Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - Printable Version

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RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-16-2017

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भौजी बिलकुल घबरा गईं और बोलीं; "हाय राम!!! आपका बदन तो जल रहा है|" इतना कहके वो चलीं गईं... मैंने वापस कम्बल ओढ़ा और सो गया| उसके बाद मुझे अपने पास लोगों की आवाज सुनाई दी और उसमें से एक आवाज जानी पहचानी थी| ये कोई और नहीं डॉक्टर साहब थे| वो मुझे उठाने की कोशिश कर रहे थे पर मैं जानबूझ के सोने का बहन कर रहा था, क्योंकि मैं जानता था की अगर मैं उठ गया तो ये जर्रूर पूछेंगे की तुमने खाना क्यों नहीं खाया| इसलिए मैं सोने का ड्रामा करता रहा .... मैं उनकी आवाजें साफ़ सुन सकता था... डॉक्टर साहब भौजी से कह रहे थे की; " देखिये आप मानु की सबसे अच्छी दोस्त हैं.. जब आप बीमार पड़ीं थी तब इन्होने आपका ध्यान रखा था और अब चूँकि ये बीमार हैं तो एक अच्छा दोस्त होने के नाते आपको इनका ख्याल रखें है| दवाई समय पर देना और खाने-पीने का भी ध्यान रखें| मौसम में आये बदलाव से इन्हें इतनी परेशानी हुई है|

पिताजी: डॉक्टर साहब लड़का बारिश में भीग गया था इसीलिए इतना बीमार पड़ा है|

डॉक्टर साहब: देखिये अंकल, मेरे अनुसार थोड़ा-बहुत भीगने से कोई इतना बीमार नहीं पड़ता, केवल जुखाम ही तंग करता है| और ऐसा भी नहीं है की मानु शारीरिक रूप से कमजोर हो, मेरा अनुमान है की इन्होने उस दिन कुछ ज्यादा ही मस्ती की है बारिश में और ऊपर से आपने बताया की कल पूरा दिन कुछ खाया भी नहीं... मैं सलाह दूंगा की आप इन्हें ज्यादा से ज्यादा आराम दें तथा थोड़ा ख्याल रखें और ये काम आपका है भाभी जी| खेर मैं एक इंजेक्शन लगा देता हूँ, बुखार कम हो जायेगा|

इंजेक्शन का नाम सुन के मेरी फटी ... पर क्या करता चुप-चाप लेटा रहा| आखिर डॉक्टर ने सुई लगाई और अपने को रोकने के बावजूद मुंह से "आह" निकल ही गई| डॉक्टर चला गया और फिर कुछ देर बाद भौजी ने मुझे जगाया और सामने बैठ के खाना खिलाया| कमरे में पिताजी की मजद्गी थी इसलिए डर के मारे मैंने भोजन कर लिया| रात्रि तक भौजी ने मेरा बहुत ख्याल रखा... मेरे आस पास रहीं पर हमारे बीच कोई बात नहीं हुई| वो तो मैं माँ का सहारा ले के उन्हें भोजन के लिए बोल देता था तब वो भोजन करने जाती थीं| रात्रि में भोजन के पश्चात माँ, बड़की अम्मा और भौजी सभी बड़े घर के आँगन में सोई| मैं अकेला कमरे में सो रहा था... नींद तो कोसों दूर थी| रात को करीब दो बजे मुझे बाथरूम जाना था इसलिए मैं उठ के बहार आया... बुखार काम लग रहा था और जब ठंडी-ठंडी हवा ने मेरे गर्म शरीर को छुआ तो आनंद आ गया| इससे पहले की मैं कमरे के बहार कदम रखता, भौजी उठ के आ गईं;

भौजी: क्या हुआ? कुछ चाहिए था आपको?

मैं: नहीं... बाथरूम जा रहा हूँ|

भौजी: (मेरा हाथ पकड़ते हुए|) मैं साथ चलूँ?

मैं: नहीं... अभी इतनी ताकत तो आ ही गई है| आप सो जाओ ...

मैं इतना कह के बहार चला गया और बाथरूम हो के आया और हाथ धो के फिर लेट गया पर नींद अब भी नहीं आई| ये समझो की सुबह होने तक हर सेकंड को गुजरते हुए मैं महसूस कर पा रहा था|

सुबह नहाना चाहता था परन्तु भौजी ने मना कर दिया और मैं मुंह हाथ धो के, ब्रश कर के वापस पलंग पे, दिवार से पीठ टिका के बैठ गया| ग्यारह बजे होंगे की तभी माँ ने भौजी से कहा की "बहु बेटा तुम खाना बनाने की तैयारी करो, मैं यहाँ बैठती हूँ"|कुछ ही देर में बड़की अम्मा ने माँ को किसी काम से बुला लिया और माँ चली गईं| मैं अकेला कमरे में बैठा था, रसिका भाभी भौजी की मदद कर रहीं थी, घर के बाकी के सभी पुरुष सदस्य खेत में थे| तभी वहां माधुरी आ गई, उसे देखते ही मेरे होश उड़ गए क्योंकि अब भी दोनों घरों के बीच शीट युद्ध जैसा माहोल था!

मैं: तुम? यहाँ क्या कर रही हो?

माधुरी: कल मुझे रसिका भाभी ने आपकी तबियत के बारे में बताया था, मैं कल भी आई थी पर तब आप सो रहे थे| आज मुझसे रहा नहीं गया तो मैं आ गई!

मैं: अगर किसी ने तुम्हें यहाँ देख लिया तो गड़बड़ हो जाएगी! (मैंने चिंता जताते हुए कहा)

माधुरी: मैं पिताजी से पूछ के आई हूँ|

मैं: (मैं उसकी दो मुही बात भांपते हुए) किसके पिताजी से?

माधुरी: आपके ... मैंने उन से गुज़ारिश की और वो मान गए|
(मुझे उसकी बातों पे बिलकुल विश्वास नहीं था ... और वो मेरे भाव को बड़ी जल्दी समझ गई|)

माधुरी: मैं खेतों में आपके पिताजी की अनुमति से यहाँ आई हूँ| यकीन ना आये तो आप अजय भैया से पूछ लीजियेगा|
(अब मुझे कुछ संतुष्टि हुई और मैंने रहत की सांस ली|)

माधुरी: उस दिन के बाद तो आपको आन चाहिए था मेरा हाल पूछने के लिए? पर कुदरत का कानून तो देखो, मुझे आपका हाल चाल पूछने आना पड़ा| आखिर क्यों भीगे आप इतना?

मैं उसकी बात समझ चूका था... उसका तात्पर्य उसके कौमार्य भांग होने से था| इसलिए मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया|

माधुरी: लगता है की आपका गुस्सा अब भी शांत नहीं हुआ? मुझे तो लगा की उस दिन अपना सारा गुस्सा आपने मेरे मर्दन (चुदाई) पर निकाल दिया होगा!!!

मैं: तुम्हें कैसे पता मैं अपना गुस्सा निकाल रहा था?

माधुरी: भले ही आप मुझसे प्यार ना करते हों पर मैं तो करती हूँ| मैं जानती हूँ आपने वो सब कितना मजबूर होक किया... आपकी शक्ल से पता लग रहा था की आप का सम्भोग करने का बिलकुल भी मन नहीं था|काश आपने वो सब मन से किया होता? पता है अब भी मैं ठीक से चल नहीं पाती... और उस दिन कितना खून निकला था?
मैं: अगर मन से ही करना होता तो मैं उस दिन कुछ नहीं करता| ये सब शादी के बाद ही होता ... पर तुम्हारी जिद्द ने मेरी जिंदगी में तूफ़ान खड़ा कर दिया है| मैं तुमसे हाथ जोड़कर रिक्वेस्ट करता हूँ, प्लीज इन बातों को मेरे सामने मत दोहराओ| मैं बहुत परेशान हूँ....

माधुरी: मुझे माफ़ कर दीजिये| खेर अब हमारा मिलना तो नहीं हो पायेगा... जैसा की आपने अपनी शर्त में कहा था की मुझे इसकी आदत नहीं डालनी है! तो अगलीबार हम मिलेंगे तो मेरे हाथ में मेरी शादी का कार्ड होगा| मुझे अपनी शादी में बुलाना तो नहीं भूलोगे ना ?

मैं: अम्म ... देखो मैं जूठ नहीं कहूँगा पर मैं तुम्हारी शादी में नहीं आ पाउँगा| तबतक मेरे स्कूल शुरू हो जायेंगे इसलिए मेरी तरफ से अभी से शुभकामनाएं| रही मेरी शादी की बात तो मैं अभी कुछ नहीं कह सकता की मेरी शादी कहाँ होगी? पर तुम्हें बुलाऊंगा जर्रूर!

माधुरी और कुछ नहीं बोली बस एक प्यारी सी मुस्कान दी| मैं जानता था की वो अपनी मुस्कान के पीछे अपने दर्द को छुपाने की कोशिश कर रही है पर मैं उसके जख्मों को कुरेदना नहीं चाहता था|

वो चली गई और उसके जाते ही भौजी अंदर आ गईं| वो में ओर देख रहीं थी ओर उनकी आँखें भर आईं थी| शायद उन्होंने हमारी बातें सुन ली थीं| वो रूवांसी होक बोलीं;

भौजी: मुझे माफ़ कर दो! मैंने आपको गलत समझा !!! मैंने आप दोनों की सारी बातें सुन ली| कितनी गलत थी मैं... (और भौजी रोने लगीं)

मैं: बस..बस..बस.. चुप हो जाओ! मैंने आपको कहा था ना की आप रोते हुए अच्छे नहीं लगते| और आपको माफ़ी मांगने की कोई जर्रूरत नहीं|पर आप तो भोजन बंनाने गए थे तो वापस क्यों आये?

भौजी: अम्मा ने कहा था की आपसे पूछ लूँ की आप भोजन में क्या खाएंगे? वो चाहती थीं की आपके पसंद का भोजन बने| अब चलिए बहार बैठिये, दो दिनों से आपने खुद को इस कमरे में बंद कर रखा है|... अब सब ठीक होगा... कोई नाराजगी नहीं !!!

खेर मैं कमरे के बहार आँगन में एक किनारे पे खाट डाल के बैठ गया.. शरीर कल ना सोने की वजह से थका हुआ सा था पर नींद आने से डर लग रहा था| ये डर क्या था ये आप सब को मैं आगे चल के बताऊंगा| अभी के लिए अच्छा ये हुआ की कम से काम भौजी ने मुझसे पुनः बात करना शुरू कर दिया|


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-16-2017

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अब आगे...

मेरे चहेरे पे अब भी एक "सदमे" के भाव थे और रह-रह के वो “डर” मुझे परेशान कर रहा था| ऐसा लग रहा था एक "विष" मेरे बदन में फैलता जा रहा है! मैं उस कमरे से बहार से तो बहार आ गया था पर "उससे" नहीं...

भौजी को थोड़ा बहुत अजब तो लग रहा होगा क्योंकि अचानक से एक हँसता खेलता हुआ इंसान गुम-सुम हो गया था| बाकी सबके सामने मैं सामान्य दिखने की पूरी कोशिश करता था, इसीलिए किसी भी घर के सदस्य ने मुझे मेरे उदास चेहरे को ना ही देखा और ना ही टोका| दोपहर के भोजन के बाद भौजी ने जिद्द की कि मैं बड़े घर से बहार निकलूं और पहले कि तरह खेलूं, हँसूँ, चहकूं पर कहीं तो कुछ था जो बदल चूका था| कुछ तो था जिसने मेरे अंदर इतना बदलाव पैदा कर दिया था|

भौजी: आखिर बात क्या है? क्यों आप इस तरह से अंदर ही अंदर घुट रहे हो? पिछले दो दिनों से मैं देख रही हूँ आप बिलकुल बदल गए हो| आप ठीक से सो भी नहीं रहे हो .. दिन भर उंघते रहते हो|

मैं: कैसे कहूँ....... जब भी मैं आँख बंद करता हूँ सोने के लिए तो बार-बार वो सब याद आता है| अब भी मुझे अपने शरीर पे उसके हाथों के चलने का एहसास होता है| एक ज़हर है जो मेरे अंदर घुलता जा रहा है| भौजी: आपने ये सब मुझे पहले क्यों नहीं बताया? क्यों आप इतने दिन तक .... खेर अब चूँकि आपका बुखार उतर चूका है मैं आपकी इस परेशानी का भी इलाज मैं ही करुँगी|

मैं: तो डॉक्टर साहिबा इस बार क्या इलाज सोचा है आपने? (मैंने माहोल को हल्का करने के लिए थोड़ा मजाक किया|)

भौजी: वो तो आज रात आपको पता चल ही जायेगा|

मैं: देखो आपने पहले ही बहुत कुछ किया है मेरे लिए ....अब और

भौजी: (मेरी बात काटते हुए) श श श श .... मैं आपकी पत्नी हूँ| ये मेरा फ़र्ज़ है!

हमेशा कि तरह इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था| और मैं मुस्कुरा दिया..... अब बस रात होनी थी... ऐसी रात जो शायद मेरे जीवन को किसी सुखद मोड़ पे ले आये|आज मैं वापस अपनी पुरानी जगह पे ही सोने वाला था, वही भौजी के घर के पास वाली जगह! मैं भोजन कर के अपनी चारपाई पे लेट गया| कुछ देर बाद माँ आई और मेरे पास बैठ के मेरा हल-चाल पूछ रही थीं| दोस्तों आप कितना भी छुपाओ पर माँ आपके हर दुःख को भांप लेती है| मेरी माँ ने भी मेरे अंदर छुपी उदासी को ढूंढ लिया था और वो इसका कारन जानना चाहती थीं| पर मैं उन्हें कुछ नहीं बता सकता था| वो तो शुक्र है की भौजी वहां आ गईं; "चाची आप चिंता मत करो, मैं हूँ ना!" भौजी ने इतना अपनेपन से कहा की माँ निश्चिन्त हो गईं और भौजी को कह गईं, "बहु बेटा, एक तुम ही हो जिसे ये सब बताता है| कैसे भी मेरे लाल को पहले की तरह हंसने बोलने वाला बना दो|" भौजी ने हाँ में सर हिलाया और माँ उठ के सोने चली गईं|

भौजी: देखा आपने? चाची को कितनी चिंता है आपकी| खेर आज के बाद आप कभी उदास नहीं होगे| मैं साढ़े बारह बजे आउंगी ....

मैं: ठीक है|

बस भौजी घर के भीतर चलीं गई और मुझे उनके किवाड़ बंद करने की आवाज आई| मैंने सोच की क्यों न मैं फिर से सोने की कोशिश करूँ, शायद कामयाबी मिल जाए| पर कहाँ जी!!! जैसे ही आँख बंद करता बार-बार ऐसा लगता जैसे माधुरी मेरी पथ सहला रही हो... कभी लगता की वो मेरे ऊपर सवार है| कभी ऐसा लगता मानो उसके हाथ मेरी छाती पे धीरे-धीरे रेंगते हुए मेरी नाभि तक जा रहे हैं| ये ऐसा भयानक पल था जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था .. तभी अचानक भौजी ने मेरे कंधे पे हाथ रखा और मैं सकपका के उठ बैठा| मेरे दिल की धड़कनें तेज थीं... चेहरे पे डर के भाव थे| माथे पे हल्का सा पसीना था... जबकि मौसम कुछ ठंडा था| धीमी-धीमी सर्द हवाएं चल रहीं थी....| मेरी हालत देख के एक पल के लिए तो भौजी के चेहरे पर भी चिंता के भाव आ गए|उन्होंने अपनी गर्दन और आँखों के इशारे से मुझे अंदर आने का कहा| मैं उठा और चुप-चाप अंदर चला गया और आँगन में खड़ा हो के गर्दन नीचे झुकाये देखने लगा| भौजी ने दरवाजा बंद किया और ठीक मेरे पीछे आके कड़ी हो गईं| धीरे से उन्होंने मेरी कमर में हाथ डाला और मुझसे लिपट गईं| उनकी सांसें मुझे अपनी पीठ पे महसूस होने लगीं थी|

उन्होंने मेरी टी-शर्ट को नीचे से पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ाते हुए उतार दिया| अब मैं ऊपर से बिलकुल नग्न अवस्था में था| मैंने आँखें बंद कर ली थीं... भौजी ने अपने होठों को जैसे ही मेरी पीठ पे रखा एक अजीब एहसास ने मुझे झिंझोड़ दिया| ऐसा लगा जैसे गर्म लोहे की सलाख को किसी ने ठन्डे पानी में डाल दिया .... श..श ..श..श..श..!!! ये चुम्बन कोई आम चुम्बन नहीं था! उन्होंने मेरी पीठ पे जहाँ-जहाँ भी अपने होठों से चूमा वहां-वहां ऐसा लग रहा था जैसे मेरे अंदर भरा माधुरी का "विष" मेरी छाती की ओर भाग रहा हो| अब मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे .... सांसें तेज हो गई.... ह्रदय की गाती बढ़ गई| धक ... धक ... की जगह दिल ढोल की तरह बजने लगा| मुझे अपनी स्वयं के हृदय की धड़कनें कानों में सुनाई देने लगी| आस-पास की कोई भी आवाज मेरे कानों तक नहीं पहुँच रही थी| माथे पे पसीना बहने लगा.... गाला सूखने लगा... कान लाल हो गए .... हाथ कांपने लगे और मन विचलित हो चूका था|

भौजी होले से मेरे कान में खुसफुसाई; "आप लेट जाओ!" .. मैं बिना कुछ कहे, बिना कुछ समझे, मन्त्र मुग्ध सा होके चारपाई पे पीठ के बल लेट गया| आँखें बंद थी, इसलिए लुच नहीं पता था की क्या होरह है| बस मुझे चूड़ियों के खनकने की आवाज आ रही थी| धीरे-धीरे मुझे भौजी के पायल की आवाज सुनाई दी| वो मेरे पैरों के पास थी, उन्होंने धीरे से मेरे पजामे को नीचे खींचा परन्तु पूरी तरह उतार नहीं| फिर मेरे कच्छे को भी उन्होंने खूनच के घुटनों तक कर दिया| वो किसी जंगली शिकारी की तरह मेरे ऊपर नीचे की तरफ से बढ़ने लगी| ये सब मैं महसूस कर पा रहा था| थोड़ी ही देर में मुझे अपनी छाती पे उनके नंगे स्तन रगड़ते हुए महसूस हुए|भौजी का मुख ठीक मेरे मुंह के सामने था क्योंकि मुझे अपने चेहरे पे उनकी गर्म सांसें महसूस हो रहीं थी|सबसे पहले उन्होंने अपने हाथो से मेरे मुंह का पसीना पोंछा फिर उन्होंने झुक के मेरे मस्तक को चूमा| उनका चुमबन गहरा होता जा रहा था ... वो करीब पांच सेकंड तक अपने होठों को मेरे मस्तक पर रखे हुई थीं| अब जो विश मेरे मस्तिष्क पे भारी पड़ रहा था वो अब नीचे उतारने लगा था| धीरे-धीरे भौजी मेरे मस्तक से नीचे आने लगी| उन्होंने मेरी नाक को चूमा... मेरे बाएं गाल को चूमा...फिर दायें गाल को| ऐसा लगा मानो वो विष मेरी गर्दन तक नीचे उतर चूका हो| फिर उन्होंने मेरे कंठ को चूमा... एक पल के लिए लगा जैसे मेरी सांस ही रूक गई हो| अब उन्होंने मेरे दायें हाथ को उठा के अपने होठों के पास लाईं... फिर मेरी हथेली को चूमा... विष कुछ ऊपर को चढ़ा| भौजी भी थोड़ा ऊपर की ओर बढ़ीं... थोड़ा और... फिर मेरी कोहनी को चूमा .. थोड़ा और ऊपर .... फिर मेरे कंधे को चूमा|

अब भौजी ने मेरे बाएं हाथ को उठाया और उसे अपने होठों के पास लाईं... मेरी हथेली को चूमा और विष वहाँ से भी ऊपर की ओर भागने लगा| भौजी ने मेरी कलाई को चूमा... थोड़ा और ऊपर ... मेरी कोहनी को चूमा... थोड़ा और ऊपर और फिर मेरे कंधे को चूमा| अब जैसे सारा विष मेरी छाती में इकठ्ठा हो चूका था| ऐसा लगा जैसे वो वापस पूरे शरीर में फ़ैल जाना चाहता हो पर चूँकि भौजी ने मेरी पीठ, मस्तक, गले और हाथों को अपने चुमबन से चिन्हित (मार्केड) कर दिया था इसलिए विष को कहीं भी भागने की जगह नहीं मिल रही थी| परन्तु अब भी भौजी का उपचार अभी भी खत्म नहीं हुआ था...
अब भौजी ने मेरी छाती पे हर जगह अपने चुम्बनों की बौछार कर दी| परन्तु अब भी वो हर अपने होठों को मेरी छाती से पांच सेकंड तक छुए रहती| उन्होंने मेरे निप्पलों को चूमा... मेरी नाभि कुछ भी उन्होंने नहीं छोड़ी थी| विष जैसे अब नीचे की ओर भागने लगा था| अंत में उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे लंड को पकड़ा और उसकी चमड़ी को धीरे-धीरे नीचे किया| अब सुपाड़ा बहार आ चूका था ... उन्होंने मेरे छिद्र पे अपने होंठ रख दिए| मेरा कमर से ऊपर का बदन कमान की तरह खींच गया... भौजी ने धीरे-धीरे सुपाड़े को अपने मुंह में भरना शुरू किया|

अब मुझे लग रहा था की भौजी उसे अंदर-बहार करेंगी पर नहीं.... वो बस सुपाड़े को अपने मुंह में भरे स्थिर थीं! अब मेरी कमर से नीचे के हिस्से में कुछ होने लगा था... जैसे कोई चीज बहार निकलने को बेताब हो! मैं उसे बाहर निकलते हुए महसूस करा पा रहा था| पर असल में कुछ भी नहीं हो रहा था .... धीरे-धीरे मेरा शरीर ऐठने लगा| लगा की अब मैं मुक्त हो जाऊंगा....!!!

