Incest Kahani उस प्यार की तलाश में
02-28-2019, 10:54 AM,
#1
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चेतावनी ...........दोस्तो ये कहानी समाज के नियमो के खिलाफ है क्योंकि हमारा समाज मा बेटे और भाई बहन और बाप बेटी के रिश्ते को सबसे पवित्र रिश्ता मानता है अतः जिन भाइयो को इन रिश्तो की कहानियाँ पढ़ने से अरुचि होती हो वह ये कहानी ना पढ़े क्योंकि ये कहानी एक पारवारिक सेक्स की कहानी है

उस प्यार की तलाश में


दोस्तो कहते है ना कि अगर प्यार का रंग जो एक बार किसी पर चढ़ गया तो फिर वो कभी उतारे नहीं उतरता....उस प्यार के रंग के सामने सारे रंग बिल्कुल फीके पड़ जाते है.....और इस प्यार में अगर हवस भी शामिल हो जाए तो फिर.......तब वो प्यार कुछ और ही रूप ले लेता है......फिर सारे रिश्ते नाते, मान मर्यादा ,मान सम्मान, सब कुछ एक पल में मिटाता चला जाता है......तो आइए चलते है उस प्यार की तलाश में जो रिश्तो के बीच शुरू हुआ और ख़तम वहाँ ......जहाँ पर इसकी सारी सीमाए ख़तम हो जाती है......तो आइए मेरे साथ साथ चलिए इस सुनहरे सफ़र पर......उस प्यार की तलाश में .........

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मैं अदिति एक बेहद खूबसूरत लड़की, रंग बिल्कुल दूध की तरफ गोरा और सॉफ.......चिकना बदन........उमर लगभग 20 साल......अभी जवानी मुझ पर पूरे शबाब पर है.......मेरे दिल में भी आज वही अरमान है जो बाकी लड़कियों के होते है इस उमर में......कौन होगा मेरे सपनों का राजकुमार......कैसा दिखता होगा......क्या वो मुझे प्यार करेगा.....कब मिलेगा मुझसे.......मैं उसे इस भीड़ में कैसे पहचानूँगी........कुछ तो ख़ास होगा उसमे.......क्या वो मेरे जज्बातो को समझेगा........क्या मैं उसे खुस रख पाउन्गि........आज भी ये सारे सवाल मुझे पल पल परेशान करते है.......मगर इस दिल में कहीं ना कहीं एक मीठी सी चुभन हमेशा से इस नन्हे से दिल को उस घड़ी के आने का इंतेज़ार करती रहती है.......कब मिलेगा मेरे इन सारे सवालों के जवाब......कब मेरा इंतेज़ार ख़तम होगा........

मैं अपने बिस्तेर पर लेटी हुई अपने हाथ में एक डायरी लेकर इस मीठे से एहसास को उस काग़ज़ के पन्नो पर उतार रही थी.....दिल में हज़ारों सपने लिए और मन में रंगीन ख्वाब लेकर मैं उस आने वाले हसीन पल को शब्दों का रूप दे रही थी......ये एहसास मेरे लिए बिल्कुल नया सा था......अभी तक मेरी ज़िंदगी में किसी लड़के की एंट्री नहीं हुई थी......दोस्ती के ऑफर तो मुझे बहुत आए मगर मैं आज भी उस प्यार को तलाश रही थी जो कभी मैं बचपन से लेकर अब तक अपने सपनों में देखती आ रही थी.....मुझे यकीन था कि मेरे सपनों का राजकुमार मुझे ज़रूर मिलेगा.....मगर कब मिलेगा इसकी ना तो कोई तारीख फिक्स थी और ना ही कोई जगह......

तभी मेरी मम्मी की आवाज़ मेरे कानों में गूँजी और मैं एक बार फिर से अपने सपनों की उस हसीन दुनिया से बाहर निकल गयी.......ये मम्मी का रोज़ का काम था....ख्वमोखवाह वो मेरे सपनों की दुश्मन बनती थी.......मगर कॉलेज भी तो जाना था मुझे.......इस लिए मैं इसी ज़्यादा और कुछ नहीं सोची और फटाफट अपनी डायरी छुपाकर अपने ड्रॉयर में रख दिया और फिर उठकर मैं फ्रेश होने बाथरूम में चल पड़ी......उधेर मम्मी रोज़ की तरह अपना रामायण मुझे सुना रही थी....रोज की उनकी बक बक....मगर वो कितना भी मुझ पर चिल्लाति मुझे उनकी बातों का कोई फ़र्क नहीं पड़ता.........

जैसे ही मैं अपने बाथरूम के दरवाज़े के पास पहुँची सामने से मुझे विशाल आता हुआ नज़र आया......वो मुझसे एक साल छोटा था.....उससे मेरी कभी नहीं बनती थी......वो हमेशा मुझसे लड़ा करता था.....मैं भी कहाँ उससे पीछे रहती.......वो शेर तो मैं सवा शेर.......मैं उसे देखकर तुरंत बाथरूम में घुस गयी.......विशाल का मूह देखने लायक था.....मुझे तो एक बार उसके चेहरे को देखकर उसपर बड़ी हँसी आई मगर मुझे और लेट नहीं होना था इस लिए मैं जल्दी से फ्रेश होने लगी......विशाल वही अपने सिर के बाल खीचते हुए मेरी मम्मी से मेरी शिकायत कर रहा था....मुझे उसकी बातें सॉफ सुनाई दे रही थी......अंदर ही अंदर मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था और मेरी हँसी नहीं रुक रही थी.......मुझे विशाल को चिडाने में बड़ा मज़ा आता था.....वो मेरा कुछ बिगाड़ तो नहीं सकता था मगर मुझसे गुस्सा बहुत होता था......और वैसे भी वो मुझसे गुस्सा होकर करता भी क्या.....

खैर मैं थोड़ी देर बाद बाथरूम से बाहर आई तो वो फ़ौरन बाथरूम में घुस गया.....शकल उसकी देखने लायक थी.......उसके चेहरे पर मेरे लिए गुस्सा अब भी था......मैं उसे चिड़ाते हुए बाहर आई और अपने कमरे में चल पड़ी..


थोड़ी देर बाद मैने एक नीले रंग का सूट पहना और नीचे वाइट कलर की लॅयागी......जो मेरे बदन से अब पूरी चिपकी हुई थी......उन कपड़ों में मेरी फिगर का अंदाज़ा कोई भी आसानी से लगा सकता था.......वैसे मुझे जीन्स पहनना थोड़ा ऑड लगता था......ज़्यादातर मैं सूट में ही रहती थी.......मैने अपने बाल सवरे जो इस वक़्त पूरे गीले थे नहाने की वजह से.......फिर आँखों पर हल्का सा काजल लगाया और माथे पर उसी रंग की मॅचिंग बिंदिया......थोड़ा मेकप और फाइनल टच देकर मैं अपने कमरे से बाहर निकली और जाकर सीधे ड्रॉयिंग रूम में डाइनिंग चेर पर बैठ गयी और नाश्ता आने का इंतेज़ार करने लगी.......

तभी मुझे विशाल बाथरूम से बाहर निकलता हुआ दिखाई दिया......अब भी उसका चेहरा गुस्से से लाल था.....वैसे वो मुझे गुस्से में ज़्यादा क्यूट लगता था......थोड़ी देर बाद वो भी वही डाइनिंग टेबल पर आया और मेरे सामने वाले चेर पर आकर बैठ गया......तभी कमरे में मम्मी आई उनकी हाथों में नाश्ते का ट्रे था.......मम्मी की उमर करीब 46 साल.......दिखने में काफ़ी हेल्ती और मोटी थी.........रंग उनका भी गोरा था मेरी तरह......वो भी जवानी के दिनों में बहुत खूबसूरत रही होंगी मगर अब पहले जैसे खूबसूरती उनके चेहरे पर दिखाई नहीं देती थी.......कुछ घर की ज़िम्मेदारी की वजह से और कुछ हमारी परवरिश के चलते उन्होने कभी अपने उपर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया.....मेरी मम्मी का नाम स्वेता था......

स्वेता- क्यों शहज़ादी .......अब तो तुम इतनी बड़ी हो गयी हो........कभी तुम्हारे अंदर ज़िम्मेदारी नाम की कोई चीज़ आएगी भी या नहीं........या सारी उमर ऐसे ही गुज़ारने का इरादा है.....अरे कुछ दिनों में तेरी शादी हो जाएगी क्या तू अपने ससुराल में भी ऐसे ही रहेगी.......तुझे ज़रा भी होश नहीं रहता कि घर पर काम भी होता है.......मैं अकेले थक जाती हूँ......तुझे मेरा हाथ बटाना चाहिए तो तू सुबेह तक सोती रहती है.........आख़िर ऐसा कब तक चलेगा........

अदिति- क्या मोम......आपका ये प्रवचन सुन सुन कर मैं तो तंग आ गयी हूँ.......जब देखो तब मेरी शादी के चक्कर में पड़ी रहती हो....अरे अच्छा ख़ासा आज़ाद हूँ और आप मुझसे मेरी आज़ादी छीनने पर तुली हुई हो.........और आपको क्या लगता है कि मैं अभी से घर की ज़िम्मेदारी अकेले निभा पाउन्गि........देखो मुझे अभी तो मेरी उमर कहाँ हुई है इन सब चीज़ों के लिए......
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02-28-2019, 10:54 AM,
#2
RE: Incest Kahani उस प्यार की तलाश में
स्वेता अदिति के कान जाकर पकड़ लेती है- कुछ तो शरम कर.......तेरी जैसी लड़कियाँ आज घर का पूरा काम अकेले करती है........थोड़ा उन सब से भी सीख लेती तो तेरे साथ साथ कुछ मेरा भी भला हो जाता.......वही मेरे सामने विशाल मुझे देखकर मज़े ले रहा था......जब भी मुझे डाँट पड़ती वो बहुत खुस होता.......तभी पापा कमरे में आते है......उनकी उमर लगभग 50 साल के आस पास.......आँखों पर चश्मा चढ़ाए हुए और हाथों में अख़बार लिए वो अपने चेर पर आकर बैठ जाते है.....उनका नाम मोहनलाल था.....

मोहन- अरे क्या हो रहा है ये सुबेह सुबेह.......क्या करती हो स्वेता तुम....बेचारी इतनी अच्छी तो मेरी लाडली बेटी है और तुम इससे ऐसे पेश आती हो........

