vasna kahani चाहत हवस की
12-20-2018, 12:20 AM,
#1
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चाहत हवस की

मेरे परिवार में मेरे पापा, मम्मी मेरी गिफ़्टी दीदी और मैं चार लोग हैं। हम लोग नोएडा में रहते हैं। मेरे पापा और मम्मी दोनों सरकारी जॉब में हैं। दीदी की पिछले साल ही शादी हुई है, जीजू की लन्दन में किसी विदेशी बैंक में अच्छी जॉब है, लेकिन जीजू शादी के बाद दीदी को वीसा प्रॉब्लम के कारण लन्दन नहीं ले जा पाये हैं, दीदी अभी भी हमारे साथ ही रहकर अपनी सॉफ़्ट्वेयर कम्पनी में जॉब कर रही है। जीजू हर दो तीन महिने में आते जाते रहते हैं। 
मेरे घर पर झाड़ू पोंछा सफ़ाई का काम करने वाली गुड़िया को जब भी मम्मी पापा घर पर ना होते, और दीदी जॉब पर गयी होती तो मैं उसको एक हजार का नोट देकर उस से अपना लण्ड चुसवाया करता था। गुड़िया की अभी शादी नहीं हुई थी, एक बार मैंने उससे अपना लण्ड चुसवाते हुए पूछा कि किस किस से चुदी है वो, तो उसने झिझकते हुए अपनी आपबीती सुना दी। 

गुड़िया की आप बीती उसकी खुद की जुबानी

मेरा नाम गुड़िया है, मेरे परिवार में मेरी मम्मी, पापा और मेरा छोटा भाई विजय है, पहले हम जयपुर में रहते थे, कुछ साल पहले ही नोएडा आये हैं। मेरी उम्र 20 साल की है और मेरे छोटे भाई की उम्र 19 साल की। पापा एक फ़ैक्ट्री में मजदूरी करते थे और मम्मी बड़े बड़े घरों में सफ़ाई पोंछे का काम करती थी। दो साल पहले पापा की एक रोड एक्सीडेन्ट में डैथ हो गयी थी, उसके बाद से मैंने मम्मी के साथ कोठियों में सफ़ाई पोंछे का काम करना शुरु कर दिया था। हम एक कच्ची बस्ती में रहते हैं, हमारे घर में दो कमरे हैं, जब तक पापा थे तब तक मम्मी पापा एक कमरे में, और मैं और विजय दूसरे कमरे में सोया करते थे। 

जब मैं और विजय छोटे थे तब बाकी सभी भाई बहनों की तरह डॉक्टर डॉक्टर खेलते हुए एक दूसरे के शरीर की संरचना को समझने की कोशिश करते। हाँलांकि डॉक्टर डॉक्टर खेलते हुए ना जाने कब से विजय मुझे चोद रहा है मुझे याद नहीं, लेकिन फ़िर भी जब पहली बार हमारे यौनांगों ने एक दूसरे के यौनांगों को छुआ था उसकी मुझे अभी भी अच्छी तरह से याद है। हम उस समय बच्चे नहीं थे, और बहुत बड़े हो चुके थे, और वो छोटे भाई विजय के साथ पहली अविस्मरणीय चुदाई, मुझे याद है किस तरह मेरी छोटी सी चूत ने विजय के खड़े लण्ड के सुपाड़े को अपने अंदर लेकर उसको बेतहाशा जकड़ लिया था।

जब हम छोटे थे तब जब भी कभी रात में बगल के कमरे में मम्मी पापा चुदाई करते, तो मैं और विजय आधे सोते हुए उनकी चुदाई की आवाजें साफ़ सुना करते। मम्मी हम दोनों को बैड पर सुला कर चली जातीं और फ़िर शुरु होता मम्मी पापा की चुदाई का खेल, चुदते हुए मम्मी जोर जोर से कराहने की आवाज निकाला करती थीं, और फ़िर दोनों के हांफ़ते हुए तेज तेज साँस लेने की आवाज सुनाई देती। 

हर रात ऐसा ही होता कि जब हम जाग रहे होते, तभी पापा मम्मी को कुतिया बहन की लौड़ी और भी गंदी गंदी गाली देते हुए उनके ऊपर चोदने के लिये चढ जाते और फ़िर दूसरे कमरे से आ रही मम्मी के कराहने की आवाज के साथ साथ खटिया के चरमराने की आवाज सुना करते। जब पापा मम्मी को चोद रहे होते, तो विजय अपने पाजामे में हाथ घुसा कर अपना लण्ड सहलाया करता। क्योंकि मैं और विजय एक ही बैड पर सोया करते थे इसलिये मैं उसकी सब हरकतों से वाकिफ़ थी। कई बार जब मम्मी दरवाजा ठीक से बंद करना भूल जातीं तब मैं और विजय दरवाजे की झिर्री में से मम्मी पापा की चुदाई को देखा करते। 

पापा मम्मी को बहुत अच्छे से चोदा करते थे। वो मम्मी के ऊपर चढ जाते और मम्मी चुदने के लिये अपनी टांगे ऊपर उठा कर फ़ैला लेती, पापा मम्मी की चूत में लण्ड घुसाने से पहले उसके ऊपर ढेर सारा थूक लगाते, और फ़िर आगे झुककर उसमें अपना फ़नफ़नाता हुआ लण्ड एक झटके में पेल देते। और फ़िर शुरू होती चुदाई की हर झटके के साथ वो ऊह्ह आह्ह, जो हम दोनों भाई बहनों को मंत्र मुग्ध कर देतीं। मम्मी अपनी गाँड़ उछाल उछाल कर पापा का चुदाई में भरपूर सहयोग देतीं। 

दो बच्चे पैदा करने के बाद मम्मी की चूत ढीली हो चुकि थी, इसलिये चुदाई शुरू होने के कुछ देर बाद जब वो पूरी तरह गीली हो जाती तो पापा के लण्ड के हर झटके के साथ उसमें से फ़च फ़च की आवाज आती, और मम्मी के कराहने की आवाज तेज होने लगती। हम उनकी चुदाई की आवाज सुनकर ही समझ जाते कि उनकी चुदाई कब चरम पर पहुँचने वाली है, और कब पापा अपने लण्ड का पानी मम्मी की चूत में छोड़ने वाले हैं। 

कभी कभी तो मम्मी पापा की चुदाई इतनी लम्बी चला करती थी कि मैं और विजय दरवाजे के पास खड़े होकर देखते हुए थक जाते। बहुत बार मम्मी पापा से विनती किया करतीं, इसको ऐसे ही अंदर डाल के चोदते रहो, और भी ना जाने क्या क्या चुदते हुए खुशी में मम्मी लगातार बड़बड़ाया करती थीं। पापा मम्मी की बात मानते हुए जब तक लण्ड को मम्मी की चूत में अंदर बाहर करते रहते जब तक कि मम्मी उनको जोर से अपनी बाँहों में जकड़कर जोर से चीखते हुए झड़ नहीं जाती थीं। जब पापा सुनिश्चित कर लेते की मम्मी झड़ चुकि हैं तो उसके बाद पापा अपने लण्ड से पानी निकालने के लिये अपनी मन मर्जी चुदाई शुरु किया करते थे। फ़िर उनके लण्ड के झटकों की स्पीड तेज हो जाती, और वो बेतहाशा ताबड़ तोड़ अपने लण्ड का बेरहमी से मम्मी की गद्दे दार चूत पर प्रहार करने लगते। और फ़िर जल्द ही झड़ते हुए मम्मी के बड़े बड़े मम्मों पर अपना सिर टिका लेते, और उनका लण्ड मम्मी की चूत की सुरंग में बच्चे पैदा करने वाला जूस ऊँडेल रहा होता। और फ़िर पापा मम्मी के ऊपर से उतरकर सीधे लेटकर सो जाते, और कुछ ही मिनटों में खर्राटे भरने लगते। 

जैसे ही उनकी चुदाई खत्म होती, मैं और विजय जल्दी से अपने बैड पर आकर लेट जाते, क्योंकि चुदाई के तुरंत बाद मम्मी आगे से खुला गाउन पहन कर हमारे रुम में चैक करने आतीं कि हम दोनों ठीक से सो रहे हैं। जब मम्मी हमारे ऊपर हमको चादर या कम्बल से उढाने के लिये झुकतीं तो मैं और विजय सोने का बहाना बनाया करते। बहुत बार ऐसा भी होता कि मम्मी अपने गाऊन के सामने वाले बटन बंद किये बिना ही हमारे कमरे में आ जाया करतीं और मम्मी के लटकते हुए बड़े बड़े मम्मे हमको दिखाई दे जाया करते। जब मम्मी हमारे बैड के पास आया करतीं तो उनके बदन में से चुदाई के बाद चूत के रस और पापा के वीर्य की मिश्रित गंध सुंघायी देती। एक रूटीन की तरह वो इसके बाद बाथरूम जातीं और हम उनके मूत की कमोड में गिरने की आवाज सुनते। 

ऐसी रोमांचक चुदाई देखने के बाद मेरा और विजय का भी मन एक दूसरे के बदन के साथ खेलने का करता, लेकिन हम सो जाया करते। लेकिन अब हमारा डॉक्टर डॉक्टर का खेल और ज्यादा आगे बढने लगा था, और हम दोनों जब भी कुछ मिनटों के लिये अकेले होते, तो हम एक दूसरे के अन्डर वियर में हाथ डाल देते और एक दूसरे के गुप्तांगों के साथ खेलने लगते। मैं विजय के लण्ड को पकड़कर सहलाने लगती और विजय मेरी छोटी सी चूत के अन्दरुनी काले काले होंठों को जो बाहर की तरफ़ निकले हुए थे उनको सहलाने लगता। विजय के चेहरे पर आ रहे भाव देखकर ही मैं समझ जाती कि ऐसा करके उसको कितना मजा आ रहा होता।

ऐसे ही हमारी जिन्दगी चले जा रही थी, तभी एक दिन हमारे ऊपर कहर टूट पड़ा, मेरे पापा का देहान्त एक रोड एक्सीडेन्ट में हो गया था। मेरी मम्मी ने बड़े पैसे वाले लोगों के घर में काम करके हमारा भरण पोषण किया। जैसा कि आपको पता है कि पहले हम जयपुर की एक अविकसित कॉलोनी में दो कमरे के घर में रहते थे। पापा की डैथ के बाद, हमने एक कमरा किराये पर उठा दिया, और हम तीनों एक ही कमरे में रहने लगे। मैं भी मम्मी के साथ कोठियों में सफ़ाई पोंछा और कपड़े धोने के लिये जाने लगी, और विजय एक प्लास्टिक फ़ैक्ट्री में फ़ैक्ट्री के मालिक की गाड़ी का ड्राईवर बन गया। किसी तरह हमारा गुजर बसर हो रहा था। 

मम्मी मुझे अकेले किसी घर में काम करने के लिये नहीं भेजती थीं, वो मुझे अपने साथ साथ ही घरों में काम कराने के लिये ले जातीं। जब मैं जवान होने लगी तो मेरे उभार कुर्ते में से साफ़ नजर आते और मैं उनको दुपट्टे से ढकने का प्रयास करती रहती। मैं और मम्मी जिस भी घर में काम करने जाते उस घर के मर्दों की नजरें मेरे जिस्म को ऊपर से नीचे तक देखती रहतीं, जब मैं पोंछा लगाने को झुकतीं तो उनकी नजरें मेरे कुर्ते के गले में से अंदर झाँकती हुई प्रतीत होतीं। लेकिन धीरे धीरे मुझे भी समझ आने लगा था कि मुझे इसी दुनिया में इन्ही लोगों के बीच रहना है, और मुझे अब इन सब चीजों की आदत सी पड़ गयी थी। सिटी बस में चढते उतरते समय या बस के अन्दर भीड़ में सभी मर्द मेरे बदन के साथ जो स्पर्श सुख का आनंद लेते थे, वो मैं अनजान बनकर नजरअंदाज करने लगी थी। हाँलांकि अब मै भी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी, और जब भी बस में भीड़ का फ़ायदा उठाकर कोई मेरी चुँचियों या मेरे चूतड़ों को दबाता या सहलाता तो मेरे अन्दर भी कभी कभी भूचाल सा आने लगता। लेकिन जिस तरह से हमारे घर की परिस्थितियाँ थी उस में मुझे अपनी शादी होने के जल्द ही आसार नजर नहीं आ रहे थे।
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12-20-2018, 12:20 AM,
#2
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जवानी की दस्तक होते ही मेरे बदन में बदलाव आने शुरू हो गये थे, माहवारी शूरु होने के साथ साथ मेरे उभार नजर आने लगे थे। चुँचियां अपने नैचुरल आकार लेने लगी थीं, मेरी चूत के ऊपर बालों के रोयें अब झाँटों का रूप लेने लगे थे। शरीर के अन्दर जो बदलाव आ रहे थे, उनका असर मेरे जेहन पर भी होने लगा था। जब भी मैं बाथरुम में नहाने को जाती तो अपनी चूँचियों को अपनी चूत के दाने को सहलाने में मुझे बहुत मजा आता। 

मेरे पास पहनने के लिये ज्यादा कपड़े नही थे, और जो थे वो भी सभी होली दिवाली पर उपहार के तौर पर दिये हुए हुए थे, उन महिलाओं द्वारा जिनके घर मैं और मम्मी काम करने जाया करते थे। जैसा मैंने पहले भी बताया कि हमारे घर में बस एक ही कमरा था, जिस में मैं मम्मी और विजय एक साथ सोया करते थे। सर्दियों मे सब अलग अलग खटिया पर अपनी अपनी रजाई में, और गर्मियों मे एक साथ जमीन पर कूलर के सामने। जिस तरह मुझ पर जवानी चढ रही थी उसी तरज विजय पर भी जवानी चढनी शुरु हो गयी थी, और जब कभी सुबह मैं उससे पहले उठ जाती तो देखती कि उसके लण्ड ने उसके पाजामें मे टैण्ट बना रखा होता। 