धीरे ... धीरे ... धीरे... धीरे... मेरा बदन सामान्य होने लगा| मैं अब शिथिल पड़ने लगा.... शरीर ने कोई भी प्रतिक्रिया देनी बंद कर दी| सांसें नार्मल होने लगी .... ह्रदय की गति सामान्य हो गई| अब भौजी मेरे ऊपर आके लेट गईं| उनके नंगे स्तन मेरी छाती से दबे हुए थे और उनके हाथों ने मुझे अपने आलिंगन से जकड़ा हुआ था| मैंने भी उन्हें अपनी बाँहों में भर लिया ... मेरे हाथ उनकी नंगी पीठ पर थे और हम ऐसे ही एक दूसरे से लिपटे रहे| ना जाने भौजी को क्या सूझी उन्होंने मेरे लंड को अपने हाथ से पकड़ा और अपनी योनि में प्रवेश करा दिया| मुझे लगा शायद भौजी का मन सम्भोग करने का है पर ये करने के बाद भी उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और वैसे ही मेरे ऊपर बिना हिले-डुले लेटी रहीं|उनकी योनि अंदर से पनिया चुकी थी और मुझे अपने लंड पे गर्मी का एहसास होने लगा था| पर नींद मेरे ऊपर हावी होने लगी| पिछले कई दिनों से मैं ठीक तरह से सो नहीं पाया था और आज भौजी के इस तथाकथित उपचार के बाद मुझे मीठी-मीठी नींद आने लगी थी| नाजाने कब मेरी आँखें बंद हुई मुझे पता नहीं... 

जब आँख खुली तो सर पे सूरज चमक रहा था| मैं जल्दी से उठ के बैठा तो पाया की मैं रात को भौजी के घर में ही सो गया था और मैं अब भी अर्ध नग्न हालत में था| मैंने जल्दी से पास पड़ी मेरी टी-शर्ट उठाई और पहन के बहार आ गया| मेरी फटी हुई थी क्योंकि मैं और भौजी रात भर अंदर अकेले सोये थे| अब तक तो सारे घर-भर में बात फ़ैल चुकी होगी| आज तो शामत थी मेरी !!!

जैसे ही मैं घर के प्रमुख आँगन में आय तो सामने पिताजी दिखाई दिए, उन्होंने बड़ी कड़क आवाज में मुझसे पूछा; "क्यों लाड-साहब उठ गए? नींद पूरी हो गई? या बही और सोना है? कहाँ गुजारी सारी रात? तुम तो आँगन में सोये थे अंदर कैसे पहुँच गए?"

मेरे पास उनकी बातों का कोई जवाब नहीं था इसलिए मैं चुप-चाप गर्दन झुकाये खड़ा रहा| मैंने कनखी नजरों से देखा तो भौजी छप्पर के नीचे छुपी मुझे देख रही थीं| उन्होंने मुझे इशारे से कुछ समझाना चाहा परन्तु मैं समझ नहीं पा रहा था .... भौजी बार-बार अपने माथे पर हाथ फेर रहीं थीं मैंने थोड़ा सा अंदाजा लगाया और जल्दी से पिताजी के सवालों का जवाब देने लगा;

मैं: जी वो रात को सर दर्द कर रहा था तो मैं भौजी से दवाई लेने गया था| तो भौजी मेरा सर दबाने लगीं और मुझे वहीँ नींद आ गई|

पिताजी: सर में दर्द था तो माँ को बताता क्यों अपनी भाभी को तंग करता रहता है?

मैं: जी, माँ को उठाने जाता तो बड़की अम्मा भी जाग जाती| और मैं नहीं चाहता था की बड़की अम्मा या माँ परेशान हों|

पिताजी: तो इसलिए तू बहु को परेशान करने पहुँच गया| सारा दिन वो काम करती है और तू उसे तंग करने से बाज नहीं आता| पता भी है की तेरी वजह से तेरी प्यारी भाभी कहाँ सोई रात भर? सारी रात बेचारी तख़्त पे सोई वो भी बिना बिस्तर के? कुछ तो शर्म कर !!!

मैं गर्दन झुकाये नीचे देखने ला और मुझे खुद पर क्रोध आने लगा क्योंकि मेरी वजह से भौजी को तख़्त पे सोना पड़ा| मैं अब भी कनखी नजरों से भौजी को देख रहा था जैसे उनसे माफ़ी मांगने की कोशिश कर रहा हूँ| तभी माँ रसोई से निकली और बीच में बोल पड़ीं;

माँ: अजी छोड़िये से, इसकी तो आदत है| यहाँ आके अपनी भौजी का बहुत दुलार करता है| आप लोग तो खेत चले जाते हो और ये बस भौजी-भौजी करता रहता है... ये नहीं सुधरेगा| आप जाइये भाई साहब (बड़के दादा) खेत में आपका इन्तेजार करते होंगे|और तू (मेरी ओर ऊँगली से इशारा करते हुए) चल जा जल्दी से नहा-धो ले ओर जल्दी से चाय पी| तेरी भौजी को और भी काम हैं सिर्फ तेरी तीमारदारी ही नहीं करनी... जा जल्दी|

मैं फ्रेश हो के आया और भौजी से माफ़ी मांगने के लिए व्याकुल था| परन्तु आस-पास माँ, बड़की अमा और रसिका भाभी मौजूद थे इसलिए मैं कुछ कह नहीं पाया| कुछ देर सर जुखाये बैठने के बाद मैंने मन में ठान लिया की भले ही सबके सामने सही पर माफ़ी माँगना तो बनता है| माँ और बड़की अम्मा दाल-चावल साफ़करने में लगे थे और रसिका भाभी बटन तांख रहीं थी|

मैं: अम्म्म.... भौजी... मुझे माफ़ कर दो! मेरी वजह से आपको कल रात तख़्त पे बिना बिस्तर के सोना पड़ा| I'M Sorry !!!

भौजी: देख रहे हो अम्मा, एक दिन मुझे तख़्त पे क्या सोना पड़ा ये माफ़ी माँग रहे हैं| अरे अगर मैं तख़्त पे सो गई तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा| आप वैसे भी बहुत दिनों से ठीक से नहीं सोये थे अब मेरे सर दबाने से आपको वहीँ नींद आ गई तो इसमें आपका क्या कसूर| मैंने आपको इसीलिए नहीं उठाया की मैं आपकी नींद खराब नहीं करना चाहती थी|

बड़की अम्मा: अरे मुन्ना कोई बात नहीं... तुम भी तो अपनी भौजी की बिमारी में सारी रात जागे थे| तुम दोनों के रिश्ते में इतना प्यार है की तुम दोनों एक दूसरे के लिए ये छोटी-छोटी कुर्बानी देते रहते हो| भूल जाओ इस बात को, और आने दो तुम्हारे पिताजी को जरा मैं भी तो डाँट लगाऊँ उन्हें|

अम्मा की बात सुनके सब हंस दिए और पुनः अपने-अपने काम में लग गए| मेरा मन अब कुछ हल्का हो गया था ... परन्तु अब मन में कल रात को जो हुआ उसे ले कर विचार उमड़ने लगे| वो सब क्या था, और मुझे ये सब अजीब एहसास क्यों हो रहा था? हालाँकि मैं भूत-प्रेत, आत्मा पर विशवाास नहीं करता था परन्तु कल रात हुए उस एहसास ने मुझे थोड़ा चिंतित कर दिया था| अगर कोई मेरी चिंता दूर कर सकता था तो वो थीं "भौजी" पर सब के सामने मैं उनसे इस बारे में कुछ नहीं कह सकता था| इसलिए मैं सब्र करने लगा... दोपहर भोजन बाद समय मिल ही गया बात करने का| भोजन के बाद सभी पुरुष सदस्य आँगन में ही चारपाई डाल के बैठे थे| मौसम कुछ शांत था.. ठंडी-ठंडी हवाएं चल रहीं थी, आसमान में बदल थे और धुप का नामो निशान नहीं था| नेहा स्कूल से आ चुकी थी और भोजन करने के बाद मेरी ही गोद में सर रख के सो चुकी थी| मैं आँगन में चारपाई पे बैठा था... कुछ ही देर में भौजी भी वहां आ गईं और मेरे सामने नीचे बैठ गईं|

मैं: अरे, आप नीचे क्यों बैठे हो? ऊपर बैठो

भौजी: नहीं सभी घर पे हैं और उनके सामने मैं कैसे...

मैं: (बीच में बात काटते हुए) मैं नहीं जानता कोई क्या सोचेगा आप बस ऊपर बैठो! मुझे आप से कुछ पूछना है?

भौजी मेरी बात मानते हुए मेरी चारपाई पे कुछ दूरी पे बैठ गईं| दरअसल हमारे गाँव में कुछ रीति रिवाज ऐसे हैं जिन्होंने औरत को बहुत सीमित कर रखा है| यूँ तो अकेले में भौजी मेरे साथ बैठ जाया करती थी परन्तु जब घर के बड़े घर में मौजूद हों तब वो मुझसे दूर ही रहती थीं| उनके सामने हमेशा घूँघट और मुझसे गज भर की दूरी|

भौजी: अच्छा जी ! पूछिये क्या पूछना है आपको?

मैं: (मैंने भौजी को रात में मुझे जो भी महसूस हुआ वो सब सुना दिया और फिर अंत में उनसे पूछा...) कल रात को मुझे क्या हुआ था...? मैं ऐसा अजीब सा बर्ताव क्यों कर रहा था?

भौजी: (थोड़ा मुस्कुराते हुए) मन कोई डॉक्टर नहीं... ना ही कोई ओझा या तांत्रिक हूँ! कल दोपहर में जब आपने अपने अंदर आये बदलावों को बताया तो मैं समझ गई थी की आपको क्या तकलीफ है| ये एक तरह का संकेत था की आप मुझसे कितना प्यार करते हो| आपका वो बारिश में भीगना... ठन्डे पानी से रात को बारिश में साबुन लगा-लगा के नहाना.. चैन से ना सो पाना.. बार-बार ऐसा लगना की माधुरी के हाथ आपके शरीर से खेल रहे हैं या आपको ऐसा लगना की उसके शरीर की महक आपके शरीर से आ रही है... ये सब आप के दिमाग की सोच थी| आप अंदर ही अंदर अपने आपको कसूरवार ठहरा चुके थे और अनजाने में ही खुद को तकलीफ दे रहे थे| आपका दिल आपके दिमाग पे हावी था और धीरे-धीरे आपको भ्रम होने लगा था| मैंने कोई उपचार नहीं किया.... कोई जहर आपके शरीर से नहीं निकला| बस आप ये समझ लो की मैंने आपको अपने प्यार से पुनः "चिन्हित" किया| ये आपका मेरे प्रति प्यार था जिससे आपको इतना तड़पना पड़ा और मैंने बस आपकी तकलीफ को ख़त्म कर दिया| 


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-16-2017

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अब आगे...

मैं: (मैंने भौजी को रात में मुझे जो भी महसूस हुआ वो सब सुना दिया और फिर अंत में उनसे पूछा...) कल रात को मुझे क्या हुआ था...? मैं ऐसा अजीब सा बर्ताव क्यों कर रहा था?

भौजी: (थोड़ा मुस्कुराते हुए) मन कोई डॉक्टर नहीं... ना ही कोई ओझा या तांत्रिक हूँ! कल दोपहर में जब आपने अपने अंदर आये बदलावों को बताया तो मैं समझ गई थी की आपको क्या तकलीफ है| ये एक तरह का संकेत था की आप मुझसे कितना प्यार करते हो| आपका वो बारिश में भीगना... ठन्डे पानी से रात को बारिश में साबुन लगा-लगा के नहाना.. चैन से ना सो पाना.. बार-बार ऐसा लगना की माधुरी के हाथ आपके शरीर से खेल रहे हैं या आपको ऐसा लगना की उसके शरीर की महक आपके शरीर से आ रही है... ये सब आप के दिमाग की सोच थी| आप अंदर ही अंदर अपने आपको कसूरवार ठहरा चुके थे और अनजाने में ही खुद को तकलीफ दे रहे थे| आपका दिल आपके दिमाग पे हावी था और धीरे-धीरे आपको भ्रम होने लगा था| मैंने कोई उपचार नहीं किया.... कोई जहर आपके शरीर से नहीं निकला| बस आप ये समझ लो की मैंने आपको अपने प्यार से पुनः "चिन्हित" किया| ये आपका मेरे प्रति प्यार था जिससे आपको इतना तड़पना पड़ा और मैंने बस आपकी तकलीफ को ख़त्म कर दिया|

मैं: (मुस्कुराते हुए) तो ये मेरे दिम्माग की उपज थी... खेर आपने सच में मेरी जान बचा ली| वरना मैं पागल अवश्य हो जाता|

भौजी: मैं ऐसा कभी होने ही नहीं देती|

मैं: अच्छा ये बताओ, आपने ये उपचार कहाँ सीखा? कौन सी पिक्चर में देखा आपने ये उपचार का तरीका? (मैं हंसने लगा|)

भौजी: पिक्चर.... आखरी बार पिक्चर मैंने आपके ही घर में देखी थी| मैंने तो बस वाही किया जो मेरे दिल ने कहा| खेर मुझे भी आप से माफ़ी मांगनी है, मेरी वजह से आपको पिताजी से इतना सुन्ना पड़ा वो भी सुबह-सुबह|

मैं: ये तो चलता रहता है... उन्होंने कुछ गलत नहीं कहा था| गलती मेरी ही थी... पर मुझे नींद कब आगे पता ही नहीं चला| मेरे सोने के बाद आखिर हुआ क्या था, आप बहार कब आके सो गए?

भौजी: दरअसल मैं आपके पास रात दो बजे तक लेटी थी... फिर मुझे लगा की अगर सुयभ किसी को पता चला की आप और मैं एक ही घर में अकेले सोये थे तो लोग बातें बनाने लग जाते| इसलिए मैं कपडे पहन केचुप-चाप बहार आ गई| सच कहूँ तो मेरा मन बिल्क्कुल नहीं था की मैं आपको अकेला सोता छोड़ के जाऊँ| मुझे बहुत आनंद आ रहा था आपके साथ इस तरह सोने में पर क्या करूँ? और हमारे बेच रात में कुछ नहीं हुआ... हालाँकि मेरा मन तो था पर आप सो चुके थे इसलिए मैं आपके पास चुप-चाप लेटी रही|

मैं: ओह सॉरी! पर आप मुझे उठा देते|

भौजी: मैं इतनी स्वार्थी नहीं की अपनी जर्रूरत के लिए आपकी नींद खराब कर दूँ| कल रात ना सही तो आज सही!!

मैं: आज रात तो कोई मौका ही नहीं... कल रात जो हुआ उसके बाद अब तो मेरे नाम का वारंट निकल चूका है| अगर मैं रात को आपके घर के आस-पास भी भटका ना तो मेरी फाँसी तय है|

भौजी का मुंह लटक गया... उनके मुख पे परेशानी के भाव थे, बुरा तो मुझे भी लग रहा था पर मैं अब इसका समस्या का हल ढूँढना चाहता था| चुप्पी तोड़ते हुए मैंने कहा; "मुझ पे भरोसा रखो... भले ही कितना सख्त पहरा हो पर मैं आज रात जर्रूर आऊंगा| पहले ही मैं आपको बहुत दुःख दे चूका हूँ पर अब और नहीं|" भौजी को मेरी चिंता हुई तो वो बोलीं; "नहीं ... प्लीज आप कुछ ऐसा मत करना| धीरे-धीरे सब शांत हो जाएगा और सभी भूल जायेंगे| तब तक आप कुछ भी गलत मत करना"| सच कहूँ तो मैं कोई भी खतरा उठाने को तैयार था, पर मुझे आज किसी भी हालत में भौजी की ये " ख्वाइश" पूरी करनी थी| अब दिमाग फिर से प्लानिंग में लग गया... पर कई बार चीजें इतनी आसानी से हो जाती हैं की आपकी साड़ी प्लानिंग धरी की धरी रह जाती हैं| भौजी उठ के अपने घर के भीतर चलीं गई... मैं जानता था की उनका मूड ख़राब है| अब कुछ तो करना था मुझे, इसलिए दस मिनट रुकने के बाद मैं उठा और नेहा को गोद में उठाया और भौजी के घर के अंदर घुस गया| अंदर भौजी कमरे के एक कोने पे सर झुकाये खड़ी थी| शायद उन्हें बुरा लगा की अब हम दोनों रात को एक साथ नहीं रह पाएंगे| मैंने नेहा को चारपाई पर लेटाया और भौजी के एक डैम करीब खड़ा हो गया| मैंने उनका मुँह उठाया और उनकी आँखों में देखने लगा|

मैंने उनके होठों को चूमा और फिर उन्हें गले लगा लिया.... आह! क्या ठंडक पड़ी कलेजे में| भौजी भी मुझसे एक डैम लिपट गई और मुझे इतना कस के गले लगाया की एक पल के लिए तो लगा जैसे वो मुझे दुबारा मिलेंगी ही नहीं| या जैसे एक सदी के बाद हम मिले हों... मैं जानता था की कुछ भी करने के लिए ये समय ठीक नहीं है... इसलिए मैं "आगे" नहीं बढ़ा| हम जब अलग हुए तभी मुझे किसी के आने की आहट आई और मैंने फ़ौरन भौजी से ऊँची आवाज में बात करनी शुरू कर दी....

मैं: मैं बैटिंग करता हूँ और आप बॉल डालो|

भौजी: (मेरा इशारा समझते हुए) आपको क्रिकेट खेलना है तो नेहा के साथ खेलो, आप हर बार मेरी बॉल बहुत जोर से पीटते हो!

मैं: (भौजी की डबल मीनिंग बात का अर्थ समझ गया पर मुझे ये बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा और मुंह बनाते हुए कहा) आप रहने दो, जब नेहा उठेगी तब उसी के साथ खेलूंगा|

इससे पहले की भौजी कुछ कहतीं ... रसिका भाभी आ गईं| अर्थात वो रसिका भाभी की ही आने की आहट थी|

रसिका भाभी: मानु जी, आप से कुछ बात करनी थी?

मैं: हाँ बोलो

रसिका भाभी बोलने में थोड़ा झिझक रहीं थी और मुझे समझने में देर नहीं लगी की उन्हें अकेले में माधुरी के बारे में बात करनी है| अब चूँकि माधुरी के नाम से ही घर के सभी सदस्य चिढ़ते थे इसलिए रसिका भाभी भूल से भी उसका जिक्र किसी के सामने नहीं करती थीं| इससे पहले की बात आगे बढे, भौजी बीच में ही बोल पड़ीं;

भौजी: अरे ऐसी कौन सी बात है जो तुम दोनों को मुझसे छुपानी पद रही है| वैसे भी ये (मेरी और इशारा करते हुए) मुझसे कोई बात नहीं छुपाते| तो बेहतर होगा की मेरे सामने ही बात कर लो...

रसिका भाभी: जीजी ऐसी कोई बात नहीं... दरअसल माधुरी के बारे में बात करनी थी तो...

भौजी: (बात काटते हुए) तो मुझसे कैसा पर्दा? आज से पहले तो तुम मुझे सब बात बताया करती थी? और अगर तुम्हें लग रहा है की मैं अम्मा को बता दूंगी तो निश्चिंत हो जाओ मैं किसी को नहीं बताऊँगी| अब बताओ क्या बात है? अब क्या चाहिए उसे?

रसिका भाभी: वो .. माधुरी ने मानु जी के लिए संदेसा भिजवाया है| वो कह रही थी की आप उसे छः बजे स्कूल पे मिलो|

मैं: ना ... मैं नहीं जा रहा| वो फर से वही बातें करेगी ...... SORRY !!!

मैं इतना कह के बहार आ गया .... बहार आते ही मुझे अजय भैया ने पकड़ लिया और जबरदस्ती पिताजी के पास ले गए| कोई ख़ास बात नहीं थी दरअसल पिताजी चाह रहे थे की आज मौसम बहुत अच्छा है तो मैं अजय भैया के साथ बाजार से सब के लिए कुछ खाने को लाऊँ| मैं जल्दी से तैयार हुआ और अजय भैया के साथ बाजार चला गया| बाजार पहुँच के मैं दुकानों का मुआयना करने लगा और मैंने सब के लिए खाने के लिए जलेबी, आलू की टिक्की, भल्ले पापड़ी और कोल्ड ड्रिंक्स लीं| अजय भैया भी हैरान थे की मैं इतनी रिसर्च कर कर के खरीदारी कर रहा था|करीब दो घंटे की रिसर्च के बाद सामान ले के हम घर पहुँचे... रास्ते में हमें माधुरी दिखी और उसने मेरे हाथ में जब सामान दिखा तो वो समझ गई| वो चुप-चाप चली गई, अजय भैया के मुंह पे भी गुस्से के भाव थे| मैंने भैया को कोहनी मारते हुए घर की ओर चलने का इशारा किया और हम रस्ते में बाते करते-करते घर पहुँच गए| सभी ने बड़े चाव से खाया और गप्पें लगाने लगे| रसिका भाभी ने तो दबा के टिक्की खाई... जैसे कभी खाई ही ना हो! सबसे ज्यादा मेरी तारीफ भी उन्होंने ही की ... बातों-बातों में पता चला की मेरी गैर मौजूदगी में भौजी का भाई (अनिल) आया था| अब ये सुनते ही मैं समझ गया की फिर से भौजी के घर में कोई हवन होगा या कोई समारोह होगा और वो भौजी को कल सुबह ले जाएगा| मन खराब हुआ और मैं चुप-चाप उठ के कुऐं की मुंडेर पे बैठ गया| हालांकि मेरे मुख पे अब भी नकली मुस्कान चिपकी थी पर भौजी मेरे भावों को भलीं-भांति जानती थी ... इसलिए भौजी भी सबसे नजर बचा के मेरे पास आईं|

भौजी: क्या हुआ?

मैं: कुछ भी तो नहीं|

भौजी: तो आप यहाँ अकेले में क्यों बैठे हो? आप जानते हो ना आप मुझसे कोई बात नहीं छुपा सकते|

मैं: (ठंडी सांस एते हुए) आज आपका भाई आया था ना आपको लेने .... तो कब जा रहे हो आप?

भौजी: सबसे पहली बात, मेरा भाई यानी आपका "साला" और दूसरी बात वो आज इसलिए आया था की मेरे पिताजी यानी आपके "ससुरजी" के दोस्त (चरण काका) की लड़की की शादी है|

मैं: ठीक है बाबा साले साहब आपको लेने ही तो आये थे ना? कितने दिन के लिए जा रहे हो?