स्वेता- हां और चढ़ाओ इसे अपने सिर पर......पहले ही क्या कम लाड प्यार दिया है इसे आपने.......घर का काम करने के बजाए सुबेह तक ये सोती रहती है.....शाम को पढ़ने का बहाना बनाती है........आख़िर कब तक चलेगा ये सब.....अभी से ये घर का काम नहीं सीखेगी तो आगे इसका क्या होगा.......

मोहन- सीख जाएगी.......अभी तो इसकी उमर कहाँ हुई है.......अदिति अपने पापा की बातों को सुनकर मुस्कुरा देती है......

स्वेता- आपने तो और इसे सिर पर चढ़ा रखा है.......आप तो ऐसे बोल रहें है जैसे ये कोई दूध पीती बच्ची है......और स्वेता फिर किचेन में चली जाती है......उधेर विशाल के चेहरे पर हँसी थी......मगर मैं भला उसे कैसे खुश होता हुआ देख सकती थी......उसका और मेरा तो 36 का आकड़ा था.....

अदिति- पापा पता है कल विशाल कॉलेज बंक मार कर अपने दोस्तों के साथ मूवी गया था........वो तो मेरी सहेली है उसने इसको जाते हुए देखा और सुना......आज कल इसका पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लगता है.....दिन भर ये अपने दोस्तों के साथ इधेर उधेर घूमता रहता है......

मोहन गुस्से से एक बार विशाल की ओर देखता है विशाल के चहेरी पर हँसी गायब थी अब उसके चहेरी पर परेशानी और डर झलक रहा था......वो खा जाने वाली नज़रो से अदिति को घूर रहा था.......

मोहन- दिस ईज़ नोट फेर विशाल......कह देता हूँ अगर इस साल तुम्हारा रिज़ल्ट खराब आया तो मुझसे बुरा और कोई नहीं होगा.......बी कॉन्सेंटेर्ट इन युवर स्टडीस......दिस ईज़ माइ लास्ट वॉर्निंग......नेक्स्ट टाइम नो एक्सक्यूसस......अंडरस्टॅंड!!!!

विशाल बेचारा क्या करता वो चुप चाप अपना सिर नीचे झुका लेता है और अपने पापा की डाँट सुनता रहता है......ये रोज़ का काम था अदिति अक्सर विशाल की ऐसी ही टाँगें खीचा करती थी......और विशाल चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता था......करीब 1/2 घंटे बाद दोनो तैयार होकर बस स्टॉप पर जाते है और बस के आने का इंतेज़ार करते है.....

विशाल और अदिति दोनो एक ही कॉलेज में पढ़ते थे......जहाँ अदिति बी.कॉम कर रही थी वही विशाल बी.एससी कर रहा था........दोनो एक ही बस से कॉलेज जाते थे.......आज एक तरफ अदिति खड़ी थी वही दूसरे कोने पर विशाल चुप चाप अपना सिर नीचे झुकाए खड़ा था.......वो अब अदिति से बहुत नाराज़ था........होता भी क्यों ना......उसने जान बूझ कर विशाल को डाँट सुनवाया था.....

अदिति- आइ अम सॉरी विशाल.......अब तो तू मुस्कुरा दे........

विशाल एक नज़र अदिति के तरफ देखता है फिर वो अपना मूह दूसरी तरफ फेर लेता है- मुझे तुझसे कोई बात नहीं करनी.....

अदिति तुरंत अपने बॅग से एक कॅड्बेरी निकाल कर उसके हाथों में दे देती है- मैने जो किया तेरे भले के लिए किया......चल अब पहले की तरह मुस्कुरा दे......वैसे एक बात बोलूं तू गुस्से में और भी ज़्यादा अच्छा लगता है......अब ऐसे क्या देख रहा है चुप चाप टॉफी खा ले नहीं तो वो भी मैं तुझसे छीन लूँगी.......

विशाल चाह कर भी कुछ नहीं बोल पाता और अगले ही पल उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर जाती है......अदिति रोज़ इस तरह से विशाल को पहले डाँट सुनवाती फिर बाद में मनाती......मगर विशाल भी अदिति से बहुत प्यार करता था....उसे भी अदिति के ये सब नखरें पसंद थे.......भले ही वो उसपर गुस्सा क्यों ना होता हो मगर उसका गुस्सा अदिति पल भर में गायब कर देती थी........तभी थोड़ी देर बाद बस आ जाती है.....

रोज़ की तरह आज भी बस भीड़ से पूरी खचाखच भरी थी.......विशाल तो जैसे तैसे उस बस में चढ़ जाता है मगर अदिति जैसे ही अपना एक पाँव बस में रखती है तभी बस चल पड़ती है.......बस के अचानक चलने से अदिति का हाथ फिसल जाता है और वो तुरंत पीछे की ओर गिरने लगती है तभी एक मज़बूत हाथ उसकी बाहें थाम लेता है.......वो मज़बूत बाहें और किसी की नहीं बल्कि विशाल की थी......वो अदिति को अंदर की तरफ खीचता है और अगले ही पल अदिति बस के अंदर होती है......इस वक़्त दोनो के चेहरों पर एक प्यारी सी मुस्कान थी.......तभी विशाल आगे बढ़कर आगे की तरफ चला जाता है अपने दोस्तों के पास.....और अदिति वही खड़ी रहती है तभी उसके कंधे पर किसी का हाथ उसे महसूस होता है.......वो हाथ उसकी बेस्ट फ्रेंड पूजा का था......वो भी उसकी क्लास मेट थी........
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02-28-2019, 10:54 AM,
#3
RE: Incest Kahani उस प्यार की तलाश में
पूजा दिखने में गोरी और सुंदर थी मगर अदिति के सामने वो बिल्कुल फीकी दिखती थी.......हाइट में पूजा थोड़ी उँची थी अदिति से और उसका जिस्म भी भरा था......वो भी दिखने में काफ़ी अट्रॅक्टिव थी......

पूजा- क्यों बस में सही से चढ़ नहीं पाती क्या.....आज तेरे भाई ने अगर सही समय पर तेरा हाथ नहीं पकड़ा होता तो तू तो गयी थी आज उपर.....काश मैं तेरी जगह होती तो मैं विशाल के सीने से लग जाती और उससे वही लिपट जाती........ये सब मेरे साथ क्यों नहीं होता यार.....

अदिति- प्लीज़ स्टॉप इट पूजा....तुझे बक बक के सिवा और कुछ नहीं सूझता क्या......जब देखो तब तू हमेशा लड़कों के बारे में मुझसे बातें किया करती है..........

पूजा- लड़कों के बारे में तुझसे बात ना करूँ तो क्या अपने बारे में बात करूँ........बात तो तू ऐसे कर रही है जैसे तुझे लड़कों में कोई इंटरेस्ट ही नहीं है........

अदिति- मैं तेरी तरह फालतू नहीं हूँ....जब देखो तब इन्ही सब में लगी रहती है

मैं पूजा की बातों को सुनकर कुछ पल तक यू ही खामोश रही......मैं अच्छे से जानती थी कि मैं बहस में उससे कभी जीत नहीं सकती.....मगर आज पहली बार मैं अपने भाई के लिए सोचने पर मज़बूर हो गयी थी......बार बार मेरे जेहन में बस विशाल का हाथ पकड़ना मुझे याद आ रहा था.......इससे पहले भी वो मेरे हाथ ना जाने कितनी बार पकड़ चुका था मगर मैने इस बारे में कभी ज़्यादा गौर नहीं किया था......मगर आज ऐसा क्या हुआ था मुझे जो ये सब मैं सोच रही थी......शायद ये पूजा की बातों का मुझपर असर था........

आज मुझे भी ऐसा लग रहा था कि विशाल अब पूरा जवान हो चुका है......उसका जिस्म भी अब पत्थर की तरह मज़बूत और ठोस बन चुका है.......यही तो हर लड़की की तमन्ना होती है कि उसे कोई मर्द अपनी मज़बूत बाहों में जकड़े और उसके बदन की कोमलता को अपने मज़बूत हाथों में पल पल महसूस करता रहें......शायद आज मेरे अंदर भी ऐसा ही कुछ तूफान अब धीरे धीरे जनम ले रहा था.......मैं भी अब किसी मर्द की बाहों में अपने आप को महसूस करना चाहती थी.....अपना ये जवान जिस्म किसी को सौपना चाहती थी......टूटना चाहती थी किसी की बाहों में.........

ये सब सोचकर मेरे चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गयी जो पूजा की नज़रो से ना बच सकी......वो मेरे चहेरी को बड़े गौर से देख रही थी जैसे वो मुझसे इस मुस्कुराहट की वजह पूछ रही हो........ये सब सोचकर मेरा चेहरा अब शरम से लाल पड़ चुका था.......

पूजा- क्या बात है जान तेरे चेहरे पर ऐसी मुस्कुराहट क्यों????? क्या मैं इस मुस्कुराहट की वजह जान सकती हूँ.....

अदिति- कुछ नहीं पूजा.......बस यू ही.......

पूजा मेरे चेहरे पर अपने दोनो हाथ रख देती है और मुझे अपनी तरफ देखने का इशारा करती है.......मेरा चेहरा शरम से और भी लाल पड़ चुका था.....एक नज़र मैने उसकी आँखों में देखा फिर मेरी नज़रें खुद ब खुद नीचे झुक गयी........वो भी बस मुझसे कुछ और ना पूछ सकी और मेरे चेहरे को ऐसे ही देखती रही.....शायद वो मेरे चहेरी से मेरे दिल का हाल जानने की कोशिश कर रही हो.......

तभी मेरे पीछे खड़ा एक लड़का बार बार मुझे धक्के दे रहा था......वो इस वक़्त मेरे ठीक पीछे खड़ा था......शकल से वो काला सा था और काफ़ी मोटा भी.......वो बार बार अपना पेंट अड्जस्ट कर रहा था......इस वक़्त उसका लंड मेरी गान्ड से पूरी तरह चिपका हुआ था......भीड़ इतनी ज़्यादा थी बस में कि आगे जाना भी मुमकिन ना था......वो इसी बात का फ़ायदा उठा रहा था.......मेरे साथ अक्सर ये सब होता आया था मैं जानती थी कि ऐसे सिचुयेशन में मुझे क्या करना है......

