Hindi Samlaingikh Stories समलिंगी कहानियाँ
07-26-2017, 10:57 AM,
#21
RE: Hindi Lesbian Stories समलिंगी कहानियाँ
यार बना प्रीतम - भाग (14)

गतान्क से आगे.......

प्रदीप तो मेरी चप्पल खा'कर पागल सा हो गया था. मुझे पटक'कर मेरे ऊपर चढ गया और अपना लंड मेरी गुदा पर रख कर पेल'ने लगा. माजी हंस'ने लगी.

देखो कैसा उतावला हो गया है, अरे पहले ज़रा बहू के शरीर को मसलना कुचलना था. खैर, तेरी बेताबी मैं समझ सक'ती हूँ. मार ले उसकी, अपनी आग शांत कर ले, फिर मिल'कर आराम से खेलेंगे इस गुड़िया से.

प्रदीप के पेल'ने के बावजूद उसका लंड मेरी गान्ड में नहीं घुस रहा था. उधर मैं दर्द से बिलबिलाता हुआ तडप रहा था क्योंकि गान्ड में बहुत दर्द हो रहा था. मेरी हालत अजीब सी थी, एक तरफ मैं किसी नवविवाहित वधू जैसा अप'ने पति से चुद'ने को बेताब था, वहीं उस घोड़े से लंड को देख'कर डर से अधमरा हो गया था. प्रीतम मेरी परेशानी देख'कर बोला.

भैया, ये ऐसे नहीं जाएगा. महीने भर से मैने भाभी को नहीं चोदा है. आराम मिल'ने से अब उस'की गान्ड फिर कुँवारी चूत सी कसी हो गयी है. मक्खन लगा लो नहीं तो माधुरी मर जाएगी.

वह जा'कर मक्खन ले आया. माजी ने मेरी गुदा में और प्रीतम ने अप'ने भाई के लंड में मक्खन लगाया. मक्खन लगाते हुए प्रदीप के लंड को चूम कर प्रीतम बोला.

आज तो यह गजब ढा रहा है यार! सुहागरात ना होती तो मैं कह'ता कि मेरी ही मार लो प्लीज़! उधर माजी बड़े प्यार से दो उंगलियों से मक्खन के लॉंड के लौंदे मेरी गान्ड में भर रही थी. माजी ने मेरे चूतड पकड़'कर कस के चौड़े किए.

देख बेटे, कैसा गुलाब की कली सा च्छेद है, पेल दे अब. प्रदीप ने जैसे ही अप'ने लंड को पकड़ा और बेरहमी से मेरी गान्ड में सुपाड़ा उतार दिया. पक्क की आवाज़ के साथ मेरा छल्ला चौड़ा हुआ और मुझे इतना दर्द हुआ कि मैं रो पड़ा और हाथ पैर फेकते हुए चीख'ने लगा.

आख़िर सील टूटी साली की. प्रीतम इधर आ और हाथ पकड़ हरामजादी के, बहुत छटपटा रही है प्रदीप मस्त होकर बोला. माजी ने मेरे पैर पकड़ लिए और प्रीतम ने हाथ. प्रीतम ने पूचछा.

मुँह बंद कर दूं भाभी का? माजी बोलीं.

अरे नही, चिल्ला'ने दे, मज़ा आएगा. सुहागरात में बहू रोए तो मज़ा आता है. इससे पता चल'ता है कि असल में चुदी या नहीं! मैं इस'की दर्द भरी चीख सुनना चाह'ती हूँ. जब मेरे बेटे का लॉडा इस'की गान्ड चौडी करेगा, तो ये कट'ती मुर्गी जैसी चिल्लानी चाहिए. तब मैं समझूंगी कि इस अप्सरा को तूने ठीक से भोगा है. वैसे फाड़ तो नहीं देगा रे प्रदीप बहू की गान्ड? नहीं तो कल ही टाँके लगवा'ने पडेन्गे. आगे ढीली ढाली गान्ड मार'ने में क्या मज़ा आएगा?

नहीं मा, ऐसे थोड़े फटेगी! साली पूरी चुदक्कड है. देख अब इस'की कैसी दूरगत कर'ता हूँ! कह'कर प्रदीप ने आगे लंड पेलना शुरू किया. मैं दर्द से चीख'ने लगा. आज सच में मेरी गान्ड ऐसे दुख रही थी जैसे कोई घूँसा बना कर हाथ डाल रहा हो. अब मेरा लंड भी बैठ गया था. सारी मस्ती उतर गयी थी. आँखों से आँसू बह रहे थे. प्रदीप ने और ज़ोर लगा'कर जब तीन चार इंच लॉडा और मेरी गान्ड में उतार दिया तो मैं बेहोश होने को आ गया.

अरे अरे, बेहोश हो रही है बहू. फिर क्या मज़ा आएगा इस'के बेजान शरीर को छोड़'कर. प्रदीप, उस'की चूची मसल, अभी जाग जाएगी. मा की इस सलाह पर प्रदीप ने मेरी चूची पकड़'कर ऐसे कुचली की दर्द से बिलबिला'कर मैं फिर होश में आ गया और हाथ पैर पटक'ने की कोशिश कर'ने लगा.

अब ठीक है, डाल दे पूरा लंड अंदर. मा ने कहा. प्रदीप ने मेरे चूतड पकड़े और घच्छसे पूरा एक फुट लॉडा मेरे चूतडो के बीच गाढ दिया.

मैं ऐसे चिल्लाया जैसे हलाल हो रहा हू! मेरे दर्द की परवाह ना कर'के प्रदीप मेरे ऊपर चढ गया और मेरी चूचियाँ हाथ में पकड़'कर बोला.