भौजी: अब शादी ब्याह का घर है तो कम से कम एक हफ्ता तो लगेगा ही|

एक हफ्ता सुन के मैं मन ही मन उदास हो गया, और मुझे फैसला करने में एक सेकंड भी नहीं लगा की कल जब भौजी निकलेंगी तभी मैं उन्हें अलविदा कह दूँगा और अगले दिन ही वापस चला जाऊँगा|

मैं: (अपने मुंह पे वही नकली हंसी चिपकाए बोला) ठीक है... आप जर्रूर जाओ| आखिर आपके काका की लड़की की शादी है|

भौजी: दिल से कह रहे हो?

मैं: हाँ … (मैंने जूठ बोला, क्योंकि मैं नहीं चाहता था की भौजी शादी में मेरी वजह से ना जाएँ|)

भौजी: वैसे आपसे किसने कहा की मैं जा रही हूँ| मैंने भाई को मना कर दिया… मैंने उसे कह दिया की मेरा मन नहीं है|

मैं: और वो मान भी गया?

भौजी: नहीं ... मैंने थोड़ा झूठ और थोड़ा सच बोला| मैंने कहा की शहर से चाचा-चाची यानी मेरे "ससुर और सास" आये हैं और ख़ास तौर पे आप को छोड़ के गयी तो आप नाराज हो जाओगे|

मैं: क्या? आपने उसे सब बता दिया? वैसे मैं नाराज नहीं होता|

भौजी: अच्छा जी ??? पिछली बार जब मैं हवन के लिए मायके गई थी तो जनाब ने सालों तक कोई बात नहीं की| इस बार अगर जाती तो आप तो मेरी शकल भी नहीं देखते दुबारा|

मैं: ऐसा नहीं है... आप को जर्रूर जाना चाहिए| हमने इतने दिन तो एक साथ गुजारे हैं|

भौजी: मैं इतने भी बुद्धू नहीं की अपनी बकरी (मैं) को शेरनियों (रसिका भाभी और माधुरी) के साथ अकेला छोड़ जाऊँ!!! वैसे भी सच में मेरा मन बिलकुल नहीं की मैं आपको छोड़ के कहीं जाऊँ|

मैं: ठीक है, जैसी आपकी मर्जी! पर मैं ये जानने के लिए उत्सुक हूँ की आपने साले साहब से आखिर बोला क्या? मुझे साफ़ शब्दों में बताओ|

भौजी (हँसते हुए) मैंने कहा की; सालों बाद शहर से चाचा-चाची आये हैं| मुझे उनकी देख-भाल करने के लिए यहीं रुकना होगा| और ख़ास कर तुम्हारे (अनिल के) जीजा जी (चन्दर भैया) का भाई जो दिल्ली से आया है! वो सिर्फ और सिर्फ मुझसे मिलने आये हैं| याद है पिछली बार जब मैं हवन के लिए घर आई थी तो वापस जाते हुए उन्होंने (मैंने) मुझसे बात भी नहीं की थी| और वैसे भी मेरा मन नहीं इस शादी में जाने का, अभी-अभी नेहा का स्कूल भी शुरू हुआ है और मैं नहीं चाहती की उसका स्कूल छूटे! ये सब कहने के बाद मेरा भाई माना|

मुझे भौजी का नाजाने पर थोड़ा बुरा तो लगा पर उनके नाजाने की ख़ुशी सबसे ज्यादा थी|

मैं: मतलब की साले साहब को पता चल गया की आपके और मेरे बीच में कुछ तो पक रहा है| और अब वो यही बात जाके "सास-सासुर" को भी बता देंगे| क्या इज्जत रह जाएगी मेरी?

भौजी: तो बताने दो ना ...कोई कुछ नहीं कहेगा क्योंकि सब जानते हैं की हमारे बीच में केवल देवर-भाभी का रिश्ता है| ये तो सिर्फ हम दोनों जानते हैं की हमारा रिश्ता उस रिश्ते से कहीं अधिक पवित्र है! अब छोडो इन बातों को और चलो सब के पास वरना फिर सब कहेंगे की दोनों क्या खिचड़ी पका रहे हैं|

मैंने भी इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और वापस सब के साथ घुल-मिल कर बैठ गया और बातें करना लगा| आज रात भोजन बनने में बहुत देर हो गई... जब सभी पुरुष सदस्य भोजन के लिए बैठे तब भौजी के मायके से आये अनिल की बातें शुरू हो गईं|

पिताजी: बहु तुम गई क्यों नहीं अपने भाई के साथ? आखिर तुम्हारे चरण काका की लड़की की शादी थी| तुम्हें जाना चाहिए था?

भौजी: (घूँघट किये रसोई से बोलीं) चाचा... मेरा मन नहीं था जाने का और फिर नेहा का स्कूल भी तो है|

पिताजी: बहु बेटा, नेहा को तो कोई भी संभाल लेता और यहाँ तुम्हारा लाडला देवर भी तो है| नेहा उसी के पास तो सबसे ज्यादा खुश रहती है| ये उसका अच्छे से ध्यान रखता|

माँ: (बीच में बात काटते हुए बोली) जाती कैसे? आपके लाड़-साहब जो नाराज हो जाते| याद है पिछली बार जब बहु मायके गई थी तो लाड़ साहब ने बात करना बंद कर दिया था|

पिताजी: क्यों रे?

मैं: जी मैंने कब मना किया... मैं तो खुद इन्हें ससुराल छोड़ आता हूँ| (मेरे मुंह से अनायास ही "ससुराल" शब्द निकल पड़ा|)

पिताजी: रहने दे तू, पहले बहु को मायके छोड़के आएगा और अगले दिन ही यहाँ से चलने के लिए बोलेगा|

पिताजी ने बिलकुल सही समझा था... आखिर वो भी मेरे बाप हैं! अब मेरे पास बोलने के लिए कुछ नहीं था तो मैं चुप-चाप भोजन करता रहा| मेरे बचाव में कोई बोलने वाला नहीं था... कोई बोलता भी क्या| सभी चाहते थे की भौजी शादी में जाए|


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अब आगे...

भोजन के पश्चात मैं अपनी चारपाई पे बैठा था और नेहा हमेशा की तरह कहानी सुनते-सुनते मेरी गोद में ही सो गई| भौजी जब नेहा को लेने आईं तो मैंने उनसे कुछ बात की;

मैं: आप चले जाओ शादी में, मेरे लिए| नहीं तो घर के सब लोग मुझे ही दोष देंगे|

भौजी: मैं आपकी कोई भी बात मान सकती हूँ पर मैं सच में इस शादी में नहीं जाना चाहती| मैं आपसे अलग नहीं रह सकती| प्लीज मुझे जाने के लिए मत कहिये, मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ| और रही बात आपको दोष देने की तो मैं देखती हूँ कौन आपसे कुछ कहता है|

मैं ठीक है, पर वादा करो की मुझे लेके आप किसी से लड़ाई नहीं करोगे| अगर इस बारे में कोई कुछ कहे भी तो भी आप चुप रहोगे| बोलो मंजूर है?

भौजी: आपने मुझे गजब दुविधा में डाल दिया.. पर ठीक है आपसे अलग रहने से तो अच्छा है की मैं चुप रहूँ| पर अगर बात हद्द से बढ़ गई तो मैं आपकी भी नहीं सुनुँगी|

ऐसा पहली बार था की मैंने भौजी के ऐसे बागी तेवर देखे थे!

मैं: मुझे आप से एक और बात कहनी है, मुझे आपका ये डबल मीनिंग वाली बातें करना बिलकुल पसंद नहीं| इसलिए आइन्दा ये डबल मीनिंग वाली बातें मुझसे मत करना|

भौजी: डबल मीनिंग बात?

मैं: शाम को जब हम दोनों क्रिकेट की बात कर रहे थे तब... डबल मीनिंग वाली बातें मतलब= दो अर्थ वाली बातें| ये बातें आपको शोभा नहीं देती| आपका चरित्र ऐसा नहीं है इसलिए आइन्दा कभी भी मुझसे ऐसी बातें मत करना|

भौजी: सॉरी जी! मैं तो बस थोड़ा मजाक कर रही थी| आगे से इस बात का ध्यान रखूंगी|

मैं बस थोड़ा मुस्कुराया और बात खत्म की| भौजी नेहा को गोद में ले के चली गईं... मैं भी लेट गया पर अब भी मैं भौजी "ख्वाइश" पूरी करने के बारे में सोच रहा था| कई बार मित्रों सीधा रास्ता मुश्किल होता है परन्तु मंजिल तक तो पहुंचा ही देता है| जैसे ही घडी में रात के एक बजे मैं उठा और भौजी के घर की ओर चल दिया| दरवाजा खुला था, और मैं चुप-चाप अंदर पहुँच गया| देखा तो भौजी अंदर सो रहीं थी! जब उन्हें सोते हुए देखा तो बस देखता ही रह गया ... बहुत प्यारी लग रही थीं वो| मैं बस दरवाजे पे खड़ा उन्हें निहारता रहा... मन ही नहीं किया की वहां से जाऊँ या उन्हें जगाऊँ| मैं धीरे-धीरे भौजी के पास गया और झुक के उनके होठों को चूमा| शायद भौजी को जबरदस्त नींद आ रही थी इसलिए उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी| मैं चुप-चाप दुबारा दरवाजा बंद कर के वापस अपनी चारपाई पे आके सो गया|

नई सुबह.. नया दिन... पर आज कुछ तो ख़ास बात थी| जब मेरी आँख खुली तो मुझे "चक्की" चलने की आवाज आई| मैं उठ के बैठा और पाया की मेरे आस-पास कोई नहीं है| कुछ देर में मुझे माँ और बड़की अम्मा आते हुए दिखाई दिए| मेरे नजदीक आके माँ ने कहा की; "जल्दी से हाथ-मुंह धो के तैयार हो जाओ| और हाँ नहाना मत!" मैंने ना नहाने का करना पूछा तो पता चला की आज मुझे "बुक्वा" लगेगा|

मित्रों चूँकि आप नहीं जानते की "बुक्वा" क्या होता है तो मैं आपको इसके बारे में डिटेल में बताता हूँ| हमारे गाँव में स्त्रियाँ घर की चक्की पे सरसों को पीसती हैं और फिर उस मिश्रण में सरसों का तेल मिलाया जाता है| कहते हैं की इस मिश्रण को बदन पे लगाने से निखार और तमाम खाज-खुजली की तकलीफें ठीक हो जाती हैं| इसे घर की स्त्रियाँ ही लगाती हैं पर हाँ ये सिर्फ और सिर्फ घर के पुरुषों के लिए होता है| घर के बड़े जैसे मेरे पिताजी या बड़के दादा को बुक्वा केवल और केवल बड़की अम्मा ही लगाती हैं| चन्दर भैया, या अजय भैया को बुक्वा या तो बड़की अम्मा अथवा उनकी पत्नियाँ ही बुक्वा लगाती हैं| और सबसे छोटे देवर अर्थात मैं मैं जिससे चाहे बुक्वा लगा सकता हूँ| सरल शब्दों में कहें तो स्त्रियाँ अपने से छोटे पुरूषों को बुक्वा लगा सकती हैं, परन्तु अपने से बड़ों को नहीं| किसी भी बहार के पुरुष को ये सेवा किसी भी हाल में उपलब्ध नहीं होती| ना ही वो इसे लगाते हुए देख सकता है| इसे लगाने के विधि कुछ ख़ास नहीं है, बस इस मिश्रण को हाथों से लेप की तरह लगाया जाता है और कुछ समय बाद (तकरीबन 1 - 2 घंटे) इसे पानी से धोके उतार दिया जाता है| फिर साबुन से नहा के ये काम पूरा होता है| चूँकि मैं छोटा था तो मुझे बुक्वा लगाने की जिम्मेदारी भाभियों की थी| अब मेरी प्यारी भौजी से अच्छा विकल्प क्या हो सकता है!

बुक्वा लगाने की बात सुन के मैं खुश तो था ही पर नजाने मन में भौजी का चन्दर भैया को बुक्वा लगाने के बारे में सोच कर मन खराब हो गया| मैं मुंह हाथ धो के भौजी को ढूंढता हुआ उनके घर पहुँचा| वहां पहुँच के देखा तो भौजी चक्की चला रहीं थी और सरसों पीस रहीं थीं| दरअसल चक्की भौजी के घर में ही थी, मैंने उन्हें देखा परन्तु बोला कुछ नहीं| थोड़ा अजीब सा लग रहा था... शायद भौजी मेरी परेशानी भाँप गई और उनके मुख पे भी बिलकुल वैसे ही भाव थे जैसे मेरे मुख पे थे| मैं बिना कुछ बोले वापस आ गया और अपनी बारी का इन्तेजार बड़े घर में करने लगा| मैं सोच रहा था की बार-बार मुझे भौजी का इस तरह रिश्ते जोड़ना बहुत अच्छा लगने लगा था| कभी अपने पिताजी को मेरा ससुर कहना, मेरे पिताजी को अपना ससुर मानना, अपने भाई को मेरा साला कहना, मेरी माँ को चाची ना कह के माँ कहना ये सब बातें मेरे दिल को छू जातीं ओर मुझे एक अलग ही एहसास कराती| मैं इतना बहक चूका था की रात्रि में बातों-बातों में भौजी के मायके को मैंने ससुराल कह दिया| वो तो शुक्र है की पिताजी ने इस बात को तवज्जो नहीं दी वरना कल तो मेरी ठुकाई पक्की थी| करीब एक घंटे बाद भौजी आई और उनके पास एक डोंगे जैसा ताम्बे का बर्तन था| मैं आँगन में चारपाई पे बैठा था| मेरी पीठ दरव्वाजे की ओर थी तो मुझे केवल भौजी के पायल की आवाज ही सुन पाया| भौजी बर्तन लिए मेरे सामने कड़ी हो गईं ओर सवालियां नज़रों से मुझे देखने लगी|

इससे पहले की वो कुछ पूछें मैं स्वयं ही चुप्पी तोड़ते हुए बोला;

मैं: लगा दिया आपने चन्दर भैया को बुक्वा?

भौजी: मैंने नहीं .... अम्मा ने लगाया| मैं तो चक्की चलने में व्यस्त थी ....

मैं कुछ बोला नहीं बस एक ठंडी साँस छोड़ी... और टी-शर्ट उतार दी| भौजी ने ऊँगली से मेरे पजामे की ओर इशारा किया और उसे भी उतारने को कहा| अब मैं केवल कच्छा पहने उनके सामने बैठा था| भौजी ने उबटन लगन शुरू किया... सबसे पहले उन्होंने छाती पे उबटन लगाया;

भौजी: तो आप का मूड इसलिए खराब था की मैं आपके भैया को उबटन लगाउंगी?

मैं: हाँ... पूछो मत| ऐसा लग रहा था जैसे शरीर पे चींटे काट रहे हों|

भौजी: पर मैं तो सिर्फ आपकी हूँ| और मैं किसी पराये मर्द को कैसे स्पर्श कर सकती हूँ?

मैं: जानता हूँ... पर यदि बड़की अम्मा ने आपसे भैया को उबटन लगाने को कहा होता तो? आप कैसे मन करते उन्हें ?

भौजी: बड़ा आसान है.... मैं अपना हाथ जख्मी कर लेती!

मैं: आपका दिमाग खराब है?

भौजी: हाँ !!! आपसे प्यार जो किया है..... निभाना तो पड़ेगा ही|

मैं: आप सच में पागल हो! अगर आप उन्हें उबटन लगा भी देते तो क्या होता? दुनिया के सामने तो वो आपके पति हैं|

भौजी: आपको क्या हुआ था जब आपने माधुरी के साथ.... ??? वही हाल मेरा भी होता!
(भौजी इतना कहके रूक गईं और दस सेकंड बाद अपनी बात पूरी की|)

मैं जानता था... और ये कहें की समझ सकता था की उनपे और मुझ पे क्या बीतती| खेर भौजी ने स्वयं ही बातें घुमा दीं;

मैं: एक बात कहूँ.... आप सोते हुए बहुत प्यारे लगते हो?

भौजी: ओह! आपने कब देख लिया मुझे सोते हुए? हमेशा तो मेरे सोने से पहले ही आप चले जाते हो| दिन में तो मैं कभी सोती नहीं|

मैं: कल रात को मैं आया था... देखा आप सो रहे थे| दस मिनट तक आपको निहारता रहा ... फिर आपके होठों को KISS किया और वापस चला गया|

भौजी: तो मुझे उठाया क्यों नहीं?

मैं: मन नहीं किया... मन तो कर रहा था की वहीँ खड़ा सारी रात आपको सोता हुआ देखता रहूँ|

भौजी: आप भी ना...

अब तक भौजी मेरे पूरे बदन पे बुक्वा लगा चुकीं थी....

मैं: (अपना कच्छा सामने की ओर खींच के भौजी को दिखाते हुए) इस पे भी थोड़ा बुक्वा लगा दो| इसमें भी थोड़ी चमक आ जाए... ये भी गोरा हो जाए!

भौजी: ना जी ना.... अगर ये गोरा हो गया तो फिर यहाँ-वहां मुँह मारेगा|

अब ये सुन के तो मेरे तन-बदन में आग लग गई| गुस्से से मैं तमतमा गया ओर उठ के खड़ा हो गया| गुस्सा मेरी शक्ल से झलक रहा था... मैं अंदर अपने कमरे की ओर बढ़ा ओर अंदर जाके बैग में अपने कपडे भरने लगा| मुझे ऐसा करता देख भौजी के प्राण सूख गए ओर वो बोलीं;

भौजी: ये आप क्या कर रहे हो? ........ प्लीज मेरे साथ ऐसा मत करो| मुझे छोड़ के मत जाओ!!!

मैं: नहीं... आप को अब भी मुझ पे विशवास नहीं| आप को अंदर ही अंदर अब भी लगता है की मैंने आपके साथ दगा किया|

भौजी: नहीं... वो तो बस मैं आपसे थोड़ा मजाक कर रही थी| प्लीज मुझे इस तरह छोड़ के मत जाओ... मैं मर जाऊँगी!!! (इतना कह के भौजी रोने लगीं)

मैं: मजाक !!! आपको हर-बार यही विषय मिलता है मजाक करने के लिए? आपको पता है ना की मुझे इस बात से कितनी तकलीफ होती है? बार-बार आपका इस विषय को छेड़ने से मुझे ग्लानि महसूस होती है... अपने आपको कोसता हूँ..... पर फिर भी..... मैं तो कभी आपसे इस विषय में मजाक नहीं करता?

इतना कह के मैं भौजी की ओर मुड़ा और उनके नजदीक आया| गुस्स्सा तो अब भी अंदर था पर फिर भी मैंने भौजी के आँसूं पोछे और वहाँ से चला गया|मैं कुऐं की मुंडेर जो की मेरी पसंदीदा जगह बन चुकी थी वहाँ पे अकेला बैठा था|अकेला बैठा मैं यही सोच रहा था की क्या मैंने भौजी को इस तरह डाँट के सही किया? पर उन्हें भी तो पता होना चाहिए की मुझे कितना बुरा लगता होगा? मैं ये भी भूल चूका था की मैं केवल कच्छे में हूँ| डेढ़ घंटे तक मैं वहीँ बैठ रहा ... और फिर भौजी वहाँ आईं और मुझे नहाने के लिए कहा| मैं वापस बड़े घर आ गया और नहाने के लिए बाल्टी भरने लगा|जैसे ही मैं बाल्टी ले के स्नान घर की ओर बढ़ा... भौजी ने मेरे हाथ से बाल्टी ले ली| साफ़ जाहिर था की भौजी ही मुझे नहलाने वाली हैं| उनके मुख पे मुझे अफ़सोस ओर शर्मिंदगी के मिले-जुले भाव दिख रहे थे|

भौजी: आई ...ऍम....सॉरी जी!!!

मैं कुछ नहीं बोला... अब भी मेरे मुख पे गंभीर भाव थे|

भौजी: तो आप मुझसे बात नहीं करेंगे? प्लीज माफ़ कर दीजिये ना ... आगे से ऐसा मजाक कभी नहीं करुँगी| प्लीज .....
आगे की बात पूरी होने से पहले ही रसिका भाभी आ गईं|

रसिका भाभी: तो मानु जी, नहाना हो रहा है!

मैं: जी नहाने ही जा रहा था| (इतना कह के मैंने भौजी के हाथ से बाल्टी लेने के लिए हाथ बढ़ाया, परन्तु भौजी ने बाल्टी पीछे खींच ली|)

भौजी: आप रहने दो.... मैं नहला देती हूँ|

रसिका भाभी: (इस बात पे भी चुटकी लेने से बाज़ नहीं आई|) आय-हाय!!! देवर-भाभी का प्यार तो देखो!!! ही... ही...ही...ही !!!

अब मैं कहता भी क्या, मैं अर्ध नग्न हालत में चुप-चाप खड़ा हो गया और भौजी मुझे नहलाने लगी| पहले उन्होंने पानी की मदद से साड़ी उबटन छुड़ाई और फिर साबुन लगने लगीं| एक पल के लिए भौजी पीछे मुड़ीं और रसिका भाभी को देखा| रसिका भाभी अपने कमरे में थीं तो मौके का फायदा उठा के भौजी ने मेरे कच्छे की इलास्टिक को पकड़ के सामने की ओर खींचा, जिससे उन्हें मेरा सोया हुआ लंड दिख गया| उन्होंने उसे छूना चाहा परन्तु मैंने झट से उनका हाथ हटते हुए कच्छे की इलास्टिक छुड़ा ली| मैं जल्दी से भाग के कमरे में गया ओर तौलिया लपेट लिया ओर कपडे बदल कर, तेल कंघी कर के भर आ गया| जब मैं बहार आया तो भौजी अब भी स्नान घर के पास खडीन मेरी ओर देख रहीं थीं|

ऐसा नहीं था की मैं अकड़ दिखा रहा था या अब भी नाराज था| माफ़ तो मैं उन्हें पहले ही कर चूका था... मैं तो बस उन्हें थोड़ा तड़पा रहा था, क्योंकि आगे के लिए मैंने जो सोचा था उसके लिए थोड़ा गुस्सा दिखाना जर्रुरी था|


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-16-2017

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अब आगे...