मैने अपनी नज़रें उसकी तरफ की तो वो मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था......जैसे मुझसे पूछ रहा हो कि क्या तुम्हें भी मज़ा आ रहा है......मैने उससे कुछ कहा तो नहीं बस एक नज़र उसे घूर कर देखती रही फिर अपने एक हाथ मैं अपने बालों पर ले गयी और वहाँ मैने अपना हेरपिन धीरे से निकाला और फिर अपने हाथ को धीरे धीरे सरकाते हुए नीचे की ओर ले जाने लगी.....अगली बार जब फिर बस अगले स्टॉप पर रुकी तो एक बार फिर से उसने मुझे ज़ोर का धक्का दिया ......मैं तो उस भीड़ में पिस रही थी और वो शख्स इस भीड़ का पूरा पूरा फ़ायदा उठा रहा था.......मैने भी सही मौके का इंतेज़ार किया और जैसे ही बस चली वो जान बूझकर फिर से मुझे धक्के देने के लिए जैसे ही उसने अपनी कमर आगे की तरफ पुश की मैने अपने हाथ में रखा हेरपिन उसके हथियार पर दे मारा.....

मैं फिर तुरंत पलट कर उसके चहेरी की तरफ देखने लगी......उसके चेहरे पर अभी भी मुस्कान थी मगर उस मुस्कुराहट के पीछे अब उसके चेहरे पर दर्द की एक लकीर सॉफ झलक रही थी......भले ही उसने अपने मूह से कोई आवाज़ ना निकाली हो मगर उसकी आँखें उस दर्द को सॉफ बयान कर रही थी.......इसका असर भी मुझे देखने को तुरंत मिला.......वो वहाँ से सरकते हुए आगे की ओर बढ़ गया.......उसके इस हरकत पर अब मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी थी........तभी थोड़े देर में कॉलेज आ गया और एक एक कर सारे स्टूडेंट्स बाहर आते गये.......पूजा ने भी सब देख लिया था वो मुझे देखकर बस मुस्कुरा रही थी......जवाब में मैं भी उसे देखकर मुस्कुरा पड़ी......

पूजा- क्या बात है अदिति आज तेरे चेहरे पर मुस्कान हट नहीं रही......कोई मिल गया क्या तुझे.......कहीं तेरे सपनों का राजकुमार तो नहीं मिल गया.....

अदिति- अपनी बक बक बंद कर......कभी तो कोई और बात किया कर मुझसे........और जब मेरे सपनों का राजकुमार मुझे मिलेगा तो तुझे सबसे पहली खबर करूँगी.......जवाब में पूजा मुझे देखकर मुस्कुराती रही.......

थोड़ी देर बाद लेक्चर शुरू हो गया और उधेर विशाल अपने क्लास की ओर चल पड़ा......सुबेह तो पढ़ाई में थोड़ी इंटरेस्ट जागती थी मगर जैसे जैसे वक़्त गुज़रता था टाइम तो ऐसा लगता था मानो थम सा गया हो........दोपहर में लंच के दौरान हम सब वही गार्डेन में जाकर बैठते और इधेर उधेर की बातें किया करते.......आज मेरी कई सारी फ्रेंड्स नहीं आई थी जिससे मुझे और भी बोरियत सी महसूस हो रही थी......मगर पूजा थी ना मुझे पकाने के लिए.......

पूजा- तूने मुझे बताया नहीं अदिति कि तू अपने भाई से कब मुझे मिलवा रही है........कसम से जान क्या आइटम लगता है तेरा भाई......हाई मैं मर जावां.......जैसे तू एक पीस है वैसे ही तेरा भाई......अगर मैं तेरी जगह पर होती तो मैं तो अपने भाई से कब का चुद चुकी होती....चाहे जमाना मुझे कुछ भी कहता.....और सबसे अच्छी बात तो घर की बात घर में रह जाती.......इसमें बदनामी का भी ख़तरा कम रहता.....मगर अफ़सोस कि मेरा कोई भाई नहीं है........और एक तू है घर में इतना मस्त माल है और तू बेकार में अपने सपनो के राजकुमार के बारे में सोची फिरती है........ये तो वही बात हुई कि हिरण (डियर) को कस्तूरी की तलाश रहती है और उसे खुद नहीं मालूम कि जिसकी उसे तलाश है वो तो उसके पास ही है.....

अदिति- ओह गॉड!!!! इट्स टू मच पूजा.......पता नहीं तू कब सुधेरेगी.........जब देखो तब ये सब बातें......अगर तुझे विशाल इतना ही पसंद है तो क्यों नहीं जाकर उससे बोल देती......वैसे मेरा भाई बहुत शरीफ इंसान है.......वो तेरे जैसी लड़की के चक्कर में कभी नहीं आएगा......और तू ये बेफ़िजूल की बातें हमेशा मुझसे करती रहती है.....भला कौन भाई अपनी बेहन पर ऐसी नज़र डालेगा......ये सब किताबी बातें है.......तू हमेशा ऐसी उल्टी सीधी कहानियाँ पढ़ती है इस लिए तेरे दिमाग़ में ये सारी बातें आती रहती है......मुझे देख ले क्या मैने कभी अपने भाई के बारे में ये सब सोचा......

पूजा- लगता है कि तुझे मुझसे जलन हो रही है......कहीं तुझे डर है कि मैं तेरे भाई को तुझसे चुरा ना लूँ......अगर यही बात है तो फिर मैं तेरे रास्ते से हट जाती हूँ......सहेली हूँ मैं तेरी तेरे खातिर इतना तो कर ही सकती हूँ....और क्या मैं तुझे फालतू लगती हूँ.....यही कहना चाहती है ना तू.......ठीक है तो आज से तेरी मेरी दोस्ती ख़तम.......

अदिति- ओह गॉड!!!! हमेशा उल्टी सीधी बातें किया करती है......मैं अब तुझे कभी इस बारे में कुछ नहीं कहूँगी......अब तो चुप हो जा मेरी माँ......आइ अम सॉरी जो मुझसे ग़लती हो गयी.....कान पकड़ती हूँ मैं......अब तो चुप हो जा......जवाब में पूजा अदिति को देख कर धीरे से मुस्कुरा देती है......ऐसे ही समय गुज़रता जाता है और पूजा रोज़ नये नये किस्से अदिति को सुनाती थी ख़ास कर इन्सेस्ट रिलेशन्स के बारे में.......पहले तो अदिति ये सब सुनना भी पसंद नहीं करती थी मगर बाद में उसने ये सोचा कि सुनने में क्या बुराई है.......ये सोचकर वो पूजा से रोज़ नये नये किस्से सुना करती थी......इस दौरान वो कई बार बहुत गरम भी हो जाती थी जिसके वजह से उसे घर जाकर सबसे पहले अपने आप को ठंडा करना पड़ता था.......
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02-28-2019, 10:54 AM,
#4
RE: Incest Kahani उस प्यार की तलाश में
वक़्त बदल रहा था.......मगर अदिति ने कभी अपने भाई को उस नज़र से देखा भी नहीं.......कई बार उसके दिमाग़ में ये सारे ख्याल आते तो वो फ़ौरन अपना माइंड दूसरी तरफ डाइवर्ट कर देती...... समय के साथ साथ अब अदिति धीरे धीरे सेक्स के तरफ झुक रही थी........वजह ये थी कि उसकी अधिकांश सहेलियाँ यही टॉपिक के बारे में उससे बात किया करती थी.......कहीं ना कहीं अब अदिति के मन में भी सेक्स की इच्छा अब धीरे धीरे जनम ले रही थी.......देखा ये था कि आने वाले समय में अदिति इस तपिश को अपने अंदर संभाल पाती है या फिर वो भी इस सेक्स की आँधी में अपने आप को बहा ले जाती है.

मैं अपने कमरे में अपने बिस्तेर पर लेटी हुई आज भी अपनी डायरी में वो बीते हसीन लम्हें लिख रही थी......हालाँकि ऐसा मेरा साथ अभी तक कुछ हुआ नहीं था फिर भी दिल में एक मीठी सी चुभन हमेशा रहती थी........कल ही मेरे पीरियड्स ख़तम हुए है और अब मैं राहत सी महसूस कर रही थी........मगर आज मेरे पास लिखने को ज़्यादा कुछ नहीं था इस लिए मैने अपनी डायरी बंद कर दी और अपने सपनों का राजकुमार के बारे में सोचने लगी........मगर मम्मी थी ना मेरी सपनों की दुश्मन.......उनके रहते तो मेरे सपनों का राजकुमार मेरे घर के चौखट पर भी अपने कदम नहीं रख सकता था तो भला वो मेरे सपनों में क्या खाक आता.......

स्वेता- एरी वो शहज़ादी......अब तो उठ जा......आज तुझे कॉलेज नहीं जाना क्या........ये लड़की का कुछ नहीं हो सकता......पता नहीं इसका आगे क्या होगा.....

अदिति- क्या माँ हमेशा एक ही बात........मैं ये सब सुनकर पक गयी हूँ......

स्वेता- अगर तुझे मेरी बात इतनी ही बुरी लगती है तो फिर अपनी ये आदत क्यों नहीं बदल देती.....नहीं तो फिर सुनती रह बेशरमों की तरह......मुझे मम्मी की बातों पर हँसी आ गयी और मैं मम्मी के पास आई और उनके गले में अपनी बाहें डाल दी........मम्मी मेरी इस अदा पर मुस्कुराए बिना ना रह सकी......

अदिति- आख़िर मैने ऐसा कौन सा काम कर दिया जो मैं आपकी नज़र में बेशरम बन गयी हूँ.......अभी तो आपने मेरी शराफ़त देखी है......जिस दिन मैं बेशरामी पर उतर आऊँगी उस दिन आपको भी मुझसे शरम आ जाएगी......

स्वेता फिर से अदिति का कान पकड़ लेती है- ओये चुप कर......देख रही हूँ आज कल तू बहुत बढ़ चढ़ कर बातें कर रही है.......लगता है अब तेरे हाथ जल्दी से पीले करने पड़ेंगे........तेरी ये बेशर्मी की लगाम अब तेरे होने वाले पति के हाथों में जल्दी से थमानी पड़ेगी.......

मैं मम्मी को एक नज़र घूर कर देखी फिर मैं बिना कुछ कहे अपने बाथरूम में घुस गयी......आज मैं मम्मी से इस बारे में कोई बहस नहीं करना चाहती थी........थोड़ी देर बाद मैं फ्रेश होकर बाहर निकली तो हमेशा की तरह विशाल बाहर मेरे आने का इंतेज़ार कर रहा था.......आज भी उसके चेहरे पर गुस्सा था......और गुस्सा होता भी क्यों ना....मेरी वजह से उस बेचारे को घंटों इंतेज़ार करना पड़ता था.......