अब हट जाओ मा. प्रीतम तू अब जा और मा को चोद ले. मुझे अपनी पत्नी को चोद'ने दे ठीक से. अब देख मैं कैसे इस रंडी की गान्ड का भूर'ता बनाता हूँ. और मेरी रबड की ब्रा में कसी चूचियाँ मसल मसल कर वह मेरी गान्ड मार'ने लगा.

अगले आधे घंटे मेरी जो हालत हुई, मैं कह नहीं सकता. मैं रोता बिलख'ता रहा और मेरा पति हांफ'ता हुआ ऐसे मेरी गान्ड मार'ता रहा जैसे पैसा वसूल कर'ने किसी रंडी पर चढ़ा हो. मुझे ऐसा लग रहा था कि किसीने पूरा हाथ मेरे चूतडो के बीच गाड़ दिया हो और उसे अंदर बाहर कर रहा हो. आज मुझे पता चल गया था कि हलाल होते बकरे को कैसा दर्द होता होगा या फिर भयानक बलात्कार की शिकार कोई युव'ती क्या अनुभव कर'ती होगी!

उधर प्रीतम अपनी मा पर चढ कर उसे चोद रहा था. माजी भी चूतड उच्छाल उच्छाल कर अप'ने छोटे बेटे से चुदवा'ती हुई बड़े बेटे को शाबासी दे रही थी.

बस ऐसे ही बेटा, दिखा दे बहू को चुदाई क्या होती है! प्रीतम ने तो बड़े प्यार से मारी होगी इस'की गान्ड! अब ज़रा यह देखे की असली गान्ड मराना किसे कहते हैं. आज यह ऐसी चुदनी चाहिए कि जनम भर याद रखे कि बहू का स्वागत कैसे किया जाता है

आख़िर प्रदीप एक हुंकार के साथ झड और हांफ'ता हुआ मेरे ऊपर लेट कर आराम कर'ने लगा. मा और प्रीतम मेरी यह निर्मम चुदाई देख'कर पहले ही झड चुके थे. उन'की वासना शांत होने पर अब वे मुझसे थोड़ा नरमी का बर्ताव कर'ने लगे.

बाहू, ठीक से चुदी या नहीं तू या कोई तमन्ना बा'की है? माजी ने पूच्छा. मुझे रोते देख'कर तरस खा'कर बोलीं.

बहुत अच्छा चोदा तूने प्रदीप इसे, इस'की खूबसूर'ती के लायक इसे भोगा, पर अब इसे ज़रा पानी पिला दे. बेचारी को प्यास लगी होगी. और प्रीतम ज़रा अपनी भाभी के लंड पर ध्यान दे, देख कैसा मुरझा गया है. ज़रा मज़ा दिला उसे. तब तक मैं प्रदीप को शहद चखा'ती हूँ. प्रदीप मज़ा आया बेटे?

मस्त मुलायम गान्ड है मा माधुरी की. प्रीतम तू सही बीवी लाया है चुन कर मेरे लिए. अब देखना कैसे इस काली को मसल मसल कर इसका भोग लगाता हूँ. इस'की मलाई चख'ने का मन हो रहा है अब. प्रदीप मेरे गुदा में से लौड खींचते हुए बोला.

माजी ने प्रदीप का मुँह अपनी चूत में डाल लिया और उसे अप'ने बुर के पानी और प्रीतम के वीर्य का मिला जुला अमृत पिला'ने लगीं. मैं अब सोच रहा था कि काश मैं उस'की जगह होता. प्रदीप का लंड निकल जा'ने के कारण अब मेरी गान्ड में होती भयानक यातना कम हो गयी थी फिर भी गान्ड तन तन दुख रही थी. प्रीतम ने पहले प्रदीप का लंड चूस कर साफ किया. फिर वह मेरे गुदा पर मुँह लगा'कर अंदर का माल चूस'ने लगा. मुँह उठा'कर बोला.

वाहा, भाभी की मुलायम गान्ड में से भैया का वीर्य चख'ने का मज़ा ही कुच्छ और है मा. वह साथ में मेरे लंड को सहला रहा था. उसे मालूम था कि मुझे क्या अच्च्छा लग'ता है और उस'के अनुभवी हाथों ने जल्द ही मेरा लंड ख़ड़ा कर दिया. लंड खड होने के बाद गान्ड का दर्द मुझे अब इतना जान लेवा नहीं लग रहा था.

प्रदीप आख़िर अपनी मा की चूत पूरी चाट कर उठा और मेरा सिर अपनी गोद में लेकर लेट गया. मेरे मुँह में अपना मुरझाया लंड पूरा डालते हुए बोला.

माधुरी रानी, चल अब अप'ने पति का शरबत पी ले. ख़ास तेरी प्यास बुझा'ने को मैने बनाया है. फिर वह मेरे सिर को अप'ने पेट पर भींच कर मेरे मुँह में मूत'ने लगा.

उस'ने दस मिनिट मुझे अपना मूत पिलाया. लग'ता है घंटों वह मूता नहीं था. मैने आँखें बंद कर'के चुपचाप अप'ने स्वामी का मूत पिया. वह खारा गरमागरम मूत मुझे बहुत अच्च्छा लग रहा था. मेरे चेहरे पर के भाव देख'कर प्रदीप और माजी बहुत खुश हुए.

सच बड़ी अच्छी ट्रेनिंग दी है प्रीतम ने अपनी भाभी को. कैसे पी रही है जैसे भगवान का प्रसाद हो! माजी बोलीं.

प्रदीप का मूत पीने के बाद प्रीतम और माजी ने भी अपना अपना मूत मुझे पिलाया. प्रीतम ने तो वैसे ही लॉडा मुँह में देकर पिलाया पर माजी ने खड़े होकर मुझे अपनी टाँगों के बीच बिठा'कर मेरे मुँह में मूता जैसे कोई देवी साम'ने बैठे भक्त पर अहसान कर रही हो. पहले चेतावनी भी दी.