मैं आँगन में पड़ी चारपाई पे बैठ गया.... अब भी मेरे ओर भौजी के बेच बात-चीत नहीं हो रही थी| हालाँकि भौजी पूरा प्रयास कर रहीं थी की मैं उनसे बात करूँ पर मैं चुप-चाप होने का नाटक कर रहा था| भौजी परेशान दिख रही थी, क्या मैं उनसे नाराज हूँ या नहीं? खेर अम्मा ओर माँ एक साथ बड़े घर में दाखिल हुईं| अम्मा ने भौजी से कहा की वे माँ को भी बुक्वा लगा दें| इतना कहके बड़की अम्मा रसिका भाभी को अपने साथ किसी काम के लिए ले गईं| अब बड़े घर में केवल मैं, माँ ओर भौजी रह गए| माँ नीचे बैठ गईं ओर भौजी ठीक उनके पीछे बैठी उनकी पीठ पे बुक्वा लगा रहीं थी| मेरी ओर भौजी की पीठ थी, यानी मैं सबसे पीछे बैठा था| तभी भौजी ने माँ से उनका मंगलसूत्र उतारने को कहा, नहीं तो उसमें भी बुक्वा लग जाता| माँ ने मुझे बुलाया ओर मेरे हाथ में अपना मंगल सूत्र दिया ओर कहा की इसे संभाल के रख दे| मुझे ना जाने क्या सूझी ओर मैंने मंगलसूत्र भौजी के गले में डाल दिया! भौजी एक दम से हैरान मेरी ओर देखने लगीं जैसे पूछ रहीं हो की क्या मैं अब भी नाराज हूँ या मैं मजाक कर रहा हूँ? मैंने माँ से कहा की मैं खेत जा रहा हूँ और आपका मंगलसूत्र भौजी के पास है|

दोपहर के भोजन के समय जब मैं वापस आया तो माँ ने मुझसे कहा की मैं उनका मंगलसूत्र भौजी से ले आऊँ| सच कहूँ तो मेरा मन बिलकुल नहीं था, भौजी से मंगलसूत्र वापस लेने का| परन्तु करता क्या, वो मंगलसूत्र 22000/- का था! मैं मुंह बनाके भौजी के पास गया और बेमन से उनसे माँ का मंगलसूत्र माँगा| भौजी ने वो मंगलसूत्र संभाल के अपनी अटैची में रखा था| उन्होंने मंगलसूत्र मेरे हाथ में देते हुए मुझसे पूछा;
भौजी: आपको मालुम है मंगलसूत्र पहनना क्या होता है?

मैं: हाँ....
बस इसके आगे मैंने उनसे कोई बात नहीं की और वहाँ से चला गया| मैं जानता था की मैंने उन्हें मंगलसूत्र पहनाया है और उसका अर्थ क्या है| और मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगा| मैंने मंगलसूत्र लाके माँ को दिया और नेहा को लेने स्कूल चला गया|

दोपहर का भोजन करने के बाद मैंने अपना ध्यान नेहा में लगा दिया और भौजी को ऐसा दिखाया जैसे मुझे उनकी कोई परवाह ही नहीं| भौजी मेरे और नेहा के पास ही लेट गईं और नेहा को कहने लगीं; "पापा से कहो की कहानी सुनायें!" अब ये सुन के तो मेरी आँखें फ़ैल गईं!!! ये क्या कह रहीं हैं भौजी? वो भी नेहा से? ये तो खुशकिस्मती थी की छप्पर के नीचे जहाँ हम बैठे थे वहाँ हम तीनों के आलावा कोई नहीं था| और मेरी बेवकूफी देखिये की मैंने उनकी बात का जवाब भी दे दिया; "बेटा मम्मी से कहो की कहानी रात में सुनाई जाती है, दिन में नहीं|" जवाब देके मुझे मेरी ही गलती का एहसास हुआ तो मैंने अपनी जबान दांतों टेल दबा ली और इसे देख भौजी खिल-खिला के हंस दी| परन्तु मैं मुस्कुराया नहीं... बहुत मुश्किल से अपने को रोका! मैं नेहा को लेके बैट-बॉल खेलने के लिए चला गया| भौजी तख़्त पे लेते मुझे देख रही थी और तरह-तरह के मुंह बनाके मुझे हंसाने की कोशिश कर रही थी| पर मैं पूरी कोशिश कर रहा था की मैं उनकी ओर ध्यान ना दूँ|

जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैं बैट छोड़के खेत की ओर भाग गया और कुछ दूर पहुँच के भौजी के द्वारा बनाये गए उन चेहरों को याद कर के बहुत हँसा| कुछ देर बाद मैं वापस आया तो देखा तो चन्दर भैया ओर अजय भैया तैयार हो रहे थे| मैंने जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया की मामा के घर किसी काम से जा रहे हैं, और कल शाम तक लौटेंगे| अकस्मात् ही मेरी किस्मत मुझ पे इतना मेहरबान हो गई थी| मेरा रास्ता लघभग साफ़ था बस एक ही अड़चन थी.... वो थी रसिका भाभी! खेर अगर किस्मत को मंजूर होगा तो उनका भी कोई न कोई उपाय मुझे सूझ ही जाएगा| अब मुझे अपने प्लान को अम्ल में लाना था... पर दिक्कत ये थी की मुझे हमला ठीक समय और अकस्मात् करना था, वरना सब कुछ नष्ट हो जाता| खेर मेरा भौजी से बातचीत ना करने का ड्रामा चालु था और काफी हद्द तक मैंने भौजी को दुविधा में डाल दिया था की क्या मैं वाकई में उनसे नाराज हूँ या मजाक कर रहा हूँ| एक पल के लिए तो मुझे भी ऐसा लगा की भौजी उदास हैं और उन्हें यकीन हो गया की मैं उनसे नाराज हूँ| मन तो किया उन्हें सब सच कहूँ पर मैं रिस्क नहीं लेना चाहता था| और सबसे बड़ी बात मैं उन्हें खुश देखना चाहता था और अगर मैं उन्हें सब बता देता तो ये सस्पेंस ख़त्म हो जाता| रात्रि भोज के समय भौजी ने मुझसे बात करने के लिए एक और पहल की, पर इस बार उन्होंने नेहा का सहारा लिया| नेहा मेरे पास आई और मेरी ऊँगली पकड़ के भौजी के पास ले आई| भौजी छप्पर के नीचे तख़्त पे लेटी थीं;

नेहा: बैठो चाचू|

मैं: अच्छा बोलो क्या चाहिए मेरी लाड़ली को?

नेहा: कुछ नहीं चाचू, आप बैठो! (भौजी की ओर देख के बोली) चाचू आप मम्मी से नाराज हो?

मैं: आप ऐसा क्यों पूछ रहे हो ?

नेहा: आप मम्मी से बात नहीं कर रहे हो? आप तो मम्मी के बहुत अच्छे दोस्त हो ना तो फिर?

मैं समझ गया की ये जज्बात भौजी के हैं बस बोल नेहा रही है| अबतक नेहा की मासूमियत सुन के बड़की अम्मा भी आ गईं...

बड़की अम्मा: क्या हुआ मुन्नी? मुझे बताओ....

नेहा: दादी देखो ना चाचू मम्मी से बात नहीं कर रहे हैं|

बड़की अम्मा: क्या हुआ मुन्ना? बी क्या किया तुम्हारी भौजी ने? क्यों नाराज हो?

मैं: जी कुछ भी तो नहीं.... मैं तो ...... बस नेहा के साथ खेलने में व्यस्त था| (भौजी को उलाहना देते हुए कहा) अगर मैं नाराज होता तो दिल्ली वापस नहीं चला जाता?

ये सुन के बड़की अम्मा हँसे लगी ओर में भी जूठी हँसी हंसने लगा| मैं वहाँ से उठा और अपनी चारपाई पे लेटा आसमान में तारे देखने लगा| दोपहर की ही तरह भोजन रसिका भाभी ने पकाया था, क्योंकि चक्की चलाने की वजह से भौजी थक गईं थीं| जब सब को भोजन परोसा गया तो मैं अपनी थाली ले के अपनी चारपाई पे बैठ गया| मैंने नेहा को इशारे से अपने पास बुलाया और सारा भोजन उसे खिला दिया| दरअसल ये मेरा खुद को सजा देने का तरीका था| आज सारा दिन मैंने भौजी को बड़ा सताया था इसलिए प्रायश्चित तो बनता था| भोजन के कुछ देर बाद भौजी फिर से मेरे पास आईं और बोलीं; "अगर आप मुझसे बात नहीं करोगे तो मैं भोजन नहीं खाऊँगी|" मैं कुछ नहीं बोला और भौजी अपने घर के भीतर चलीं गई| मैं जानता था की वो भोजन नहीं करने वाली, इसलिए मैं बड़की अम्मा के पास गया और उनसे भौजी के लिए भोजन परोसने के लिए कहा|

बड़की अम्मा: पता नहीं भैया तुम दोनों के बीच में क्या चलता रहता है| कभी तुम नाराज होते हो तो कभी तुम्हारी भौजी| पता नहीं आज क्या हुआ बहु को सारा गुम-सुम सी रही, और अब भोजन के लिए कहा तो कह गई मुझे नींद आ रही है| मुन्ना वो सिर्फ तुम्हारी ही मानती है, ये लो भोजन करा दो|

मैं: आप चिंता ना करो अम्मा मैं उन्हें भोजन करा देता हूँ|

रसिका भाभी: हाँ भाई दीदी तो सिर्फ "आपकी ही सुनती हैं" !!! ही..ही..ही...

अब भी रसिका भाभी चुटकी लेने से बाज़ नहीं आई पर ठीक है! मैं भौजी के घर के भीतर पहुंचा तो देखा की भौजी चारपाई पे लेटी हैं| पर भूखे पेट किसे नींद आई है जो उन्हें आती| मैंने बड़े रूखेपन का दिखावा किया और बहुत रूखे तरीके से उन्हें कहा;

मैं: चलो उठो.... भोजन कर लो|

भौजी: अगर आप मुझसे बात नहीं करोगे तो मैं नहीं खाऊँगी|

मैं: भोजन मैंने भी नहीं किया है... अपना हिस्स का मैंने नेहा को खिला दिया था| अगर आपको नहीं खाना तो मत कहाओ, मैं थाली यहीं रख के जा रहा हूँ|

भौजी: रुकिए, आप मेरे साथ ही खा लीजिये|

मैं: नहीं.... रसिका भाभी आजकल ज्यादा ही नजर रख रहीं है हम पर| मैं जा रहा हूँ आप भोजन कर लो|

मुझे संदेह था की भौजी भोजन नहीं करेंगी इसलिए मैं पानी देने के बहाने वापस आया| देखा तो भौजी गर्दन झुकाये बेमन से भोजन कर रहीं थी| मैं पानी का गिलास रख के वापस जाने लगा तो भौजी बोलीं; "देख लो मैं भोजन कर रहीं हूँ, आप भी भोजन कर लो|" मैंने उनकी बात का जवाब नहीं दिया बस गर्दन हाँ में हिलाई और बहार चला आया| मैं चुप-चाप नेहा को गोद में लिए अपनी चारपाई पे लेट गया| करीब पंद्रह मिनट बाद भौजी बहार आईं और मुझे लेटा हुआ देखा, साफ़ था की मैंने भोजन नहीं किया है| मैं कनखी नजरों से उन्हें देख रहा था, वो बर्तन रख के रसोई की ओर गईं परन्तु आज सारे बर्तन खाली थे, कुछ भी भोजन नहीं बचा था| भौजी पाँव पटकते हुए मेरे पास आईं और मेरे कान में खुस-फुसाई; "आपने भोजन नहीं किया ना? चलिए उठिए मैं कुछ बना देती हूँ, नहीं तो कुछ नमकीन वगैरह ही खा लीजिये| प्लीज उठिए ना ..." पर मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था और सोने का नाटक कर रहा था| उनकी बेचैनी और तड़प मैं साफ़ महसूस कर पा रहा था पर मैं शिथिल पड़ा रहा| भौजी ने नेहा को अपने साथ ले जाने के लिए जब उठाने लगी तो मैंने नेहा को और कसके अपनी छाती से जकड लिया| अब भौजी समझ गईं थी की मैं सोने का नाटक कर रह हूँ इसलिए वो फिर से कुछ खाने के लिए जोर देने लगीं| “चलिए ना... कुछ तो खा लीजिये? प्लीज ..... प्लीज ..... अगर खाना नहीं था तो मुझे क्यों खाने को कहा? प्लीज चलिए ना, मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ प्लीज !!”

मैं कुछ नहीं बोला, परन्तु लगता है शायद पिताजी ने भौजी की खुसफुसाहट सुन ली इसलिए वे अपनी चारपाई से मेरी चारपाई की ओर देखते हुए बोले; "क्या हुआ बहु बेटा? क्या ये नालायक फिर तंग कर रहा है?" पिताजी की आवाज बड़ी कड़क थी अगर मैं कुछ नहीं bolta तो भौजी पिताजी से अवश्य कह देती की मैंने कुछ नहीं खाया| इसलिए मैं बोल पड़ा; "नहीं पिताजी, नेहा मेरे साथ सो रही है और भौजी उसे लेने आईं है पर नेहा ने मेरी टी-शर्ट पकड़ रख है| मैं इन्हें कर रहा हूँ की नेहा को यहीं सोने दो पर ये मान ही नहीं रही?" पिताजी बोले; "सोने दो बहु दोनों चाचा-भतीजी को एक साथ| और तुम भी जाके सो जाओ रात बहुत हो रही है|" भौजी चुप-चाप चलीं गई पर जाते-जाते भी वो शिकायत भरी नजरों से मुझे देख रहीं थी| एक नै सुबह, और आज मैं जल्दी उठ गया| खाली पेट सोने कहाँ देता है!!! दैनिक दिनचर्या निपटा कर मैं सही समय का इंतेजआर करने लगा| आज रविवार था तो नेहा के स्कूल की छुट्टी थी, तो मैं नेहा के साथ खेलने में लगा था| जैसे ही पिताजी और बड़के दादा खेत में काम करने को निकले मैं पहले रसिका भाभी को ढूंढने लगा| और मेरा अंदाजा सही निकला, भाभी बुखार का बहाना करके बिस्तर पर पड़ी हुई थीं| मैं उनका हाल-चाल पूछने लगा और वो कहने लगी की तबियत नासाज़ है और वो तो बस आजका दिन आराम ही करेंगी| अब मैं नेहा को अपनी ऊँगली पकड़ा कर बड़की अम्मा और माँ के पास पहुँचा|

अम्मा और माँ कच्चे आम धो के काट रहे थे, आचार बनाने के लिए|

मैं: अम्मा मुझे आपसे कुछ बात करनी थी|

बड़की अम्मा: हाँ कहो मुन्ना

मैं: अम्मा देखो आप तो जानते ही हो की भौजी मेरी वजह से शादी में नहीं गई| तो मैं सोच रहा था की आज मैं, आप, माँ, नेहा, भौजी और रसिका भाभी सब पिक्चर देखने जाएँ| पिताजी और अब्द्के दादा को इसलिए नहीं लजायेंगे क्योंकि उनके होते हुए भाभियाँ असहेज महसूस करेंगी| तो चलिए ना ?

बड़की अम्मा: देखो मुन्ना हमें तो ये फिल्म-विल्म का शौक है नहीं| तुम जाओ और बहुओं को ले जाओ| अब कहँ हम इन फिल्मों के चक्कर में पड़ें|

माँ: ठीक है बेटा तू बहुओं को साथ ले जाना उनका भी मन बहल जायेगा|

मैं तुरंत वहाँ से रसिका भाभी के पास दुबारा भागा, क्योंकि अब वो ही एक काँटा रह गई थी हमारे बीच! रसिका भाभी घोड़े बेच के सो रही थी, इसलिए मैं दुबारा अम्मा के पास आया और उन्हें बताया;

मैं: अम्मा, रसिका भाभी तो घोड़े बेच के सो रहीं हैं| सुबह जब मैंने उनसे हाल-चाल पूछा था तो उन्होंने कहा था की उनका बदन टूट रहा है और बुखार भी है| इसलिए वो सारा दिन आराम करेंगी| तो अब क्या करूँ?

ये सुनके बड़की अम्मा थोड़ा चिंत में पड़ गईं, परन्तु इसे पहले वो कुछ कहतीं मैंने भोली सी सूरत बनाई और कहा;

मैं: अम्मा अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं नेहा और भौजी फिल्म देख आएं?

बड़की अम्मा: हाँ... ये ठीक रहेगा| तुम तीनों हो आओ|

मैं: परन्तु अम्मा घर में सब का खाना कौन बनाएगा?

बड़की अम्मा: मुन्ना तुम चिंता नहीं करो... मैं संभाल लुंगी| तुम जाओ इसे बहाने बहु का मन भी कुछ हल्का होगा|

मैं ख़ुशी-ख़ुशी भौजी के घर में घुसा तो देखा भौजी जमीन पे बैठी, सर झुकाये शायद रो रहीं थी| आज सुबह से मैंने उन्हें अपनी शक्ल नहीं दिखाई थी और वैसे भी मैंने कल से बोल-चाल बंद कर रखी थी| उन्हें इस तरह उदास देख के मन तो बहुत दुखा|

मैं: चलो जल्दी से तैयार हो जाओ, हम फिल्म देखने जा रहे हैं|

भौजी ने मेरी ओर देखा और आँखों ही आँखों जैसे इस सब का कारन पूछ रहीं हो|

मैं: बाकी बातें रास्ते में, जल्दी करो दोपहर का शो है, सिर्फ आप मैं और नेहा ही जा रहे हैं| अगर पिताजी और बड़के दादा आ गए तो जबरदस्ती रसिका भाभी को भी ले जाना पड़ेगा|

भौजी जल्दी से उठीं और फटाफट तैयार होने लगीं और इधर मैं भी भाग के गया और पाँच मिनट में तैयार हो के आ गया| परन्तु भौजी ने तैयार होने में आधे घंटे का समय लिया, और लें भी क्यों ना औरत जो हैं!!! पर एक बहुत अवश्य कहूँगा की ये आधे घंटे का इन्तेजार व्यर्थ नहीं गया| जब भौजी को मैंने देखा तो बस बिना आँखें झपकाये देखता ही रह गया! पीतांबरी साडी में भौजी बहुत सुन्दर लग रहीं थी| उसपे पीले और नारंगी रंग की मिली जुली बिंदी... हाय!!! बस उन्होंने लिपस्टिक नहीं लगाईं थी परन्तु उसे उनकी सुंदरता में कुछ भी कमी नहीं आई| सर पे पल्लू और साडी में बने फूल का डिज़ाइन जिसे की बड़े प्यार से काढ़ा हुआ था..... हाय..हाय.हाय..!!! गजब!!! उँगलियों पे नेलपॉलिश और उनके बदन से आ रही गुलाब की सुगंध ने तो मुझे मन्त्र मुग्ध कर दिया| मन किया भौजी को भगा ले जाऊँ!

भौजी बड़े िढ़ालते हुए मेरे पास आईं और बोलीं; "चलना नहीं है क्या? पिक्चर छूट जायेगी!!!" हाय उनके कोकिल कंध से निकले शब्दों ने तो जैसे मुझे सन्न कर दिया|माँ को बाय-बाय कह के हम निकल पड़े| हमारे घर से मुख्य सड़क करीब पंद्रह मिनट दूर है|हम घर से करीब दस मिनट की दूरी पर आ चुके थे| अब भौजी ने बातें शुरू किया;

भौजी: अगर आप बुरा ना मनो तो एक बात कहूँ?

मैं: हाँ..हाँ बोलो

भौजी: आज आप बहुत हङ्सुम... लग रहे हो|

मैं: (भौजी के इस तरह हड़बड़ा कर अंग्रेजी में हैंडसम बोलने पे मुझे हंसी आ गई|) आप का मतलब हैंडसम ? हा..हा...हा...हा...

भौजी: हाँ..हाँ.. वही हैंडसम लग रहे हो!

मैं: थैंक यू|

भौजी का ऐसा कहने ककरण ये था की मैंने आज लाल रंग की टाइट वाली टी-शर्ट पहनी थी| ऊपर क दो बटन खुले थे और कालर खड़े किये हुए थे| नीचे मैंने ब्लू जीन्स पहनी थी और ब्राउन लोफ़र्स| मैं चलते समय अपने दोनों हाथ जीन्स के आगे की दोनों पॉकेट में डाले चल रहा था|

मैं: वैसे क़यामत तो आज आप ढा रहे हो| बस अपना ये घूँघट थोड़ा काम करो| सर पे पल्ला केवल अपने बालों के जुड़े तक ही रखो|
भौजी ने तुरंत ही मेरा सुझाव मान लिया और अपनी तारीफ सुन के थोड़ा मुस्कुराईं| फिर अचानक से गंभीर होते हुए बोलीं;

भौजी: आई...ऍम... सॉरी!

मैं: आपको सॉरी कहने की कोई जर्रूरत नहीं, मैं आपसे नाराज नहीं हूँ| मैंने तो आपको कल ही माफ़ कर दिया था| दरअसल मैं थोड़ा ज्यादा ही सेंसिटिव मतलव संवेदनशील हूँ| मैं जल्दी ही बातों को दिल पे ले लेता हूँ| आपने जरा सा मजाक ही तो किया था, और मैं बेकार में इतना भड़क गया और आपको डाँट दिया| I’M Sorry !!! वादा करता हूँ की मैं अपने इस व्यवहार को सुधारूँगा|

भौजी: आप जानते हो की आपकी एक ख़ास बात जिसने मुझे प्रभावित किया वो क्या है? आप अपनी गलती मानने में कभी नहीं जिझकते|

मैं: बस एक अच्छाई ही है... एक बुराई भी है| मैं बहुत जल्दी पिघल जाता हूँ... उस दिन जब आपने माधुरी और मेरी बात सुन ली थी, उस दिन मुझे माधुरी के लिए वाकई में बहुत बुरा लग रहा था| आखिर उसका दिल मेरी वजह से टूटा|

भौजी: ये बुराई नहीं है, आप किसी को भी दुखी नहीं देख सकते बस! चाहे वो इंसान कितना ही बुरा क्यों ना हो| खेर मैं आपसे नाराज हूँ!

मैं: क्यों?

भौजी: कल रात आपने खुद कुछ नहीं कहे और जबरदस्ती मुझे भोजन करा दिया| ऐसा क्यों किया आपने? जानते हैं आपने मुझे पाप का भागी बना दिया!