मम्मी रात को सिर्फ़ पेटीकोट और ब्लाउज पहन कर सोतीं, शायद माहवारी बंद होने के बाद से ही उन्होने पैण्टी पहनना छोड़ दिया था, और मैं किसी का दिया हुआ गाउन, जिसने आगे की तरफ़ बट्न थे, और विजय पाजामा और टी-शर्ट पहन कर सोता। एक बार गर्मियों की रात में एक बजे जब मैं पानी पीने के लिये मेरी आँख खुली तो मैंने देखा कि विजय ने मम्मी का पेटीकोट ऊपर कमर तक उठाया हुआ था, और उनकी काली काली झाँटों से ढकी चूत को देखकर हाँफ़ता हुआ अपने एक हाथ से अपने लण्ड को पकड़कर जल्दी जल्दी मुट्ठ मार रहा था। मैंने उस वक्त चुप रहने में ही भलाई समझी और कुछ देर बाद जब विजय अपने लण्ड से पानी निकालकर फ़ारिग होने के बाद थक कर सो गया, तो मैं पानी पी कर सो गयी। उस रात के बाद मैं रोजाना सोने का नाटक करने लगी और चुपचाप रहकर विजय को मुट्ठ मारते हुए देखा करती, कभी वो मम्मी का पेटीकोट ऊपर कर देता और उनकी चिकनी गोरी जाँघों को देख उत्तेजित होकर मुट्ठ मारता, तो कभी पेटीकोट को पूरा ऊपर कर के उनकी गोल गोल गाँड़ को देख कर मुट्ठ मारता, तो कभी जब मम्मी पैर चौड़ा कर सो रही होतीं तो उनकी चूत के दर्शन करते हुए, अपनी जिस्म की आग को लण्ड हिलाकर उसका पानी निकालकर शांत करता। ये उसका रोजाना का रूटीन बन चुका था।


एक रात मैंने देखा कि उसने मम्मी के ब्लाउज के बटन खोल दिये और फ़िर उनकी गोल गोल मम्मों को देखकर उसने अपने लण्ड को मुठियाते हुए पानी निकाला और फ़िर सो गया, कुछ देर बाद मम्मी भी अपने ब्लाउज के बटन बंद कर के चुपचाप सो गयीं, तो मुझे लगा कि जरुर दाल में कुछ गड़बड़ है, और शायद मम्मी भी इस खेल में शामिल हैं। 

मैंने अगले दिन जब विजय फ़ैक्ट्री चला गया तो मम्मी से अकेले में पूछा कि क्या उनको पता है कि विजय रात में क्या कुछ करता है, तो उन्होने बताया कि कुछ महीने पहले एक रात को उन्होने विजय को उनका पेटीकोट ऊपर कर मुट्ठ मारते हुए पकड़ लिया था, और अगले दिन उसको समझाया भी लेकिन जो कुछ मम्मी ने आगे बोला वो सुनकर मैं भी चुप हो गयी। मम्मी ने बताया, ''लड़कों कि ये उम्र होती ही ऐसी है, इस उम्र में उनको नाते रिश्तों का कोई ख्याल नहीं रहता, उनके दिमाग में बस एक ही चीज घूमती रहती है और वो है सैक्स। इस उम्र में लड़के अपनी जिस्म की प्यास बुझाने को किसी भी हद तक जा सकते हैं। इस उम्र में जब बाकि सब लड़के पढ लिख रहे होते हैं, तब विजय मेहनत कर अपने परिवार का भरण पोषण करने में जिस तरह हमारी मदद कर रहा है, ये सब सोचकर ही मैंने भी उसकी इन सब हरकतों को नजर अंदाज करना शुरु कर दिया है, और रात में यदि वो मेरे बदन के किसी हिस्से को पाँच दस मिनट देखकर अपनी जिस्म की आग को शांत कर शांति से सो जाता है, तो इसमें कुछ बुरा भी नहीं है। यदि मान लो वो दोस्तों के साथ रण्डियों के पास जाना शुरु कर दे और उन पर अपनी मेहनत की कमाई उन पर उड़ाने लगे, उससे तो ये अच्छा ही है।''

मुझे मम्मी की बातें सुनकर थोड़ा अटपटा तो जरूर लगा लेकिन फ़िर कुछ देर सोचने के बाद मैं भी इसी निश्कर्ष पर पहुँची कि जो हो रहा था, उसको वैसे ही होने देना चाहिये।
कुछ दिनों के बाद मेरी बुआ की बेटी की शादी थी, हमारी बुआ जयपुर में ही रहती थीं, और मम्मी ने बुआ की मदद करने के लिये मुझे उनके घर शादी से कुछ महीनों पहले भेज दिया। शादी होने के बाद जब मैं फ़िर से अपने घर लौट आयी, तो लौटने के बाद मुझे सबसे ज्यादा उत्सुकता रात में विजय के मम्मी का पेटीकोट उठाकर मुट्ठ मारते हुए देखने की थी। 

रात होने के बाद जब मैं आँखें बंद कर सोने का नाटक कर रही थी, तो कुछ देर बाद मैंने देखा, विजय अपनी जगह से उठा और मम्मी के पास जाकर बैठ गया। कुछ देर वैसे ही मम्मी के बदन को निहारने के बाद उसने अपना पाजामा और कच्छा उतारकर पास में रख दिया, और फ़िर मम्मी के ब्लाउज के बटन खोलने लगा, बलाउज के सारे बटन खोलकर उसने मम्मी के दोनों मम्मों को नंगा कर दिया, और फ़िर अपने लण्ड को सहलाने लगा। कुछ देर बाद उसने मम्मी के पेटीकोट के नाड़े को खोला और पेटीकोट को नीचे खिसकाने लगा, मम्मी ने अपनी गाँड़ थोड़ी सी ऊपर उठाकर उसको पेटीकोट को उतारने में उसकी मदद की, अब मम्मी सिर्फ़ बाँहों मे ब्लाऊज पहने उसके सामने नंगी लेटी हुई थीं। कुछ देर मम्मी के नग्न बदन को निहारते हुए अपने लण्ड को सहलाने के बाद विजय ने मम्मी की दोनों टाँगों को चौड़ा किया और फ़िर उनके बीच आकर अपने लण्ड को अपने थूक से चिकना कर, मम्मी की चूत के मुँह पर रख दिया, और फ़िर एक झटके के साथ उसको अंदर घुसाकर मम्मी को चोदने लगा, कुछ देर बाद उसने अपने दोनों हाथों से मम्मी के मम्मों को अपनी हथेलियों में भरकर उनको मसलने लगा, और फ़िर मम्मी की चूत में अपने लण्ड के झटके मारने लगा, कुछ देर बाद जब उसके लण्ड से वीर्य का पानी निकल गया तो वो चुपचाप अपने कपड़े पहन कर अपनी जगह जाकर सो गया। थोड़ी देर बाद, मम्मी भी उठीं अपने ब्लाउज के बटन लगाये, अपना पेटीकोट पहना और फ़िर सो गयीं। 

अगले दिन सुबह जब मैं उठी तो सब कुछ नॉर्मल था, विजय काम पर जा चुका था, मैं मम्मी के पास जाकर चुपचाप खड़ी हो गयी। शायद मम्मी मेरी मंशा समझ गयीं और मेरे बिना कुछ पूछे बोलीं, ''रात को तूने सब कुछ देख लिया ना, चलो अच्छा ही हुआ, ये बात कब तक छुपने वाली थी। हाँ, मुझे पता है कि जो कुछ मैं और विजय कर रहे हैं वो गलत है, लेकिन यदि ऐसा करके हम दोनों को खुशी होती है, तो मेरी बला से भाड़ में जाए दुनिया।''

मैंने किसी तरह हिम्मत करके पूछा, ''आप तो उस कह रही थीं कि आप विजय की खुशी के लिये करती हो, तो क्या आप को भी उसके साथ करवाने में मजा आता है।'' कुछ देर खामोश रहने के बाद मम्मी ने जो कुछ मुझे बताया वो सुनकर मैं निरुत्तर हो गयी।
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#3
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आगे की कहानी

गुड़िया की मम्मी की कहानी उन्ही की जुबानी

कुछ देर खामोश रहने के बाद मम्मी ने जवाब दिया, ''बेटा ये जिस्म की जरूरत है, ये रिश्ते नाते सब भूल जाती है, तुझे तो पता ही है कि जब से तेरे पापा खतम हुए है, मेरी चूत में किसी का लण्ड नहीं गया, मैं अगर बाहर किसी गैर मर्द से चुदवाना शुरु कर देती तो कभी ना कभी सब को पता चल ही जाता, और फ़िर कितनी बदनामी होती, ये सब सोचकर ही मैंने निर्णय लिया कि क्यों ना विजय से ही अपने जिस्म की आग को बुझाया जाये, बात घर की घर में रहेगी और किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा। जिस तरह से विजय रात को मेरे कपड़े उघाड़कर मेरे जिस्म के उन हिस्सों को देखकर अपना लण्ड हिलाता था, तो मेरी चूत में आग सी लग जाती थी, मुझे लगता क्यों ये अपना लण्ड हिला रहा है, क्यों नहीं इसको मेरी चूत में डालकर उसकी आग अपने लण्ड के पानी से बुझा देता।

तुझे याद होगा गुड़िया जब पापा के देहांत के बात हमने तुझे कुछ महीनों के लिये बुआ के घर भेज दिया था, ये उन दिनों की बात है। 

गुड़िया बेटी तेरे पापा के देहांत के बाद, मैं तो किसी तरह संभल गयी थी, लेकिन घर परिवार की सारी जिम्मेदारी के बोझ के तले विजय मुर्झाता जा रहा था, जब भी एक माँ अपने बेटे की सूनी सूनी आँखें देखती तो उसका कलेजा गले को आ जाता। एक 18-19 साल के लड़के की मानो सारी दुनिया उजड़ गयी थी, उसके सारे सपने चकनाचूर हो गये थे। वो बहुत थोड़ा खाना खाता, उसकी आँखों से नींद कोसों दूर जा चुकी थी। उसने अपने दोस्तों के साथ घूमना फ़िरना छोड़ दिया था। वो उन दिनों बस कमरे में ही रहा करता था। 

एक माँ कुछ दिनों तक इन्तजार करती रही कि समय विजय के दिल के घाव भर देगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। दिन पर दिन और हफ़्ते पर हफ़्ते बीतते जा रहे थे। मुझे पता था कि विजय उम्र के जिस दौर से गुजर रहा है, जरूर उसकी जिस्मानी जरूरतें भी होंगी। जो भी कारण हो जिस्मानी या मानसिक लेकिन एक बात निश्चित थी कि विजय डिप्रेशन में जा रहा था। मुझे पता था कि दिन भर वो बैड पर लेटा रहता और रात में मुट्ठ मार कर अपने बदन की गरमी को निकाला करता था, रात में मेरे सोने के बाद मेरे गुप्तांगों को देखकर या छूकर मुट्ठ मारते हुए मैं उसे बहुत बार देख चुकी थी, क्यों कि हम दोनों एक ही कमरे में सोया करते थे। 

मुझे पता था कि इस उम्र में लड़को के लिये मुट्ठ मारकर पानी निकालना नॉर्मल था, लेकिन तेरे पापा के गुजर जाने के बाद जिस तरह वो मेरे अंगों को देखकर मुठियाता था वो थोड़ा मुझे भी अजीब लगता था। वो मेरा पेटीकोट ऊपर कर के मेरी चूत को देखकर जब मुट्ठ मार रहा होता तो उसके कराहने में एक मजा आने की जगह एक अजीब सी कसक होती, जब वो पानी छोड़ने वाला होता तो वो आनंदित होने की जगह वो अंदर ही अंदर रो रहा होता।

एक रात मैं अधखुली आँखों से विजय को मुट्ठ मारते हुए देख रही थी, वो जमीन पर मेरे बगल में लेट कर मेरे ब्लाउज के बटन खोलकर मेरे मम्मों को देखकर मुठिया रहा था, और जब तक अपने लण्ड को हिलाता रहा, जब तक कि उसके लण्ड ने उसके पेट और छाती पर लावा नहीं उंडेल दिया, लेकिन वो फ़िर से अपने लण्ड को हिलाता रहा जब तक कि वो फ़िर से टाईट हिकर खड़ा नहीं हो गया, और वो फ़िर से जब तक मुट्ठ मारता रहा जब तक कि दोबारा उसके लण्ड ने पानी नहीं छोड़ दिया। 

उसके बाद वो अपनी जगह जाकर सो गया, लेकिन मेरे दिमाग में उसके मुट्ठ मारने की तस्वीर ही घूम रही थी। ऐसा नहीं था कि मैंने विजय का औजार पहली बार देखा था, लेकिन पूरी तरह से खड़ा साफ़ साफ़ पहली बार ही देखा था, और पहली बार ही उसमें से वीर्य की धार निकलते हुए देखी थी। लेकिन जो कुछ विजय कर रहा था वो नैचुरल नहीं था, इस तरह वो अपना शरीर बर्बाद कर रहा था। वो अपने मन का गुबार बाहर निकालने के लिये हस्त मैथुन को इस्तेमाल कर रहा था। वो जबर्दस्ती मुट्ठ मार रहा था, और वो इसको एन्जॉय भी नहीं कर रहा था। मुझे लगा कि मुझे जल्द ही कुछ करना होगा, नहीं तो विजय अपनी जिंदगी बर्बाद कर लेगा।