फिर हम रोज़ की तरह कॉलेज निकल गये.......फिर से वही बोरियत वाली लेक्चर्स......जैसे तैसे वक़्त गुज़ारा और दोपहर हुई........मैं आज भी पार्क में बैठी हुई थी और पूजा रोज़ की तरह मुझे आज भी पका रही थी.......
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02-28-2019, 10:55 AM,
#5
RE: Incest Kahani उस प्यार की तलाश में
पूजा अपने बॅग से कुछ निकाल कर मुझे थमा दी.....उसके हाथ में एक बड़ा सा पॅकेट था.......और उसके उपर एक ब्लॅक कलर की प्लास्टिक कवर चढ़ा हुआ था........मुझे तो कुछ ज़्यादा समझ में नहीं आया मगर उसके ज़्यादा ज़ोर देने पर मैं वो पॅकेट चुप चाप अपने बॅग में रख ली......

पूजा- जानती है अदिति ये जो मैने तुझे अभी अभी दिया है ये मैं तेरे लिए ही ख़ास तौर पर लाई हूँ.......आज घर पर जाना और आराम से इस पॅकेट को रात में खोलना........ये तेरे लिए बहुत ख़ास है.......मैं पूजा को सवाल भरी नज़रो से देखती रही मगर मेरे लाख पूछने पर भी उसने मुझे कुछ नहीं बताया......आख़िर ऐसी क्या ख़ास चीज़ थी उस पॅकेट में.......मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था.......पता नहीं ऐसा कौन सा ख़ास चीज़ है जो पूजा मेरे लिए ही लाई है.........

थोड़ी देर बाद फिर से लेक्चर्स शुरू हो गये......मेरा पढ़ाई में बिल्कुल मन नहीं लग रहा था.......बार बार मेरा ध्यान उस पॅकेट पर जा रहा था......दिल में बार बार यही इच्छा हो रही थी कि मैं अभी उस पॅकेट को खोल लूँ और तसल्ली से देखूं मगर पूरे क्लास में ये मुमकिन नहीं था.....और अगर किसी की नज़र मुझपर चली गयी तो ख्वमोखवाह बात बिगड़ जाती.......जैसे तैसे वक़्त गुज़र रहा था......उस वक़्त मुझे ऐसा लग रहा था मानो वक़्त रुक सा गया हो.........

जैसे ही क्लास ओवर हुई मैं फ़ौरन अपने घर के लिए निकल पड़ी.......मुझे जल्दी में जाता हुआ देखकर पूजा मुस्कुराए बिना ना रह सकी......मैने भी उसकी ज़्यादा परवाह नहीं की और पूरे रास्ते भर मेरे दिल और दिमाग़ में सवालों का ये सिलसिला चलता रहा.....मैं जब घर पहुँची तो मैं फ्रेश हुई और जाकर अपने कपड़े चेंज किए......मैं उस पॅकेट को अपने बॅग से निकाल कर अपनी अलमारी में सेफ रख दिया......

जैसे तैसे शाम हुई और फिर रात......आज वक़्त पता नहीं क्यों कुछ थम सा गया था.......मैं जल्दी से खाना खाकर अपने रूम में आ गयी........डॅड ने मेरे पिछले बर्तडे पर मुझे प्रेज़ेंट के रूप में एक लॅपटॉप गिफ्ट किया था......और मेरे भाई का भी एक कंप्यूटर था वो उसके कमरे में था......उसके पास डेस्कटॉप था........मैने अपना रूम झट से अंदर से लॉक किया और मैं बहुत बेचैनी से अपनी अलमारी की तरफ बढ़ी और अपनी अलमारी से वो पॅकेट बाहर निकाला.......उस वक़्त मेरा दिल बहुत ज़ोरों से धड़क रहा था........पता नहीं पूजा ने मुझे ऐसी क्या चीज़ दी थी इस सवाल का जवाब पाने के लिए मैं बहुत बेचैन थी........ये जानना मेरे लिए अब और भी अहम हो गया था.........

मैने फ़ौरन वो पॅकेट निकाला और जब मेरी निगाह अंदर रखे उस चीज़ पर पड़ी तो मेरा गला घबराहट से सूखने लगा......उस पॅकेट में दो तीन बुक्स थी......उन बुक्स के पोस्टर्स पर नंगी लड़कियों की तस्वीरें थी जिसे देखकर मेरे होश उड़ गये थे......ऐसा पहली बार था जब मैं ऐसी चीज़ देख रही थी........अंदर दो डीवीडी भी मुझे दिखाई दी.......वो दोनो डीवीडी बाहर से पूरी ब्लॅंक दिख रही थी.......मुझे इस बात का अंदाज़ा तो हो गया था कि वो ज़रूर ब्लू फिल्म की डीवीडी होगी........मेरे चेहरे पर इस वक़्त पसीने की बूँदें सॉफ झलक रही थी........मैं अपनी सांसो को अपने वश में करने की पूरी कोशिश कर रही थी पर पता नहीं क्यों ना ही मेरी साँसें मेरे बस में हो रही थी और ना ही मेरे दिल की धड़कनें कम हो रहा थी.....

मैं फिर उन किताबों को एक एक कर देखने लगी......वो सेक्स की किताबें थी.....और जगह जगह उसमे कुछ नंगी लड़कियों की तस्वीरें भी थी.......जैसे जैसे मैं उसके पान्ने पलट रही थी मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन तस्वीरों में नँगता बढ़ती जा रही है.......पहले उन तस्वीरों में लड़कियाँ बिन ब्रा की खड़ी थी......फिर बाद में उन लड़कियों के जिस्म पर कपड़े का एक रेशा भी ना था.......कुछ पन्ने पलटने के बाद जब मेरी नज़र एक मर्द के तस्वीर पर पड़ी तो मुझे एक पल तो ऐसा लगा मानो मेरा कलेजा बाहर को आ गया......मैने पहले तो अपनी आँखें तुरंत बंद कर ली........

शरम से मेरा चेहरा पूरा लाल पड़ चुका था........मेरी साँसें मेरे बस में नहीं थी......कुछ देर तक मैं अपनी आँखें बंद कर ऐसे ही खामोश बैठी रही.....फिर थोड़ी हिम्मत जुटाकर अगले ही पल मैने धीरे धीरे अपनी आँखे खोली और उन तस्वीर की तरफ एक टक देखने लगी.......उस तस्वीर में एक मर्द पूरी नंगी हालत में खड़ा था......ऐसा पहली बार था जब मैं किसी मर्द को इस हाल में देख रही थी.....मेरी नज़र बार बार उसके मर्दाने जिस्म को घूर रही थी........कुछ सोचकर एक बार फिर से मेरा चेहरा शरम से लाल पड़ चुका था.
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02-28-2019, 10:55 AM,
#6
RE: Incest Kahani उस प्यार की तलाश में
इस वक़्त मेरा बहुत बुरा हाल था......मेरा पूरा जिस्म पसीने से बुरी तरह भीग चुका था.......कुछ देर तक मैं उन किताबों की हर एक तस्वीरों को बड़े गौर से देखती रही......आगे की जो तस्वीरें थी उन्हे देखने की मुझे बिल्कुल हिम्मत नहीं हुई और मैने फ़ौरन उन किताबों को बंद कर दिया.......इस वक़्त मेरा दिल बहुत ज़ोरों से धड़क रहा था.....तभी मेरी नज़र वहाँ मौजूद डीवीडी पर गयी......मैने फ़ौरन उसे अपने हाथों में लिया और अपने लॅपटॉप ऑन करके उसमे प्ले कर दिया......

जैसे मुझे अंदाज़ा था बिल्कुल वैसा ही हुआ.......वो ब्लू फिल्म की डीवीडी थी.......जैसे जैसे वक़्त बीत रहा था मेरा गला घबराहट से सुख़्ता जा रहा था......दिल में एक अजीब सी बेचैनी बार बार उठ रही थी......जैसे ही मूवी प्ले हुई मेरी नज़र सबसे पहले सीन पर गयी तो मैं मानो उछल सी पड़ी......वो ब्लू फिल्म ही थी कोई हॉलीवुड की......स्टार्टिंग से ही उसमे सब बिन कपड़ों के थे......और फिर शुरू हुआ वो खेल जो मैने कभी आज तक सपनों में भी नहीं सोचा था.....मेरा एक हाथ खुद ब खुद मेरे सीने पर चला गया था और दूसरा हाथ मेरी चूत के दरमियाँ था........मैं आँखें फाडे एक टक अपने कंप्यूटर की स्क्रीन को देखती रही.......जैसे जैसे सीन आगे बढ़ रहा था मेरी बेचैनी और बेताबी बढ़ती जा रही थी.......

मैने फ़ौरन अपना सूट निकाल दिया और फिर कुछ देर बाद मैने अपनी लॅयागी भी उतार कर बिस्तेर पर अपनी ब्रा और पैंटी में आ गयी.......इस वक़्त भी मेरे दोनो हाथ मेरे गुप्तांगों से खेल रहें थे......मेरी पैंटी इस वक़्त लगभग पूरी तरह से भीग चुकी थी.......मगर इस वक़्त मुझे कोई होश ना था.......अब भी मैं उसमे पूरी तरह से खोई हुई थी.....मैं अब पूरी तरह से गरम हो चुकी थी......मेरा बदन किसी आग के समान तप रहा था......आँखें पूरी तरह से सुर्ख लाल हो चुकी थी.........मैं खुद मदहोशी के आलम में पूरी तरह से डूब चुकी थी.......मेरी उस वक़्त ऐसी हालत थी कि अगर मेरे सामने कोई भी मर्द आ जाता तो मैं बिना देर किए अपनी जवानी उसे सौंप देती.....चाहे वो मर्द मेरा भाई या पिता ही क्यों ना हो.......

जैसे जैसे सीन आगे बढ़ रहा था वैसे वैसे मेरी हालत और भी खराब होती जा रही थी......अब मैने अपने जिस्म से अपनी ब्रा और पैंटी भी निकाल फेंकी......और अपने सीने को अपने दोनो हाथों में कसकर भीचने लगी......मेरे दोनो निपल्स तंन कर पूरी तरह से खड़े हो चुके थे........गोरे जिस्म पर गुलाबी निपल्स मेरी सुंदरता को और भी चार चाँद लगा रहें थे......... इस वक़्त मेरे दोनो निपल्स बहुत हार्ड हो चुके थे.......ऐसा लग रहा था जैसे मेरी जवानी की चन्द बूँदें उसमे से बाहर फुट पड़ेंगी......अब धीरे धीरे मेरे मूह से हल्की हल्की सिसकियाँ भी निकल रही थी जो उस कमरे को और भी रंगीन बनती जा रही थी..........