बहू, अगर ज़रा भी नीचे गिराया तो आज तेरी टाँगें तोड़ दूँगीं. अपनी सासूमा का यह बेशकीम'ती उपहार मन लगा कर पी. मैं जब बिना छलकाए सारा पी गया तो वे बहुत खुश हुईं. मेरा पेट अब लबालब भरा था और मुझे डकार आ रही थी. तीनों मिल'कर यह सोच'ने लगे कि अब मेरे साथ क्या किया जाए?

इसे कुच्छ खिला दो अब . माजी का आग्रह था. पर प्रीतम ने कहा कि अभी अभी मूत पिया है, पेट भरा है, ठीक से माधुरी खा नहीं पाएगी.

तो कोई ऐसी चीज़ खिला जिसे खा'ने में टाइम लगे. फिर खा लेगी. प्रदीप, तेरी चप्पलें इसी लिए तो रखी हैं? चल तैयार हो जा. बहू चप्पालों की कितनी शौकीन है, मैं जान'ती हूँ इस'लिए वैसे किसी की भी चप्पलें खिला सकते हैं पर आज की सुहागरात में तो पति का ही प्रसाद मिले तो अक्च्छा है. माजी ने प्रदीप को कहा. वह अपनी चप्पलें हाथ में लेकर तैयार हो गया.

हां मा, अपनी दुल्हन के लिए यह तोहफा तो मैने मन लगा'कर तैयार किया है. महीने भर से पहन कर इन्हें चिकना कर दिया है. मेरे पैरों का पसीना भी इन'में भीं गया है, मेरी रानी को खूब स्वाद आएगा.

ठहरो भैया, तुम'ने इसका एक छेद तो चोद डाला, अब दूसरा चोदो. मुँह चोद डालो, मस्त पूरा घुसेड कर पेट तक उतार दो. बहुत अच्छी चुद'ती है यह लौंडा मुँह में, अभी ठीक से सीखी नहीं है इस'लिए गोंगिया'ती है, बहुत मज़ा आता है. तब तक मैं अपनी भाभी की गान्ड मार लेता हूँ. आख़िर इस'की सुहाग रात है, गान्ड खूब चुदनी चाहिए नहीं तो सोचेगी कि कैसे लोग हैं, बहुओं को ठीक से चोदना भी नहीं जानते. और माधुरी मा की गान्ड मार ले तब तक! आख़िर बहू से गान्ड मरा'ने में जो मज़ा है, वह मा भी चख ले ज़रा. प्रीतम ने सुझाव दिया.

प्रदीप को बात जच गयी. चप्पलें बाजू में रख कर उस'ने अपनी मा को बिस्तर पर लेट'ने को कहा. माजी अपनी पहाड सी गान्ड ऊपर कर'के लेट गयीं. मुझे उनपर चढ़ा दिया गया और मेरा लंड उन'की गान्ड में घुसेड दिया गया. काफ़ी फुकला गान्ड थी मेरी सासूमा की, आख़िर दो दो बेटों के मतवाले लंडों से सालों चुदी थी. पर उस मुलायम छेद का मज़ा ऐसा था कि मैं तुरंत अपनी सास की गान्ड मार'ने लगा. प्रीतम मेरे ऊपर चढ गया और मेरी गान्ड मार'ने लगा. उस'के प्यारे जा'ने पहचा'ने लंड के अप'ने गुदा में होते स्पर्श से मुझे बहुत अच्च्छा लगा.

प्रदीप मेरे साम'ने बैठ गया और अपना झाड़ा लंड मेरे मुँह में डाल'कर मेरा सिर अप'ने पेट पर दबा'कर हमारे साम'ने बैठ गया.

चलो शुरू हो जाओ अब . अगले आधे घंटे यह सामूहिक चुदाई चल'ती रही. मैं माजी के मम्मे दबाता हुआ उन'की गान्ड मार रहा था और प्रीतम मेरी. धीरे धीरे प्रदीप का लंड खड़ा हुआ और मेरे गले में समा'ने लगा.

जल्द ही मैं दम घुट'ने से छटपटा रहा था. मेरे पति का एक फूटिया लंड मेरे सीने तक उतर गया था. अब मैं हाथ पैर मार'कर छूट'ने की कोशिश कर रहा था. मेरा गला दुख रहा था और साँस रुक गयी थी. मैं साँस लेने की कोशिश करते हुए चीख भी रहा था पर मुँह से सिर्फ़ 'आम' 'आम' 'अघ' ऐसी आवाज़ निकल रही थी. बीच में मुझे लगा कि अब मैं मर जाऊँगा. किसी तरह हाथ पैर फटकार'ता हुआ रोता बिलख'ता मैं तडप'ता रहा पर वे तीनों मा बेटे मुझसे ऐसे चिपटे रहे जैसे उन्हें कोई परवाह नहीं है कि मैं जिऊ या मरूं, और मुझे भोगते रहे.

आख़िर मेरे झड'ने के बाद वे रुके. प्रीतम और प्रदीप ने अप'ने अप'ने तन्नाए लंड मेरी गान्ड और मुँह से निकाले और बारी बारी से अपनी मा की गान्ड में से मेरा वीर्य चूसा. मैं हांफ'ता हुआ अधमरा साँस लेने की कोशिश कर'ता हुआ लस्त पड़ा रहा. माजी उलाहना देते हुए बोलीं.

तुम लोग झाडे नहीं बहू के शरीर में? अब तो मौका आया है दुल्हन की असली चुदाई का मा! जब तक यह चप्पल खाएगी, हम लगातार इस'की गान्ड मारेंगे. एक मिनिट को भी इस'की गान्ड में लंड चलना बंद नहीं होना चाहिए. आख़िर हमारे खानादान की इज़्ज़त का सवाल है. सुहागरात में बहुएँ बिना रुके रात भर चुदाना चाहिए ऐसी प्रथा है हमारे यहाँ मा. प्रीतम अपनी मा की चूचियाँ दबाता हुआ बोला.