मेरे दिमाग में बस विजय के खड़े हुए लण्ड से निकलते वीर्य की पिचकारी की तस्वीर घूमती रहती, विजय का लण्ड उसके पापा से भी बड़ा है। मुझे विजय में उसके पापा की जवानी के दिन दिखायी देने लगे। मैं शायद विजय को प्यार करने लगी थी, लेकिन कहीं ना कहीं मुझे पता था कि ये गलत है। लेकिन मेरा जिस्म मेरे दिमाग की बात नहीं सुन रहा था, और विजय के लण्ड की कल्पना करते करते मेरी चूत पनियाने लगती, मेरी चूत को भी तो तेरे पापा की मौत के बाद कोई लण्ड नहीं मिला था। मेरे बदन में कुच कुछ होने लगता, मेरा चेहरा लाल पड़ जाता, मेरा मन करता कोई मुझे अपनी बाँहों में भर ले और मुझे जी भर के चोदे, मेरी चूत का कचूमर निकाल दे। हाँ ये बात सही थी कि मेरा बेटा विजय ही मेरी चूत को पनियाने पर मजबूर कर रहा था। किसी तरह अपनी फ़ड़फ़ड़ाती हुई चूत में ऊँगली घुसाकर उसको घिसकर, विजय के मुट्ठ मारते हुए द्रष्य की कल्पना करते हुए अपने जिस्म की आग को ठण्डा करने का प्रयास करती। 

अगले कुछ दिनों तक मैं विजय की ईमोशनल प्रोब्लम का निदान ढूँढने की जगह अपने अंदर चल रहे अन्तर्द्वन्द पर काबू करने का प्रयास करने लगी, जब भी विजय फ़ैक्ट्री से लौटकर घर आता, तो मैं उसके साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताने का प्रयास करती। मैं उसके लिये उसका मन पसंद खाना बनाती जिससे वो कुछ ज्यादा खा ले और उसकी भूख खुल जाये। थोड़ा कुछ तो बेहतर हो रहा था, लेकिन रात में विजय का अपनी मम्मी के गुप्तांगों को नंगा देखकर मुट्ठ मारना बदस्तूर जारी था। और मैं हर रात उसको ऐसा करते हुए देखती। 

रात में विजय को मुट्ठ मारते देख कर मैं गर्म हो जाती और अगले दिन सुबह नहाते हुए मैं भी अपनी चूत में ऊँगली घुसाकर अपनी आग बुझाती। समस्या का समाधान अब दिखाई देने लगा था, कि विजय को चुदाई के लिये एक औरत के जिस्म की जरुरत थी, आखिर वो कब तक मुट्ठ मारता, उसको एक जीती जागती औरत जो उसे चूम सके चाट सके उसके जिस्म की जरुरत पूरी कर सके, एक ऐसी औरत चाहिये थी। मेरी नजर में शायद अब एक यही उपाय बचा था। 

कभी कभी मुझे लगता कि शायद अपने बेटे विजय के लिये वो औरत मैं ही हूँ, मैं उसकी मदद कर सकती हूँ, मैं उसको छू सकती थी, मैं उसे प्यार कर सकती थी, इसमें कोई शक नहीं था। लेकिन फ़िर कभी मेरे दिमाग में ख्याल आता कि नहीं ये गलत है, माँ बेटे के बीच ऐसा नहीं होना चाहिये। मुझे अपने सगे बेटे के साथ चुदाई करने में कोई बुराई नहीं दिखायी देती थी, आखिर हम दोनों व्यस्क थे, और हमको अपने मन का करने का अधिकार था। लेकिन उस सीमा रेखा को पार करने में एक झिझक जरुर थी। यदि उन दोनों के बीच जिस्मानी रिश्ते बन गये, तो फ़िर उस माँ बेटे के रिश्ते का क्या होगा। कहीं वो एक समस्या का समाधान ढूँढते एक नयी समस्या ना खड़ी कर दें। 

कभी कभी मेरे मन में विचार आता कि मेरी चूत और मम्मों को देखकर मुट्ठ मारना एक अलग बात है, लेकिन क्या विजय उसके साथ चुदाई करने को तैयार होगा। ये सोचकर ही मैं घबरा जाती। यदि विजय इसके लिये तैयार ना हुआ तो। लेकिन जब भी मैं नहाते हुए अपने 42 वर्ष के गदराये नंगे जिस्म को देखती तो मेरा मन कह उठता, विजय उसको अस्वीकार कर भोगे बिना नहीं रह सकता। 

हाँलांकि मेरे मम्मे अब वैसे नुकीले तो नहीं थे जैसे कि मेरी 20 साल की उम्र में चुँचियाँ थीं, लेकिन फ़िर भी मेरे मम्मे बहुत बड़े बड़े और मस्त गोल गोल थे, जिन पर आगे निकले हुए निप्प्ल उनकी शोभा दो गुनी कर देते थे। मेरा पेट भी अब पहले जैसा सुडौल नहीं था, लेकिन फ़िर भी रामदेव का योगा कर के मैं अपने आप को शेप में रखने का प्रयास करती थी। मेरा पिछवाड़ा बहुत भारी था, और ये मेरी पर्सनलीटी में चार चाँद लगा देता था। मैं जहाँ भी जाती मर्दों की नजर बरबस मेरी गाँड़ पर टिक ही जाती थी। 

शाम को जब मैं विजय के फ़ैक्ट्री से लौटने का इन्तजार करती तो मन ही मन उसके साथ सैक्स करने के विचार मेरे मन में आ ही जाते। मैं फ़िर भलाई बुराई गिनने में लग जाती, लेकिन किसी भी निश्कर्ष पर पहुँचना मेरे लिये मुश्किल होता जा रहा था, और मैं झिझक और जिस्म की आग के बीच मानो फ़ँस गयी थी। 

लेकिन फ़िर कुछ ऐसा हुआ, जिससे अपने आप ही सब कुछ होता चला गया।

एक रात हम दोनों के सोने के बाद, इस से पहले कि मेरे कपड़े हटा कर गुप्तांगों को देख कर मुट्ठ मारने के लिये विजय मेरे पास आता, उससे पहले ही मैं अपने बाल खोलकर और सारे कपड़े उतारकर लेट गयी। जब कुछ देर बार विजय मेरे पास आया तो मैं उठ कर बैठ गयी, और उससे बोली, ''बहुत हो चुका ये लुका छुपी का खेल, अब जो कुछ करना है मेरी आँखों के सामने करो, लो हो गयी मैं पूरी नंगी, अब निकाल लो उसको पाजामे में से और हिला कर निकाल लो अपना पानी।''

''गौर से जी भर के देखो, तुम्हारी माँ अभी भी कितनी जवान है।'' इससे पहले कि विजय कुछ बोलता मैंने आगे बढकर उसके पाजामे का नाड़ा खोलकर उसके अन्डर वियर को नीचे खिसका दिया, और उसके खड़ा हुआ लण्ड मेरी आँखों के सामने था। ''घबराओ मत विजय, अब हमको इस विषय पर बात करना जरूरी हो गया था।''

विजय चुपचाप मेरे पास बैठा हुआ मेरे नग्न बदन की नुमाईश का इत्मीनान से दीदार कर रहा था। मैंने विजय के हाथों को अपने हाथों के बीच ले लिया, और फ़िर अपने और पास खिसका कर उसको बैठा लिया।
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12-20-2018, 12:20 AM,
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RE: vasna kahani चाहत हवस की
''विजय बेटा, ये सब तुम क्या कर रहे हो, मैं इस तरह तुमको अपनी जिन्दगी बर्बाद करते हुए नहीं देख सकती। तुमने अपने डिप्रेशन का इलाज इस चीज में ढूँढ लिया है, ये गलत है, जब से पापा की डैथ हुई है, मुझे पता है कि तुम कितने परेशान हो, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हर रात दो दो तीन तीन बार ये सब करोगे। इस कठिन समय में तुमको एक जिम्मेदार मर्द की तरह हिम्मत दिखानी होगी, अगर जरूरत लगे तो किसी डॉक्टर को दिखा लो।''

जिस तरह से मैं उसके सामने मादरजात नंगी बैठी हुई थी, वो बस ''मम्मी…'' बोलकर चुप हो गया, लेकिन उसका लण्ड अभी भी फ़नफ़नाकर खड़ा हुआ था। किसी तरह हिम्मत करके वो बोला, ''मुझे पता है कि जो कुछ मैं कर रहा था, वो गलत है, आई एम सॉरी, मेरे खुद समझ में नहीं आ रहा मैं क्यों ये सब कर रहा हूँ।'' 

मैंने उसके हाथ छोड़ दिये, और उसको समझाते हुए बोली, ''देखो इस उम्र में ऐसा करना स्वाभाविक है, लेकिन यदि तुम हद से ज्यादा करोगे तो तुम्हारा शरीर खराब हो जायेगा।''

जैसे ही मैंने विजय के गाल पर हाथ रखा, और उसके माथे को सहलाते हुए उसके बालों में अपनी ऊँगलियों से कंघी करने लगी, उसकि लण्ड ने एक जोरदार झटका मारा। फ़िर उसने बोलना शुरू किया, ''मम्मी मेरा किसी चीज में मन नहीं लगता, मुझे हल्का होने की बेहद जरूरत मेहसूस होती है, मुझे पता है कि ये असली सैक्स का विकल्प नहीं है, लेकिन मैं और क्या करूँ, मुझे खुद समझ नहीं आता, आई एम सॉरी मम्मी।''

मेरे होंठों पर एक ममता भरी कुटिल मुस्कान थी। मेरे अन्दर भी कुछ कुछ हो रहा था, मैने कहा, ''कोई बात नहीं बेटा, इसीलिये मैंने सोचा क्यों ना इस बारे में बात कर ही ली जाये, मैं तुम्हारी प्रॉब्लम सॉल्व करूँगी।''

जब मैंने उसके खड़े हुए लण्ड को अपने हाथ की नाजुक ऊँगलियों से पकड़ा तो एक बारगी विजय की साँस रुक सी गयी। 

''ओह्ह्… मम्म्म्म्मी, ये आप क्या…''

मै उसके लण्ड को हिलाते हुए बोली, ''श्श्श्श्श्श्श्श्… बस चुप रहो और चुपचाप देखते रहो।''

जब मैं उसके लण्ड को अपने हाथ से मुठिया रही थी, तो विजय के पास कराहने के सिवा और कोई विकल्प नहीं बचा था। दूसरे हाथ से मैंने विजय के टट्टे सहलाने शुरू कर दिये, विजय से ये बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने अपने हाथ पीछे ले जाकर बैडशीट को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। 

मैंने विजय से पूछा, ''अच्छा लग रहा है, बेटा?''

''ओह्ह्ह, हाँ मम्मी, बहुत मजा आ रहा है!" उसकी नजरें मेरे बड़े बड़े मम्मों पर टिकी हुई थीं। 

''अपने आप करते हो, उससे तो ज्यादा अच्छा लग रहा होगा, क्यों बेटा?"

''हाँ, मम्मी बहुत अच्छा लग रहा है, बहुत ज्यादा…।, सीईईईई!"

अपने बेटे के इतने बड़े लण्ड को मुठियाते हुए मेरे होंठों पर बरबस मुस्कान आ गयी। जिस तरह आँखों में वासना भरकर वो मेरे मम्मों को देख रहा था, और मैं उसके जवान लण्ड को हिला रही थी, ऐसा करते हुए मुझे बहुत मजा आ रहा था।
मैं उसकी मुट्ठ मारते हुए कई बार अपनी टाँगों को क्रॉस अनक्रॉस कर चुकी थी, जिस से विजय को मेरी चूत को कई बार कनखियों से देखने का मौका मिल चुका था। मेरी चूत में भी आग लगी हुई थी, और मेरा मन कर रहा था कि उसी वक्त विजय को नीचे लिटा कर उसके ऊपर चढ कर बैठ जाऊँ और उसके लण्ड को अपनी चूत में घुसाकर उसकी सवारी करने लगूँ। जैसे ही उसके लण्ड के शिश्न पर चूत को चिकना करने वाले पानी की कुछ बूँदे आयीं, मेरी नजर उसी पर जा टिकी। वो मेरे नग्न बदन को निहार रहा था, और मैं उसके शिश्न पर उभरती बूँदों को अपनी हथेली पर लेती और फ़िर पूरे लण्ड पर उसको लगा कर सारे लण्ड को चिकना कर देती। मैं उसके टट्टों से खेलते हुए उसके वीर्य की पिचकारी छोड़ने का इन्तजार कर रही थी। बस इतना सोचते ही मेरी जीभ बाहर निकल कर मेरे होंठों को गीला कर गयी, मैं बस ये सोच कर उत्तेजित हो रही थी कि मेरे अपने बेटे के वीर्य के पानी का स्वाद कैसा होगा। 

कुछ देर बाद विजय कराहते हुए बोला, ''ओह्ह, मम्मी… मैं बस… झड़ने…आह्ह्ह!"

''कोई बात नहीं बेटा, हो जाओ आराम से,'' मैं उसके लण्ड को मुठियाते हुए बोली। मैं दूसरे हाथ से उसके टट्टों को अब भी सहलाये जा रही थी, जिसमें कि उसकी गोलियाँ ऊपर चढ चुकी थीं। ''आराम से निकाल दो सारा पानी, अपनी मम्मी के हाथों पर!"

मैं वासनामयी नजरों से विजय के फ़नफ़नाते हुए लण्ड में से वीर्य का लावा उगलते हुए देखने लगी। उसके लण्ड से वीर्य की पिचकारी पर पिचकारी निकले जा रही थी, और उसका वीर्य युक्त पानी उसके पेट, उसकी छाती, मेरी बाँहों और मेरे हाथों को गीला कर रहा था। मैं अपने हाथ से उसके लण्ड को मुठियाते हुए आखिर बूँद तक निकालने का प्रयास कर रही थी, हाँलांकि ऐसा करते हुए मेरी चूत में भी आग और ज्यादा भड़कने लगी थी। 

हल्का होने के बाद विजय निढाल हो गया और उसकी आँखें स्वतः ही बण्द हो गयीं। होश आने पर जब कुछ देर बाद विजय ने आँखें खोली तो उसने मम्मी को अपने पास पूर्ण रुपेण नग्न होकर बैठे हुए पाया। उसने जब मम्मी के मम्मों पर नजर डाली तो उनके निप्पल को हार्ड होकर चूसने के लिये आमंत्रित करते हुए पाया। 

''ओह मम्मी आप बहुत अच्छी हो, बहुत सुंदर हो,… आपके…ये … ओह ये तो बहुत अच्छे हैं!"