फिर मैने अपना एक हाथ अपनी चूत पर ले गयी और वहाँ भी अपने हाथों से अपनी कुँवारी चूत के क्लीस्टोरील्स को धीरे धीरे सहलाने लगी.......मुझे इस वक़्त कोई होश ना था.......ऐसा पहली बार था जब मैं अपने कमरे में इस हालत में पड़ी थी......उस वक़्त मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैने अपने अंदर कोई बहुत बड़ा तूफान समेटकर रखा हुआ हो.....और अब वो तूफान फुट कर बाहर आने को बेताब था........मेरी हाथों की स्पीड अब धीरे धीरे बहुत बढ़ चुकी थी.......मेरा कामरस मेरी चूत से इस कदर बाहर की ओर बह रहा था कि मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरा पूरा बिस्तेर गीला हो जाएगा........मगर मुझे उस वक़्त अपने बिस्तेर से ज़्यादा अपने छुपे हुए उस आग को बुझाने की फिकर थी........

करीब 5 मिनिट के अंदर ही मुझे ऐसा लगा कि अब मेरा जिस्म अकड़ने लगा है......मेरे अंदर का तूफान अब बाहर निकलने वाला है.......और आख़िरकार मेरे सब्र टूट गया और मैं वही ज़ोरों से सिसकती हुई अपने बिस्तेर पर किसी लाश की तरह बिल्कुल ठंडी पड़ गयी......लॅपटॉप की स्क्रीन पर अभी भी वीडियो चल रहा था मगर मेरा ध्यान अब उसपर बिल्कुल नहीं था......मैं उस वक़्त एक अलग ही दुनिया में अपने आप को महसूस कर रही थी.......मेरे अंदर का तूफान अब बाहर आ चुका था.......मैं वही हाँफ रही थी और अपनी आँखे बंद किए हुए उस चरम सुख को एहसास कर रही थी.......आज पहली बार मैं उस सुख को इतने करीब से महसूस की थी........

मुझे तो एक पल के लिए ऐसा लगा कि इससे बढ़कर दुनिया में और कोई सुख नहीं.......काफ़ी देर तक मैं वही बिस्तेर पर उसी हाल में पड़ी रही......मुझे ऐसा लग रहा था मानो मेरा जिस्म अब बहुत हल्का हो गया हो........जो सैलाब मेरे अंदर था वो अब बाहर निकल चुका था......फिर मैने थोड़ी हिम्मत जुटाकर अपना लॅपटॉप को बंद किया और फिर अपने कपड़े पहन कर फ़ौरन बाथरूम में घुस गयी.......मैं इस वक़्त पसीने से बुरी तरह भीग चुकी थी.......मैने फिर तुरंत बाथ लिया और फिर दूसरे कपड़े पहनकर अपने रूम में आ गयी......बिस्तेर पूरा अस्त व्यस्त था.....मैने अपना लॅपटॉप अलमारी में रख दिया और उन सारी किताबों को भी वही सेफ रख दिया.....और अपने बिस्तेर पर आकर लेट गयी......

मेरे आँखों में नींद कोसों दूर थी.......अभी भी मेरे आँखों के सामने वही सब घूम रहा था.......आज ज़िंदगी में मैं पहली बार आदमी और औरत के बीच सेक्स को देखी थी......हालाँकि ये तो सिर्फ़ मूवी थी मगर ये मेरे लिए बहुत बड़ी चीज़ थी......मैं बहुत देर तक इन्ही सब ख्यालों में खोई रही और कब मेरी आँख लग गयी मुझे बिल्कुल पता भी नहीं चला......मगर एक बात तो थी कि मैं उस रात बहुत मज़े से सोई थी......ऐसी गहरी नींद मुझे इसी पहले कभी नहीं आई थी.

सुबेह जब मेरी आँख खुली तो मैं सबसे पहले बाथरूम में गयी.......आज पहली बार मम्मी के जगाने से पहले मेरी नींद खुली थी........जब मैं फ्रेश होकर बाहर आई तो मम्मी किचन में नाश्ता तैयार कर रही थी......विशाल वही बाहर बैठा हुआ था......मगर आज उसके जिस्म पर सिर्फ़ एक टवल था.....वैसे तो वो अक्सर मेरे सामने उसी हाल में खड़ा रहता था......मगर आज मैने पहली बार विशाल के बदन को अच्छे से गौर किया था.......एक बार तो फिर मेरे दिमाग़ में कल रात वाली ब्लू फिल्म के हीरो की याद आ गयी.......उसका बदन भी कुछ विशाल के जैसा था मगर वो अँग्रेज़ लोग काफ़ी गोरे होते है.........और मेरा भाई भी गोरा था मगर उस अँग्रेज़ जितना नहीं.......फिर मुझे ध्यान आया कि मैं ये सब क्या सोच रही हूँ.......फिर मैने तुरंत अपना दिमाग़ को झटका और फिर कल रात वाली बात को भूलने की कोशिश करने लगी.......ये सब सोचते हुए आज मेरे चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गयी थी.....

मुझे अपनी तरफ ऐसे घूरते हुए देखकर विशाल ने तुरंत अपनी नज़रें दूसरी तरफ फेर ली......शायद मेरे इस तरह से देखने से उसे शरम सी महसूस हो रही हो......वो फिर तुरंत अपने बाथरूम में घुस गया और मैं सीधा मम्मी के पास आ गयी........मम्मी मुझे देखकर मुस्कुराए बिना ना रह सकी......
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02-28-2019, 10:55 AM,
#7
RE: Incest Kahani उस प्यार की तलाश में
स्वेता- क्या बात है बेटी......आज पहली बार तू बिन उठाए उठी है.......लगता है मेरी बातों का तुझपर कुछ असर हो रहा है........

अदिति- हां सोचा आज जल्दी उठकर आपको सर्प्राइज़ दे दूं.......और नाश्ते में क्या है.......आप आज आराम करो मैं ही नाश्ता बना देती हूँ......मम्मी मेरी बातों को सुनकर मुझे ऐसे देखने लगी जैसे मैने कोई अजूबा हूँ........

स्वेता- ये तू कह रही है......चलो देर से आँख खुल मगर खुली तो सही......फिर मम्मी मुझे देखकर मुस्कुराती रही......मैं वही रखा नाश्ता टेबल पर ले गयी तो पापा वही बैठ कर सुबेह की अख़बार पढ़ रहें थे......मुझे ऐसे नाश्ता लाता हुआ देखकर वो भी हैरत से मेरी ओर देखने लगे.......

मोहन- क्या बात है बेटी......आज सूरज पश्चिम से कैसे निकल गया.......मैं पापा के उस बात पर मुस्कुराए बिना ना रह सकी और पापा के पास जाकर उनकी बगल वाली सीट पर बैठ गयी......पापा मेरे तरफ ही देख रहें थे......शायद उन्हें मेरी बातों के जवाब का इंतेज़ार था.......

अदिति- पापा आप भी मुझे ताना देने लगे.....जाओ अब मैं आपसे बात नहीं करती.......

पापा मेरी बातों को सुनकर मुस्कुराए बिना ना रह सके- आरे पगली आज पहली बार तुझे इतनी सुबेह उठता हुआ देख रहा हूँ इस लिए मुझे हैरानी हो रही है......सब ठीक तो है ना.......

मैं पापा की बातों को सुनकर धीरे से मुस्कुरा दी और चाइ पीने लगी.....तभी कमरे में विशाल भी आ गया.......सब के लिए आज मैं एक मिसाल बन चुकी थी....आज सब लोग मेरी ही तारीफ किए जा रहें थे......फिर रोज़ की तरह हम दोनो तैयार होकर बस का इंतेज़ार करने लगे.......आज विशाल के चेहरे पर कोई नाराज़गी नहीं थी.....शायद उसे आज पहली बार इंतेज़ार नहीं करना पड़ा था बाथरूम के बाहर........

थोड़े देर बाद हम दोनो कॉलेज पहुँच गये........आज मेरी सारी सहेलियाँ आई हुई थी.....पूजा की नज़र जब मुझपर पड़ी तो वो सवाल भरी नज़रो से मुझे देखने लगी......

पूजा- क्या बात है अदिति आज तो तेरे चेहरे पर निखार कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है......लगता है कल कि रात तू बहुत सुकून से सोई है.......पूजा की बातों को सुनकर मेरा चेहरा शरम से लाल पड़ गया......मैने अपना चेहरा तुरंत नीचे झुका लिया और पूजा मेरे चेहरे की ओर देखकर मुस्कुराती रही........

पूजा- मैने सही कहा ना अदिति......तू कल रात बहुत सुकून से सोई थी.......वैसे इसमें छुपाने वाली कौन सी बात है.......जवान तू भी है और मैं भी......जब मैं भी ठंडी हो जाती हूँ तब मैं भी बहुत सुकून से सोती हूँ.......इस लिए मैने अंदाज़ा लगाया कि तू भी कल रात..........

अदिति- प्लीज़ स्टॉप पूजा........मुझे शरम आती है......तुझे इन सब के अलावा और कोई बात नहीं सूझता क्या.......चल अब लेक्चर शुरू होने वाला है....पूजा भी आगे कुछ नहीं कहती और हम दोनो अपने क्लास की ओर चल पड़ते है.......

आज मैं अपने लेक्चर्स पर भी ध्यान दे रही थी.....कल तक मुझे सारे पीरियड्स बोर करते थे मगर आज सारे लेक्चर्स मुझे अच्छे लग रहें थे.......आज दोपहर तक मेरा वक़्त बहुत जल्दी कट गया.......मुझे भूख लगी थी तो मैं पूजा और मेरी एक और सहेली थी प्रिया.....उसके साथ मैं कॅंटीन की ओर निकल पड़ी........

बाहर कई सारे लड़के हमे घूर रहें थे......मैं सबसे साइड में थी और बीच में पूजा और सबसे लास्ट मे प्रिया थी........

मैं जैसे ही आगे बढ़ी तभी किसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया.......मेरा हाथ इस तरह पकड़ने से मेरी साँसें एक पल के लिए मानो रुक सी गयी......मेरे जिस्म में इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि मैं पलटकर उसके तरफ देखु की किसकी इतनी जुर्रत हुई ये हरकत करने की......मैं कुछ सोचकर खामोश रही फिर अपनी गर्देन घूमकर उस सक्श को देखने लगी.......मेरा हाथ पकड़ने वाला सक्श विशाल का एक दोस्त था ........उसका नाम रवि था........शकल से मैं उसे अच्छे से जानती थी........कई बार मैने उसे विशाल के साथ देखा था.....वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रहा था......