मैं: मैं प्रायश्चित कर रहा था|

भौजी: कैसा प्रायश्चित?

मैं: कल सारा दिन मैंने अपना जूठा गुस्सा दिखा के आपको बहुत तंग किया| मैं जानता हूँ आप मेरे इस बर्ताव से कितना बुझे हुए थे| मैं आपसे बात नहीं कर रहा था.. आपके आस-पास होक भी आपसे दूर था| इसलिए मैं प्रायश्चित कर रहा था|

भौजी: तो वो सब आप दिखाव कर रहे थे.... हाय राम! आपने तो मेरी जान ही निकाल दी थी| अब बड़े वो हैं!
(ये कहते हुए भौजी ने मेरी छाती पे धीरे से मुक्का मारा)

मैं: आह! हा..हा...हा...हा...


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-16-2017

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अब आगे...

भौजी: तो वो सब आप दिखाव कर रहे थे.... हाय राम! आपने तो मेरी जान ही निकाल दी थी| अब बड़े वो हैं!
(ये कहते हुए भौजी ने मेरी छाती पे धीरे से मुक्का मारा)

मैं: आह! हा..हा...हा...हा...

भौजी: अच्छा ये तो बताओ की ये अचानक फिल्म का प्लान कैसे बनाया आपने?

मैं: उस दिन आपने कहा था ना की आपने आखरी बार पिक्चर दिम्मी में हमारे घर पे देखि थी| तो मैंने सोचा की क्यों ना आपको एक पिक्चर तो दिखा ही दूँ| आखिर आपका पति हूँ! और इसी बहाने मैं आपकी फीस भी चूका दूँगा!!!

भौजी: अच्छा जी!!! मतलब आगे से आप से कुछ भी कहूँ तो मुझे सोच-समझ के कहना होगा वरना आप मेरी अनजाने में कही हर बात पूरी कर दोगे| और रही बात फीस की तो वो अब भी अधूरी है!!!

मैं: चिंता ना करो आज के दिन मैं आपकी फीस तो अवश्य दे दूँगा!

भौजी: अच्छा ये तो बताओ की पिक्चर कौन सी है?

मैं: तारा रम पम पम....

भौजी ने मेरा हाथ थाम लिया जैसे कोई नव विवाहित जोड़ा एक दूसरे का हाथ पकड़ चलता है! भौजी बहुत खुश थीं... हम इसी तरह बातें करते-करते मुख रास्ते पे पहुंचे और बाजार के लिए जीप में बैठ गए| मैं भौजी के साथ एक दम चिपक के बैठा था और मेरा हाथ उनके कंधे पे था| भौजी ने घूँघट कर रखा था और वो कसमसा कर मेरी छाती से चिपकी हुई थीं और नेहा मेरी गोद में बैठी थी|

हम थिएटर पहुंचे और थिएटर की हालत देख के मैंने अपना सर पीट लिया| थर्ड क्लास थिएटर... बेंत की कुर्सियां, आराम से बैठना तो भूल ही जाओ| ना कोई AC न कुछ .... बस छत पे और बगल में लगे पंखे जो इतने बूढ़े थे की चलते समय कांपते थे और इतनी आवाज़ करते थे की बिचारा हीरो अपना डायलाग भूल जाये| पॉपकॉर्न की तो बात ही मत पूछो! खाने के लिए वहाँ कुछ नहीं था! वहाँ आने वाले ज्यादातर लौंडे थे जो अपनी-अपनी आइटम ले के आते थे| शायद ही ये थिएटर कभी हाउस फुल रहा हो| न फर्श पे कालीन न दीवारों पे पैंट... अंग्रेजी में कहें तो SHIT HOLE !!! अगर मैं B GRADE मूवी दिखाने वाले थिएटर से तुलना करूँ तो वो थिएटर इस पुराने थिएटर के सामने शीश महल लगेंगे| शुक्र है मैंने अपने मित्रों को कभी इस बारे में नहीं बताया वरना वो बहुत मजाक उड़ाते! खेर अब पिक्चर दिखाने लाया था तो पिक्चर तो दिखानी पड़ी! मैंने काउंटर से टिकट खरीदी और अंदर हॉल में घुसा| किस्मत से हॉल में ज्यादा लोग नहीं थे| कुल मिला कर मुझे वहाँ पंद्रह-बीस लोग दिखे| हमारी सीट ऊपर से चौथी लाइन में कोने की थीं| परन्तु हॉल पूरा खाली था तो मैंने बीच की सीट में ही बैठने का फैसला किया| पर भौजी ने मना कर दिया| मैंने नेहा को गोद में ले रखा था इसलिए सबसे पहले उसे बिठाया और फिर उसकी बगल में मैं बैठ गया और भौजी को नेहा की दूसरी बगल बैठने को कहा| इसपर भौजी ने नेहा को गोद में उठाया और मेरी बगल में बैठ गयीं और नेहा को अपनी बगल में बिठाया| मैंने भौजी से बस इतना ही कहा; "ध्यान रखना उसका कहीं उठ के भाग ना जाए!" भौजी ने गर्दन हिला के अपनी सहमति दी| उसके बाद भौजी मेरा हाथ अपने हाथ से लॉक करके बैठ गईं| उनकी गर्दन मेरे कंधे पे टिकी थी|

पिक्चर शुरू होने से पहले जो Advertisemnts होते हैं वो दिखाए जा रहे थे| पर भौजी तो जैसे मुझसे लिपटी हुई थीं...

मैं: आप बड़े रोमांटिक हो रहे हो!

भौजी: तो?

मैंने पीछे मुड़ के देखा की कोई हमारे पीछे तो नहीं बैठा, तो देख के हैरान हुआ की हॉल का एक कर्मचारी जो सब को सीटें बता रहा था वो हमें ही देख रहा था| चूँकि अभी तक लाइट्स बंद नहीं हुई थी और हलकी सी रौशनी में वो हमें साफ़ देख रहा था और मुस्कुरा रहा था| शायद वो सोच रहा होगा की हम पति-पत्नी हैं!

मैं: यार .... पीछे वो आदमी हमें ही देख रहा है और मुस्कुरा रहा है|

भौजी: तो मुस्कुराने दो! छोडो उसे ... तो मेरी फीस कब पूरी करोगे?

मैं: यहाँ नहीं, ये सार्वजानिक जगह है|

भौजी: ना मैं कुछ नहीं जानती... मुझे एक KISS अभी चाहिए|

मैं: अभी? नेहा ना देख ले... अच्छा कम से कम लाइट्स तो बंद होने दो|

भौजी कहाँ मानने वालीं थी और उन्होंने मेरे गाल पे अपने होंठ रख दिए| मैंने अपनी गर्दन अलग की और उनकी तरफ देखने लगा| उनकी आँखों में मुझे वो तड़प साफ़ नज़र आ रही थी.... वो कशिश जिसने मुझे पागल बना रखा था| मैंने अपना हाथ उनके कंधे पे रखा और उनके माथे को चूम लिया| वो आदमीं वहाँ से हमें ये सब करते हुए साफ़ देख सकता था|
मैं: अब तो खुश?

भौजी: ना ... ये तो ब्याज था असल तो अभी बाकी है|

मैं: पहले लाइट बंद होने दो फिर असल भी दे दूँगा|

इतने में नेहा बेचारी अकेला महसूस करने लगी और छटपटाने लगी| भौजी उसे प्यार से समझने लगी पर वो नहीं मानी| मैंने नेहा को अपनी गोद में ले लिया और उसे अपनी गोद में बिठा के पिक्चर देखने को कहा| भौजी एक पल के लिए थोड़ा नाराज हुई;

भौजी: इसी के साथ देख लो आप पिक्चर, मैं चली|
(मैंने उनका हाथ पकड़ के उन्हें वापस अपनी तरफ खींच लिया|)

मैं: यार आप ही बताओ इस बेचारी को अकेलापन नहीं लगेगा? नेहा बेटा आपको अकेलापन लग रहा था ना?

नेहा: हाँ चाचू ... मैं यहीं बैठ के पिक्चर देखूंगी|

भौजी: शैतान ... पापा की टांगें दुखेंगी|

मैंने भौजी की तरफ देखा और उन्हें आँखों से इशारा किया की ये आप क्या कह रहे हो? पर भौजी बाज़ नहीं आईं, आजतो जैसे उन्होंने सोच लिया था की आज वो मेरी खाट कड़ी कर के रहेंगी|

भौजी: बेटा पिक्चर ढाई घंटे की है... तबतक तू गोद में बैठेगी तो चाचा के पाँव में खून रूक जायेगा| फिर उन्हें चलने में दिक्कत होगी| चल उतर नीचे शैतान और अपनी कुर्सी पे बैठ|

नेहा: भी अब होशियार हो गई थी उसने भौजी से ऐसा सवाल पूछ ही लिया की भौजी एक पल के लिए स्तब्ध रह गईं;

नेहा: मम्मी ... ये तो चाचू हैं| पापा तो घर पर हैं!

भौजी का मुँह बन गया पर वो जानती थीं की अगर उन्होंने नेहा से कुछ कहा तो मैं बिगड़ जाऊँगा| इसलिए मैंने बात बनाते हुए कहा;

मैं: बेटा आपकी मम्मी का मतलब था चाचू की गोद से उतरो| आप हमेशा अपने पापा के साथ ही घूमने जाते हो ना तो इसलिए उन्हें एक पल के लिए लगा होगा की मेरी जगह आपके पापा ही बैठे हैं|

नेहा: पर पापा तो हमें कहीं ले जाते ही नहीं|

भौजी: (बीच में बोल पड़ीं) बेटा देखो आपके चाचू हमारा कितना ख्याल रखते हैं इसलिए मैंने कहा की ये आपके पापा की तरह ही हैं| अब चलो एक बार "पापा" कहो?

मैं फिर से भौजी को घूर के देखने लगा और उनसे शिकायत करने लगा की ये आप क्या कह रहे हो| इतने में नेहा बोल पड़ी; "पापा"

उसके मुँह से "पापा" सुन के अनायास ही मेरे मुख से निकला; " Awwww मेरा बच्चा !!!" और मैं एक दम से भावुक हो गया और नेहा को अपनी छाती से कस के लगा लिया| सच में उस दिन मुझे पता चला की किसी बच्चे के मुख से "पापा" सुन के कितनी ख़ुशी मिलती है| नेहा के छोटे-छोटे हाथों ने भी मेरी पीठ के इर्द-गिर्द पकड़ बन ली, और जैसे उसने सच में मुझे अपना "पापा" मान लिया हो| भौजी की आँखों से भी आँसूं की बूंदें छलक आईं थी| तभी लाइट्स ऑफ हुईं और मैंने नेहा को अपनी छाती से अलग किया और उससे बड़े प्यार से कहा; "बेटा कभी भी भूल से सब के सामने मुझे पापा मत कहना, ठीक है? जब हम अकेले में हों तब ही पापा कहना|" नेहा ने हाँ में सर हिलाया और मैंने उसे गोद में ठीक से बिठाया जिससे नेहा का मुँह परदे (स्क्रीन) की ओर था| पिक्चर शुरू हो चुकी थी परन्तु भौजी का ध्यान अब भी नेहा के "पापा" कहने पे लगा हुआ था| मैंने भौजी की ठुड्डी को पकड़ा ओर उन्हें उनके ख्यालों से बाहर निकाला| 

मैंने खुसफुसाते हुए उनसे कहा;

मैं: थैंक यू!!!

भौजी: किस लिए?

मैं: आज आपने मुझे एक अनमोल सुख दिया| नेहा के मुँह से "पापा" सुनके देखो मेरे रोंगटे खड़े हो गए|

भौजी: मैं भी ... आज मानो मेरी एक हसरत मेरी प्यारी बेटी ने पूरी कर दी|

मैं: हमारी बेटी!!! चलो अब पिक्चर देखो|

भौजी: नहीं पहले मेरी फीस ....

मैं: अच्छा बाबा ये लो....

इतना कह के मैं भौजी की ओर मुड़ा और उनके होंठों पे Kiss किया| मुझे लगा था की ये बस छोटा सा Kiss होगा परन्तु भौजी बेकाबू होने लगीं और मेरे निचले होंठ को अपने होठों में दबा लिया और चूसने लगीं| अब मुझे थोड़ी जिझक हो रही थी क्योंकि नेहा मेरी गोद में बैठी थी परन्तु उसका ध्यान फिल्म पर था| मैंने कनखी आँखों से उसे देखा, जब मुझे लगा की उसका ध्यान आगे की ओर है तब मैंने अपना डायन हाथ भौजी के दायें गाल पे रखा ओर उन्हें पूरी भावना से (Passionately) Kiss करने लगा| कभी मैं उनके होंठ चूसता तो कभी वो मेरे होंठ चूसती| उनके मुख से मुझे मीठी सी सुगंध आ रही थी जिससे मैं बेकाबू होने लगा था| मैंने एक बार फिर से नेहा की ओर कनखी नजरों से देखा तो ऐसा लगा जैसे वो कुछ कहने वाली है, मैं तुरंत भौजी से अलग हो गया| और एक पल के लिए पीछे खड़े उस कर्मचारी की ओर देखा, वो साल अब भी हमें ही देख रहा था| मैं झेंप गया ओर भौजी के कंधे पे हाथ रखते हुए उनके कान में खुसफुसाया;

मैं: वो आदमीं पीछे से हमें Kiss करते हुए देख रहा था|

भौजी: तो क्या हुआ?

मैं: कुछ नहीं ... छोडो और फिल्म देखो|

भौजी: मैं आपसे अब भी नाराज हूँ, आपने मेरी फीस ठीक से नहीं दी|

मैं: अरे बाबा, फिल्म दिखाना फीस की पहली किश्त थी| अभी दो किश्तें और बाकी हैं| और ये Kiss तो दवाइयों का खर्च समझ लो|अब चैन से फिल्म देखो|

भौजी: आपने तो मेरी उत्सुकता और भी बढ़ा दी|

बस भौजी फिर से मेरे कंधे पर सर रखके फिल्म देखने लगी| पर मेरा मन फिल्म में बिलकुल भी नहीं लग रहा था, पंखों के शोर ने और इस तंग कुर्सी ने बुरा हाल कर दिया| परफिर भी मन मार के भौजी के लिए वहीँ बैठा रहा| भौजी ने अपने दोनों हाथों से मेरे दायें हाथ को थम हुआ था और बहुत ही दिलचस्पी के साथ फिल्म देख रहीं थी| बीच-बीच में मैं उन्हिएँ फिल्म के कुछ पहलुओं के बारे में भी बता देता था और भौजी बड़े गौर से बात सुनती| इंटरवल हुआ तो नेहा फिर से मेरी ओर मुड़ी ओर मेरी छाती से चिपक गई| एक घंटे से बेंत वाली कुर्सी पे बैठे-बैठे मेरी हालत बुरी हो गई| मैं उठा और भौजी से बोला; "आप नेहा को सम्भालो मैं बाथरूम हो के आता हूँ|" जब मैं चलने लगा तो ऐसा लगा जैसे पूरे पिछवाड़े में बेंत छप गई हो! बाथरूम हो के आया और साथ में नेहा के लिए चिप्स का एक पैकेट ले आया| चिप्स देख के नेहा बहुत खुश हो गई और फिर से मेरी गोद में आने के लिए जिद्द करने लगी| भौजी उसे मन कर रही थी पर मैंने खुद ही नेहा को अपनी गोद में ले लिया और उसे चिप्स का पैकेट दे दिया| दूसरा पैकेट चिप्स का मैंने भौजी को दिया और हम बैठे चिप्स खाने लगे| कुछ ही देर में इंटरवल ख़त्म हुआ और फिल्म चालु हुई| अब भौजी समझ गईं थी की मेरा फिल्म देखने में जरा भी इंटरेस्ट नहीं है| इसलिए उन्होंने शरारत करना शुरू कर दिया| वो अपनी उँगलियों को मेरी गर्दन, कान और होठों पे घुमाने लगीं| मैंने उनकी ओर मुड़ के देखा तो उनकी आँखें परदे (स्क्रीन) पे टिकी थीं ओर वो ऐसे दिखा रहीं थी जैसे उनकी उँगलियाँ अपने आप ही मेरे साथ खेल रहीं हो| अब शरारत करने की बारी मेरी थी तो जैसे ही उन्होंने अपनी ऊँगली मेरे होठों पे फिर से फेरी मैंने गप से उनकी ऊँगली अपने मुंह में भर लीं और चूसने लगा| उनकी उँगलियों से मुझे अभी-अभी खाए चिप्स का स्वाद आ रहा था और मैं उनकी उँगलियाँ चाटने लगा और भौजी ने कोई भी प्रतिक्रिया करना बंद कर दिया| कुछ देर बाद मैंने अपना हाथ उनके कंधे से हटाया और उनका बायां हाथ जिसकी उँगलियाँ मैं चूस रहा था उसे पकड़ के हटा दिया पर भौजी की शरत खत्म नहीं हुईं और उन्होंने अपने दायें हाथ से मेरा दायाँ हाथ पकड़ा और मेरी बीच वाली ऊँगली अपने मुंह में ले के चूसने लगी|

वो मेरी ऊँगली ऐसे चूस रहीं थी जैसे उनके मुंह में मेरा लंड हो और बीच-बीच में भौजी मेरी ऊँगली को हलके से काट लेती थी| अब मैंने अपना बायें हाथ को अपने माथे पे रख लिया, क्योंकि अब मेरी हालत खराब होने लगी थी| नेहा मेरी गोद में बैठी थी और नीचे लंड पंत में तम्बू बनाने लगा था| मैंने अपनी ऊँगली छुड़ाने की कोशिश की पर उन्होंने नहीं छोड़ा और उल्टा अपने बाएं हाथ को मेरे गले पे रखा और उँगलियों को चालते हुए नीचे की ओर बढ़ने लगीं| मेरी पैंट की जीप के ऊपर पहुँच कर वो अपनी उँगलियों से मेरे लंड को पकड़ने की कोशिश करने लगीं| अब चूँकि मैंने जीन्स पहनी थी इसलिए वो लंड पकड़ नहीं पा रहीं थी| मैंने अपने बाएं हाथ से उनका हाथ हटाया और धीरे से अपनी ऊँगली उनके मुँह के गिरफ्त से छुड़ाई| भौजी मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगी; "आप बहुत शरारती हो! मेरी हालत खराब कर दी आपने ... वो बुरी तरह से फूल चूका है| अब प्लीज चुप-चाप पिक्चर देखो| कोई शैतानी नहीं! " भौजी अपनी ऊँगली को दाँतों टेल दबाते हुए दुबारा पिक्चर देखने लगीं| मेरी आवाज सुनके नेहा भी पलट के हमें देखने लगी और मैंने बस इतना कहा; "बीटा कुछ नहीं आप पिक्चर देखो|" कुछ देर में पिक्चर खत्म हुई और हम उठ के खड़े हुए| काफी देर से नेहा मेरी ही गोद में थी तो भौजी ने उसे अपनी गोद में ले लिया| मैं आगे -आगे चल रहा था और भौजी और नेहा पीछे थे| मैंने मुड़ के देखा तो पाया भौजी नेहा को कुछ समझा रहीं थी| मैं समझ गया की माजरा क्या है, और मैंने फिर से नेहा को अपनी गोद में ले लिया और हम बाहर आ गए|


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42

अब आगे...

बाहर आके मैंने भौजी से कहा;

मैं: चलो लगे हाथ आपको दूसरी किश्त, भी दे दूँ|

भौजी: यहाँ?

मैं: हाँ .. अब हम लंच पे जायेंगे|

भौजी: क्या? पर क्यों? और कहाँ?

जब मैं पिछली बार अजय भैया के साथ बाजार आया था, चाट लेने तभी मैंने एक दूकान देखी थी| तो मैंने उसी दूकान की ओर ऊँगली की ओर उसी दिशा में बढ़ने लगा| चूँकि बाजार में ज्यादातर दुकानें ढाबे जैसी थीं और वो एक अकेली ऐसी दूकान थी जिसमें बैठने के लिए टेबल कुर्सियां थी| गाँव के लोगों के अनुसार सोचें तो वो दूकान महंगी थी परन्तु हम शहर में रहने वाले लोग जानते हैं की जब खाना खाने की बात आती है तो सबसे अच्छी दूकान ही देखी जाती है| इधर भौजी के चेहरे से झिझक साफ़ नजर आ रही थी और मैं अपनी जिद्द में आगे बढे जा रहा था| दूकान के बाहर पहुँच के भौजी रूक गईं;

भौजी: सुनिए ना, ये तो बड़ी महंगी दूकान है| हम चाट खाते हैं ना|

मैं: मेरी बेटी को भूख लगी है और आप उसे चाट खिला के भूखा रखोगी| चलो चुप-चाप नहीं तो मैं फिर से आप से बात नहीं करूँगा|

मजबूरी में भौजी मेरे साथ चल दीं, मैंने भी बिना डर उनका हाथ पकड़ा और दूकान में घुस गया| कोने की टेबल पे हम तीनों बैठ गए, भौजी मेरे सामने बैठीं थी और नेहा मेरे बगल में| आर्डर लेने के लिए बैरा आया, मैंने उसे निम्नलिखित आर्डर दिया:

दो प्लेट चना मसाला
दो प्लेट दाल तड़का
दो प्लेट चावल
छः तंदूरी रोटी
और अंत में दो रस मलाई

भौजी मेरी और आँखें फायदे देख रहीं थी| एक बात मैं आप सभी को बताना चाहूंगा, जब मैं अजय भैया के साथ चाट लेने आया था तब मैंने बातों-बातों में अजय भैया से पूछा था की यहाँ खाने में अधिकतर क्या मिलता है| ऐसा नहीं है की मैं उस समय ही लंच के बारे में प्लान कर रहा था बल्कि मैं तो ये जानना चाहता था की इस गरीब गाँव में लोग खाते क्या हैं? तब भैया ने बताया की यहाँ ज्यादातर दुकानों में आपको आलू परमल, भिन्डी की सब्जी, समोसे, सीताफल और पूड़ी ही मिलेगी| और मुझे इनमें से एक भी चीज नहीं पसंद! अब भौजी ने जब मेरे मुँह से चना मसाला, दाल तड़का और तंदूरी रोटी जैसे शब्द सुने तो उनका हैरान होना लाज़मी था|

भौजी: आप क्यों इतने पैसे खर्च कर रहे हो? इतना खाना कौन खायेगा?