अपने मम्मों की विजय के मुँह से तारीफ़ सुनकर बहुत अच्छा लगा। उसके लण्ड को एक हाथ से मसलते हुए मैंने कहा, ''ओह, थैन्क यू, बेटा, तुम इनको मम्मे, बोबे, चूँची जो चाहे बोल सकते हो, तुमको अच्छे लगते हैं ना अपने मम्मी के ये मम्मे?"

''हाँ, मम्मी आपके मम्मे बहुत अच्छे हैं, ये कितने बड़े बड़े हैं!"

"तुम छूना चाहोगे अपनी मम्मी के मम्मों को, बेटा ?"

विजय के लण्ड के शिश्न पर चूत को चिकना करने वाला पानी फ़िर से निकलने लगा। ''ओह, हाँ मम्मी, मैं छू लूँ इनको?" वो हाँफ़ते हुए हाथ बढाते हुए बोला। 

मैं शर्माते हुए बोली, ''नहीं बेटा, आज नहीं फ़िर किसी दिन, तुम तो मेरे प्यारे बेटे हो ना…''

जैसे जैसे मेरे मुठियाने की स्पीड तेज होती जा रही थी, उसी तरह विजय के मुँह से निकलने वाली कराहने की आवाज तेज होती जा रहीं थीं । 

''बेटा, अब तुम को अपने आप दो-तीन बार अपने आप मुट्ठ मारने की जरूरत नहीं पड़ेगी, अब मैं तुम्हारा ख्याल रखा करूँगी, मैं तुमहारे इस लण्ड की इसी तरह मालिश करके इसका पानी निकाल दिया करूँगी। बस तुम को मेरी एक बात माननी पड़ेगी।''

''हाँ मम्मी, बहुत मजा आयेगा,'' वो मस्ती में आँखें बंद करके कुछ कुछ बरबड़ाये जा रहा था। उसको रोजाना अपनी मम्मी के हाथ से मुट्ठ मारने की बात सुनकर अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। 

''मैं आपकी हर बात मानने को तैयार हूँ।'' 

''बेटा, तुम अपनी सेहत पर ध्यान दो, तुम अच्छी अच्छी बातें सोचा करो, सुबह उठ कर घूमने जाया करो। 

इसके बदले तुम्हारा जब भी मुट्ठ मारकर पानी निकालने का मन किया करे, मुझे बता दिया करना। तुम चाहो तो मेरे मम्मे दबा भी सकते हो, और चाहो तो इनके बीच अपने लण्ड को घिस भी सकते हो।'' मैं अपने मम्मे हिलाते हुए बोली। विजय चरम पर पहुँचने ही वाला था और उसके लण्ड से पानी निकलने ही वाला था।

''लेकिन अगर तुम ऐसे ही मेरी बात मानते रहे और अच्छी तरह से खुश रहते रहे तो मैं तुमको कुछ और भी तोहफ़ा दे सकती हूँ,'' मैं इस अंदाज में बोली कि विजय कयास लगाने लगा कि मैं किस हद तक जा सकती हूँ। 

''हो सकता है, मैं तुमको अपने इन चूतड़ों के साथ खेलने दूँ? तो फ़िर डील पक्की?"

ये सब विजय के लिये कुछ ज्यादा ही हो गया था। वो बेहद खुश था क्योंकि उसने इस सब की कल्पना भी नहीं की थी। अपनी मम्मी के हाथों से मुट्ठ वो पहले ही मरवा चुका था, और अब मम्मों या चूतड़ों को छूने या फ़िर मम्मी के फ़ूले हुए मोटे होठों से लण्ड चुसवाने की कल्पना मात्र से वो बेहद उत्तेजित हो गया था, उसको अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

वो इतना ज्यादा उत्तेजित हो गया कि उसके लण्ड ने तुरंत अपनी मम्मी के हाथ पर वीर्य का लावा ऊँडेलना शुरु कर दिया। अपने बेटे के वीर्य से मेरे हाथ, मम्मे पेट सब सन चुका था। विजय चरम पर पहुँच कर निढाल होकर लेट गया। 

''अब सो जाओ बेटा,'' मैंने विजय के नंगे बदन पर एक निगाह डालते हुए, और उसके लण्ड को निहारते हुए कहा।

इस एपिसोड के बाद मैं भी बेहद गरम हो चुकी थी, और फ़िर मैं भी बाथरूम में जाकर अपने आप को पानी से साफ़ किया, और अपनी चूत में ऊँगली डालकर, और चूत के दाने को घिसकर उसकी आग को बुझाया। मैं अपने बेटे के खड़े फ़नफ़नाते हुए लण्ड को कुछ ही मिनट पहले देखकर इतनी ज्यादा उत्तेजित और गरम हो चुकी थी कि बस एक दो मिनट में ही में ही मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया, और बरबस अपने आप मेरे मुँह से निकल गया, ''ओह, विजय…''

अगले कुछ दिनों तक मैंने विजय की मुट्ठ मारने का कोई चान्स मिस नहीं किया। जो कुछ हो रहा था वो दोनों की सहमती से हो रहा था, और दोनों ही ऐसा करके खुश थे।


मित्रो मेरे द्वारा पोस्ट की गई कुछ और भी कहानियाँ हैं 
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12-20-2018, 12:20 AM,
#5
RE: vasna kahani चाहत हवस की
विजय अब पहले से कहीं ज्यादा खुश रहने लगा था, और उसकी भूख भी खुल गयी थी। वो खुशी खुशी फ़ैक्ट्री पर काम करने जाता और हँसता खिलखिलाता रहता। हर रात सोने से पहले वो मुझसे मुट्ठ मरवाता और ढेर सारा वीर्य का पानी मेरे हाथ पर निकाल कर, थक कर सो जाता। जब चाहे जब मैं उसका लण्ड चूम लेती, और जब चाहे जब वो अपना पानी मेरी गोल गोल नितम्बों पर निकाल देता। उसके बाद मुझे गुड नाईट विश करके वो थक कर सो जाता। उसके बाद मैं उसके वीर्य के गाढे पानी को चाटकर, बाथ रुम में जाकर अपनी चूत की आग को ऊँगली डालकर शांत करती, और फ़िर हम दोनों अगल बगल नंगे ही सो जाते। 

कुछ दिन इस रूटीन के बाद, मैं एक हाथ से विजय को लण्ड को मुठियाती और दूसरे हाथ से अपनी चूत को सहलाने लगती, इस तरह हम दोनों एक साथ झड़ जाते। 

एक दिन शाम को विजय ने फ़क्ट्री पर काम से लौटने के बाद बताया कि मालिक ने उसकी लगन, समय पाबंदी और ईमानदारी से खुश होकर उसकी पगार 5000 बढा दी है। ये सुनकर मैंने विजय को गले लगा लिया, और कहा, ''आज तो तुमको कुछ स्पेशल मिलेगा।'' और फ़िर अपना ब्लाउज खोलकर उसके सामने बैठ गयी, ''तुम्हारी पगार बढने की खुशी में, तुम क्या करना चाहोगे, मेरे मम्मे चोदना या चुसवाना, या चाहो तो दोनों कर लो।''

''थैन्क यू, मम्मी,'' विजय हकलाते हुए बोला। मेरे हिलते हुए मम्मे देखकर उसका लण्ड पहले ही खड़ा हो चुका था। जैसे ही मैंने उसका पाजामा खोलकर, अन्डर वियर की इलास्टिक को नीचे किया, उसका फ़नफ़नाता हुआ तना हुआ लण्ड फ़टाक से जाके उसके पेट से टकराया। 

अपने बेटे के लण्ड को देखकर मेरी भी साँसें तेज हो गयी, जो मैं करने जा रही थी, उसके बारे में सोचकर मुझे कुछ कुछ होने लगा। मैं अपने बेटे का लण्ड चूसने वाली थी, चाहे मेरी चूत में ना सही लेकिन मैं अपने बेटे का लण्ड अपने शरीर में अंदर लेने वाली थी, वो चाहे मुँह में ही सही। मैं उस लक्ष्मण रेखा को पार करने ही वाली थी, मैं अपने बेटे के साथ सैक्स करने वाली थी, और मुझसे अब और ज्यादा इंतेजार नहीं हो रहा था। 

जैसे ही मैंने विजय के लण्ड को अपने होंठों के बीच लिया, और धीरे धीरे एक एक ईन्च करके विजय के लण्ड को अपने मुँह में अंदर लेने लगी, विजय का लण्ड मेरे मुँह की चिकनाहट और गरमाहट पाकर आनंदित हो उठा। 

अपने लण्ड को मेरे मुँह में अंदर घुसते हुए देखकर, विजय के मुँह से निकल गया, ''ओह्ह्ह, मम्मी…''

विजय मेरे मुँह में अपने लण्ड को गले तक पेले जा रहा था, और मैं उसके प्रीकम का स्वाद ले रही थी। 

मैं उसके लण्ड को अपने एक्सपर्ट जीभ से चाट और चूस रही थी, और ऐसा करते हुए मेरी चूत में भी आग लग रही थी। मैं अपने एक हाथ से अपनी चूत को सहलाने लगी। 

''ओह्ह मम्मी बहुत मजा आ रहा है।''

मैंने उसके लण्ड को पूरा अपने थूक से गीला कर दिया था। ऐसा करते हुए बस कुछ देर ही अपनी चूत को सहलाने के बाद, मैं झड़ गयी, और मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया, और मेरा मुँह खुला का खुला रह गया, और विजय का लण्ड मेरे मुँह से बाहर निकल गया। 

''मम्मी, मैं बस होने ही वाला था, आप रुक क्यों गयीं?"

''बेटा, तुम मेरे मुँह में पानी बाद में निकालना, पहले तुम थोड़ा मेरे मम्मे चोद लो।'' मैंने अपने मम्मों को दोनों हाथ से टाईट पकड़ कर उसको उनके बीच अपना लण्ड उनके बीच घुसाने के लिये आमंत्रित करते हुए कहा।

''तुम अपनी मम्मी के मम्मों के बीच अपने लण्ड नहीं घुसाओगे? तुमने तो इनको अभी तक छुआ भी नहीं है, लो खेलो इनके साथ, दबाओ इनको, तुमको बहुत अच्छे लगते हैं ना, अपनी मम्मी के मम्मे?''

विजय तो अपनी मम्मी से लण्ड को चुसवाकर ही अपने आप को धन्य समझ रहा था, उसको मेरे मम्मों के साथ खेलने का ख्याल ही नहीं आया था। उसने झट से मेरे मम्मों को अपनी हथेलियों में भरकर, उनको दबाना शुरु कर दिया। 

जब विजय मेरे निप्पल को मींजता तो मेरी आह निकल जाती। किसी मर्द से अपने मम्मों को दबवाते हुए मुझे बहुत मजा आ रहा था। विजय ने अपना लण्ड दोनों मम्मों के बीच रख दिया, और मजे से मेरे मम्मों को दबाने लगा और निप्प्ल के साथ खेलने लगा। 

मेरी चूत में आग लगी हुई थी, मेरी पैन्टी चूत के पानी में भीगकर पूरी गीली हो चुकी थी, तभी मैंने अपने हाथों को विजय के मेरे मम्मों को मींजते हुए हाथों के ऊपर रख दिया, और उसके हाथों के साथ अपने हाथों से अपने मम्मे दबाने लगी। मैंने अपनी ऊंगलियाँ उसकी ऊंगलियों के बीच फ़ँसा ली, और फ़िर अपने होंठों पर मुस्कान लाते हुए उसकी तरफ़ देखा, और फ़िर विजय को लण्ड से मेरे मम्मों को चोदने में उसकी मदद करने लगी।

विजय अपने लण्ड को मेरे मम्मों के बीच फ़िसलते हुए देखकर पूरे जोश में आ चुका था। मुझे भी उसके फ़नफ़नाते लण्ड से अपने मम्मों को चुदवाने में अपार आनन्द आ रहा था। 

''विजय बेटा, तुमको मेरे मम्मे अच्छे लगते हैं ना?" मैंने मुस्कुराते हुए उससे पूछा, ''तुमको अपने लण्ड को इनके बीच घुसाकर मजा आ रहा है ना बेटा?"

''हाँ मम्मी बहुत मजा आ रहा है, सच में!" वो हाँफ़ता हुआ बोला, और फ़िर से अपने लण्ड को मेरे मम्मों के बीच पेलने लगा। ''मुझे आपके मम्मे बहुत अच्छे लगते हैं मम्मी! ये कितने सॉफ़्ट और बड़े बड़े हैं... इतना मजा तो पहले कभी नहीं आया!"

मैं उसकी बात सुनकर बरबस मुस्कुरा दी। उसके लण्ड से मम्मों की पहली चुदाई को यादगार बनाने के लिये मैंने आगे बढकर उसके लण्ड के सुपाड़े को अपने होंठों से चूम लिया, और अपने बेटे के लण्ड को अपने चिकने बड़े बड़े मम्मों के बीच फ़िसलता हुआ महसूस करते हुए, विजय को प्रोत्साहित करने लगी। 

कुछ ही समय बाद विजय अपने चरम पर पहुँच गया, और जब उसका लण्ड वीर्य मिश्रित पानी मेरे मम्मों पर उँडेलने वाला था, तभी मैं उसके लम्बे फ़नफ़नाते हुए लण्ड को अपनी हथेली की मुट्ठी बनाकर उसको आगे पीछे करने लगी, ताकि उसको चूत जैसा एहसास मिल सके। 

इससे पहले की उसके लण्ड से वीर्य का लावा निकलता, मैंने उसको कहा, '' मेरे मुँह में पानी निकालना बेटा! ले अब अपने लण्ड को मेरे मुँह में घुसा दे, और अपने पानी से मेरे गले को त्रप्त कर दे बेटा!''