मैं बहुत मुश्किल से अपने जज्बातो को संभालते हुए बोली- मैं कहती हूँ छोड़ो मेरा हाथ........तुम तो विशाल के दोस्त हो ना........

रवि मुझे देखकर हसे जा रहा था .....मेरे इस तरह कहने पर उसने अपने हाथों पर दबाव और ज़ोरों से बढ़ा दिया लिया......

रवि.........रवि नाम है मेरा........सही कहा तुमने मैं तेरे भाई का दोस्त हूँ.......मगर क्या करूँ मैने तो उससे दोस्ती सिर्फ़ इस लिए की थी कि मैं उसके ज़रिए तुझे हासिल कर सकूँ....मगर एक तू है कि मेरी तरफ देखती भी नहीं........क्या कमी है मुझ में.....कॉलेज की कई लड़कियाँ मुझपर मरती है मगर मैं तुझपर मरता हूँ......जब मेरे सब्र की सीमा टूट गयी तब मुझे ऐसा करना पड़ा.......आइ लव यू अदिति......तुम बहुत सुंदर हो.......मैने जब से तुम्हें देखा है मैं तुम्हारा दीवाना हो गया हूँ......अगर तुम ना मिली तो मैं मर जाऊँगा.......प्लीज़ मेरे प्यार को मना मत करना.....नहीं तो मैं कुछ भी कर जाऊँगा........

मैं अपनी आँखें फाडे उसके चेहरे की ओर देखती रही.......मेरा दिमाग़ काम करना लगभग बंद कर चुका था......सारे लोग हमे ही देख रहें थे......मेरा जिस्म डर से थर थर कांप रहा था......ऐसा मेरे साथ पहली बार था जब किसी ने मुझे पूरी भीड़ के सामने प्रपोज़ किया हो......मेरी दोनो सहेलियाँ भी अपनी आँखें फाडे मुझे तो कभी रवि को घूर रही थी.......मैं क्या कहती मैने फ़ौरन अपनी नज़रें नीचे झुका ली.....

रवि- चुप क्यों हो अदिति.....कुछ तो बोलो....देखो मैं अगर तुमसे सच्चा प्यार नहीं करता तो इन सब के सामने ये बात मैं तुमसे कभी नहीं कहता.....मेरे मन में तुम्हारे लिए कोई चाल नहीं है......ये देखो अगर तुम्हें लगता है कि मेरा प्यार झूठा है तो ये रहा सबूत....फिर रवि अपने शर्ट का लेफ्ट हाथ का बटन खोलता है ....उसने अपने हाथ में मेरा नाम ब्लेड से चीर कर लिखा था.....मैं उसे अपनी आँखें फाडे देखे जा रही थी......समझ में नहीं आ रहा था कि मैं उसके किसी भी सवालों का क्या जवाब दूं.

रवि- अदिति मैं जानता हूँ कि मैने जो तरीका अपनाया है वो ग़लत है मगर इसके सिवा और कोई चारा भी नहीं था मेरे पास .......

अदिति- जस्ट शटअप.........प्लीज़ तुम अभी यहाँ से चले जाओ......मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ......मेरा और तमाशा यहाँ मत बनाओ.......अगर विशाल को इस बारे में पता लग गया तो पता नहीं वो तुम्हारे साथ क्या सुलूख करेगा......

रवि- मुझे दुनिया वालों की कोई फिकर नहीं है अदिति.......मुझे बस तुम्हारा साथ चाहिए......बस एक बार तुम मेरा हाथ थाम लो फिर मैं इस दुनिया से अकेले सामना करने को भी तैयार हूँ......अभी रवि की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि किसी ने उसके पीठ पर एक ज़ोर की लात मारी......वो थोड़ी दूर पर जाकर मूह के बल गिर पड़ा......जब उसकी नज़र सामने खड़े सक्श पर पड़ी तो रवि के साथ साथ मेरी आँखें भी हैरत से फैलती चली गयी........मेरे सामने विशाल खड़ा था......इस वक़्त वो बहुत गुस्से में दिखाई दे रहा था........शायद किसी ने उसे इस बात की खबर कर दी थी......

विशाल ने फिर आगे बढ़कर रवि का कॉलर पकड़ा और फिर उसके उपर लात और मुक्कों की बारिश कर दी.......साथ ही उसके दो दोस्त भी थे वो भी रवि की पिटाई करने लगे.........रवि के जिस्म के कई हिस्सों से खून निकल रहा था.........मगर विशाल के हाथ नहीं रुक रहें थे.........

विशाल- क्यों बे.......तुझे मेरी ही बेहन मिली थी क्या इश्क़ लड़ाने के लिए.......आज मैं तेरी आशिक़ी का भूत तेरे उपर से हमेशा के लिए उतार देता हूँ.......और साले तू तो मेरा दोस्त है ना......मादरचोद दोस्ती की आड़ में मेरी पीठ पीछे मेरी ही बेहन के साथ ये सब कर रहा है......फिर विशाल रवि को बोलने का एक मौका भी नहीं देता और फिर से लात और घूसे बरसाना शुरू कर देता है.......

मैं इस वक़्त बीच में खड़ी सबकी नज़रो में तमाशा बन चुकी थी साथ में मेरी दोनो सहेलियाँ भी चुप चाप वही खड़ी थी......चारो तरफ से स्टूडेंट्स वहाँ भीड़ लगाए देख रहें थे मगर कोई ना ही विशाल को रोक रहा था और ना ही रवि को बचा रहा था......
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02-28-2019, 10:56 AM,
#8
RE: Incest Kahani उस प्यार की तलाश में
विशाल- इसी हाथ से तूने मेरी बेहन का हाथ थामा था ना......देख मैं तेरे हाथों का क्या हाल करता हूँ....फिर विशाल बिना रुके अपने पैरो से रवि के हाथों पर चोट करने लगता है......रवि के मूह से दर्द भरी कराह निकल रही थी.....मगर विशाल को तो जैसे उसकी कोई परवाह ही नहीं थी.....कारेब 10, 12 बार एक ही जगह लगातार चोट करने से रवि के हाथ की हुड्डी टूट जाती है और वो वही दर्द से चीखते हुए बेहोश हो जाता है.....मगर विशाल अब भी उसे मारे जा रहा था......विशाल के भी हाथों से खून निकल रहा था.........ये सब तमाशा देखकर मेरे आँखों में भी आँसू छलक पड़े थे......

अगर ये सिलसिला कुछ देर तक यू ही चलता रहता तो यक़ीनन रवि मर जाता.......मैं फ़ौरन आगे बढ़ी और विशाल के पास गयी.....

अदिति- प्लीज़ स्टॉप दिस विशाल......मार डालोगे क्या उसे ........मैने विशाल को एक तरफ धकेला मगर विशाल अपनी जगह से बिल्कुल हिला भी नहीं......फिर मैने उसे ज़ोर का धक्का दिया......

अदिति- विशाल.............तुम्हें मेरी कसम.......अगर तुमने इसपर अपना एक भी और हाथ उठाया तो......मुझसे बुरा और कोई नहीं होगा........

विशाल मेरे इस तरह बोलने पर कुछ शांत हुआ और फिर मुझे घूर कर देखने लगा- तुम्हें पता भी है दीदी कि तुम क्या कर रही हो......इसने मेरी आड़ लेकर तुम्हें पाने की कोशिश की है......ये दोस्त नहीं दोस्ती के नाम पर एक दाग है.......ऐसे लोगों का मर जाना ही बेहतर है......फिर विशाल आगे बढ़कर एक दो लात और रवि पर जड़ देता है......मेरा भी सब्र टूट चुका था मैं विशाल के पास गयी और उसके गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा मार दिया जिससे उसके गालों पर मेरे पाँचों उंगलियाँ छप सी गयी......थप्पड़ इतना ज़ोर का था कि मेरे हाथ झंझणा उठे थे.......मेरे हाथ की कलाई लचक गयी थी........मगर मुझे उस वक़्त अपनी परवाह नहीं थी.......मेरे इस हरकत पर विशाल मुझे सवाल भरी नज़रो से देखने लगा.....जैसे वो मुझसे पूछ रहा हो कि आख़िर इसमें मेरी क्या खता है......

अदिति- क्या साबित करना चाहते हो तुम अपने आप को......गुंडे हो कहीं के........या अपने आप को कहीं का डॉन समझते हो........क्या हो तुम........हां मानती हूँ कि इसने जो तरीका अपनाया वो ग़लत था.......इसने सरे आम मेरा हाथ पकड़ा वो ग़लत था.......मगर मैं पूछती हूँ कि जो तुमने इसके साथ किया क्या वो सही था.......देखो कैसे जानवरों की तरह इसे मारा है.......

विशाल- दीदी.......कोई आपके साथ बढ़तमीज़ी करेगा तो क्या आपका ये भाई चुप बैठेगा......अभी तो इसकी किस्मेत अच्छी है कि ये बच गया.......नहीं तो साले का मार मार कर वो हाल करता कि........ये बात पूरे भी नहीं हुई थे कि अदिति का एक और करारा थप्पड़ विशाल के गालों पर पड़ता है.......

अदिति- गेट आउट फ्रॉम हियर.......दूर हो जा मेरी नज़रो से.......मैं तेरी शकल भी देखना नहीं चाहती.........नफ़रत हो गयी है मुझे तुमसे.......चला जा यहाँ से इससे पहले कि और कोई तमाशा खड़ा हो........

विशाल चुप चाप अपनी नज़रें नीचे झुकाए खड़ा था......मगर अब वो कुछ भी नहीं बोल रहा था......

अदिति- सुना नहीं तूने......दूर हो जा इस वक़्त मेरे सामने से......

विशाल- ठीक है दीदी ये मत समझना कि मैं चुप हूँ तो मैं डर गया.....अगर किसी ने आप पे बुरी नज़र डाली तो मैं उसकी आँखे निकाल लूँगा.....अगर आपकी इज़्ज़त के खातिर मुझे गुंडा भी बनना पड़े तो मुझे वो भी मंज़ूर है......

मैं उस वक़्त बिल्कुल खामोश सी वही विशाल को जाता हुआ देख रही थी.......थोड़े देर बाद रवि को किसी प्राइवेट हॉस्पिटल में शिफ्ट कर दिया गया.......मेरे आँखों से अब भी आँसू नहीं थमे थे......कितना भरोसा करती थी मैं विशाल पर मगर आज विशाल ने मेरे सारे भरोसे को पल भर में तोड़ दिया था......विशाल का ये रूप आज मैं पहली बार देख रही थी......अब भीड़ बहुत हद तक कम हो चुकी थी.........पूजा मेरे पास आई और उसने मेरे आँखों से बहते आँसू पूछे......