मैं: पहली बात आप पैसों की चिंता ना करो| स्कूल जाने के समय पिताजी मुझे जेब-खर्ची दिया करते हैं| वही जोड़-जोड़ के मैंने पैसे इकट्ठे किये हैं| आप बताओ क्या मैं रोज आपको लंच या डिनर के लिए ले जाता हूँ? नहीं ना... तो फिर? और हाँ अगर रोज ले जा सकता तो भी आप चिंता ना करो| और रही बात खाना आर्डर करने की तो ये बहुत ज्यादा नहीं है| हमारे लिए काफी है, क्यों हैं ना नेहा बेटा|

नेहा: जी पापा!

मैं: Awww मेरा बच्चा!!! (मैंने नेहा के सर पे हाथ फेरा|)

कुछ ही देर में बैरा आर्डर लेके आ गया, उसने एक-एक कर खाना परोस दिया और चला गया| टेबल जरा ऊँचा था इसलिए नेहा बैठ-बैठे नहीं खा सकती थी, उसे खड़ा होना पड़ता|

भौजी: बेटा मेरे पास आओ|

मैं: नहीं रहने दो आप खाना शुरू करो मैं नेहा को खिला दूँगा|

भौजी जिद्द करने लगीं पर मैं अपने हाथों से नेहा को खाना खिलाने लगा| ऐसा नहीं था की नेहा खुद नहीं खा सकती थी, ये तो आज मुझे नेहा पर कुछ ज्यादा ही प्यार आ रहा था| मैं उसे रोटी के छोटे-छोटे कौर बना के खिलाने लगा| नेहा भी बड़े चाव से खा रही थी| और मुझे उसे खिलाने में बहुत मज़ा आ रहा था| और इधर भौजी को मुझे इस तरह खाना खिलाते देख के बहुत मज़ा आ रह था और उनकी ख़ुशी उनके चेहरे से झलक रही थी| अचानक उन्होंने मुझे खाना खिलाने के लिए चमच मसे चावल उठाये और मेरी ओर चमच बढ़ा दी| मैं एक दम से हैरान था क्योंकि ऐसा नहीं था की मैं उनके हाथ से खाने के लिए संकुचा रह था, बल्कि वो एक सार्वजानिक स्थान था| हमारे आलावा वहां दो परिवार और बैठे थे और वो भी बीच-बेच में हमें देख रहे थे| मैंने भौजी से कहा; "आप खाओ मैं खा लूंगा|" पर भौजी अपनी जिद्द पे अड़ीं थी; "नहीं मेरे हाथ से खाओ!" अब मैं उनके इस भोलेपन का ही तो कायल था| मैंने आखिर उनके हाथ से खा लिया और फिर से नेहा को खिलाने लगा| भौजी एक कौर खुद खाती तो दूसरा कौर मुझे खिलाती| मैं अब भी बीच-बीच में बाकी लोगों की ओर देखता तो लोग हमें देख के जलते-भूनते नजर आये| भौजी ओर नेहा रस मलाई खा रहे थे तो मैं टेबल से उठा ओर भौजी को कह गया की मैं अभी आता हूँ| मैं पहले काउंटर पे गया ओर काउंटर पे खड़ा आदमी कुछ ज्याद ही मुस्कुरा रहा था|

मैं: क्या हुआ क्यों हँस रहा है?

आदमी: अरे कुछ नहीं|

मैं: काम में ध्यान दिया कर समझा!

बस उसको थोड़ा अकड़ से डांटते हुए मैं वहां से बहार आया और इधर-उधर दूकान देखने लगा| अब मुझे तीसरे सरप्राइज की तैयार जो करनी थी| करीब बीस कदम की दुरी पे एक सुनार की दूकान थी| मैं तेजी से उसकी ओर लपका| दूकान पे एक बुजुर्ग सा आदमी था, जो कपड़ों से सेठ यानी दूकान का मालिक लग रहा था| वो मेरी ओर बड़े प्यार से देखते हुए बोला;

सेठ: आओ..आओ बेटा!

एक पल के लिए तो मैं ठिठक गया क्योंकि मुझे लगा की कहीं ये मुझे पहचान तो नहीं गया| पर मैं तो इसे नहीं जानता...

मैं: अरे काका मुझे एक "मंगलसूत्र" दिखाओ|

सेठ: अभी लो बेटा... ये देखो|

मैं बड़ी उत्सुकता से देखता रहा परन्तु मेरे पास समय ज्यादा नहीं था| मैंने आखिर में पड़े एक पीस को उठाया| पेन्डेन्ट दिखने बहुत आकरशक लग रहा था उसमें छोटे-छोटे लाल रंग के नग जड़े थे, और मेरे मन उसपे ही आ गया|

मैं: काका ये वाला दे दो| कितने का है?

सेठ: बस 500/- का|

मैं: (बिना भाव-ताव किये) ठीक है इसे पैक कर दो|

सेठ: अरे बेटा इस्पे सोने का पानी चढ़ा है| अंदर से ये चांदी का है, तुम सोने का क्यों नहीं ले लेते? बहु खुश हो जाएगी|

मैं समझ गया की काका यही सोच रहे हैं की मैं शादी-शुदा हूँ और देखा जाए तो उनका अनुमान लगाना गलत नहीं था| हमारे गाँव में मेरी उम्र के लड़के-लड़कियों का ब्याह कर दिया जाता था|

मैं: जी नहीं... अभी कमाता नहीं हूँ| जब कमाऊँगा तो आपसे ही सोने का ले जाऊँगा|

सेठ: ठीक है बेटा... ये लो|

काका ने मंगलसूत्र एक पतले लम्बे से लाल रंग के केस (Case) में पैक कर के दिया था| मैंने एक बार उसे खोला और चेक किया की चीज़ तो वही है ना|

फिर मैं तुरंत वहाँ से वापस रेस्टुरेंट आया| देखा तो भौजी परेशान हो रहीं थी क्योंकि मुझे गए हुए करी पंद्रह मिनट होने को आये थे| मैं वापस आया तो भौजी पूछने लगीं;

भौजी: कहाँ रह गए थे आप?

मैं: कुछ नहीं... बस बहार कुछ देख रहा था|

इतने में बैरा बर्तन उठाने आया तो मैंने उसे दस रुपये का नोट टिप (Tip) में दिया, जिसे पाके वो बहुत खुश हो गया और भौजी तो जैसे हैरान हो के मुझे देख रहीं थी| मैंने कुछ चाट भी घरवालों के लिए पैक कराई और दुबारा भौजी के पास आगया|

भौजी: आपने उसे पैसे क्यों दिए?

मैं: वो टिप (टिप) थी| शहर में खाना खाने के बाद बैरा को टिप देना रिवाज है|

भौजी: तो कितने पैसे कर्च किये खाने पे?

मैं: क्यों? (मैंने गुस्से में कहा)

भौजी: सॉरी बाबा| अब ये बताओ की बहार आप क्या देख रहे थे?

मैं: बस वापस जाने के लिए जीप देख रहा था| (मैंने भौजी से मंगलसूत्र की बात छुपाते हुए झूठ कहा|)

हम बस स्टैंड पहुंचे और वहाँ कड़ी जीप में बैठने लगे| इस बार मैं भौजी के साथ नहीं बैठ पाया क्योंकि एक लाइन में महिलाएं बैठी थीं और दूसरी लाइन में पुरुष यात्री| मैं ठीक भौजी के सामने बैठा और नेहा मेरी गोद में बैठी थी| भौजी ने फिर से घूँघट काढ़ा, और हम हिलते डुलते घर पहुंचे| अब हमें फिर से मुख सड़क छोड़ के कच्ची सड़क पकड़ के घर जाना था| नेहा फिर से आगे-आगे भाग रही थी और मैं और भौजी एक साथ चल रहे थे| घडी में शाम के चार बजे थे और हम तिराहे पे पहुंचे| तिराहे से हमारा घर दिख रहा था, एक रास्ता सीधा दूसरे गाँव जाता था और उसी रास्ते पे स्कूल भी पड़ता था| दूसरा रास्ता हमारे घर की ओर जाता था| तीसरा रास्ता वो था जो मुख्य सड़क की ओर जाता था| अब वो हुआ जिसकी आशंका मुझे तनिक भी नहीं थी; सामने स्कूल के पास हाथ बंधे माधुरी खड़ी थी| जैसे ही माधुरी ने मुझे देखा वो मेरी ओर बढ़ी और इधर भौजी ने जैसे ही माधुरी को देखा उनका गुस्सा सातवें आसमान पे था| जब माधुरी हमारे नजदीक आई तो भौजी उसपे बरस पड़ीं;

भौजी: अब क्या लेने आई है तू यहाँ? जो तुझे चाहिए था वो तो मिल गया न तुझे! अब भी तेरा मन नहीं भरा इन से?
माधुरी चुप-चाप नजरें झुकाये नीचे देखती रही और भौजी का बरसना जारी था|
भौजी: मुझे सब पता है की कैसे तूने इन्हें ब्लैकमेल किया! इनका दिल सोने का है और तुझे जरा भी शर्म नहीं आई ऐसे इंसान के साथ धोका करते? तू ने इनका इस्तेमाल किया और इन्होने सिर्फ तेरा भला चाहा और अब तू फिर इनके पीछे पड़ी है| छोटी (रसिका भाभी) के हाथों पैगाम भिजवाती है की मुझे स्कूल पे मिलो, क्यों? वो तेरी नौकर है? तू साफ़-साफ़ बता क्या चाहिए तुझे?

भौजी के बात करने के ढंग से साफ़ था की वो मुझपे कितना हक़ जताती हैं, और अगर मैं उनकी जगह होता तो मैं भी यही हक़ जताता! जब भौजी ने उसकी साड़ी पोल-पट्टी खोल दी तो माधुरी मेरी और सवालिया नज़रों से देखते हुए बोली;

माधुरी: आपने.....
(उसकी बात पूरी होने से पहले ही भौजी ने उसे टोक दिया)
भौजी: हाँ मुझे सब पता है, उसदिन जब तू इनसे बात कर रही थी तब मैंने दोनों की बात सुन ली थी|

माधुरी: मैं वो...

भौजी: तू रहने दे! मुझे सब पता है तू क्या चाहती है, एक बार और....

मैंने भौजी के कंधे पे हाट रख के उन्हें वो बोलने से रोक दिया|

मैं: आप प्लीज शांत हो जाओ! प्लीज यहाँ सीन मत बनाओ|
(क्योंकि आते जाते लोग अब इक्कट्ठा होने लगे थे| दूसरा कारन ये था की मैं नहीं चाहता था की नेहा वो सब सुने...)

माधुरी की आँखों से आंसुओं की धरा बह रही थी, और मेरे दिल पे थोड़ा पसीज गया था| पर मैं वहाँ सब के सामने बात नहीं कर सकता था| मैंने भौजी के दोनों कन्धों पे पीछे से हाथ रखा और उन्हें अपनी ओर मोड़ा ताकि हम घर वापस जा सकें और उधर माधुरी अब भी खड़ी मुझे जाता देख रही थी| नेहा तो अपनी मम्मी का रोद्र रूप देख के मेरी टांगें पकड़े पीछे छुप गई थी| जब हम वहाँ से चले आये तो जो दो-चार लोग वहाँ इकठ्ठा हुए थे वो चले गए और बस माधुरी अकेली खड़ी मुझे देख रही थी| घर बस पाँच मिनट की दूरी पे था, भौजी एक डैम से रुकीं और मेरी ओर मुड़ीं

भौजी: आप मुझसे एक वादा कर सकते हो?

मैं: हाँ बोलो

भौजी: आप चाहे मुझे मार लो, डाँट लो, काट दो पर मुझसे कभी बात करना बंद मत करना... मुझसे नाराज मत होना, वरना मैं सच में मर जाऊँगी!

मैं: आप ऐसा मत बोलो... मैं वादा करता हूँ कभी आपसे नाराज़ नहीं हूँगा!

जहाँ हम खड़े थे वहाँ हलकी से झाड़ियाँ थी, जिसका फायदा मैंने उठाया और भौजी को अपने गले लगा लिया| भौजी ने मुझे बहुत कस के जकड लिया जैसे मुझसे अलग ही ना होना चाहती हों और मुझमें समा जाना चाहती हों| करीब पाँच मिनट बाद जब नेहा हमें इस तरह गले लगा देख के छटपटाने लगी तब जाके हमारा आलिंगन टूटा| अब भौजी का गुस्सा समाप्त हो चूका था और दिल भर आया था, पर मैंने उनकी पीठ सहला के उन्हें शांत किया पर नेहा मेरी ऊँगली पकडे चल रही थी और भौजी से बात करने में भी कतरा रही थी और बार मेरी आड़ ले के छुप जाती थी| मैंने नेहा को गोद में उठा लिया और उसने बड़े भोलेपन से पूछा;

नेहा: पापा ... माँ गुस्से में क्यों थी?

मैं: बेटा मम्मी को माधुरी ज़रा भी अच्छी नहीं लगती और जब वो अचानक सामने आ गई तो मम्मी को गुस्सा आ गया|

भौजी: बेटा आप भी माधुरी से दूर रहा करो और उससे कभी बात मत करना और ना ही कोई चीज लेना| ठीक है?

नेहा अब भी डरी हुई थी और उसने बस हाँ में सर हिलाया पर बोली कुछ नहीं|

मैं भौजी से उनके इस व्यवहार के लिए बहुत कुछ पूछना चाहता था परन्तु ये समय ठीक नहीं था| खेर हम घर पहुंचे तो .....


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-16-2017

43

अब आगे...

घर भरा-भरा लग रहा था ... चन्दर भैया और अजय भैया दोनों वापस आ गए थे| पिताजी और बड़के दादा कुऐं के पास बैठे बात कर रहे थे और बड़की अम्मा और माँ आचार के लिए आम इकठ्ठा कर रहे थे| रसिका भाभी घूँघट काढ़े जानवरों को पानी पिला रही थीं| मतलब सब के सब अांगन में ही मौजूद थे और हमें देखते ही सबसे पहले पिताजी ने सवाल दागा;

पिताजी: क्यों भई कहाँ से आरहे हैं तीनों, देवर-भाभी और भतीजी?

जैसे ही भौजी की नजर घूँघट के अंदर से पिताजी और बड़के दादा पे पड़ी तो वो अपने घर में घुस गईं|

मैं: जी वो... पिक्चर देखने गए थे?

पिताजी: तो नालायक घर में बताना जर्रुरी नहीं था?

मैं: जी पूछ के गया था|

पिताजी: हम से तो नहीं पूछा?

मैं: जी आप खेत पे थे|

पिताजी: सभी सवालों के जवाब रट के आया है! अगर पिक्चर देखने जाना ही था तो सारे चलते? तुम तीनों ही क्यों गए?

मैं: जी मैंने प्लान बनाया था अम्मा, माँ, भाभी, भौजी और नेहा को एक साथ ले जाने का| परन्तु अम्मा ने मना कर दिया की वो और माँ नहीं जायेंगे| अब बचे मैं, नेहा, भाभी और भौजी| तो भाभी की तबियत सुबह से खराब थी और ये बात उन्होंने ही मुझे बताई थी| उन्होंने कहा था की मैं आज सारा दिन सोना चाहती हूँ| तो मैंने अम्मा से कहा की क्यों न मैं, नेहा और भौजी ही पिक्चर देख आएं| अम्मा ने इज्जाजत दी तभी हम गए वार्ना हम नहीं जाते| वैसे भी आप सभी के कहने के अनुसार, भौजी मेरी वजह से ही शादी में नहीं गई तो मैंने सोचा इसी बहाने इनका दिल बहाल जायेगा|

पिताजी: ठीक है, अगर भाभी (बड़की अम्मा) से पूछ के गए थे तो ठीक है|

मैं: पिताजी मैं आप सभी के लिए खाने के लिए कुछ लाया हूँ|

पिताजी: ये की न अकल मंदी वाली बात! शाबाश! ये खाने पीने का सामान अपनी माँ को दे दे|

मैं अपने कपडे बदल के आया पर भौजी मुझे ना तो प्रमुख आँगन में मिली और ना ही रसोई में| आखिर मैं उनके घर में पहुँचा तो भौजी मुझे दरवाजे की ओर पीठ कर के खड़ी दिखाई दी| मैंने भौजी को पीछे से बाँहों में भर लिया और उनकी गर्दन पे अपने होंठ रख दिए| भौजी के मुख से सिसकारी फूट पड़ी; "स्स्स्स्स्स्स्स्स" मैंने उनका मुख तो नहीं देखा था पर ये एहसास हो गया था की माधुरी की वजह से उनका मूड खराब है|

मैं: जानता हूँ आपका मूड खराब है ... पर प्लीज मेरे लिए अपना मूड ठीक कर लो| अभी तो आखरी सरप्राइज बाकी है!

भौजी: उस माधुरी ने.....
(भौजी के कुछ कहने से पहले ही मैंने उनके होठों पे ऊँगली रख के उन्हें चुप होने का इशारा किया|)

मैं: shhhhhhhhh बस अब मूड मत ख़राब करो|
(भौजी मेरी ओर पलटीं ओर मेरी आँखों में देखने लगीं....)

भौजी: तो अगला सरप्राइज क्या है?

मैं: जल्दी पता चल जायेगा, पर पहले आप को मेरी एक इच्छा पूरी करनी होगी|

भौजी: हाँ बोलिए... आपका हुक्म सर आँखों पे|

मैं: मैं आज रात आपको, आपके शादी के जोड़े में देखना चाहता हूँ|

भौजी: बस? इतनी सी बात| ठीक है और कुछ हुक्म करिये?

मैं: नहीं... मैं रात को साढ़े ग्यारह बजे आऊँगा|

भौजी: और मेरा सरप्राइज का क्या?

मैं: वो कल मिलेगा|

भौजी: कल? इतना इन्तेजार करवाओगे मुझसे?

मैं: हाँ.... इन्तेजार करने में जो मजा है वो किसी और किसी बात में नहीं|

भौजी: आप भी न सच्ची बहुत तड़पाते हो!

मैं: अच्छा ये तो बात हुई सरप्राइज की, अब मैं कुछ और बात भी करना चाहता हूँ?

भौजी: हाँ बोलो?

मैं: नहीं अभी नहीं... बाद में!

भौजी: नहीं कहिये ना?

मैं: नहीं... बड़ी मुश्किल से आपका मूड ठीक हुआ है, और मैं उसे दुबारा ख़राब नहीं करूँगा|

ये कहके मैंने उनके होठों को अपने होठों से छुआ और हलकी सी Kiss देके बहार निकल आया| बहार नेहा बहुत खुश दिख रही थी और आज मुझसे कुछ ज्यादा ही दुलार कर रही थी| जब से मैं आया था tab से मैंने नेहा को चन्दर भैया के साथ बहुत कम ही देखा था| और जब से वो बेल्ट से पिटाई वाला हादसा हुआ तबसे तो नेहा चन्दर भैया से एक दम कट गई थी| मुझे तो लगता था की वो उन्हें अपना बाप ही नहीं मानती... खेर ये मेरी सोच थी पर मैंने कभी भी नेहा से इस बारे मैं बात नहीं की| रात को भोजन खाके मैं अपनी चारपाई पे लेटा था और तभ कूदती हुई नेहा भी मेरे पास आके लेट गई| मैंने नेहा को हमेशा की तरह कहानी सुनाई और वो सुनते-सुनते वो सो गई|

जैसे ही घडी में रात के साढ़े ग्यारह बजे मैं मूतने के लिए उठा और चेक करने लगा की सब सो रहे है ना| फिर मैं वापसी में सीधा भौजी के घर की ओर बढ़ गया| दरवाजा खुला था और मैंने अंदर जा के दरवाजा बंद किया| जैसे ही मैं पलटा तो देखा भौजी आँगन में अपनी शादी का लाल जोड़ा पहने, घूँघट काढ़े मेरे सामने कड़ी हैं| मैं हाथ बंधे उन्हें देखता ही रहा.... करीब पांच मिनट तक मैं बस उन्हें निहारता रहा और भौजी भी कुछ नहीं बोलीं| मुझे समझ नहीं आया की मैं क्या कहूँ| फिर मैं धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ा और उनके सामने खड़ा हो गया| मैंने उनका घूँघट उठाया तो उनके हुस्न ने मेरा क़त्ल कर दिया| चाँद की रौशनी में ऐसा लग रहा था जैसे चाँद का एक टुकड़ा कट के मेरी झोली में आ गिरा हो! भौजी की आँखें झुकी हुई थीं... पर मेरी आँखें उनके चेहरे पे टिकी हुई थी| मैंने भौजी की ठुड्डी को अपनी उँगलियों से ऊपर उठाया और तब हमारी आँखें चार हुई!

मैं: प्लीज अपनी आँखें बंद करो|

भौजी ने बड़ी नजाकत से अपनी आँखें बंद की| मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और ट्रैक पेंट से मंगलसूत्र का CASE निकला| उसे खोला... और CASE को चारपाई पे रख दिया| मंगलसूत्र हाथ में लेके मैंने भौजी के गले में हाथ डालके गर्दन के पीछे उसे लॉक किया| अब भौजी को कुछ तो समझ आ गया था, क्योंकि जैसे ही मैंने मंगलसूत्र को लॉक किया और अपने हाथ वापस खींचे तो भौजी ने अपनी आँखें उसी नजाकत से खोलीं जिस नजाकत से बंद की थी|

भौजी: ये... आपके पास....
(मैंने आगे उन्हें कुछ भी बोलने नहीं दिया और उनके होठों पे अपनी ऊँगली रख दी|)

मैं: shhhhh ये आपके लिए है| मैंने कहीं से चुराया नहीं है.... कल जब मैं आपसे माँ का मंगलसूत्र वापस लेने आया था तब मुझे बड़ा बुरा लगा| मेरे दिल में एक ख्वाइश हुई की क्यों न मैं आपको एक मंगलसूत्र पहनाऊँ, जो मैंने खरीदा हो| इसलिए आज जब आप खाना खा रहे थे तब मैं दुकाने से बहार निकल के सुनार से खरीद लाया था| मुझे स्कूल जाते समय पिताजी जेब खर्ची के लिए पैसे देते हैं उन्ही पैसों से मैंने आपके लिए ये लिया|

भौजी ने मेरी बातें बड़े इत्मीनान से सुनी और बातें सुन के उनकी आँखों में आंसूं छलक आये और वो कुछ ना बोलीं बस मेरे गले लग गईं| रोने से उनके गले से आवाज भी नहीं निकल रही थी, बस इतना ही बोल पाईं; "आज आपने मुझे पूर्ण कर दिया!!!" और मुझे से लिपट के सुबकने लगी|

“बस..बस... चुप हो जाओ| मैंने आपको ये तौफा आपको रुलाने के लिए नहीं दिया था!"
तब जाके भौजी चुप हुईं, अब मैंने उनके कंधे पे हाथ रख के उन्हें अपने से थोड़ा दूर किया और फिर उनके आँसूं पोछे|

मैं: अब कभी मत रोना?