विजय तो अपनी मम्मी से ऐसे आमंत्रण को सुनकर मानो पागल ही हो गया। एक हाथ से वो मेरे मम्मे दबा रहा और और दूसरे हाथ से उसने मेरे सिर को पकड़कर अपनी तरफ़ खींचा, ऐसा करते ही उसका फ़नफ़नाता हुआ पूरा लण्ड मेरे गले तक घुस गया, और उसकी गोलियाँ मेरी थूक से भीग चुकी ठोड़ी से टकराने लगीं। विजय अपनी मम्मी के मुँह में अपने लण्ड को ताबड़तोड़ पागलों की तरह पेले जा रहा था। 

अपने बेटे के सामने समर्पण कर और इस तरह लाचार होकर उसके लण्ड को अपने मुँह में पिलवाने में मुझे भी बहुत मजा आ रहा था, मैंने भी अपना एक हाथ अपनी पैण्टी में घुसाकर अपनी पनिया रही चूत को सहलाना शुरु कर दिया। 

कुछ देर बाद विजय बोला, ''ओह, मम्मी मेरा पानी बस निकलने ही वाला है।''

मेरे मुँह में अपने लण्ड को जोरों से पेलते हुए जब उसके लण्ड से वीर्य मिश्रित पानी मेरे मुँह में निकलना शुरू हुआ तो वो आनंद से जोर जोर हुँकार भरने लगा। मेरी चूत भी और ज्यादा पनियाने लगी और मेरी उँगलियाँ भी मेरी चूत में अंदर तक घुस गयीं।
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12-20-2018, 12:21 AM,
#6
RE: vasna kahani चाहत हवस की
अपने बेटे के लण्ड से निकले वीर्य मिश्रित पानी को अपने मुँह में लेकर गले से नीचे सटकने में जो मुझे आनंद आ रहा था वो लाजवाब था। विजय अपने लण्ड का सारा पानी मेरे मुँह में निकालने के बाद वो निढाल होकर बैड पर लेट गया। शायद उसकी आँखों के सामने अंधेरा सा छा गया था, वो आँखें बंद करके साँस लेकर संयत होने का प्रयास कर रहा था। मैं भी बैड पर विजय के पास ही बैठ गयी, मुझे अपने आप पर गर्व हो रहा था, पहला तो इस बात का कि मैंने अपने प्यारे बेटे को खुशी प्रदान की थी, और दूसरा इस वजह से कि मेरा रंडीपना अभी भी किसी मर्द को पानी छोड़ने को मजबूर कर सकता था। 

इतने सालों बाद किसी मर्द के लण्ड को छूकर देखकर मुझे उत्तेजित कर रहा था, और वो भी अपने सगे बेटे का लण्ड, ये आग में घी का काम कर रहा था। हम दोनों वो शारीरिक सम्बंध बना रहे थे जिसकी समाज मान्यता नहीं देता, लेकिन वही करने में मुझे और मेरे बेटे विजय को जो आनंद मिल रहा था, तो फ़िर हम दोनों को किसी की परवाह नहीं थी। 

बिना कुछ सोचे मैंने विजय के मुर्झाते हुए प्यारे से लण्ड को अपने मुँह में भर लिया, मैं एक हाथ से विजय के टट्टों में गोलियों को सहला रही थी, तो दूसरे हाथ से उसके सुडौल पेट को, एक माँ अपने बेटे के लण्ड को सहला रही थी, उसे चूम रही थी, उसके लण्ड के सुपाड़े को अपनी जीभ से चाट रही थी, और उसके लण्ड को फ़िर से खड़ा करने का प्रयास कर रही थी। मैं अपने मुँह में विजय के लण्ड को फ़िर से खड़ा होता हुआ मेहसूस कर रही थी।

मैं इस सब में इतना ज्यादा डूब गयी थी कि जब विजय ने मेरा सिर पकड़कर मुझे अपनी तरफ़ खींचा तो मुझे एहसास हुआ कि हम दोनों 69 की पोजीशन में आ चुके थे। विजय ने जैसे ही अपना हाथ मेरी गाँड़ पर रखा तो मेरे पूरे बदन में करंट सा दौड़ गया, और मेरे मुँह से आह निकल गयी, जिससे विजय का लण्ड मेरे मुँह से बाहर निकलकर मेरे गालों से टकराने लगा। 

मैं उत्तेजित और चुदासी हो रही था, किसी तरह मेरे मुँह से निकला, ''क्या कर रहे हो बेटा!?"

मैं जड़वत विजय को मेरा पेटीकोट और पैण्टी उतारते हुए देख रही थी, उसने एक झटके में दोनों को मेरी टाँगो से नीचे निकालते हुए मुझे मादरजात नंगा कर दिया। तब मुझे एहसास हुआ कि आज पहली बार मैं अपने बेटे के सामने पूरी नंगी हुई थी। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, विजय ने मेरी दोनों टाँगों को चौड़ा कर के फ़ैला दिया, और मेरी गोरी गोरी अंदरूनी चिकनी जाँघों को सहलाते हुए मेरी चूत की तरफ़ बढने लगा। इस व्याभिचार का परम सुख मुझे बेहद आनंदित कर रहा था, जब मैंने विजय की साँसों को अपनी चूत के ऊपर मेहसूस किया तो फ़िर भी मैं ना चाहते हुए बोली, ''विजय, ऐसा मत करो बेटा, हे भगवान!"

जब मैंने विजय की उँगलियों को मेरी चूत की फ़ाँकों को अलग करते हुए, और मेरी पनिया रही फ़ूली हुई चुत को सहलाते हुए मेहसूस किया तो मानों मेरी साँसे गर्दन में ही अटक गयीं। और कुछ ही पल बाद विजय की साँसों की जगह उसके होंठों की किस ने ले ली थी, और विजय की जीभ मेरी चूत के छेद में अंदर तक घुस रही थी। 

''ओह्ह्ह्ह्… विजय बेटा, ऐसा मत करो बेटा…''

विजय ने एक बार चूत में से जीभ बाहर निकाली, और फ़िर चूत के होंठों को नीचे से ऊपर तक पूरी तरह चाटते हुए बोला,''कर लेने दो ना मम्मी, जैसा मजा आप मुझे देती हो, वैसा ही मजा मैं भी आपको देना चाहता हूँ,'' वो हाँफ़ते हुए बोला। अपनी मम्मी की चूत को पहली बार चाटने में उसे बहुत मजा आ रहा था। हम दोनों हवस के तूफ़ान में बहे जा रहे थे। विजय ने फ़िर से अपना मुँह मेरी टाँगों के बीच घुसा दिया, और अपनी माँ की स्वादिष्ट चूत को चूसने लगा। 

कुछ ही देर बाद मेरा बनावटी प्रतिरोध स्वीकृति में बदल गया, और मैं बड़बड़ाने लगी, ''ओह विजय बेटा, हाँ ऐसे ही करो बेटा… ओह तुम तो मुझे बहुत अच्छा चूस रहे हो…!"

जब विजय ने मेरी चूत के होंठों के साथ मेरी चूत के दाने को चूसना शुरू किया तो मेरा सिर चकराने लगा, और मेरे दिमाग में बस एक ही बात घूम रही थी कि ''मेरा बेटा मेरी चूत को चूस और चाट रहा है।''

हर बार, बार बार विजय की जीभ के हर झटके के साथ मरी चूत और पूरे बदन में आनंद की एक लहर सी दौड़ जाती, और मेरी चूत फ़ड़क कर और ज्यादा पनिया जाती। मैंने एक बार फ़िर से विजय के लण्ड को अपने मुँह में ले लिया और विजय मेरी चूत को इस कदर चूस रहा था मानो उसका जीवन का यही लक्ष्य हो। मैं सोच रही थी कि, ''हमको ऐसा नहीं करना चाहिये, लेकिन फ़िर विजय कितना प्यार से मेरी चूत को चूस रहा है, और मजा तो मुझे भी आ ही रहा था।''

मेरी चूत झड़ने ही वाली थी, और मेरे चुसने के कारण विजय के लण्ड का सुपाड़ा भी फ़ूल गया था। और जब मैं झड़ी तो मैंने विजय का लण्ड मेरे मुँह से बाहर निकाल दिया, जिससे विजय मेरी सिस्कारीयाँ सुन सके और उसको पता चले कि उसकी मम्मी कितना अच्छा वाला झड़ी हैं।

मैं हाँफ़ते हुए बोली, ''ओह बेटा,'' और उसके लण्ड को अपने हाथों से जोर जोर से झटकने लगी। 

हम दोनों इसी तरह 69 की पोजीशन में एक दो घण्टे लेटे रहे, और पूरे कमरे में बस हमारी कराह और सिसकारियाँ ही सुनाई दे रही थीं। और जब विजय के लण्ड से फ़िर से पानी निकला तो मैंने अपना मुँह खोल दिया, जिससे उसके वीर्य के पानी की सारी पिचकारियाँ ने मेरे चेहरे और मुँह को पूरी तरह भिगो दिया। 

और फ़िर हम दोनों वैसे ही नंगे निढाल होकर बैड पर लेटे रहे। कुछ देर बाद जब मैं उठी तो मैंने अपने चेहरे पर लगे वीर्य को अपनी उँगलियों से पोंछा, और फ़िर उँगलियों को अपनी जीभ से चाट लिया। विजय तकिये का सहारा लगाकर बैड पर बैठे हुए अपनी मम्मी को पूर्ण नग्नावस्था में खुद का वीर्य उस दिन दूसरी बार चाटते हुए देख रहा था। 

''बहुत मजा आया मम्मी,'' विजय कुछ समय बाद बोला, ''आपको भी आया ना, आप मुझसे गुस्सा तो नहीं हो ना, मम्मी? मैं तो बस…''

मुझे उसकी बात सुनकर बरबस उस पर प्यार आ गया, और मैंने उसके होठों को चूम लिया। 

''अरे, नहीं बेटा, तुम्हारी खुशी के लिये तो मैं कुछ भी कर सकती हूँ। तुम मेरा और गुड़िया का कितना ख्याल रखते हो, और ये तो तुम्हारे जवान जिस्म की जरूरत है, बाहर जाकर किसी रन्डी के ऊपर रुपये उड़ाने से तो अच्छा ही है कि तुम अपने जिस्म की जरूरत मेरे साथ ही पूरी कर लो, किसी बीमारी होने का खतरा भी नहीं रहेगा। आज के बाद जब भी तुम्हारा मन मेरी चूत को चाटने का करे, तो चाट लिया करना, और मैं तुम्हारे लण्ड को चूस कर उसका पानी निकाल दिया करुँगी, ठीक है?''
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12-20-2018, 12:21 AM,
#7
RE: vasna kahani चाहत हवस की
विजय मेरी बात सुनकर खुश हो गया, और मुस्कुराते हुए बोला, ''हाँ मम्मी ये ठीक रहेगा।''

''मेरा प्यारा बेटा, हाँ एक बात और, तुम चूत बहुत अच्छा चूसते और चाटते हो, आज मैं बहुत दिनों के बाद इतना अच्छा वाला झड़ी हूँ।''

''थैन्क्स मम्मी, आप मेरा कितना ख्याल रखती हो,'' विजय शरारती अन्दाज में बोला, ''लगता है आपके जिस्म को भी इसकी जरूरत थी।''

ये सुनकर मैं हँस पड़ी और मजाक में विजय की छाती पर एक प्यार भरी चपत लगा दी। ''चल अब सो जा, सुबह फ़िर फ़ैक्ट्री भी काम पर जाना है। सोने से पहले रोजाना रात को इसी तरह मैं तेरी सारी थकान मिटा दिया करूँगी।''

जब मैं बैड से उठकर बाथरूम की तरफ़ जाने लगी तो विजय मेरे नंगे बदन, मटकती हुई गाँड़ और हिलते हुए मम्मों को निहार रहा था।

अगले दिन सुबह जब मैंने विजय को नाश्ता परोस रही थी तब विजय मुस्कुराते हुए बोला, ''मम्मी आज के बाद आप मेरी मुट्ठ मत मारा करना, आप चूस के ही मेरा पानी निकाला करना।''

मैं उसकी बात सुनकर मुस्कुरा भर दी।

मेरा कोई उत्तर ना पाकर विजय मेरी आँखों में आँखे डालते हुए बोला, ''या फ़िर आपके मम्मों के बीच में घिसकर…'' 

''ठीक है, जैसे चाहो वैसे कर लेना, चलो अब जल्दी से नाश्ता करो और फ़िर काम पर जाओ, नहीं तो लेट हो जाओगे।''

लेकिन मन ही मन मेरे मन में विजय से अपनी गाँड़ मरवाने के विचार चल रहे थे। ये सोचकर ही मेरे दिल की धड़कन तेज हो रही थी, और अपने बेटे विजय के मोटे लण्ड को अपनी गाँड़ के छोटे से छेद में घुसाने का विचार आते ही मेरी चूत पनियाने लगी। 

विजय के फ़ैक्ट्री जाने के बाद मैं अपने बदन को अलमारी के आदमकद शीशे में निहारने लगी। मैंने अपने सारे कपड़े उतार दिये और अपने मम्मों को दोनों हाथों में भरकर मसलने लगी। और विजय के लण्ड के बारे में सोचते हुए अपने निप्पल मींजने लगी। और कुछ देर बाद ही मेरा एक हाथ मेरी चूत पर पहुँच गया, और उसकी उंगलियाँ मेरी चूत को सहलाने लगीं। और जब एक उँगली मेरी गीली चूत के दाने को सहलाने के बाद चूत के छेद के अंदर घुसी तो मेरी आँखें खुदबखुद बंद हो गयीं।

शाम को जब विजय फ़ैक्ट्री से घर लौटा तो वो बहुत खुश था, उसका प्रोमोशन हो गया था, और वो सुपरवाइजर बन गया था। उसकी पगार भी दुगनी हो गयी थी। उसने आते ही खुशी से मुझे चूम लिया, मैं भी उसकी तरक्की पर खुश थी। मेरे कहने पर वो मंदिर चलने को तैयार हो गया, मंदिर से लौटते समय सिटी बस में मैं उस से चिपक कर बैठी हुई थी, वो मेरे स्पर्ष का भरपूर आनंद ले रहा था।