पूजा- अदिति चलो मेरे साथ.......इस वक़्त तुम्हारा मूड ठीक नहीं है.......

अदिति- पूजा मेरा एक काम करोगी....प्लीज़ मैं इस वक़्त घर जाना चाहती हूँ......क्या तुम मुझे अपने घर तक छोड़ दोगि.......प्रिया वही खड़ी थी उसने झट से अपनी स्कूटी की चाभी पूजा के हाथों में थमा दी.......पूजा ने भी मुझसे कोई बहस नहीं की और फिर उसने स्कूटी निकाली और मैं उसपर चुप चाप बैठ गयी.........पूरे रास्ते भर पूजा ने मुझसे कोई बात नहीं की.......शायद आज उसने पहली बार मेरा ये रूप देखा था.

जैसे जैसे मेरा घर नज़दीक आ रहा था वैसे वैसे मेरे दिल में घबराहट और बेचैनी और भी बढ़ती चली जा रही थी......अंदर ही अंदर मैं मम्मी के सवालों से डर रही थी कि मैं उन्हें कॉलेज से जल्दी आने की क्या वजह बताउन्गि......इस वक़्त भी मेरी आँखें नम थी......जब मेरा घर आया तब मैने अपना चेहरा अच्छे से सॉफ किया और मैने अपने घर की डोर बेल दबा दी........मेरे ठीक पीछे पूजा खड़ी थी......थोड़ी देर बाद मम्मी ने आकर दरवाज़ा खोला.......

जब मम्मी की निगाह मुझपर गयी तो वो मुझे सवाल भरी नज़रो से देखने लगी.......मम्मी को शायद मेरी आने की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी.......

स्वेता- अरे बेटी तू.....आज कॉलेज से इतनी जल्दी.......सब ठीक तो है ना......मैं अपनी गर्देन नीचे झुकाए चुप चाप खड़ी थी.......मेरे मूह से चाह कर भी एक शब्द नहीं फुट रहें थे.....तभी पूजा मम्मी के सवालों का जवाब दे देती है.........

पूजा- वो आंटी बात ये है कि आज अदिति की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है.......शायद कमज़ोरी है थोड़ी बहुत......इसे चक्कर आ गया था कॉलेज में......इस लिए मैं इसे घर ले आई........पूजा की बातों को सुनकर मैं भी हां में अपना सिर हिला दिया मगर मम्मी अभी भी मेरे चेहरे की ओर देख रही थी........शायद वो मेरे चेहरे की सच्चाई को पढ़ने की कोशिश करना चाह रही हो...........

स्वेता- कितनी बार बोला है इसे कि अपने उपर ज़रा ध्यान दिया कर........मगर इस लड़की को मेरी बात की परवाह कहाँ होती है........अच्छा किया बेटी जो तू इसे घर ले आई.......अब बाहर खड़ी रहेगी या अंदर भी आना है.......मम्मी मेरे चेहरे को घूरते हुए एक बार फिर से बोली......मैने उनकी बातों का कोई जवाब नहीं दिया और चुप चाप अपने कमरे में चली गयी......पूजा जाना चाहती थी वापस मगर मम्मी ने उसे रोक लिया और चाइ पीकर जाने को कहा.....चाइ पीकर पूजा कॉलेज के लिए निकल पड़ी........
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02-28-2019, 10:56 AM,
#9
RE: Incest Kahani उस प्यार की तलाश में
थोड़ी देर बाद मम्मी मेरे कमरे में आई.......मैं वही कमरे में अपने बिस्तेर पर बैठी हुई थी.......उनके हाथों में तेल की शीशी थी......उन्होने मुझसे कुछ नहीं पूछा और मेरे बाल खोल दिए और मेरे सिर पर तेल रखकर मेरा सिर दबाने लगी......मैं बस गुम्सुम सी बैठी हुई थी......मम्मी ने जब मेरे सिर दबा दिया तो वो फिर अपने कमरे में सोने के लिए चली गयी.......

स्वेता- अब तू आराम कर ले......फ्रीज़ में फल रखें है........अगर तेरी इच्छा हो तो वो मैं लाकर तुझे दूं......मैने उनकी ओर एक नज़र डाली......फिर मैने ना में अपनी गर्देन नीचे झुका दिया......मम्मी भी कुछ नहीं बोली और अपने कमरे में चली गयी......मैने फ़ौरन उठकर अपने रूम को अंदर से लॉक किया और अपने बिस्तेर पर आकर फिर से रोने लगी.......बहुत देर से मैं अपने आँखों के अंदर उस सैलाब को संभाले हुई थी और अभ वो किसी झरने की तरह तुरंत फुट पड़े थे........मेरी आँखों से आँसू बहते हुए अब बिस्तेर पर गिर रहें थे........मैं बहुत देर तक ऐसी ही रोती रही......और ना जाने कब मेरी आँख लग गयी मुझे पता भी नहीं चला........

उधेर विशाल इस वक़्त बहुत बेचैन था......उसका दिल कहीं नहीं लग रहा था......बार बार उसके मन में अपनी बेहन के कहे हुए शब्द गूँज रहें थे........उसका दोस्त रोहित भी उसके साथ था.....वो बार बार उसे समझा रहा था मगर विशाल आज बहुत सीरीयस था.......वो जानता था कि जो कुछ हुआ वो ठीक नहीं हुआ.....मगर अब तो जो होना था वो तो हो चुका था.....

इधेर जब मेरी नींद खुली तो शाम के 4 बज रहें थे.......विशाल भी घर आ चुका था.......इस वक़्त उसके चेहरे पर घबराहट सॉफ दिखाई दे रही थी........जब वो घर आया था तो उसने सबसे पहले मम्मी से मेरे बारे में पूछा था......क्यों की उस हादसे के बाद मैं उसे कहीं दिखाई नहीं दी थी.....इस लिए वो बहुत परेशान हो गया था........मम्मी को भी शक था कि ज़रूर कुछ तो बात है मगर मम्मी ने ये बात हमे ज़ाहिर नहीं होने दी......मगर जब कहीं आग लगी हो तो धुआँ तो उठेगा ही.......

शाम को रवि की मा मेरे घर पर आई.......उस वक़्त वो बहुत गुस्से में थी......पापा भी घर आ चुके थे......आज कॉलेज में जो कुछ हुआ था वो सारी बातें उसने मेरे मम्मी और पापा से कह डाली.......मगर उसने असली वजह नहीं बताई कि ग़लती किसकी थी.....क्यों विशाल ने रवि पर हाथ उठाया......पापा मेरे बहुत गुस्से मिज़ाज़ के इंसान है.......वो गुस्से में मानो पागल हो जाते है.......जैसे ही रवि की मा गयी पापा ने विशाल को अपने पास बुलाया......वो चुप चाप अपनी गर्देन झुकाए पापा के सामने खड़ा था......वही थोड़ी दूर पर मेरी मा भी थी.......मैं अपने कमरे के अंदर से सारी बातें सुन रही थी........सच तो ये था कि मेरे अंदर भी हिम्मत नहीं थी कि मैं पापा का सामना कर सकूँ......

मोहन- क्या जो मैं सुन रहा हूँ वो सच है.......क्या तुमने रवि को बेरहमी से पीटा......क्या ये भी सच है कि तुमने उसका एक हाथ तोड़ दिया.......

विशाल पापा के सवालों को सुनकर एक शब्द कुछ ना बोला और चुप चाप अपनी गर्देन नीचे झुकाए खड़ा रहा......पापा उठकर दूसरे रूम में गये और एक छड़ी ले कर आयें.......पापा ने फिर से वही सवाल विशाल से दोहराया मगर विशाल इस बार भी चुप रहा.......अगले ही पल पापा के अंदर का गुस्सा पूरी तरह से फुट पड़ा......और उन्होने विशाल को वही उस छड़ी से मारना शुरू कर दिया.......मम्मी आगे कुछ कहती तो पापा ने उसे कसकर डांता तो वो भी डर से सहम गयी.......

विशाल वही बाहर मार खा रहा था मगर अपने मूह से एक भी शब्द कुछ नहीं कह रहा था......करीब 5 मिनिट तक मैं ये सब सुनती रही......मेरा दिल बहुत ज़ोरों से घबरा रहा था......मैं बहुत बेचैन सी हो गयी थी विशाल को ऐसे मार ख़ाता हुआ देखकर......मुझे बार बार ऐसा लग रहा था कि मार वो खा रहा है और दर्द मुझे हो रहा है......मैं अपने आप को संभाल ना सकी और फ़ौरन अपने कमरे से भागते हुए डाइनिंग रूम में गयी जहाँ पर विशाल खड़ा था.......जब मेरी नज़र उसपर पड़ी तो मेरे दिल छलनी छलनी हो गया......उसके हाथों पर छड़ी के दाग सॉफ दिखाई दे रहें थे......मगर वो चुप चाप मार खाए जा रहा था.......

मम्मी वही डर से सहमी हुई थी.....उनकी भी आँखों में आँसू थे.......कोई भी मा अपने बच्चू को मार ख़ाता हुआ नहीं देख सकती थी......मैं आगे बढ़कर विशाल के पास गयी और जाकर विशाल के सामने खड़ी हो गयी......पापा ने मुझे एक नज़र घूर कर देखा और फिर मुझे भी उस छड़ी से मारने लगे......जब उन्होने करीब 10 छड़ी मुझे मारी तब जाकर वो रुक गये......मेरे हाथों पर भी काले काले निशान सॉफ दिखाई दे रहें थे........मगर मुझे उस वक़्त अपने दर्द की परवाह नहीं थी.....मुझे तो बस विशाल की चिंता थी.......

अदिति- पापा आप रुक क्यों गये......मारिए मुझे भी......जितना आज विशाल दोषी है उतनी मैं भी हूँ.........आज मेरी वजह से विशाल ने रवि पर अपना हाथ उठाया था......विशाल मुझे चुप रहने को बोलता है.....वो नहीं चाहता था कि सच्चाई उसके मम्मी पापा को मालूम हो......शायद उसे मेरी इज़्ज़त ज़्यादा प्यारी थी इस लिए वो चुप चाप पापा के हाथों मार ख़ाता रहा.......