भौजी ने हाँ में अपना सर हिलाया| मैं पलट के जाने लगा तो भौजी बोलीं;

भौजी: आप कहाँ जा रहे हो?

मैं: सोने

भौजी: क्या? पर अभी? आजतो हमारी सुहागरात है!

मैं: क्या? सुहागरात तो उस दिन थी ना?

भौजी: पर मंगलसूत्र तो आपने आज पहनाया है ना? एक तरफ तो आप मुझे रोने के लिए मन करते हो और दूसरी तरफ मुझे यूँ अकेला छोड़के जारहे हो?

मैं: मैं आपको छोड़के कहीं नहीं जा रहा, मेरा मकसद आज आपको सिर्फ मंगलसूत्र पहनाने का था बस और कुछ नहीं|

भौजी: वाह जी वाह, आपने तो कहा था की तीसरा सरप्राइज आप कल दोगे?

मैं: घडी देख लो, बारह बजके एक मिनट हो चूका है! मैं कभी झूठ नहीं बोलता!

भौजी: ठीक है बाबा, आप जीते पर मैं आज आपको नहीं जाने दूँगी|

इतना कहके भौजी तेजी से मेरी ओर चलती हुई आई और मुझसे कस के लिपट गई|

भौजी: आपको पता भी है की मेरा हाल क्या है? मैं कितना अकेला महसूस करती हूँ.... आपको नेहा का अकेलापन दीखता है पर मेरा नहीं! पिछले 5 - 6 दिनों से आपने मुझे छुआ भी नहीं? कल भी सारा दिन आप मेरे साथ खेल खेलते रहे और ऐसे जताया की जैसे मैं यहाँ हूँ ही नहीं| आप जब खाना ले के आये तो मुझे लगा की आपका गुस्सा शांत हो गया है और आप रात में आओगे पर नहीं.....मेरा कितना मन है आप के साथ ... पर आप हैं की ....

मैं: Awwwww !!! O.K. बाबा नहीं जाऊँगा! बस खुश!!!

भौजी कुछ नहीं बोलीं बस अपने नीचे वाले होंठ को अपने दाँतों तले दबाया और मुस्कुरा दीं| पता नहीं क्या हुआ, वो मुझे एक टक देखने लगीं..... और फिर एक कदम पीछे गईं और नीचे घुटनों के बल बैठ गईं| पर मुझे बहुत ही अजीब लगा... एक अलग सी फीलिंग हुई और इधर भौजी का हाथ मेरे पजामे के ऊपर था| इसे पहले की भौजी मेरे पजामे को नीचे खींचे मैंने उन्हें कंधे से पकड़ा और वापस खड़ा किया| भौजी अपनी दोनों भौएं सिकोड़ के सवालिया नजरों से देखने लगीं| मैंने कुछ नहीं कहा और बस ना में सर हिला के उन्हें रोका| भौजी ने अपने हाथ आगे बढ़ा के मेरी टी-शर्ट उतारी और इस बार मैंने उनका जरा भी विरोध नहीं किया| भौजी ने अपने सीधे हाथ को मेरी नंगी छाती पे फिराया ...मेरा शरीर गर्म था! उन्होंने आगे बढ़ के मेरे दिल के ऊपर अपने होठों से चुम्बन किया| मानो ये जता रहीं हों की ये मेरा है! फिर धीरे से वो एक कदम पीछे हो गईं| मैं धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ने लगा ओर वो पीछे होती गई... आखिर हम चारपाई तक पहुंचे| मैंने उनको बिठाया .... और फिर धीरे-धीरे उन्हें लेटा दिया| मैं अब उनके ऊपर चढ़ गया और उनके होठों पे अपने होंठ टिका दिया| मैंने अपना पूरा वजन उनपे नहीं डाला था मैं बिलकुल Push Ups मारने वाली स्थिति में था|

मैंने सीधा अपने जीभ उनके मुंह में प्रवेश कर दी और भौजी ने बड़ी गर्म जोशी से उसका स्वागत किया| मेरी जीभ उनके मुंह में भ्रमण कर रही थी और इधर भौजी ने अपने दोनों हाथों से मेरी गर्दन के इर्द-गिर्द अपनी गिरफ्त बना ली थी| वो अब भी मुझे अपने ऊपर खींच रहीं थी... पर मैं उनके निचले होंठ को चूसने में व्यस्त था| वो मधुर सुगंध मुझे फिर से पागल किये जा रही थी| मैं उन्हें बेतहाशा चूमे जा रहा था| पर अब बारी थी भौजी की,,, जैसे ही मैंने अपनी जीभ उनके मुंह में दुबारा प्रवेश कराई उन्होंने अपने मोती से सफ़ेद दाँतों से मेरी जीभ को पकड़ लिया| अब मेरी जीभ उनके मुंह के अंदर छटपटाने लगी जैसे किसी छिपकली की पूँछ काट देने पे उसकी पूँछ कुछ देर के लिए छटपटाने लग जाती है| ये तो साफ़ था की दोनों जिस्म वासना और प्यार की मिलीजुली अग्नि में झुलस रहे हैं! अब भौजी ने मेरी जीभ को दाँतों से दबाये हुए ही चूसना शुरू कर दिया था| इधर मेरा लंड पाजामा फाड़ के बहार आने को तैयार था| मैंने धीरे से अपने लंड को उनकी योनि पे दबाना शुरू कर दिया था| पर भौजी मेरी जीभ को अपने दाँतों की गिरफ्त से छोड़ना ही नहीं चाहती थीं| मैं चूँकि Push Ups मारने वाली स्थिति में उनके ऊपर लेटा था इसलिए मैं धीरे-धीरे ऊपर उठाने लगा जिससे की मेरी जीभ बहार निकलने को तड़पने लगी| पर भौजी कहाँ मानने वाली थीं... उन्होंने मेरी जीभ को तो आजाद किया पर मेरे निचले होंठ को अपने होठों में भर लिया और लगीं उसे चूसने| अब मैंने भी सोचा की चलो जो ये चाहें वही सही और मैंने भी उनका पूरा सहयोग देना शुरू कर दिया| मैं भी उनके ऊपर के होठ को चूसने लगा और ये सिलसिला करीब पंद्रह मिनट तक चलता रहा| ना तो उनका मन था मेरे होंट छोड़ने का और ना ही मेरा मन था उनके होठों को छोड़ने का!


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अब आगे...

शायद उन्हें लगा की इससे से हम दोनों को वो संतुष्टि नहीं मिल पायेगी जो हमें आगे मिलती| या फिर उनके अंदर अग्नि अब ज्वाला का रूप ले चुकी थी की उन्होंने मेरे होठों को आजादा किया और उसके बाद मैंने भी उन्हें आजाद किया| हम दोनों के ही होंठ पूरी तरह से गीले थे और ..... उस दृश्य को बयान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं! हम अलग तो हुए पर आँखें अब भी एक दूसरे से मिली हुईं थी और जैसे अलग ही ना होना चाहती हों! इस तरह से एक दूसरे को देखने से शरीर में लगी अग्नि अब प्रगाढ़ रूप धारण कर चुकी थी पर फिर भी कुछ था जिसने हमें जंगली होने से रोका हुआ था| मैंने दुबारा पहल की और अपनी आँखों से उनके ब्लाउज की ओर इशारा किया, और दुबारा टकटकी लगाए उन्हें देखता रहा| भौजी ने भी बिना अपनी नजरें हटाये अपने ब्लाउज के बटन खोलने शुरू कर दिए और जैसे ही ब्लाउज खुला मेरे सामने दूध से सफ़ेद एक दम सही गोलाकार स्तन थे| मैं थोड़ा सा नीचे खिसका और उनके बाएं स्तन पे अपने होंठ रख दिए| ये मेरा तरीका था उन्हीने बताने का की आपके दिल पे अब बस मेरा राज है! भौजी ने मेरी इस प्रतिक्रिया का जवाब अपने दोनों हाथों को मेरे सर पे रख के दबा के दिया| मैंने उनके स्तन का पान करना शुरू कर दिया| हालाँकि नमें दूध नहीं था पर दोष की महक जर्रूर आ रही थी| मैं उनके निप्पल को अपनी जीभ से छेड़ना लगा और भाजी के मुंह से सिस्कारियां फूटने लगीं थी; "स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ... म्म्म्म्म्म्म्म .... आअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह ज़्ज़्ज़्ज़"| अपने बाएं हाथ से मैंने भौजी के दाहिने स्तन का मर्दन शुरू कर दिया था और भौजी के शरीर ने प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी थी| वो बहुत कसमसा रहीं थी... उनके दिल की धड़कनें मुझे माथे पे महसूस होने लगी थी| भौजी अपने हाथों का दबाव मेरे सर पे डाले जा रहीं थी जैसे कह रहीं हो की खा जाओ... काट लो इन्हें! एक बात कहूँ मित्रों आप जब भी सेक्स करें तो कोशिश करें की आप बोलें ना| मैं आपको गारंटी देता हूँ की आपको जो सैटिस्फैक्शन मिलेगा उसकी आप किसी भी चीज से तुलना नहीं कर सकते बशर्ते आपका पार्टनर बिना कहे आपके मन की बातें समझ सकता हो!

मैंने अपने दांतों से भौजी के निप्पलों को काटना शुरू कर दिया था, और जैसे ही मेर दाँत उनके निप्पल को छूटे वो चिहुक उठती और उनके मुंह से "आअह्ह्ह..स्स्स्स्स्स" निकल पड़ता| बहुत मजा आ रहा है और रुकने का मन भी नहीं कर रहा था पर मैं भौजी के दाहिने स्तन के साथ तो ज्यादती नहीं कर सकता था| इसलिए मैंने भौजी के बाएं स्तन को छोड़ा ... एक नजर उसे देखो और देखता रहा वो बिलकुल लाल हो चूका था और उसमें मेरे दांतों के निशाँ पड़ चुके थे| दायाँ स्तन जैसे मेरे होठों से शिकायत कर रहा हो की आखिर मेरे साथ ही सौतेला व्यवहार क्यों! आखिर मैंने उसे (दायें स्तन) को अपने मुंह में भर लिया और उसे भी वही प्यार दिया जो बायें वाले को दिया था| भौजी का कसमसाना अब भी जारी था और उनके मुंह से "स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स...... उम्म्म अन्न्न्ह्ह्ह्ह " की सिसकारियाँ जारी थी| मैंने अपनी जीभ से उनके निप्पल को बार बार छेड़ता ... कभी उनके निप्पल को दांतों से दबाता और भौजी के मुंह से आह निकल पड़ती; "आअह्हह्हह म्म्म्म"... फिर मैंने अपना मुंह जितना हो सकता था उतना खोला और उनके स्तन को अपने मुंह में भर के काट लिया! भौजी ने अपने दोनों हाथों से मेरे सर में उँगलियाँ फिराना चालु कर दिन और मुझे महसूस हुआ की उन्हिएँ कितना आन्नद आ रहा है! अब मैंने दायें वाले को भी चूस-चूस के लाल कर दिया था| अब मैं सीधा नीचे की ओर बढ़ा... उनकी नाभि को KISS किया और फिर उनकी साडी खोली और जो पल्ला उन्होंने अपनी कमर में खोंसा हुआ था उसे निकाल दिया|साडी खुल गई .. अब बचा पेत्तिसोअत तो मैंने उसका नाद खोल दिया और उसे नीचे ना उतार के ऊपर की ओर सरका दिया और उनकी योनि पे अपने होंठ टिका दिए| भौजी ने अपनी दोनों टांगें पूरी खोल ली जिससे उनकी योनि ओर उभर के सामने आ गई|

अब मैंने एक नजर भौजी को देखा तो जैसे वो इन्तेजार कर यहीं हों की कब मैं अपना मुंह उनकी धधकती योनि पे लगाउँगा|

मैंने जैसे ही अपनी जीभ उनकी योनि पे लगा के एक सुड़का मारा (क्योंकि उनकी योनि पहले से ही पनिया चुकी थी|) भौजी का बदन कमान की तरह उठ गया| मैं फिर भी रुका नहीं ओर अपनी जीभ से उनकी योनि ऊपर-ऊपर से कुरेदने लगा| मैंने धीरे से भौजी के भगनासा को अपने जीभ से छेड़ा तो भौजी तड़प उठीं; "स्स्स्स्स्स्स्स्स ...उम्म्म"| मैंने उनके भगनासा को अपने मुँह में भर लिया ओर उसे चूसने लगा| भौजी विचलित होने लॉगिन ओर उनकाबदन फिर से कमान की तरह खिंच गया| केवल उनकी गर्दन तकिये पे थी बाकी का सारा शरीर कमान की तरह ऊपर की ओर मुड़ चूका था| मैंने उनके भगनासा को छोड़ा और धीरे-धीरे उनका शरीर पुनः सामान्य हो गया| मुझे महसूस हुआ की अब भी उनका मन नहीं भरा इसलिए करीब 5 - 7 सेकंड सांस लेने के बाद मैंने पुनः डुबकी लगाईं और भौजी की योनि में अपनी जीभ प्रवेश करा दी और भौजी तो छटपटाने लगीं| उन्होंने तकिये को दोनों हाथों से पकड़ लिया और बार-बार अपनी कमर हवा में उठा लेतीं| मैंने उनकी योनि की खुदाई जारी रखी और इधर भौजी ने अपना हाथ मेरे सर के ऊपर रखा और मेरे बालों में उँगलियाँ फिराने लगीं| उनकी उँगलियाँ मेरे सर पे जादू करने लगीं और मेरे रोंगटे खड़े हो गए और मैं और भी ज्यादा जोश से उनकी योनि को चाटने-चूसने लगा| कभी-कभी तो मैं भौजी की योनि की कपालों को अपने दाँतों से हल्का दबा देता और भौजी चिहुंक उठती; "आह!"!!! दस मिनट तक उनकी योनि को अपने मुँह से भोगने के बाद मुझे लगा की भौजी अब स्खलित होने वाली हैं इसलिए मैं पूरी तरह तैयार था| अगले दो सेकंड में भौजी ने अपनी कमर हवा में उठाई और उनकी योनि से रस मेरे मुँह में जाने लगा| बिना रुके भौजी स्खलित होती रहीं और मुझे उनका नमकीन रस अपने मुँह में भरता महसूस होने लगा| अब उनकी योनि से एक मादक खुशबु ने मेरे दिल में हलचल मचा दी और मैं रह-रह के उनके भगनासा को छेड़ देता| रस निकलना अब भी नाद नहीं हुआ... करीब बीस सेकंड तक वो स्खलित होती रहीं और मैं जीभ से उनके रस को पीता रहा|

भौजी हाँफने लगीं और मैं उन्हें और तंग ना करते हुए उनकी बगल में लेट गया| करीब एक मिनट बाद उनकी सांसें सामान्य हुईं और वो मेरी और करवट लेके लेट गेन| उनका सर मेरी छाती पे था और उनका बायां हाथ मेरे पेट पे था| मुझे उनके हाव भाव से लगा की वो संतुष्ट हैं और मैं मन ही मन बहुत खुश था| मैं उनके साथ सम्भोग नहीं करना चाहता था क्योंकि ऐसा करना ऐसा होता जैसे मैं उनसे दिन में दिए सभी सुरप्रीज़ों के बदले में उनसे कुछ माँग रहा हूँ| मैं उनसे कोई सौदा नहीं करना चाहता था बल्कि उन्हें खुश देखना चाहता था | मेरा मन अवश्य कह रहा था की आगे बढूँ पर आत्मा मना कर रही थी| इसलिए मैं शांत पड़ा रहा..... पर पता नहीं कैसे उन्हें हमेशा मेरे दिल की बात बिना कहे ही पता चल जाती थी? भौजी उठ के कड़ी हुईं और अपना पैटीकोट निकाल फेंका और वापस आके मेरे बगल में उसी तरह लेट गईं| उनका नंगा बदन मेरे अंदर आग लगा चूका था पर मैं बहुत झिझक रहा था| उन्होंने अपनी बायीं टांग उठा के मेरे लंड पे रख दिया| मैं हल्का सा मुस्कुरा दिया और वो अपने आप ही मेरे ऊपर चढ़ गईं ... उनके मेरे मुँह से अपने रस की महक आ रही थी और उन्होंने बिना कुछ कहे मेरे होठों पे Kiss किया| वो मेरे होठों को मदहोश होके चूसने लगीं और ये सिलसिला करीब तीन मिनट तक चलता रहा| जब तक उन्हें ये संतोष नहीं हो गया की मेरे मुंख में अब उनके योनि रस की महक खत्म नहीं हो गई वो मेरे होठों को चूसती रहीं| अब वो धीरे-धीरे नीचे हुईं और मेरे निप्प्लेस को अपने दांतों से काट लिया, मेरे मुँह से पीड़ा से भरी चीख निकल पड़ी; "आह! स्स्स" फिर उन्होंने मेरे निप्पल के इर्द-गिर्द भूरे हिस्से को निप्पल समेत अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगीं| शायद उन्हें लगा की इसमें से कुछ निकलेगा? पर जहाँ से निकलना था वो तो उनकी नंगी योनि और मेरे पजामे के बीच फँसा हुआ था| भौजी की योनि की गर्मी मुझे अपने लंड पे साफ़ महसूस होने लगी थी और वो बेचारा बहार आके सांस लेने के लिए तड़प रहा था! भौजी ने मेरे दोनों निप्पलों को चूसना... चबाना जारी रखा| और मैं बस सिसकियों के सागर में गोता लगा रहा था|

अब वो नीचे की ओर बढ़ीं ओर मेरी नाभि को चूमा और फिर मेरे पजामे के नाड़े को खोला और उसे और कच्छे को एक साथ पकड़ा और नीचे खींच के उतार दिया| अब मेरे फैन फनाता हुआ लंड उनके सामने खड़ा था और वो उसे प्यासी नजरों से क्षण भर देखती रहीं| इधर मेरे लंड ने एक तेज सांस ली क्योंकि बेचारे का दम क्षण भर पहले जो घुट रहा था| भौजी ने दाहिने हाथ से उसे पकड़ा और उसकी चमड़ी नीचे की और सुपाड़ा बहार आ गया| भौजी ने धीरे-धीरे अपना मुँह खोला और उसे अपने मुँह में भर के सहज हो गईं| मैं तो जैसे अव में उड़ने लगा... उनके मुँह से निकल रहीं गरम सांसें मुझे अपने लंड पे महसूस होने लगी थी| भौजी ने अपने दाँतों से सुपाड़े को धीरे-धीरे दबाने लगी| "स्स्स्स्स्स्स आह!" और मैं बस इतना ही कह पाया.... भौजी ने एक लम्बा सुड़पा मारा और लंड को पूरा अंदर ले लिए! पूरा लंड उनके गर्म-गर्म मुँह में और ऊपर से उस पे धोंकनी जैसी लग राय उनकी गर्म सांसें मेरी हालत ख़राब करने लगी थी| फिर उन्होंने अपना मुँह ऊपर-नीचे करना शुरू किया और लंड को पूरा चूसने लगीं| अंदर का ज्वलमुखी उबाल रहा था और बहार आने को तैयार था.... मैंने उनके गालों को अपने हाथ से छुआ और रुकने का इशारा किया| फिर उन्हें अपने ऊपर खींच लिया और अपनी बगल में लिटा लिया| क्षण भर हम एक दूसरे को देखते रहे और इसका ये फायदा भी था की जवालानुखी शांत होने लगा था| जब वो बिलकुल ठंडा हो गया तब मैं भौजी के ऊपर आगया और अपने लंड को उनकी योनि पे सेट किया पर फिर मन किया की क्यों ना इन्हें और तड़पाऊँ? इसलिए मैं लंड को ऊपर-ऊपर से उनकी योनि पे रगड़ने लगा परन्तु अंदर नहीं धकेल रहा था| भौजी तड़प उठीं और अपने हाथ से मेरे लंड को पकड़ने की कोशिश करने लगीं पर मैंने उन्हें पकड़ने नहीं दिया, उसके बाद जो हुआ उसे सुन के मेरे होश उड़ गए!