सिटी बस से उतर कर जब हम दोनों घर आ रहे थे, तो मैंने विजय से कहा, ''ये तुम्हारी इमानदारी और मेहनत का ही नतीजा है कि सेठ ने तुम्हे तरक्की दी है, सब ऊपर वाले की मेहर है। भगवान ने तुम्हे बरकत दी है, मैं भी आज रात तुम्हे कुछ स्पेशल चीज दूंगी।'' इतना कहकर मैं कुटिलता से मुस्कुरा दी। मेरी इस मुस्कान के राज को विजय समझने का प्रयास करने लगा। 

''रात में स्पेशल… क्या दोगी मम्मी? मुँह में तो डाल ही चुका हूँ, अब बस दो ही जगह बची हैं।" इतना कहकर विजय हँसने लगा। 

''कुछ घण्टों बाद खुद ही देख लेना बेटा।''

रात को खाना खाने के बाद जब मैं विजय के कमरे में मादरअजात नंगी दाखिल हुई तो मेरे हाथ में सरसों के तेल की शीशी थी। विजय सिर्फ़ अन्डर वियर पहने हुए बैड पर लेटा हुआ था। मुझे इस रुप में देखकर विजय के मुँह से आह निकल गयी, और उसने तुरंत अंडर वियर में से अपना लण्ड बाहर निकाल लिया। मुझे पूर्ण नग्नावस्था में देख कर विजय का लण्ड फ़नफ़ना रहा था।

मैं विजय को और ज्यादा उत्तेजित करने के लिये अपनी गाँड़ मटकाती हुई और मम्मों को हिलाती हुई उसके पास आकर बैठ गयी। 

''अगर अपनी मम्मी की गाँड़ मारना चाहते हो तो, पहले अपने लण्ड को और मेरी गाँड़ के छेद को अच्छी तरह से चिकना कर लो, और तुम्हारा ये लण्ड मेरी गाँड़ के छोटे से छेद में आसानी से नहीं जायेगा, तो प्लीज थोड़ा आराम आराम से डालना।''

मैंने विजय को बैड से नीचे उतरने का इशारा किया, और खुद बैड के किनारे पर बैठ गयी। विजय के लण्ड को अपने मुँह में भरकर उसको चुसने लगी, ऐसा करते हुए मेरी चूत भी पनिया रही थी। हम दोनों ही कुछ नया करने वाले थे, जो हमने पहले कभी नहीं किया था, ये एक नयी उत्तेजना पैदा कर रहा था। मैंने उसके लण्ड को पूरा नीचे से ऊपर तक अपने थूक से गीला करके चिकना कर दिया। 

हमेशा की तरह जब मैं उस के लण्ड को चूस रही थी तो उस दिन भी विजय मेरे गालों और मेरी गर्दन को अपने हाथ से सहला रहा था। लण्ड को चुसवाते हुए उसको बहुत मजा आ रहा था, और वो जब बीच बीच में मेरे चेहरे को देखता और हमारी आँखें मिल जाती तो हम दोनों मुस्कुरा देते। 

''मम्मी, आप मेरा बहुत ख्याल रखती हो, आप बहुत अच्छी हो, लेकिन क्या सच में मैं आपकी गाँड़ मार लूँ…?"

मैंने अपनी भौहें चढाते हुए कहा, ''हाँ बेटा, मार लो, लेकिन तुम ऐसा क्यों पुछ रहे हो? तुमको तो पता है कि मुझे कोई आपत्ती नहीं है, और आखिर मेरे बेटे की तरक्की हुई है, उसको कुछ इनाम तो देना ही पड़ेगा।''

अपनी मम्मी को अपने लण्ड के सुपाड़े को चूसते हुए देखता हुआ विजय बोला, ''वो तो ठीक है मम्मी, लेकिन फ़िर इस तरह जैसे मुझे रोजाना आपसे लण्ड चुसवाने की आदत पड़ गयी है, कहीं आपकी रोजाना गाँड़ मारने की आदत पड़ गयी तो? क्योंकि आपकी गाँड़ है ही इतनी मस्त कि फ़िर मैं इसको रोजाना मारे बिना नहीं रह पाऊँगा।''

विजय की ये बात सुनकर मेरे होंठों पर मुस्कान आ गई, और मेरी गाँड़ की तारीफ़ सुनकर मेरी चूत और ज्यादा पनिया गयी, मैंने कुछ बोलने से पहले एक बार फ़िर से विजय के लण्ड को पूरा मुँह में अन्दर तक लेकर एक जोर का सड़का मार दिया। 

''अरे विजय बेटा, तुम उसकी चिन्ता मत करो, अभी जो मिल रहा है उसका फ़ायदा उठा लो, बाद का जो होगा देखा जायेगा,'' मैं माहौल का हल्का करने के अन्दाज में बोली। 

''ठीक है मम्मी, जो मिल रहा है उसका फ़ायदा उठा ही लेते हैं।''

''तुम चिन्ता मत करो, अगर आदत पड़ भी गयी तो भी मुझे तुम से रोज गाँड़ मरवाने में कोई आपत्ती नहीं है, जब चाहो मार लिया करना अपनी मम्मी की गाँड़, अब तो ठीक है?''

विजय मुझसे चिपकता हुआ बोला, ''ओह मम्मी, आप बहुत अच्छी हो।''

''मेरा अच्छा बेटा, तो फ़िर आ जाओ,'' मैं बैड के ऊपर चढकर घोड़ी बनते हुए, और गाँड़ को ऊपर उँचकाते हुए बोली, ''ले लो अपना इनाम, और मार लो अपनी मम्मी की गाँड़।''

मैं अपने बेटे विजय के सामने घोड़ी बनकर अपनी गाँड़ को हिलाने लगी। विजय किसी तरह से मेरी मोटी हिलती हुई गाँड़ को देखकर अपने आप पर काबू रखने का प्रयास कर रहा था, उसकी सांसे तेज तेज चल रही थी और दिल जोरों से धड़क रहा था। जब विजय ने पहली बार अपनी मम्मी की आमंत्रित कर रही गोल, मुलायम, भरपूर उभरी हुई दर्षनीय गाँड़ पर हाथ रखकर, दोनों गोलाइयों को पूरा सहलाना शुरू किया तो उसका हाथ काँप उठा।
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12-20-2018, 12:21 AM,
#8
RE: vasna kahani चाहत हवस की
''हे भगवान…'' विजय सिसकते हुए बोला, वो समझ नहीं पा रहा था कि ये सपना है या हकीकत, क्या वो सचमुच अपनी मम्मी की गाँड़ में अपना लण्ड पेलने वाला है। ''आपकी गाँड़ सचमुच बहुत सुन्दर है मम्मी, क्या मस्त उभरी हुई गोलाइयाँ है इसकी आह…'' 

कंधे के ऊपर से मैं अपने बेटे विजय को मेरे चूतड़ों को प्यार से सहलाते और मसलते हुए देख रही थी। कुछ देर बाद जब मेरे सब्र का इम्तेहान जवाब देने लगा तो मैं बोली, ''विजय बेटा, मेरे वहाँ पर थोड़ा तेल लगाकर चिकना कर लेना।''

विजय ने तभी मेरी गाँड़ के छेद को अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया। विजय को मेरी सिसकारियाँ बता रही थीं कि उसका ऐसा करना मुझे कितना आनंदित कर रहा था। कुछ देर बाद विजय ने सरसों के तेल की शीशी में से थोड़ा सा तेल मेरी गाँड़ के छेद पर टपका दिया, और फ़िर अंदर तक चिकना करने के लिये एक उंगली तेल में भिगोकर मेरी गाँड़ के छेद के अंदर बाहर करने लगा। मेरी तो मानो जान ही निकल रही थी, मेरा बेटा मेरी गाँड़ को मारने से पहले उसको तेल लगाकर चिकना कर रहा था। 

''हाँ बेटा, मेरी गाँड़ मारने से पहले इसको ऐसे ही चिकना कर लो, आह्ह्ह।''

जैसे ही विजय ने अपने लोहे जैसे फ़नफ़नाते हुए लण्ड का सुपाड़ा मेरी चिकनी गाँड़ के छेद पर टिकाया तो मैं झड़ने के बेहद करीब पहुंच चुकी थी। विजय धीरे धीरे अपने लण्ड को मेरी गाँड़ में घुसा रहा था ताकि मुझे कम से कम दर्द हो। एक बार जब उसको यकीन हो गया कि मेरी गाँड़ और उसका लण्ड दोनों भरपूर चिकने हो चुके हैं, तो उसने मेरी नजरों की तरफ़ देखा, और फ़िर मेरी गाँड़ की दोनों गोलाईयों को अपने दोनों हाथों से पकड़कर चौड़ा कर फ़ैलाने लगा, जिससे उसके लण्ड को मेरी गाँड़ की बेहतर पहुँच मिल सके। 

''तैयार हो मम्मी?" उसने सिसकते हुए पूछा, ''और तेल लगाने की जरूरत तो नहीं है ना?"

''नहीं बेटा, ठीक है, अब जल्दी से अंदर तक डाल दो, मार लो अपनी मम्मी की गाण्ड़ अपने मूसल से।''

विजय का दिल जोरों से धड़क रहा था, और उसके लण्ड में उफ़ान आ रहा था, उसने एक गहरी लम्बी साँस ली, और फ़िर अपनी मम्मी की गुलाबी गांड़ के छोटे से छेद में एक जोर का झटका मारा, हम दोनों एक साथ कराह उठे। मेरी गाँड़ के छेद ने खुलने से एक सैकण्ड को विरोध किया और फ़िर विजय के लण्ड के सुपाड़े के सामने हथियार डाल दिये। विजय उत्सुकता से मेरी गाँड़ के छेद की गोलाई को अपने लण्ड के सुपाड़े के गिर्द फ़ैलकर खुलते हुए देख रहा था। उसको अब लण्ड को मेरी गरम गरम गाँड़ के अंदर तक घुसाने में आसानी हो रही थी। 

विजय को विश्वास नहीं हो रहा था, कि मैं अपनी गाँड़ की मसल्स को रिलैक्स करके इतने आराम से उसके लण्ड को अंदर तक ले जाऊँगी। 

''ऊह बेटा, ऐसे ही करते रहो, फ़ाड़ दो अपनी मम्मी की गाँड़'' मैं फ़ुसफ़ुसाते हुए बोली। मैं अपनी गाँड़ मरवाते हुए अपनी चूत के दाने को अपनी उँगली से घिस रही थी। ''अंदर तक डाल दो अपने लण्ड को, बेटा, पूरा अंदर तक।''

मेरी बातें सुनकर विजय को मजा आ रहा था। अपनी माँ को इस तरह लण्ड के लिये गिड़गिड़ाते हुए देख कर, वो और ज्यादा उत्तेजित हो रहा था, और फ़िर उसने एक बार फ़िर पूरा लण्ड मेरी गाँड़ में पेल दिया। 

जब विजय के टट्टों की गोलियाँ हर झटके के साथ मेरी पनिया रही चूत से टकराती तो विजय आनम्दित हो उठता और फ़िर और जोरों से अपनी मम्मी की गरम गरम टाईट गाँड़ में जोरों से अपना लण्ड पेलने लगता। मेरी गाँड़ के छेद ने मानो विजय के लण्ड को सब तरफ़ से जकड़ रखा था। 

''आह्ह, मम्मी बहुत मजा आ रहा है,'' मेरे ऊपर झुकते हुए, विजय मेरी गर्दन को चूमता हुआ वोला, और फ़िर उसने मेरे लटक कर झूलते हुए मम्मों को अपने हाथ से मसलना शुरू कर दिया। ''आपकी प्यारी सुंदर टाईट गाँड़ मारने में बहुत मजा आ रहा है, आप बहुत अच्छी हो मम्मी।''

अपनी गाँड़ में अपने बेटे का लण्ड घुसाये हुए, और अपने मम्मों को उसके हाथों से दबवाते हुए, विजय की गर्म साँसों को अपनी गर्दन पर महसूस करते हुए, मैंने मानो अपने बेटे विजय के सामने समर्पण कर दिया था। 

''ओह, विजय बेटा, तुम भी बहुत अच्छे हो,'' मैं कराहते हुए बोली, और फ़िर गर्दन घुमाकर अपने गुलाबी मोटे होंठ उसको परोस दिये। और फ़िर हम दोनों एक दूसरे को ताबड़तोड़ चूमने चाटने लगे। 

हम दोनों एक दूसरे की जिस्म की जरूरत को पूरा कर रहे थे, लेकिन ये पहली बार था हब हम दोनों के जिस्म का मिलन हुआ था। मेरी ग़ाँड़ की दीवार अभी भी विजय के लण्ड के साईज के अनुसार अपने आप को ढाल रही थीं, और मैं हर पल और ज्यादा मस्त हुए जा रही थी। 

अपने होंठों को विजय के होंठो से थोड़ा दूर करते हुए मैं फ़ुसफ़ुसाई, ''बेटा, चोद दो मुझे, मार लो मेरी गाँड़ को, निकाल दो अपना पानी अपनी मम्मी की गांड़ में। 

''आह्ह, मम्मी आप सबसे अच्छी मम्मी हो,'' विजय अपने लण्ड को मेरी गाँड़ में जोर से पेलते हुए, गुर्राते हुए बोला। 

मेरे रस भरे होंठों को एक लास्ट बार चूमते हुए, विजय अपने घुटनों पर सीधा हो गया, और फ़िर मेरी गाँड़ के दोनों मोटे चूतड़ों को अपने दोनों हाथों में भर के मसलने लगा। वो अपने लण्ड को मम्मी की गाँड़ के छेद में घुसे हुए होने का दीदार करने लगा, और फ़िर धीरे धीरे अपने लोहे जैसे कड़क लण्ड को अपनी मम्मी की गाँड़ में धीरे धीरे अन्दर बाहर करने लगा। और फ़िर मेरी तेल लगाकर चिकनी हुई गाँड़ में उसके लण्ड के झटके तेज होने लगे। मेरी गाँड़ तो मानो हर झटके के साथ उसके लण्ड को खा जाने को बेकरार हो रही थी। 

''ऊह्ह्ह, बहुत मजा आ रहा है, मेरी गाँड़ में तुम्हारा लण्ड और भी ज्यादा बड़ा और मोटा लग रहा है बेटा,'' मैं कराहते हुए, और अपनी चूत के दाने को उसके झटके के साथ ताल में ताल मिलाकर सहलाते हुए बोली। 

''तुमको भी मजा आ रहा है ना अपनी मम्मी की गाँड़ मारकर? मुझे तो बहुत मजा आ रहा है, और अन्दर तक डालो बेटा… ऊउह्ह्ह! बेटा, मेरी टाईट गाँड़ में अपना लण्ड घुसाकर मजा आ रहा है ना?"