अदिति- पापा आप सच जानना चाहते है ना तो फिर सुनिए....आज कॉलेज में रवि ने सरे आम मेरा हाथ पकड़ा था......और उसने ना सिर्फ़ मेरा हाथ पकड़ा बल्कि मुझे सबके बीच ,सबके सामने प्रपोज़ भी किया......जब ये बात विशाल को पता लगी तो उसने इस वजह से उसपर अपना हाथ उठाया......और इस लिए भी क्यों कि वो इसका दोस्त था और दोस्ती की आड़ में उसकी नज़र मुझपर थी.......तो आप ही बताइए विशाल ने क्या ग़लत किया.....आगर उसने आज मेरी लाज बचाई तो क्या वो ग़लत था.....क्या कोई भाई चुप रहेगा अगर कोई उसकी बेहन के साथ ऐसी बढ़तमीज़ी करेगा तो.......अब आप ही बताइए कि इसमें किसका दोष है......विशाल का या ................फिर रवि का.
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02-28-2019, 10:56 AM,
#10
RE: Incest Kahani उस प्यार की तलाश में
पापा एक दम खामोश थे.......वो कुछ नहीं बोले और चुप चाप अपने सोफे पर जाकर बैठ गये......मैं उनके पास गयी और उनके कदमों के पास बैठ गयी.....

अदिति- पापा विशाल भले ही मुझसे कितना भी झगड़ा क्यों ना करता हो ......मगर सच तो ये है कि वो मुझे बहुत प्यार करता है......और मैं भी उसे बहुत चाहती हूँ.....कोई भी भाई अपनी बेहन के साथ बुरा होता हुवा नहीं देख सकता.....विशाल की यही ग़लती है कि उसने रवि को बहुत ज़्यादा मारा......उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था......

पापा मेरी तरफ एक नज़र देखे फिर विशाल की ओर देखने लगे.....विशाल अभी भी चुप चाप वही अपनी गर्देन नीचे झुकाए खड़ा था.......

मोहन- तो फिर मेरे लाख पूछने पर भी इसने सच क्यों नहीं कहा......अगर ये सच बता देता तो क्या मैं इसपर अपना हाथ उठाता......पापा ने फिर हम से कोई बहस नहीं की और सीधा अपने कमरे में चले गये......मुझे भूख तो बहुत ज़ोरों की लगी थी......सुबेह से मैने कुछ नहीं खाया था मगर आज इतना कुछ हो गया था जिससे मेरी भूख मर सी गयी थी......मैं फिर अपने कमरे में आई और फिर अपने बिस्तेर पर आकर लेट गयी.......विशाल अपने कमरे में चला गया.....मम्मी खाना बनाने किचन में चली गयी......

रात के करीब 9 बजे पापा खाना खा कर सोने चले गये....आज डाइनिंग टेबल पर ना ही मैं गयी थी और ना ही विशाल......और ना ही मम्मी......घर में चारों तरफ खामोशी थी.......कोई किसी से बात नहीं कर रहा था........मम्मी ने मेरे लिए खाना परोसा और खुद वो खाना ले आई मेरे कमरे में......मैने खाना खाने से सॉफ इनकार कर दिया........सच तो ये था कि मुझे बहुत ज़ोरों की भूक लगी थी........मगर मुझे खाने की बिल्कुल इच्छा नहीं हो रही थी ....जो आज दिन में हुआ था वो सब सोचकर......

मम्मी भी ज़्यादा मुझसे बहस नहीं की और चुप चाप अपने कमरे में चल गयी.......थोड़ी देर बाद मैं वही गुम्सुम सी बैठी रही तभी मुझे मेरे कमरे का दरवाज़ा खुलता सा महसूस हुआ......मैने अपनी गर्देन घूमकर देखा तो सामने विशाल खड़ा था......उसकी हाथों में खाना था.......वो मेरे पास आया और खाने की थाली को वही उसने मेज़ पर रख दिया.......विशाल फिर मेरे बिस्तेर पर आकर मेरे बाजू में बैठ गया और मेरे कंधे पर उसने अपना एक हाथ रखा.......

मैं उसकी तरफ अपनी नज़रें की तो वो मुझे ही देख रहा था.......मैं चाह कर भी उससे कुछ ना बोल पाई......और अपनी नज़रें दूसरी तरफ फेर ली.......

विशाल- नाराज़ हो ना मुझसे दीदी.......चलो खाना खा लो ........आपको भूक लगी होगी......आपने सुबेह से कुछ नहीं खाया है.......मेरी खातिर आप खाना खा लो......आख़िर खाने से कैसी नाराज़गी......

अदिति- मुझे भूक नहीं है विशाल......चले जाओ तुम यहाँ से.......मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी.......

विशाल- मुझसे किस बात की नाराज़गी है दीदी......आख़िर कुछ तो बताओ मुझसे......आख़िर मेरा कसूर क्या है........

अदिति- मैने कहा ना तुम चले जाओ यहाँ से.......मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी.......

विशाल- जब आपको मुझे बात नहीं करनी थी तो क्यों आप आई मेरे और पापा के बीच में.......मार खाने दिया होता मुझे......शायद वही मेरा प्रायश्चित था......क्यों बचाया तुमने मुझे........

अदिति- मैं तुम्हारे सवालों का जवाब देना ज़रूर नहीं समझती......जस्ट शटअप और चले जाओ यहाँ से.......

विशाल- मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूँ दीदी......मुझे सब मंज़ूर है मगर तुम्हारी ये नाराज़गी मैं कभी बर्दास्त नहीं कर सकता.......अगर आपकी यही ज़िद्द है तो फिर मुझे इसकी वजह बताइए......मैं आपसे कोई सवाल जवाब नहीं करूँगा.....आख़िर मुझसे कौन सी ग़लती हो गयी जो आप मेरे साथ इस तरह से बर्ताव कर रही है........क्या मैने उसे मारा इस वजह से......सबके बीच आपने मुझे थप्पड़ मारा मैं वहाँ भी चुप रहा.......मगर अब मुझसे आपकी ये खामोशी देखी नहीं जाती.......

अदिति- बात मारने या ना मारने की नहीं है विशाल.......आज तुमने ये साबित कर दिया कि तुम एक गुंडे हो.......और मुझे इसी बात का दुख है......और शरम आती है मुझे अपने उपर की मैं एक गुंडे की बेहन हूँ....

विशाल- मारता नहीं तो और क्या करता......कोई आपको बुरी नज़र से देखे ये मैं कभी बर्दास्त नहीं कर सकता......आप मेरी बेहन है........और मैं आपको अपनी जान से बढ़कर चाहता हूँ......दुनिया का कोई भाई कभी नहीं चाहेगा कि कोई उसकी बेहन पर बुरी नज़र डाले........ फिर मैं कैसे चुप रहता.....

अदिति- तो उसकी ग़लती की सज़ा क्या ऐसे देते.......तुम तो उसे ऐसे मारते रहें जैसे कोई इंसान जानवरों को मारता है......और तुम क्या समझते हो कि मैं तुमसे प्यार नहीं करती......अपनी जान से बढ़कर तुम्हें चाहती हूँ........मगर मैं ये नहीं चाहती कि कल को कोई ये कहे कि ....वो देखो ये उस गुंडे की बेहन जा रही है......

विशाल- तो फिर ठीक है मुझे आपकी खातिर सब मंज़ूर है.......अगर आप चाहती है कि मैं आज के बाद कभी किसी पर अपना हाथ ना उठाऊं तो फिर आज के बाद ये हाथ कभी नहीं उठेगा......ये मेरा आपसे वादा है.......अब तो खाना खा लो दीदी.....इतना कहकर विशाल धीरे से मुस्कुरा पड़ता है......मैं भी ना चाहते हुए विशाल को देखकर मुस्कुरा देती हूँ और उसके कंधों पर अपना सिर रख देती हूँ......विशाल मुझे बड़े प्यार से अपने गले लगा लेता है.......

दरवाज़े के बाहर मम्मी हमे देख रही थी......उनके चेहरे पर भी मुस्कान थी......वो भी हमारे पास आई और फिर हम दोनो उनकी सीने से लग गये......फिर कुछ देर बाद मम्मी अपने रूम में सोने चली गयी.......मम्मी के जाते ही विशाल मेज़ पर रखा खाना निकाल कर मुझे बड़े प्यार से खिलाने लगा......मैं उसे बिल्लकुल इनकार ना कर सकी और धीरे से अपना मूह खोल दिया.......फिर मैने भी विशाल को अपने हाथों से खाना खिलाया......उसका हाथ उठ नहीं रहा था दर्द की वजह से.......उसके हाथों में बहुत चोट आई थी......फिर भी वो मुझे बड़े प्यार से खाना खिलता रहा और मैं उसे खिलाती रही......

खाना ख़तम होने के बाद मैं अपने बर्तन उठाकर किचन में रख दिए......और फिर हल्दी और तेल और एक पेनकिलर दवाई लेकर अपने कमरे में चल पड़ी.....विशाल अभी भी मेरे बिस्तेर पर चुप चाप बैठा हुआ था......उसने जब मुझे देखा तो एक बार फिर से उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गयी......

विशाल- इसकी क्या ज़रूरत थी दीदी.......सुबेह तक ठीक हो जाता......

अदिति- मुझसे बहस मत करो......और हां अपनी शर्ट उतार कर यहीं बिस्तेर पर सो जाओ.....मैं तुम्हें हल्दी और तेल लगा देती हूँ....सुबेह तक आराम हो जाएगा.......विशाल ने एक नज़र मुझे देखा फिर वो अपने शर्ट उतारने लगा.....फिर बाद में अपनी बनियान भी उतार कर वही बिस्तेर पर रख दिया........मैने आज से पहले ना जाने कितनी बार विशाल का बदन देखा था मगर आज मैं विशाल के इतने करीब थी कि एक पल तो मानो मुझे ऐसा लगा कि मैं आज कहीं बहक ना जाऊं.........

एक बार फिर से मेरे अंदर की तपिश भड़क उठी थी.......एक बार फिर से मेरे मन में अपने भाई के लिए बुरे ख्यालात जनम लेने लगे थे.......विशाल पेट के बल बिस्तेर पर लेटा हुआ था......मैं बहुत मुश्किल से अपने आप को संभाल रही थी......पता नहीं ये मुझे क्या होता जा रहा था......एक पल तो मुझे ऐसा लगा कि मैं भी अपने सारे कपड़े उतार कर यहीं विशाल की बगल में सो जाऊं........मगर कितना भी था तो वो मेरा भाई था और मेरे अंदर ऐसा करने की बिल्कुल हिम्मत नहीं थी.......
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