कितनी फिकर है मेरे जवान बेटों को अपनी बाहू के सुख की! मा भाव विभोर होकर बोलीं.

क्रमशः................
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07-26-2017, 10:58 AM,
#22
RE: Hindi Lesbian Stories समलिंगी कहानियाँ
यार बना प्रीतम - भाग (15)

गतान्क से आगे.......

बहू तू अब बाथ रूम हो आ. फ्रेश हो ले, फिर तुझे तेरे पति की चप्पल खिलाते हैं, तू बड़ी बेताब है उस'के लिए मुझे मालूम है. मैं किसी तरह बाथ रूम गया. अंग अंग दुख रहा था. आँखों में आँसू आ गये थे. अब तक मेरी मस्ती हवा हो गयी थी. मन में रुलाई छूट रही थी कि कहाँ फँस गया. पर अब मैं कहाँ जाता, इस परिवार से मेरी छुट्टी इस जनम में तो नहीं होगी ये मुझे मालूम हो गया था.

पंद्रह मिनिट बाद भी मैं जब नहीं निकला तो प्रदीप बुला'ने आया. मैने दरवाजा खोला तो पहले उस'ने मुझे एक करारा तमाचा मारा. मैं रोने लगा. वह बोला.

माधुरी रानी, मुझे लगा था कि आप'ने पातिदेव की चप्पल खा'ने को तू फटाफट खुशी खुशी आएगी पर तू तो रो रही है! यह नहीं चलेगा. तू गुलाम है हमारी, जैसा कहते हैं वैसा करना नहीं तो तेरी ऐसी हालत करेंगे कि तुझसे सहन नहीं होगी. तुझे चप्पल खा'ने का शौक है ना? आज खिलाता हूँ तुझे अपनी चप्पलें. ख़ास सुहागरात के लिए महीने भर से दिन रात पहन कर घूम रहा हूँ

मुझे गर्दन से पकड़'कर दबोच कर वह पकड़'कर बिस्तर पर लाया और मुझे पटक दिया. मुझे लिटा'कर मेरे मुँह में चप्पल देने की तैयारी होने लगी.

एक साथ देना प्रीतम की एक एक करके. प्रदीप ने पूच्छा.

अरे पूरी जोड़ी दो मेरी भाभी के मुँह में. मेरे साथ थी तो मुझे बार बार कह'ती थी कि प्रीतम राजा, जोड़ी दे दे मेरे मुँह में. मैने वादा किया था कि सुहागरात के दिन खिलाऊँगा. एक एक खा'ने में उसे मज़ा नहीं आएगा

प्रीतम मेरी ओर देख'कर बोला. बात तो सच थी पर आज चुदा चुदा कर मेरी हालत खराब थी. मुँह भी दुख रहा था. और प्रदीप की उन दस नंबर की चप्पालों को देख कर जहाँ मन में गुदगुदी होती थी वहीं बहुत डर भी लग रहा था. प्रीतम की चप्पलें तो पतली थी. प्रदीप की एक साथ लेकर तो मैं दम घुट कर मर जाऊँगा. मैं भयभीत होकर चुप रहा.

मा ने मेरे हाथ पकड़े और प्रीतम ने पाँव. प्रदीप तैयार होकर मेरा सिर गोद में लेकर बैठ गया. दोनों चप्पलें उस'ने जोड़ कर पंजे मेरे मुँह पर रखे. मैने चुपचाप मुँह खोल दिया. और क्या करता? पर उन बड़ी ज़रा मोटी रबड की चप्पालों की साइज़ देख'कर मैं घबरा गया था. एक एक चप्पल प्रीतम की पतली दो चप्पालों के बराबर थी जो उस'ने मुझे पहली बार खिलाई थी.

प्रदीप ने चप्पालों के पंजे मेरे मुँह में ठूंस दिए. फिर दबा दबा कर उन्हें मेरे मुँह में और घुसेड'ने लगा. मैं दर्द और दम घुट'ने से तडप'ने लगा. मा बोलीं

अरे धीरे धीरे प्यार से, नाज़ुक बहू है, उसे समय लगेगा तेरी बड़ी चप्पलें निगल'ने में.

अरे मा, कुच्छ नाज़ुक वाजुक नहीं है, नखरा कर'ती है, साली प्रीतम की चप्पलें कैसे गपा गॅप खा'ती थी! है ना प्रीतम? कहते हुए प्रदीप ने ज़ोर लगा'कर आधी चप्पलें मेरे मुँह में डाल दीं.

हां चप्पालों की बहुत शौकीन है माधुरी रानी. पूरी चप्पल जोड़ी मुँह में लेने को कब से आतुर है. मैने ही रोक दिया था कि अब पहले शादी के बाद अप'ने पति की चप्पलें खाना, बाद में मैं और अम्मा भी खिला देंगे.

प्रीतम ने मेरी ओर देख'कर मुस्कराते हुए कहा. पाँच मिनिट बाद जब बची खुची चप्पलें भी मेरे मुँहे में प्रदीप ने ठूंस दी तो मैं कराह कर बेहोश हो गया. आखरी दो तीन इंच मेरे मुँह में डाल'ने के लिए उसे अपनी पूरी शक्ति का उपयोग करना पड़ा. वह मेरे सीने के ऊपर चढ कर मेरी चून्चियो पर बैठ गया और अप'ने दोनों हाथ रख'कर कस कर दबाया जैसे टायर में ट्यूब ठूंस रहा हो. पकाक से पूरी चप्पलें मेरे मुँह में चली गयीं. मैं दम घुट'ने से और गालों में होते भयानक दर्द से होश खो बैठा. मेरे मुँह पर टेप लगा'कर उसे बंद कर दिया गया कि मैं उन्हें निकल'ने की कोशिश ना करूँ और मेरे हाथ पैर भी कस कर बाँध दिए गये.