अनायास ही उनके मुँह से ये बोल फूट पड़े; "Please .... I Can’t take it anymore!" (प्लीज मुझसे अब और बर्दाश्त नहीं होता!) ये सुन के मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं| अब मेरा दिमाग एकदम सन्न हो गया क्योंकि मैंने कभी नहीं सोचा था की भौजी अंग्रेजी भी बोल सकती हैं! मुझे उनके अंग्रेजी बोलने से कोई दिक्कत नहीं थी बस एक शिकवा था की उन्होंने कभी बताया नहीं| मैं एक दम से रूक गया और भौजी समझ गईं की क्या कारन है उन्होंने अचानक से मुझे अपने ऊपर खींचा और मुझे नीचे कर के मेरे लंड पे सवार हो गईं और अपने हाथों से लंड को योनि के अंदर धकेल दिया| अब उन्होंने ऊपर-नीचे होना शुरू कर दिया.... इधर मैं हैरान था और मैंने अपनी आँखें बंद कर ली| मैं कुछ नहीं बोला बस चुप-चाप लेटा रहा... अब दिमाग तो संन्न था परन्तु लंड अंदर पूरे मजे ले रहा था| उस बेचारे को इस सब से क्या फर्क पड़ता| उसे तो अंदर से गर्म-गर्म और भौजी के रस का गीलापन दोनों ही मिल रहे थे और वो बस अपनी प्यास बुझाना चाहता था| इधर भौजी की योनि भी कुछ ऐसा ही महसूस कर रही थी| इधर भौजी कुछ ज्यादा ही उत्साह और मस्ती में बह गईं और उन्होंने अपनी गति बढ़ा दी थी| आँगन में उनकी सिसकारियाँ गूंजने लगीं थी, "स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स अह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह..... उम्म्म्म्म्म्म्म्म" इधर मैं झड़ने की कगार पे आ चूका था| उधर भौजी की हालत भी कुछ ऐसी ही थी, उन्होंने अचानक ही ब्रेक लगा दी और स्थिर हो गईं बस अपनी कमर को गोल घुमा रहीं थी और उनकी योनि ने मेरे लंड को जकड के उसे दबाना चालु कर दिया| आखिर भौजी स्खलित हो गईं और मेरा लंड उनके रस में भीग चूका था और उनका रस बहार मेरे लंड से होता हुआ चारपाई और मेरी गांड तक बह निकला| अब बारी मेरी थी, भौजी ने अपनी कमर को हिलाना बंद नहीं किया था और आखिर मैंने अपना फव्वारा अंदर छोड़ दिया| जैसे ही मेरा फव्वारा अंदर छूटा भौजी ने अपनी गर्दन ऊँची कर के पीछे की ओर मोड़ लिया| मैंने अपने दोनों हाथों से चारपाई पे बिछी चादर को पकड़ लिया था|

करीब बीस सेकंड के बाद मैं शांत हुआ ओर भौजी मेरे ऊपर ही लेट गईं| दोनों ही पसीने से तरबतर थे ओर थक चुके थे| दोनों की सांसें तेज थी... अगर मैं गलत नहीं तो भौजी मेरी धड़कनेंईं सुन पा रहीं होंगी क्योंकि उनका सर मेरी छाती पे था| भौजी हैरान तो होंगी की मैंने आखिर उनसे अंग्रेजी बोलने के बारे में क्यों कुछ बात नहीं की| पर मैं उन्हें वचन दे चूका था की मैं आपसे नाराज कभी नहीं हूँगा|

एक लम्बी सांस लेते हुए भौजी बोलीं;

भौजी: आप मुझसे नाराज हैं?

मैं कुछ नहीं बोला बस आँख बंद किये ना में गर्दन हिला दी|

भौजी: तो आप ने मुझसे मेरे अंग्रेजी बोलने पे कुछ क्यों नहीं कहा?

मैं अब भी कुछ नहीं बोला बस उनकी पीठ पे दोनों हाथ रखे और करवट बदली| अब भौजी का सर मेरे दायें बाजू पे था और हम अब भी नंगे थे और लंड अब भी योनि में शिथिल पड़ा था| मैं उनकी आँखों में देखता हुआ बोला;

मैं: मैंने आपसे वादा किया था की मैं आपसे कभी नाराज नहीं हूँगा…. और हाँ मुझे थोड़ा बुरा लगा की आपने मुझे कभी नहीं बताया की आप कितना पढ़े हो? मैंने तो ये सोचा था की आप भी चन्दर भैया की तरह अनपढ़ हो| पर अगर आपने मुझे इस बारे में कुछ नहीं बताया तो गलती मेरी भी है.... मैंने भी तो कभी इस बारे पे आपसे कुछ नहीं पूछा… और आपका ये सब न बताने के पीछे भी कोई न कोई कारन होगा|

भौजी: कभी-कभी तो लगता है की मैं आपको बिलकुल नहीं समझ पाती! मैं तो डर रही थी की आप मुझसे नाराज होंगे पर आपने कितनी सरलता से इस बात को एक्सेप्ट (accept) कर लिया| मैं सच मैं बहुत लकी (lucky) हूँ की मुझे आप मिले|

मैं: Likewise .... (मैंने उन्हें अपने से कस के चिपका लिया|)

भौजी: दरअसल बचपन से मुझे पढ़ने-लिखने का बहुत शौक था| पर पिताजी ने कभी पढ़ने नहीं दिया, उन दिनों चरण काका की भतीजी शहर से आई हुई थी और मैंने जीवन में पहली बार किताबें देखी! मैं उन्हें खोल के देखने लगी और चरण काका की भतीजी मुझे वर्णमाला के कुछ अक्षर सिखाने लगी| ये सब चरण काका ने देख लिया और पिताजी से कहा की मुझे पढ़ने दिया जाए| पर मितजी नहीं माने... ऐसा नहीं था की हमारी माली (financial) हालत ख़राब थी पर पिताजी का मानना था की केवल लड़कों को ही शिक्षा का अधिकार है| पर चरण काका के जोर देने पर पिताजी ने मुझे पढ़ने के लिए मेरे मौसी के पास शहर भेज दिया| मौसी ने मेरे एडमिशन अंग्रेजी मध्यम स्कूल में करा दिया और मैं दसवीं के इम्तिहान दे चुकी थी तब मेरे ब्याह करा दिया गया| उसके बाद मैंने अपने मन को मार लिया और चुलह-चौक में अपना मन लगा लिया| (ये कहते हुए भौजी की आँखों से आंसूं छलक आये और मेरी छाती गीली करने लगे|) फिर आप मिले और मेरी जिंदगी बदल गई, सच कहूँ तो मैं रब की शुक्रगुजार हूँ जो आप मेरी जिंदगी में आये| मुझे अब कोई गिला नहीं की मेरी पढ़ाई छूट गई, हाँ शुरू-शुरू में हुई थी पर अब नहीं ... मेरे पास आप हो और मुझे कुछ नहीं चाहिए| (भौजी ने अपने आप ही आंसूं पोछे और फिर से मुझसे चिपक गईं|)

मैं: आप अब भी पढ़ना चाहते हो?

भौजी: नहीं... अब मन नहीं लगता और ना ही आपको इसके बारे में किसी से बात करने की कोई जर्रूरत है| आप के आलावा इस घर में और कोई नहीं जानता की मैं दसवीं तक अंग्रेजी में पढ़ी हूँ|

मैं: यार कितनी शर्म की बात है की घर में अंग्रेजी पढ़ी हुई बहु है और किसी को उसकी कदर ही नहीं| इसलिए मैं कह रहा था की मेरे साथ भाग चलो|

भौजी: छोडो उस बात को.... वैसे एक कारन है जिसकी वजह से मैंने आपको कभी नहीं बताया की मैं अंग्रेजी पढ़ी हूँ|

मैं: वो क्या?

भौजी: जब मैं आपके सामने लड़खड़ाते हुए अंग्रेजी बोलती थी तो जो मुस्कान आपके चहरे पे छलक आती थी उसके लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ|


RE: Hot Sex stories एक अनोखा बंधन - sexstories - 07-16-2017

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अब आगे...

मैं: आप बड़े शैतान हो... तो प्रॉमिस Me, अब से आप और मैं अंग्रेजी में ही बात करेंगे?

भौजी: नहीं.... अगर किसी को पता चल गया तो बखेड़ा खड़ा हो जायेगा| प्लीज !!!

मैं: ठीक है बाबा... वैसे भी आप कौन सी मेरी हर बात मानते हो|

भौजी: नहीं आपके लिए तो जान हाजिर है| पर ....

मैं: ठीक है बाबा आपको सफाई देने की कोई जर्रूरत नहीं…… मैं समझ सकता हूँ|

भौजी: आप मेरी हर बात बिना कहे ही समझ जाते हो|

जब भौजी ने मेरे सामने अंग्रेजी में वो शब्द बोले तो मैं हैरान था पर बाद में उनकी पूरी बात सुनके मैं यही समझ पाया की उनका इस बात को राज रखने का कारन बहुत ही साफ़ था| घर वालों को वैसे भी कोई फर्क नहीं पड़ता बस यदि किसी बात में अगर भौजी अपनी राय देती तो सब यही कहते की ये जयादा पढ़ी लिखी है और अपनी धोंस दिखा रही है| जो की भौजी का आचरण बिलकुल भी नहीं था| और दूसरी बात उन्होंने मुझसे अंग्रेजी में बात करने से इसलिए मन कर दिया की घर वाले सोचंेगे की ये दोनों अंग्रेजी में बातें कर के जर्रूर कोई खिचड़ी पका रहे हैं| मैं और भौजी दोनों किसी की Unwanted Attention नहीं चाहते थे|

भौजी: अच्छा आप को मुझसे कुछ बात करनी थी?

मैं: हाँ वो.... (कुछ सोचते हुए)

भौजी: बोलो ना?

मैं: अभी नहीं... कल बात करेंगे, अभी सो जाओ|

भौजी: तो आप जा रहे हो? (उनका चेहरा फीका पढ़ने लगा था|)

मैं: अरे नहीं बाबा.... मैं अपनी जानेमन को छोड़ के कहाँ जाऊँगा|

मैं जानता था की अगर मैं जाने की बात की तो उनका मन ख़राब हो जायेगा इसलिए उनकी ख़ुशी के लिए मैं उनके साथ चिपका सोने लगा| पर नींद उड़ चुकी थी.... मैं तो बस इन्तेजार कर रहा था की कब उनकी आँख लगे और मैं चुप-चाप सरक के बहार आ जाऊँ| क्योंकि अगर मैं वहीँ सो जाता तो सुबह तूफ़ान आना तय था| करीब आधे घंटे में भौजी मुझसे लिपटी हुई सो गईं और मुझे ये पूरा यकीन हो गया की वो सो चुकी हैं| मैंने धीरे से अपना दायें हाथ को उनके सर के नीचे से खींच लिया| और अपने कपडे पहन लिए... पर भौजी अब भी निर्वस्त्र थीं| मैंने उनकी साडी उठाई और उनके ऊपर दाल दी और ऊपर से एक चादर डाल दी| मैं चुप-चाप बहार निकला और दरवाजा वापस बंद कर दिया|

बहार आके मैं अपनी चारपाई पे नेहा के बगल में लेट गया| नेहा ने करवट बदली और अपने हाथ मेरी छाती पे रख दिया| मैंने उसकी ओर करवट ली ओर उसके सर पे हाथ फेरने लगा| और अपने जीवन में आये इतने परिवर्तनों के बारे में सोचने लगा|

एक औरत जिसे पहले मैं अपना दोस्त मानता था आज वो मुझे अपना पति मानती है और मैं उसे अपनी पत्नी मानता हूँ! एक छोटी सी बच्ची जिसने आज मुझे "पापा" कहके सम्बोधित किया और मेरे मन में जैसे भावनाओं का सागर उमड़ आया! और मैं भी उसे अपनी बेटी मानने लगा| इतनी सी उम्र में मुझे इतना प्यार कैसे मिल गया? जो पैसे मुझे जेब खर्ची के लिए मिलते थे और मैं उन्हें जोड़ रहा था की मैं एक नया मोबाइल लूंगा उन्हें बिना कुछ सोचे मैं भौजी और नेहा पे खर्च कर दिया!!! मैं इतना बड़ा हो गया की एक शादी-शुदा औरत को भगाने की बात कर रहा हूँ? और उसकी और उसकी बेटी जिनसे मेरे दिल का अटूट रिश्ता बन चूका है उनकी जिम्मेदारियां उठाने को तैयार हूँ! आखिर मुझ हो क्या गया है? ये कैसा जादू है जिसने मेरे अंदर इतना बदलाव किया और मुझे इतना जिम्मेदार बना दिया| ये सब सोचते-सोचते मैं सारी रात जागता रहा| वो रात जैसे मेरे विचारों के अनुसार पहर बदल रही थी! सुबह मेरी आँखें खुली हुईं थी और मैं इन्तेजार कर रहा था की कब घर के सब लोग उठें और मैं भी उठ के बैठूं| मेरा हाथ अब भी नेहा को थप-थापा रहा था और आँखें खुलीं थी... जैसे मैं खुली आँखों से अब तक जो हुआ वो सब देख रहा हूँ| करीब पांच बजे भौजी आईं, नेहा को जगाने और मुझे जागता हुआ देख के थोड़ा परेशान हुईं;

भौजी: आप सोये नहीं रात भर?

मैं: नहीं.... नींद ही नहीं आई|

भौजी: क्या सोच रहे थे?

मैं: कुछ नहीं

भौजी: अभी आप थोड़ा सो लो मैं आपको आठ बजे उठाऊंगी फिर बात करेंगे| इस तरह सोओगे नहीं तो बीमार हो जाओगे|

मैं: नहीं... नींद नहीं आएगी| अब सब उठ गए हैं तो मैं भी उठ के नह धो लेता हूँ| दिन में सो लूंगा!

भौजी: (शिकायत भरे लहजे में कहा) हाँ भई अब हमारी कौन सुनता है|

बस इतना कहके वो नेहा को गोद में ले के चलीं गई और मैं भी उठ के नह धो के तैयार हो गया| भौजी ने नेहा को तैयार कर सात बजे तक स्कूल भेज दिया| मैं प्रमुख आँगन में बैठा चाय की चुस्की ले रहा था जब भौजी मेरे पास आईं और बोलीं;

भौजी: मैं आपसे नाराज हूँ.....

मैं: (उनकी बात काटते हुए) ये अच्छा है मुझसे तो वादा ले लिया की की मैं कभी आपसे नाराज नहीं हो सकता और आप मुझसे नाराज हो जाओ?

भौजी: (मुस्कुरा दीं) आप मुझे रात में अकेला क्यों छोड़ आये?

मैं: अब मैं.....

मेरे कुछ कहने से पहले भौजी ने अपने मुंह पे हाथ रखा जैसे उन्हें उबकाई आ रही हो| वो तुरंत अपने घर की ओर भागीं| उन्हें इस तरह देख के मेरे प्राण सुख गए और मैं भी उनके पीछे भगा| अंदर जा के देखा तो भौजी स्नान घर में खड़ी हैं और उलटी कर रही हैं| मैं तुरंत भाग के रसोई की ओर भागा और चीखते हुए बड़की अम्मा को पुकारा| बड़की अम्मा रसोई से निकलीं और मेरी परेशानी का कारन पूछा| मैंने उन्हें बताया; "अम्मा भौजी उलटी कर रहीं हैं.. आप प्लीज देखिये ने उन्हें क्या हुआ है|" मेरी चिंता मेरे चेहरे पे झलक रही थी और अम्मा भौजी के पास दौड़ीं और मैं दौड़ के माँ को बुलाने बड़े घर पहुँचा| माँ कपडे तह लगा के रख रहीं थीं जब मैंने उन्हें भौजी के बारे में सब बताया| माँ बड़बड़ाते हुए निकलीं; "कल जर्रूर तूने कुछ अटपटा खिला दिया होगा इसलिए बहु को उलटी हो रही है|" अब मैं डर गया की कहीं उन्हें फ़ूड पोइज़निंग तो नहीं हो गई? अगर ऐसा होता तो उस दुकानवाले की खेर नहीं थी! इधर रसियक भाभी को देखा तो वो तो घोड़े बेच के सो रहीं थी| मैं जल्दी से अपने ख्यालों से बहार आया और भौजी के घर की ओर भाग| मैं अंदर जाना चाहता था परन्तु नहीं गया ... अब तक घर में हड़कम्प मच चूका था और ये कहना गलत नहीं होगा की वो हड़कम्प मैंने ही मचाया था|

करीब पांच मिनट बाद अम्मा भार निकलीं और उनके मुख पे ख़ुशी झलक रही थी| बहार का सीन कुछ इस तरह था;

भौजी के घर के दरव्वाजे के ठीक सामने मैं खड़ा था| भूसा रखने वाले कमरे के बहार पिताजी और बड़के दादा चारपाई डाल के बैठ थे और कुछ बात कर रहे थे| चन्दर भैया और अजय भैया खेतों और कुऐं के पास खड़े बात कर रहे थे| अब सब से पहले बड़की अम्मा को मैं दिखा तो वो मेरा परेशान चेहरा देख के बोलीं;

बड़की अम्मा: अरे मुन्ना परेशान मत हो, तुम चाचा बनने वाले हो!!!

ये सुन के मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और मन किया की अंदर जाके भौजी को गले लगा लूँ, पर मैं रूक गया और देखना चाहता था की चन्दर भैया की क्या प्रतिक्रिया है? अमा ख़ुशी-ख़ुशी चन्दर भैया के पास गईं और उन्हें खुश खबरी सुनाई पर उनके चेहरे पे कोई भाव ही नहीं थे| वो सर झुकाये सोच में पद गए और फिर खेतों की ओर निकल गए| पर अजय भैया बहुत खुश थे अब चूँकि मैं समझ चूका था की आज तो बवाल होना तय है इसलिए मैं भौजी को बधाई देने के लिए भागा| अंदर भौजी ओर माँ चारपाई पे बैठे थे ओर सबसे ज्यादा भौजी खुश दिख रहीं थी| और हों भी क्यों ना आखिर वो माँ बनने वालीं थीं... वो भी मेरे बच्चे के माँ!!!!
मैं जब अंदर पहुँचा तो भौजी मुझे गले लगाना चाहती थीं पर फिर उन्हें एहसास हुआ की माँ भी बैठी हैं| इसलिए वो मन मार के बैठीं रहीं| मैं उनके हाव भाव देख के समझ गया की वो क्या चाहती हैं| इसलिए मैं पहले अंदर गया और फिर 4 - ५ कदम दूर जाके खड़ा हो गया, और बड़े जोश से बोला;
"आप माँ बनने वाले हो!!!" और इतना कहते हुए मैंने अपनी बाहें खोल दी और उन्हें दिखाया की मैं उन्हें गले लगाना चाहता हूँ| अब भौजी को खुद को रोक पाना मुश्किल था इसलिए वो तेजी से मेरी ओर बढ़ीं और मुझे गले लगा लिया|

भौजी ने मुझे कस के जकड लिया और मेरे कान में खुसफुसाइन; "आप बाप बनने वाले हो!" और मैंने जवाब में उन्हिएँ; "थैंक यू" कहा| ये सब माँ के सामने हो रहा था और माँ सोच रहीं थी की ये देवर-भाभी का प्यार है| हम अलग हुए और भौजी वापस अपनी चारपाई पे माँ के बगल में बैठ गईं और माँ ने उनके सर पे हाथ फेरा| इतने में बड़की अम्मा अंदर आ गईं और उनके हाथ में मिठाई थी| वो बोलीं;

बड़की अम्मा: चलो भई अबकी मेरा अपने पोते को गोद में खिलाने का सपना पूरा जर्रूर होगा|

अब ये सुनके मेरा दिमाग ख़राब होगया| बड़की अम्मा एक औरत होक ऐसी दाखियानूसी बातें कैसे कर सकती हैं इसलिए मैं उन्हें अपना विरोध जताया;

मैं: क्यों अम्मा अगर लड़की हुई तो?

बड़की अम्मा: नहीं... मैं जानती हूँ की लड़का ही होगा! तुम ये मिठाई खाओ| (ये कहते हुए उन्होंने मेरे आगे मिठाई का डिब्बा सरका दिया|)

मैं: आप इतना यकीन से कैसे कह सकते हो की लड़का ही होगा? और मुझे तो आश्चर्य इस बात का है की आप एक औरत हो के इस तरह कह रहे हो|

बड़की अम्मा: मुन्ना वंश चालने के लिए लड़का तो होना चाहिए ना?

मैं: तो लड़का है नहीं क्या? लड़का या लड़की भगवान की मर्जी होती है इसमें माँ क्या कर सकती है?

बड़की अम्मा: मुन्ना तुम्हारे बड़के दादा को पोता ही चाहिए?

मैं: ओह तो ये बात है! मैं उनसे इस बारे में बात अवश्य करूँगा|

भौजी ने मुझे रोकना चाहा पर मैंने उनकी अनसुनी कर ई और बड़के दादा से बहस का इरादा लिए उनके सामने खड़ा हो गया| ऐसा नहीं था की मुझे हीरो बनने का बहुत शौक था या ये मेरा बच्चा है और बड़े बुजुर्ग इसमें भौजी को दोष दे रहे हैं, परन्तु मेरी अंतर आत्मा ने कहा की मुझे इसका विरोध करना चाहिए| मैंने बड़ी उखड़ी हुए अंदाज में उनसे बात की;

बड़के दादा: आओ-आओ बेटा बैठो! ये लो मिटहाउि खाओ, तुम चाचा बनने वाले हो!

मैं: दादा मुझे आपसे कुछ बात करनी है|

बड़के दादा: हाँ कहो?

मैं: आपको पोती चाहिए या पोता?

बड़के दादा: (बड़े गर्व से) पोता!!!!

मैं: अगर पोती हुई तो?

बड़के दादा: अरे शुभ-शुभ कहो बेटा?

मैं: मैंने कौन सी मनहूसियत की बात कह दी? मैं तो आपसे एक सीधा सा सवाल पूछ रहा हूँ|

बड़के दादा: अरे पोता ही होगा|

मैं: आप इतना यकीन से कैसे कह सकते हैं?

बड़के दादा: अरे मुन्ना (मेरे पताजी से) देख तो तेरा लड़का बड़े सवाल पूछ रहा है?

पिताजी: क्यों रे? बड़ों का लिहाज नहीं है तुझे?

मैं: पिताजी मैंने तो बस एक सीधा सा सवाल पूछा बस?

पिताजी: तो उन्होंने कह तो दिया की पोता होगा?

मैं: मैं यही तो जानना चाहता हूँ की दादा इतने यकीन से कैसे कह सकते हैं?

पिताजी: तू....

मैं: (बीच में बात काटते हुए) क्षमा करें पिताजी मैं आपकी बात काट रहा हूँ परन्तु मुझे बड़के दादा का यूँ पोते के प्रति पक्षपात ठीक नहीं लगा| पहले भी जब नेहा पैदा हुई तो भी यही बखेड़ा खड़ा हुआ था और नतीजा आप देख सकते हो की चन्दर भैया और भौजी की नहीं बनती| और अब फिर ये सवाल की पोता ही होगा? अगर मेरी जगह आपके घर लड़की पैदा होती तो क्या आप उसे उतना प्यार नहीं देते जितना आप मुझे देते हैं? क्या आप उसे वही शिक्षा नहीं देते जो आपने मुझे दी? क्या आप उसे बड़ों का आदर करना और छोटों से प्यार करना नहीं सिखाते? आपने तो कभी कोई भेद-भाव नहीं किया तो बड़के दादा क्यों करते हैं?

पिताजी और बड़के दादा के पास कोई जवाब नहीं था और ना ही मैं किसी जवाब की अपेक्षा रखता था| इसलिए मैं चुप-चाप वहाँ से उठ आया, मैं जानता था की मेरे इस ज्ञान का उन सब पे कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा| इसलिए मैं वापस अंदर आ गया ...


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