''हाँ मम्मी बहुत मजा आ रहा है!" विजय गुर्राते हुए बोला, ''इतना मजा तो मुझे कभी नहीं आया, आह…, आपकी गाँड़ तो बहुत अच्छी है मम्मी, कितनी गर्म है, कितनी टाईट है ये, ओह्ह मम्मी बहुत अच्छी गाँड़ है आपकी तो ओह्ह…!"

जिस तरह से मैं विजय के लण्ड के हर झटके के अंदर जाते समय अपनी गाँड़ को लूज और एक बार पूरा अंदर जाने के बाद टाईट कर उसके लण्ड को जकड़ लेती थी, उससे विजय समझ रहा था कि मुझे भी गाँड़ मरवाने में उतना ही मजा आ रहा था जितना उसको मेरी गाँड़ मारने में। 

जिस तरह से एक हाथ से मैं अपनी चूत के बेकरार दाने को घिस रही थी, उसकी वजह से बीच बीच में मेरे पूरे बदन में थोड़ा झड़ने जैसी हल्की सी तरंगें दौड़ जाती। ऐसा लग रहा था कि बस अब मैं पूरी अच्छी तरह झड़ने ही वाली हूँ।
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12-20-2018, 12:21 AM,
#9
RE: vasna kahani चाहत हवस की
विजय मुस्कुराते हुए मेरी मोटी मस्त गाँड़ में अपने लण्ड के लम्बे अंदर तक झटके मारे जा रहा था, वो मानो कोई सपना देख रहा था, और उस सपने को देखता रहना चाहता था। उसका अपनी मम्मी की गाँड़ मारने से मन ही नहीं भर रहा था। उसको विश्वास नहीं हो रहा था कि लण्ड चुसवाने से इतना ज्यादा मजा गाँड़ मारने में आता है।

मेरी गाँड़ की गोलाईयों पर हर झटके के साथ आ रही थप थप की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। मेरी हल्के हल्के कराहने की आवाज माहौल को और ज्यादा मादक बना रही थी। विजय को इस तरह हर वर्जना को तोड़ते हुए महुत मजा आ रहा था, वो समाज द्वारा वर्जित अपनी सगी माँ के साथ शारीरिक सम्बंध बनाते हुए उनके वर्जित गाँड़ के छेद में अपना लण्ड अपना लण्ड घुसाकर अंदर बाहर कर रहा था। 

मैंने एक बार फ़िर से पीछे विजय की तरफ़ घूमकर देखत हुए कहा, ''और जोर से मारो बेटा, और जोर से… हाँ… ऐसे ही… आह्ह्ह्… अंदर तक घुसा दो बेटा अपना मोटा लण्ड अपनी मम्मी की गाँड़ में...ढंग से मार लो अपनी मम्मी की गाँड़,'' अपने बेटे के लण्ड को अपनी गाँड़ में घुसवाकर, और उसे पिस्टन की तरह अंदर बाहर करवाते हुए मैं मस्त हुए जा रही थी। 

अपनी मम्मी के मुँह से ऐसी मस्त बातें सुनकर विजय का लोहे जैसा सख्त लण्ड और तेजी से मेरी टाईट गाँड़ के छेद के अंदर बाहर होने लगा, और वो भी झड़ने की कगार पर पहुँच गया था।

''आह्ह, मम्मी बस मैं झड़ने ही वाला हूँ… आपकी मस्त गाँड़ में मैं सारा पानी निकाल दूँगा… ओह मम्मी आपकी गाँड़ तो कमाल की है।''

''हाँ बेटा निकाल दो अपना सारा पानी अपनी मम्मी की गाँड़ में…भर दो इसको अपने पानी से…'' मैं हांफ़ते हुए झड़ने के करीब पहुँचते हुए बोली। 

विजय तो मानो जन्नत की सैर कर रहा था, उसने अपने लोहे की रॉड जैसे लण्ड के अपनी मम्मी की गाँड़ में दो चार जोर जोर के झटके लगाने के बाद, एक बार जोर से अंदर तक लण्ड पेलते हुए ढेर सारा वीर्य का पानी मेरी गाँड़ में निकाल दिया। मैंने जैसे ही अपनी गाँड़ में उसके गरम गरम पानी को महसूस किया मैं भी उसी वक्त झड़ गयी। हम दोनों माँ बेटे एक साथ झड़ते हुए खुशी से जोर जोर से तरह तरह की आवाजें निकालने लगे।

झड़ने के कुछ देर तक विजय मेरी गाँड़ में वैसे ही अपना लण्ड घुसाये रहा, झड़ने के बाद मेरी गाँड़ का छेद सिंकुड़ कर विजय के लण्ड को भींच कर दबा रहा था। और फ़िर जब विजय ने अपना लण्ड मेरी गाँड़ में से बाहर निकाला तो मेरी गाँड़ का खुले हुए छेद में से फ़च्च की आवाज आयी। विजय फ़िर मेरे पीछे पींठ के पास निढाल होकर लेट गया, और मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। 

कुछ देर बाद मेरे बदन को सहलाते हुए जब विजय का एक हाथ मेरी चूत पर पहुँचा, तो दो ऊँगलियाँ मेरी चूत में घुसाते हुए विजय मेरे कान में फ़ुसफ़ुसाया, ''मम्मी आप तो बहुत ज्यादा पनिया रही हो, क्या मुलायम मस्त चिकनी गीली चूत हो रही है।''

विजय का लण्ड मेरी चिकनी गाँड़ की दरार में घुसने का प्रयास कर रहा था, और उसकी ऊँगलियाँ मेरी चूत में अंदर बाहर हो रही थी। मैंने अपना सिर घुमा कर विजय के चेहरे की तरफ़ देखा, मैं उसकी कराह में चूत में लण्ड घुसाने की तड़प को समझ रही थी। 

''अपने लण्ड को मम्मी की चूत में घुसाना चाहते हो,'' मैंने उसके गाल पर हाथ फ़िराते हुए मुस्कुराते हुए पूछा, ''क्यों बेटा मन कर रहा है ना अपनी मम्मी की चूत को चोदने का?"

विजय ने अपने लण्ड को मेरी गाँड़ की दरार में जोर से घिसते हुए, और मेरी चूत में जोरों से अपनी ऊँगलियाँ अंदर बाहर करते हुए, हामी में सिर हिला दिया। विजय के चेहरे पर मासूमियत थी, मुझे उस पर प्यार आ गया, और मैंने उससे पूछा, ''लेकिन क्यों बेटा? मम्मी की गाँड़ मार के मन नहीं भरा क्या?"

''ओह्ह्ह, नहीं मम्मी ऐसी बात नहीं है, आपकी गाँड़ तो बहुत अच्छी है, बहुत बहुत अच्छी है।''

मुझे उसकी बात में इमानदारी और धन्यवाद के भाव प्रतीत हुए। मैंने विजय को अपने आप से और जोरों से चिपका लिया, और उसके होंठों को जोर से चूम लिया। असलियत में मेरी चूत विजय के लण्ड को अपने अंदर लेना चाहती थी, और इस मुकाम तक आने के बाद वापस लौटने का कोई मतलब नहीं था। मैं विजय के लण्ड को अपने हाथों से मुठिया चुकी थी, उसको अपने मुँह में और मम्मों के बीच ले चुकी थी, और तो और अपनी गाँड़ भी मरवा चुकी थी। हम दोनों वासना और हवस के खेल में बहुत आगे निकल चुके थे, हम दोनों के जिस्म की जरूरत हम दोनों को बेहद करीब ले आयी थी। 

समाज की वर्जनाओं को तोड़ते हुए हम माँ बेटे जिस पड़ाव पर पहुँच चुके थे, वहाँ पहुँचने के बाद चूत में लण्ड को घुसवाने या ना घुसवाने का कोई अर्थ नहीं बचा था। और वैसे भी विजय का लण्ड पहली बार किसी चूत का स्वाद चखने वाला था, तो फ़िर वो मेरी चूत का ही क्यों ना चखे? विजय पहली बार किसी चूत को चोदने वाला था, और वो भी अपनी मम्मी की चूत। 

उस वर्जित कार्य को करने से पहले ये सब सोचते हुए मेरे गदराये बदन में उत्तेजना की एक लहर सी दौड़ गयी। मेरा बेटा विजय अपना लण्ड उस चूत में घुसाने वाला था, जिस में निकल कर वो इस दुनिया में आया था, और ये वो ही चूत थी, जिस में वो अपने जीवन के पहले तजुर्बे में किसी चूत में अपना लण्ड घुसाने वाला था। इससे बेहतर और क्या हो सकता था? 

ये सब सोचकर, मैंने किस तोड़ते हुए कहा, ''हाँ, बेटा।''

विजय ने अविश्वास में अपनी आँख झपकाईं, उसकी ऊँगलियाँ मेरी पनिया रही चूत में कोई हरकत नहीं कर रही थी, और उसके लण्ड के मेरी गाँड़ की दरार में झटके भी शांत थे। वो मेरी बार सुनकर तुरंत समझ गया, लेकिन फ़िर भी उसने हकलाते हुए पूछा, ''सचमुच मम्मी?'' 

मैं विजय की बाहों में मचल रही थी, विजय के लण्ड को अपनी गाँड़ के छेद पर दस्तक देते, और उसकी ऊँगलियों को मेरी चूत में घुसे हुए, उसके लण्ड को अपनी चूत में लेने का ख्याल ही मुझे कई गुना उत्तेजित कर रहा था। ''हाँ, बेटा,'' मैंने हामी में सिर हिलाया और अपनी गाँड़ को थोड़ा पीछे खिसकाते हुए उसके लण्ड पर घिस दिया। ''हाँ, बेटा जिस दिन तुम मेहनत कर के इतना पैसा जोड़ लोगे और अपनी टैक्सी खरीद कर ले आओगे, उस दिन मैं तुमको वो इनाम दूँगी जो तुम कभी नहीं भूल पाओगे, तुम को ईनाम में मेरी चूत चोदने को मिलेगी, हाँ बेटा, मैं तुझे बहुत प्यार करती हूँ बेटा।

छः महीने बाद जब विजय ने अपनी टैक्सी खरीद कर घर के सामने खड़ी की, तो जब मैंने घर से बाहर निकलकर टैक्सी देखने के बाद जब विजय के चेहरे की तरफ़ देखा, तो हम दोनों के चेहरे पर गर्व, खुशी और वासना की मिश्रित मुस्कान थी। 

उस दिन सुबह जब विजय टैक्सी खरीदने के लिये घर से जाने वाला था, उस से पहले किचन में मैंने उसके लण्ड को चूस कर उसका पानी निकाला था। 

सड़क पर खड़े होकर मैं जब विजय की नयी टैक्सी को देख रही थी, तो मैं अपने होंठों पर अपनी जीभ फ़िरा रही थी। मुझे अपने आप पर गर्व महसूस हो रहा था कि मैंने किस तरह मैंने विजय को सैक्स के इनामों से प्रेरित कर मेहनत करने को उकसाया था कि वो आज टैक्सी का मालिक बनकर मेरे सामने खड़ा था। 

कहीं मेरे मन में ये डर भी था कि कहीं विजय अब जब ठीक ठाक कमाने लगेगा, उसके बाद शादी कर ले अपनी नयी नवेली दुल्हन की कच्ची कोमल टाईट चूत के सामने मुझे भूल ना जाये, लेकिन फ़िर मैंने अपने आप को समझाया कि पहले विजय को समझा कर पहले गुड़िया की शादी करेंगे और उसके बाद विजय की शादी का नम्बर आयेगा, और उस में अभी काफ़ी समय था। 

वो दिन हमारे लिये किसी त्योहार से कम नहीं था, और मैं उस दिन को विजय के लिये यादगार बनाने वाली थी। नारियल फ़ोड़ कर और मंदिर में गाड़ी की पूजा करवा कर जब हम दोनों वापस घर लौटे तो मेरी चूत बुरी तरह पनिया कर चुदने को उतावली हुए जा रही थी। मैंने विजय को एक नयी माला देते हुए उसके पापा की तस्वीर पर टँगी माला को बदलने के लिये कहा। विजय के पापा की मुस्कुराती हुई फ़ोटो मानो हम माँ बेटे के शारीरिक सम्बंधों को स्वीकृति प्रदान कर रही थी।
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12-20-2018, 12:21 AM,
#10
RE: vasna kahani चाहत हवस की
उस रात भी खाना खाने के बाद जब हम दोनों बिस्तर पर लेटे तो विजय का लण्ड मेरी गाँड़ की गोलाईयों के बीच दस्तक देने लगा। विजय का एक हाथ मेरे मम्मों को सहला और दबा रहा था, और वो मेरी गर्दन के पिछले हिस्से को चूम और चाट रहा था। बिना कोई समय गँवाये विजय ने मेरी पेटीकोट को ऊपर कर दिया और मेरी फ़ूली हुई चूत को ऊपर से सहलाने लगा। मेरी चूत के दाने के ऊपर वो गोल गोल ऊँगली घुमा रहा था, और चूत की फ़ाँकों को सहलाये जा रहा था। उस दिन मैं इस कदर चुदासी हो रही थी, कि विजय के कुछ देर इस तरह मेरी चूत को सहलाने से ही मैं एक बार झड़ गयी। 