आधी बेहोशी में ही मैने सुना की मा ने आप'ने बिटो को मेरा रस पीने की आगया दे दी.

अरे अब बहू को आराम से अप'ने पति की चप्पलें खा'ने दो. अब हम लोग भी कुच्छ खा पी लें. बहू का दूध नहीं पीना है क्या? चलो बारी बारी से ये मज़ा ले लो. और मैं उसका लंड चूस'ती हूँ. देखो कैसे लहरा रहा है. दूध मुझे भी चखाना

मेरी ब्रा और पैंटी अब निकाल दी गयी. प्रीतम और प्रदीप मेरी चूचियों पर टूट पड़े और माजी मेरा लंड चूस'ने लगीं. मेरी चूचियों को दबा दबा कर मसल कर उन'में से दूध निकाल कर दोनों भाई पी रहे थे. उधर मा मेरे लंड को चबा चबा'कर चूस रही थी जैसे गंडरी खा रही हों. मैं तडप कर झड गया. मा'ने पूरा वीर्य पी कर ही मुझे चोदा. फिर प्रीतम और प्रदीप को हटा'कर मेरी दुख'ती चूचियों में बचा दूध दबा दबा कर निकाला और पिया जैसे पिच'के आमों को निचोड़ रही हों उनका बचा खुचा रस निकाल'ने को.

फिर वे आपस में चिपट कर संभोग कर'ने लगे. मुझे मेरी हालत पर छोड दिया गया. दोनों भाई अपनी मा को आगे पीछे से चोद'ने लगे.

खूब चोदो मेरे लाडलो पर झड़ना नहीं. मा उचक उचक कर प्रीतम से गान्ड मरवाते हुए बोलीं. प्रदीप आगे से उन्हें चोद रहा था.

झड़ना बहू की गान्ड में. उस'की गान्ड आज इतनी मारी जानी चाहिए कि कभी यह ना कह स'के कि सुहाग रात में उस'के साथ इंसाफ़ नहीं हुआ . बीच बीच में दोनों अलट पलट कर मेरी गान्ड मार'ने लगते. प्रदीप मेरे मुँह को टटोल'ता और कहता.

अरे अभी तक नहीं खाई चप्पल? जल्दी खा रानी. सुबह हो जाएगी तो नाश्ता भी कराना है तुझे. कब से पेट में लिए घूम रहा हूँ! चल जल्दी चबा . और मुझे चबा'ने को मजबूर कर'ने के लिए कस कर मेरी चूची मरोड देता या चूचुक खींच'ने लगता.

वे दो तीन घंटे मेरे ऐसे गये जैसे मैं स्वर्ग नरक के अजीब से मिले जुले माहौल में हू. बदन और दुखते मुँह से मैं तडप तडप कर रो रहा था और चबा चबा कर प्रदीप की चप्पलें खा'ने की कोशिश कर रहा था. उधर इस विकृत कामक्रीड़ा से मेरे मन की अनकही चाहतों ने ऐसा सिर उठाया था कि लंड में बड़ी मीठी गुदगुदी हो रही थी. एक अपूर्व कामवासना मेरे रोम रोम में भर गयी थी. उन पुरानी पहन पहन कर मैली की हुईं चप्पालों का स्वाद भी मुझे बहुत मादक लग रहा था.

आख़िर रात को तीन बजे मेरा चप्पल खाना ख़तम हुआ. आखरी टुकड़ा मैने निगला और फिर लस्त पड आराम कर'ने लगा. प्रदीप, प्रीतम और मा चोद चोद कर सो गये थे. प्रदीप का लंड अब भी मेरी गान्ड में था. मेरी भी आँखें लग गयीं.

पहली सुबहा

सुबह मुझे झिन्झोड कर जगाया गया. अंग अंग दुख रहा था जैसे किसी ने रात भर तोड़ा मरोड़ा हो. गांद में अजब टीस थी, ज़ोर का दर्द था और कुच्छ मस्ती भी थी. मुँह ऐसे दुख रहा था जैसे गाल फट गये हों.

नींद खुलते खुलते मुझे अपनी बाँहों में उठा'कर चूमते हुए प्रदीप बाथ रूम ले गया. प्रीतम और माजी भी साथ में थे.

चलो बहू को भूख लगी होगी. प्रदीप जल्दी कर बेटा, मैं बहू को तेरी गान्ड में से तेरी टट्टी खाते देखना चाह'ती हूँ. फिर प्रीतम भी खिला देगा.

माजी बार बार प्रदीप से कह रही थी. आराम कर'ने से मेरा लंड फिर खड़ा हो गया था. पिच्छली रात की मेरे दुर्गति याद कर'के मुझे बड़ी मादक सनसनी हो रही थी. अब मैं अप'ने आप को कोस रहा था कि क्यों मैं रोया और चिल्लाया! यह तो मेरा भाग्य था कि इतनी तीव्र गंदी और विकृत कामवासना से भरी जिंदगी मुझे मिली थी. अब मुझे यह लग रहा था कि फिर से तीनों मेरे ऊपर कब चढ़ाएँगे!

अप'ने मसले दुखते बदन में होती पीड़ा को अनदेखा कर'के मैने प्यार से प्रदीप के गले में बाँहें डाल दीं और उसे चूम लिया. उस'की आँखों मे देखते हुए शरमा कर मैने कहा.

स्वामी, आप'ने, देवराजी और माजीने मुझे जो सुख दिया है, मैं कभी नहीं भूलूंगी. आप तीनों मुझे खूब भोगिए, अपनी सारी हवस निकाल लीजिए, मुझे चोद चोद कर मार डा'लिए प्लीज़, मुझसे यह चुदासी सहन नहीं होती अब. और मेरी एक और प्रार्थना है स्वामी! प्रदीप चूम कर मुझे बोला

बोल रानी, क्या चाह'ती है? क्या मुराद रह गयी तेरी सुहागरात में?

देवराजी की गान्ड तो मैने बहुत मारी है, माजी की भी मार ली, अब आप भी मरा लेना मेरे स्वामी, आप जो कहेंगे मैं करूँगी.

प्रदीप ने मुझे चूमते हुए कहा. 'तो यह चाह'ती है तू, चल अभी मार लेना. पहले तेरे मुँह में गान्ड खाली कर लूँ, फिर उस'में अपना यह हसीन लंड डाल देना. और तू फिकर मत कर रानी, तुझे तो हम ऐसे ऐसे चोदेन्गे और ऐसे ऐसे कुकर्म तेरे साथ करेंगे, तूने सोचे भी नहीं होंगे. हर तरह की नाजायज़, गंदी, हरामीपन की क्रियाएँ तेरे साथ हम कर'ने वाले हैं. साल भर में तुझे पीलापिला ना कर दिया तो कहना. अब चल, तुझे अपनी टट्टी खिलाता हूँ.

मुझे बाथ रूम में फर्श पर पटक'कर वह मेरे मुँह पर बैठ गया. उसे अब सहन नहीं हो रहा था. उसका लंड भी फिर तन कर खड़ा हो गया था. अप'ने सैंया के विशाल गठीले गोरे चूतड मैने पास से देखे तो वासना से सिसक उठा. मेरे पति के गुदा का छेद खुल बंद हो रहा था और उस'में से अंदर की ठोस टट्टी बाहर आने वाली थी. मैने मुँह खोला और बिना और कुच्छ कहे मेरा पति मेरे मुँह में हॅग'ने लगा. मोटी ठोस लेंडी मेरे मुँह में उतर'ने लगी. मैं भाव विभोर होकर उसे चबा चबा कर खा'ने लगा. मेरा लंड फिर कस कर खड़ा हो गया था और उस मस्ती में प्रदीप की गान्ड की टट्टी मुझे प्रसाद जैसी लग रही थी.

पाँच मिनिट में मैने प्रदीप की गान्ड खाली कर दी. कम से कम आधा किलो टट्टी निकली होगी. मेरी मदहोश वासना देख'कर प्रीतम और मा भी मस्ती में आ गये थे. प्रदीप की गान्ड मैने चाट कर सॉफ की और फिर तुरंत प्रीतम मेरे मुँह पर बैठ गया. दस मिनिट बाद अपनी गान्ड खाली कर'के जब वह उठा तो उसका भी लंड तन कर खड हो गया था. मा भी मूठ मार रही थी.

बहू एकदम रति देवी की मूरत है प्रदीप. अब तुम लोगों से मूतना तो होगा नहीं अप'ने खड़े लंडों से, मैं ही इस'की प्यास बुझा देती हूँ. कह'कर वे मेरे मुँह में मूत'ने लगीं.

मेरा पेट लबालब भर गया था और वासना से मेरा सिर सनसाना रहा था. मेरी हालत देख कर अब दोनों भाई मेरे ऊपर फिर चढ़ना चाहते थे, मैं भी यही चाह'ता था. पर मा ने मना कर दिया.

बहू को क्या वादा किया था प्रदीप? चलो गान्ड मराओ उससे. प्रदीप ज़मीन पर ओँदा लेट गया और मैं उसपर झुक कर उस'के चूतड चूम'ने लगा. क्या चूतड थे एकदम गठीले, कड़े और मास पेशियों से भरे. मैने उस'के गुदा में नाक डाली और सूंघ'ने लगा. फिर जीभ डाल'कर चाट'ने लगा.

जल्दी कर रानी. प्रदीप बोला. उसे मेरी जीभ का स्पर्श मतवाला कर रहा था.

बहू को मज़ा कर'ने दे मन भर कर. तू कर बहू क्या करना है. मैने मन भर कर अप'ने पति की गान्ड चूसी और आख़िर जब मस्ती से पागल सा हो गया तब उसपर चढ'कर उस'की गान्ड में अपना लंड डाल दिया. तन कर ख़ड़ा होने के बावजूद लंड आराम से गया. आख़िर वह अप'ने छोटे भाई प्रीतम से मरावाता था, गान्ड ढीली होनी ही थी.

क्रमशः................
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07-26-2017, 10:58 AM,
#23
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यार बना प्रीतम - भाग (16)

गतान्क से आगे.......

मैं उससे चिपट'कर अप'ने पति की गान्ड मार'ने लगा. मेरी चूचियाँ उस'की पीठ पर दब रही थी. उससे प्रदीप को भी मज़ा आ रहा था. प्रदीप भी मुझे हिम्मत दे रहा था.

मार रानी, मार मेरी गान्ड . मा ! मैं पहला पति होऊँगा जिस'ने सचमुच के लंड से अप'नी पत्नी से गान्ड मरवाई है! तीव्र सुख के साथ मैं अचानक झड गया और रोने लगा. रुलाई खुशी की भी थी और इस अफ़सोस से भी थी कि और देर मैं यह सुख नहीं ले पाया. मा ने मुझे दिलासा दिया.