विजय अभी भी मेरी गर्दन को पीछे से चूम रहा था, और उसका फ़नफ़नाता हुआ लण्ड मेरी गाँड़ पर टक्कर मार रहा था। उसके लण्ड से निकल रहा चिकना पानी मेरी गाँड़ के छेद को चिकना कर रहा था। मेरे मुँह से खुशी और उत्तेजना में सिसकारियाँ निकल रही थी। अपने बेटे के लण्ड के सुपाड़े को अपनी गाँड़ के छेद पर अंदर घुसने के लिये बेताब होता देख मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। जैसे ही उसने अपने लण्ड का सुपाड़ा मेरी गाँड़ के अंदर घुसाया, मेरे मुँह से आह निकल गयी। अपने बेटे के मोटे लण्ड को अपनी गाँड़ के छोटे से छेद में घुसवाने में थोड़ा दर्द होना लाजमी था। हाँलांकि मैं विजय के लण्ड से पिछले कुछ दिनों में कई बार अपनी गाँड़ मरवा चुकी थी, लेकिन हर बार जब पहली दफ़ा जब विजय अपने लण्ड मेरी गाँड़ में घुसाता था, तो मुझे अलग ही मजा आता था। विजय का मोटा लण्ड मेरी गाँड़ के छोटे से छेद को चौड़ा कर के उसका मुहाना खोल के बड़ा कर देता था। और ऐसा होता देख मुझे सम्पूर्णता का एहसास होता था, और मेरे पूरे गदराये बदन में खुशी की लहर सी दौड़ जाती थी। 

हमेशा की तरह मेरी गाँड़ मारते हुए विजय ने छोटे छोटे धीमे धीमे झटके मारने शुरू कर दिये, और धीरे धीरे हर झटके के साथ उसका लण्ड इन्च दर इन्च मेरी गाँड़ में घुसता जा रहा था। जब उसका लण्ड पूरा मेरी गाँड़ में घुस गया तो उसने कस कर मुझे दबोच लिया, और मेरे मम्मों को अपनी हथेली में भरकर कस कर मसलते हुए अपना लण्ड मेरी गाँड़ में पेलने लगा। खुशी के मारे मेरे मुँह से सिसकारीयाँ निकल रही थी, और मैं मचल रही थी। जैसे ही विजय का लण्ड बाहर निकलता मुझे खालीपन मेहसूस होता और मैं विजय के मोटे लण्ड को फ़िर से अंदर लेने को बेताब होकर मचल उठती। मैंने विजय के लण्ड को अपनी गाँड़ में दबोच रखा था, और गाँड़ के छेद को बंद करते हुए विजय को टाईट गाँड़ का पूरा मजा दे रही थी। 

और जब विजय अपने लण्ड से वीर्य का पानी मेरी गाँड़ में निकाल कर फ़ारिग हुआ, तब तक अपनी चूत में उंगली घुसाकर और चूत के दाने को अपने हाथ की उंगली से सहलाते हुए मैं दो बार झड़ चुकी थी। जैसे ही विजय ने मेरी गाँड़ में अपने लण्ड का आखिरी झटका मारा, मेरे मुँह से खुशी के मारे चीख निकल गयी। विजय के लण्ड से निकले पानी ने मेरी गाँड़ के छेद में मानो बाढ ला दी थी। विजय का मोटा मूसल जैसा लण्ड झड़ते हुए मेरी गाँड़ में और ज्यादा कड़क और मोटा हो जाता था, और उसको अपनी गाँड़ में कड़क होता मेहसूस करते हुए मुझे बहुत मजा आता था, और मेरा भी उसके साथ झड़ने का मजा दोगुना हो जाता था। 


वासना का तूफ़ान शांत होने के बाद, मैंने अपना सिर घुमाकर विजय के होंठो को चूम लिया। विजय का लण्ड अभी भी मेरी गाँड़ में घुसा हुआ था। विजय अभी भी अपने मुलायम नरम हो चुके लण्ड के हल्के हल्के झटके मार कर मेरी गाँड़ में मानो अपने वीर्य के बीज को रोपने का प्रयास कर रहा था।

मैंने धीमे से फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा, ''विजय बेटा, आज तो वायदे के मुताबिक तुम मेरी चूत में भी अपने लण्ड को घुसाकर, मेरी चूत को भी अपने लण्ड के पानी से भर सकते हो…''

मेरी इस बात को सुनकर विजय का लण्ड मेरी गाँड़ में अकड़ने लगा। विजय मेरे होंठों को चूमने, मेरे मम्मों को मसलने और मेरी चूत में उँगली करने के बाद फ़िर से अपने लण्ड को मेरी गाँड़ में पेलने लगा, और मेरी खूबसूरती की तारीफ़ करने लगा। एक बार फ़िर से मेरी गाँड़ में अपने लण्ड का पानी छोड़ने के साथ ही मुझे भी झड़ने पर मजबूर करते हुए, विजय मुझ से कस कर चिपक गया, और मेरे कन्धे पर अपना सिर रख दिया। विजय साथ साथ बोले जा रहा था, ''मम्मी आप बहुत अच्छी हो, आप बहुत सुन्दर हो, आप मेरा बह्तु ख्याल रखती हो,'' उसका हर एक शब्द मुझे उसको और ज्यादा प्यार करने पर बाध्य कर रहा था। 

एक दूसरे से चिपक कर लेटे हुए, हम दोनों ही के दिमाग में चूत में लण्ड डालने की ईनाम वाली बात घूम रही थी। विजय मुझे बता रहा था कि वो मेरी चूत को चोदने के लिये कितना बेकरार था, और वो भी इसलिये नहीं कि वो अपना लण्ड किसी चूत में पहली बार घुसाने जा रहा था, बल्कि इसलिये कि वो चूत उसकी प्यारी मम्मी की चूत थी। मैं भी उसको बता रही थी कि मैं भी उसके लण्ड से चुदने को उतनी ही बेकरार थी, और भगवान की शुक्र गुजार थी कि मेरे बेटे ने अपनी मेहनत से टैक्सी खरीदी थी, और उसका अपने ईनाम पर पूरा हक था।

''मैं पहली बार किसी चूत को चोदूँगा, और मैं इसे यादगार बनाना चाहता हूँ, क्यों ना मम्मी हम दोनों कल शाम जयपुर घूमने चलें और वहाँ किसी होटल में नव विवाहित जोड़े की तरह सुहाग रात मनायेंगे,'' विजय ने किसी बच्चे की तरह उत्साहित होते हुए कहा। मुझे भी विजय का प्रस्ताव सही लगा, और मैंने हामी में अपनी गर्दन हिला दी। 

अगले दिन सुबह से ही मैंने अपने बेटे की सुहाग रात के लिये तैयारी शुरू कर दी। बाजार जाकर मैंने अपने हाथों पर मेंहदी लगवाई, और नई ब्रा पैण्टी खरीदीं। घर आकर अपनी बगल और झाँटों के बाल साफ़ किये, और शाम को विजय के लौटने से पहले मैं एक अच्छी सी साड़ी पहन कर तैयार हो गयी। 

शाम 6 बजे विजय और मैं विजय की नई टैक्सी में बैठकर जयपुर के लिये रवाना हो गये। गाड़ी ड्राईव करते हुए बीच बीच में विजय कनखियों से मुझे देखकर मुस्कुरा देता, और अपना एक हाथ मेरी जाँघों पर रख देता। हम दोनों किसी किशोर नवयुवक नवयुवती की तरह व्यवहार कर रहे थे। मिड-वे बहरोड़ पर जब एक रेस्टॉरेण्ट पर विजय ने गाड़ी रोकी तो गाड़ी से उतरने से पहले विजय ने मुझे अपनी बाँहों में भरकर मुझे जोरों से होंठों पर किस कर लिया, और मेरे मुँह में अपनी जीभ घुसा दी। हम दोनों की जीभ एक दूसरे की जीभ के साथ अठखेलियाँ करने लगी। 

विजय ने गाड़ी की हैडलाईट बंद कर दी, और अंदर की लाईट ऑन नहीं की, पार्किंग में कोई लाईट नहीं थी।मैंने विजय को अपनी बाँहों में भर लिया, और उसकी छाती पर अपने मम्मों को दबाने लगी, विजय मेरे चूतड़ों को अपने हाथों में भरकर मसल रहा था। मैं उसके लण्ड को अपनी चूत में लेने को बेताब थी। लेकिन उस मिड-वे की कार पार्किंग में ऐसा करना सुरक्षित नहीं था। विजय ने एक हाथ नीचे ले जाकर मेरे पेटीकोट के अंदर घुसा दिया, और पेटीकोट और साड़ी दोनों को ऊपर कर दिया। विजय ने मुझे कार की अगली सीट पर ही घोड़ी बनाकर मेरी पैण्टी को नीचे खींच कर उतार दिया, और मेरी गाँड़ की दोनों गोलाईयों को अपने हाथों से अलग करते हुए मेरी चूत और गाँड़ के छेदों को निहारने लगा। 

विजय ने जैसे ही मेरी चूत और गाँड़ के छेदों में उँगली घुसानी शुरू की, मैं किसी चुदासी कुतिया की तरह आवाजें निकालने लगी। विजय का अँगूठा मेरी ग़ाँड़ के छेद को सहला रहा था, तो उसकी उँगलियां मेरी चूत की फ़ाँकों के साथ खेल रही थीं। कुछ देर बाद उसकी पहली और बीच वाली उँगली मेरी पनिया रही चूत के अंदर घुसने लगी। अपने बेटे के इस तरह मेरी गाँड़ और चूत में उँगली घुसाने को मैं ज्यादा देर बर्दाश्त नहीं कर पायी, और वहीं कार पर्किंग में ही मैं एक बार जोरदार तरीके से झड़ गयी। समाज की वर्जनाओं को हम दोनों माँ बेटे कब की धता बता चुके थे, और अब हम दोनों के बीच शर्म लाज लिहाज का कोई बंधन नहीं था। जिस वासना और हवस के लावा को हम दोनों ने किसी तरह तब तक दबाया हुआ था, उसका ज्वालामुखी अब फ़ूट चुका था। 

''मम्मी, अब मुझसे नहीं रहा जाता,'' विजय मेरी चूत में उँगली घुसाते हुए,मेरे कानों के पास धीमे से बोला, उसकी आवाज काँप रही थी, ''मेरे लण्ड को अपनी चूत में घुसवा लो ना मम्मी।''

मैं विजय की हालत समझ सकती थी, लेकिन रात के अंधेरे में जब भी कोई कार आती तो उसकी हैडलाईट की रोशनी में कोई भी हमारी हरकतें देख सकता था, इसलिये मैंने विजय को समझाया, ''विजय बेटा, मन तो मेरा भी बहुत हो रहा हैं चुदने का, लेकिन इस तरह यहाँ पर किसी ने देख लिया तो अच्छा नहीं होगा, तुम जयपुर पहुँच के जी भर के चोद लेना, लेकिन अब जल्दी से टॉयलेट कर के यहाँ से चलते हैं।'' ऐसा बोलकर मैंने विजय के होंठों को किस कर लिया। 

किसी तरह विजय ने अपने को काबू में किया, और हम दोनों कार लॉक करने के के बाद पेशाब करने के लिये चल दिये। जिस तरह कुछ मिनट पहले विजय ने मुझे मेरी गाँड़ और चूत में उँगली घुसाकर मुझे झड़ने पर मजबूर किया था, उसके बाद मानो मेरी टाँगों में से जान ही निकल गयी थी, और मुझसे ठीक से चलना मुश्किल हो रहा था। हमने डिनर वहीं मिड-वे रेस्टोरेन्ट पर ही किया और फ़िर जयपुर की तरफ़ चल दिये।

जयपुर में हम पहले भी रह चुके थे इसलिये विजय को वहाँ के सभी होटल की अच्छी जानकारी थी। एक अच्छे से बजट होटल में हमने एक कमरा ले लिया। विजय गाड़ी को पार्क करने पार्किंग में चला गया, और जब तक वो चैक इन की फ़ॉर्मेलीटी को खत्म करता, मैं रूम में आकर बाथरूम में नहाने के लिये चली गयी। नहाते हुए अपनी चूत को विजय से चुदवाने कि उत्सुकता के विचारों से ही मेरा दिमाग घूम रहा था। विजय आज पहली बार किसी की चूत मारने वाला था, और वो भी अपनी मम्मी की, ये वाकई में हम दोनों के लिये एक बड़ा अवसर था। 

अपने बेटे का लण्ड मेरी चूत में घुसाने का विचार केवल इस वजह से मुझे इतना ज्यादा उत्तेजित नहीं कर रहा था कि ये सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ़ था बल्कि जिन परिस्थितियों में हम माँ बेटे के ये रिश्ते बने थे, वो मुझे ज्यादा उत्साहित और उत्तेजित कर रहे थे। अब हम सिर्फ़ माँ बेटे ना रहकर दो प्रेमी बन चुके थे। प्रेमी नाम का शब्द ही मुझे अंदर ही अंदर बेहद उत्तेजित कर रहा था। जब से हम दोनों माँ बेटे के शारीरिक सम्बंध बने थे, तब से हम दोनों की एक दूसरे के प्रति भावनायें, और अटूट बंधन और ज्यादा गहरा हो गया था। मेरे जीवन में अभी तक कोई रिश्ता इतना गहरा और सतुष्टीपूर्ण नहीं हुआ था, और ये सब अपने आप हुआ था। शायद इसी वजह से मैं थोड़ा नर्वस भी हो रही थी। 

नहाने के बाद मैंने अपने गदराये बदन पर बॉडी लोशन लगा लिया, जिसकी वजह से मेरी गोरी त्वचा और ज्यादा निखर उठी, और फ़िर नंगे बदन ही होटल रूम के बैड पर आकर बैठ गयी। मेरे अंदर उत्साह उत्तेजना और घबराहट सब एक साथ हो रही थी। पता नहीं क्यों मुझे थोड़ी टेन्शन भी हो रही थी, हाँलांकि ऐसा नहीं था कि मेरी चूत में पहली बार कोई लण्ड घुसने वाला हो, लेकिन ऐसा बहुत सालों बाद होने वाला था। विजय ने मेरे जीवन में कुछ नया, उत्साह, उत्तेजना और खुशी का संचार कर दिया था।
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