बहू अब तू रोज मार सक'ती है तू. दिल छोटा ना कर, तेरा ही आदमी है, कभी भी इस'की गान्ड मार लिया कर. तुझे ना थोड़े कहेगा! ऐसा किया कर कि रोज इस'की टट्टी खा'कर इस'की गान्ड मारा कर. बहुत मज़ा आएगा. और कल से अब मैं टट्टी कर'ने का टाइम टेबल बना रही हूँ, आख़िर तीन तीन गान्डो का सवाल है. टट्टी खा'ने के बाद बहू का हक होगा उस गान्ड पर अगर वह मारना चाह'ती हो. प्रीतम तू आज बच गया. चल कल मरा लेना. फिर वे अप'ने दोनों मस्ताये बेटों से बोलीं.

अब बहू को स्नान कर'ने दो, सॉफ होने दो. बाद में इसे इस घर के तौर तरीके सीखा देंगे. एक टाइम टेबल भी बनाना है. प्यारी आ'टी होगी. उसे कहूँगी बहू को नहला दे. किसीने बाथ रूम का दरवाजा खटखटाया. माजी बोली.

लो प्यारी आ गयी. आ जा चंदा, तेरी ही राह देख रहे थे. दरवाजा खुला और पैंतीस की उम्र की एक साँवली भरे पूरे बदन की औरत अंदर आई. एकदम सेक्सी और देसी माल था. बड़ा सिंदूर, आधी खुली चोली जिस'में से बड़े बड़े मम्मे दिख रहे थे, और गाँव की स्टाइल में बाँधी साड़ी जिस'में से उस'की मोटी चिकनी टाँगें दिख रही थी. होंठ पान से लाल थे. मुझे घूरते हुए वह बोली.

तो ले आए बहू को? मैं तो मरी जा रही थी देख'ने को पर आप ने कहा कि सुहागरात के बाद ही आना इस'लिए कल रात ऐसे ही सदका लगा'कर सब्र कर लिया. बड़ी सुंदर है बहू, कितनी चिकनी है, कोई कह नहीं सक'ता कि लड़का थी, बस इस लंड से पता चल'ता है. लंड तो बहुत प्यारा है दीदी. और मम्मे? मैं तो वारी जाउ, क्या चूचियाँ हैं? पर बड़ी मसली कुचली और थ'की लग रही है बहू रानी. लग'ता है खूब मस्त सुहागरात हुई है दीदी. और हंस'ने लगी. माजी मुझे बोली.

बहू, यह है चंदा. हमारी नौकरानी है पर घर की है. इससे कोई बात छिपी नहीं है. मेरी ख़ास सहेली है. हम दोनों ने बहुत मज़ा किया है, अब तेरे साथ और करेंगे. आज से यही तेरा ख़याल रखेगी. तुझे हमारे भोग के लिए तैयार किया करेगी. इसका भी तुझ पर इतना ही हक है जितना हमारा. इसका कहा मानना. प्यारी तू बहू को नहला दे और तैयार कर. फिर बहू को सब समझाना है

मुझे प्यारी के सुपुर्द कर'के वे तीनों चले गये. जाते जाते प्रदीप उस'की चूची दबा कर बोला.

अब चढ मत जाना बहू पर प्यारी बाई, हम'ने काफ़ी ठुकायी की है!

अरे तू जा ना! मैं देख लूँगी बहू के साथ क्या करना है उलाहना देकर उस'ने सब को बाहर निकाला और दरवाजा लगा लिया. फिर कपड़े उतारते हुए बोली.

आओ बहू रानी तुम्हें नहला दू. पेट तो भर गया ना? कब से तैयारी हो रही थी तुम्हें खिला'ने पिला'ने की. कह'कर वह एक कुटिल हँसी हँसी और मेरी चूची ज़ोर से मसल दी. मैं कराह उठा. लग'ता है वह भी अपनी मालकिन और उस'के बेटों जैसी दुष्ट थी. पर थी बड़ी सेक्सी.

उस'के मोटे मम्मे, घनी झाँटें और तगडी जांघें देख'कर मेरा लंड उच्छल'ने लगा.

ओहो, तो मैं पसंद आई बहू रानी को! मुझे भी तू बहुत पसंद है बहू, बस अप'ने आप को मेरे हवाले कर से, देख मैं तुझे कहाँ से कहाँ ले जा'ती हूँ. चल अब नहा ले

प्यारी ने मुझे खूब नहलाया. मेरे बदन की मालिश की, मेरे बॉल धोए और अंत में मेरा लंड चूस डाला. दो मिनिट में मुझे झाड़ा'कर मेरा वीर्य पीकर वह उठ खड़ी हुई. मैं ना न करते रह गया क्योंकि मुझे डर था कि उन लोगों को पता चल गया कि मैं झड गया हूँ तो ना जा'ने क्या करें. प्यारी ने मुझे दिलासा दिया.

बहुत स्वाद है तुझ'में बहू. तू मत डर, किसी को पता नहीं चलेगा, अभी तुझे फिर मस्त कर देती हूँ, और पता चल भी जाए तो क्या, मेरा भी हक है तेरे बदन पर. अब चल, मेरी बुर चूस, तेरी सास तो दिवानी है इसकी, तू भी चख ले. फिर दूध पिला'ती हूँ तुझे मेरे चेहरे पर के भाव देख'कर वह हंस'ने लगी.

अरे तेरे पति को, तेरे देवर को मैने ही तो पिलाया है. अब भी पीते हैं बदमाश, जो बच'ता है उन'की मा पी लेती है. अब बैठ नीचे. मुझे नीचे बिठा'कर वह मेरे मुँह में अपनी चूत देकर खड़ी हो गयी और मुझे चूस'ने को कहा. एकदम देसी माल था उसका, चिपचिपा और तीव्र गंध वाला. उस'की बात सच थी. उस'की चूत चूस कर मेरा फिर ऐसा खड़ा हुआ जैसे बैठा ही ना हो.

फिर उस'ने प्यार से वहीं बाथ रूम के फर्श पर बैठ'कर मुझे गोद में लिया और अपना दूध पिलाया. एकदम मीठा और गरम दूध था. मैं तो निहाल हो गया. उस'की मोटी चूची पकड़'कर बच्चे जैसा उसका स्तनपान कर'ने लगा. दोनों स्तन आधे आधे पीला कर प्यारी ने मेरा बदन पोंच्छ कर जल्दी जल्दी साड़ी और चोली पहनाई. मेरे होंठों पर लिपस्टिक लगाई और माग में सिंदूर भरा

ब्रा बाद में पहन लेना. अभी काम है. चल बाहर, सब इंतजार कर रहे होंगे.

मेरी जिंदगी कैसी होगी

बाहर सब नहा धोकर मेरी राह देख रहे थे. आओ बहू, बहुत सुंदर लग रही हो. प्यारी ज़रा नज़र उतार देना मेरी बहू की. बहू अब तुझे समझा'ती हूँ कि तेरा दिन भर का क्या टाइम टेबल है. तुम लोग भी सुनो. माजी फिर मुझे गोद में बिठा'कर चूमते हुए बोली.

बहू, तेरा काम है सिर्फ़ संभोग, दिन रात हमसे चुदवाना और गान्ड मरवाना और जैसा हम कहते हैं वैसा करना. जब कोई चाहेगा , तुझे जैसे मन आए भोग लेगा. और हमारे लिए अपना मुँह हमेशा तैयार रखना. हम उस'में जो दें, वह प्यार से प्रसाद समझ कर खाना. मैं दिन भर घर में रह'ती हूँ इस'लिए मेरी सेवा तो तू हमेशा करेगी. प्रदीप सुबह काम पर जाता है और दोपहर में आता है. सुबह वह तुझे अपनी टट्टी खिला'कर और मूत पीला कर नाश्ता करा'कर जाएगा. जा'ने से पह'ले जैसे चाहे तुझे चोद लेगा. उस'के बाद तेरा नहाना धोना होगा. प्यारी तुझे नहलाएगी और तैयार करेगी. तेरी चूची में दिन में तीन चार बार दूध भी वही भरेगी. इस'के बाद प्रीतम तुझे दोपहर तक चोदेगा. मैं तो रहूंगी ही. दोपहर को प्रीतम अपनी गान्ड से तुझे खाना खिलाएगा और फिर काम पर जाएगा.

प्रदीप आ'कर सो जाएगा कि रात को तुझे ठीक से चोद सके. दोपहर को तू मेरी सेवा करेगी. प्यारी भी अपनी सेवा तुझसे कराएगी. मैं रात का खाना तुझे खिलाऊँगी बेटी, अपनी गान्ड में से मस्त टट्टी दूँगी तुझे. प्रीतम भी आ'कर आराम कर लिया करेगा. फिर हर रात तेरी ठुकायी होगी जैसे कल सुहागरात में हुई थी. हम तीनों मिल'कर तुझे चोदा करेंगे. आज से प्यारी भी अब साथ रहा करेगी. जब भी किसी भी कारण से तू खाली रहे, वह तुझे चोद लिया करेगी. तुझे यह भी अपनी गान्ड से खिलाएगी फिर कोई भी अपनी गान्ड में इसे फिट कर'के तुझे अपनी टट्टी खिला सक'ता है मैं डरते डरते बोला.

पर स्वामी, माजी, देवराजी, मैं तो खुद बड़े चाव से आप'की टट्टी खा'ती हूँ, हमेशा तैयार रह'ती हूँ. इस'की ज़रूरत क्या है?

ज़रूरत क्यों नहीं है रानी प्रदीप अपना लंड मुठियाता हुआ बोला.

मान लो मुझे, मा और प्रीतम को और प्यारी को भी एक साथ एक ही समय तेरे मुँह में हगाना हो तो तू ले नहीं पाएगी. मुँह बंद कर लेगी. ऐसे में ये यंत्र फिट कर'के तुझे तीन क्या, दस लोगों की टट्टी खिला सकते हैं ज़बरदस्ती. मान लो मा ने कभी अपनी सहेलियों को बुलाया रात को, तेरी मुँह दिखाई को, वे कभी कभी अपनी सहेलियों के साथ चुदाई का रतजगा कर'ती है. अब तो सोने में सुहागा हो जाएगा. औरतें तुझे आशीर्वाद के साथ साथ अपनी गान्ड का प्रसाद भी देना चाहेंगी, तब तुझे इतनी औरतों की टट्टी खिला'ने के लिए ये ज़रूरी होगा.

और एक बात है, तू मस्त रह'ती है तो खुद खा'ती है. एक बार तुझे खूब झड कर तेरी मस्ती गायब करके, तुझे चप्पालों से खूब पीट कर, तेरी सारी मस्ती उतार'कर फिर मैं तेरे मुँह में हगाना चाह'ता हूँ. तब पता चलेगा कि मेरी, अप'ने पति की या फिर मा या प्रीतम की टट्टी तुझे कैसी लग'ती है? तब तू नहीं खाएगी अप'ने आप, तब ये यंत्र काम आएगा. मैं डर'के रोने लगा. मा'ने मुझे पुचकारते हुए कहा.

रो मत बहू, आज थोड़े ना कर'ने वाले हैं. ये तो तुझे ब'ता दिया कि किसी दिन करेंगे. और एक बात है, वो जानवरों वाली पुस्तक तो लाना प्रीतम बेटा! प्रीतम जा'कर एक किताब ले आया. मेरी ओर देख'कर वह मंद मंद मुस्करा रहा था.

माजी ने किताब खोली और मुझे चित्र दिखा'ने लगीं. उन'में जानवरों और इंसानों के संभोग के चित्र थे. औरतों को चोदते कुत्ते या घोड़े, जानवरों के लंड चूसते स्त्री पुरुष और अंत में बाँध कर रखे किशोर लड़कों और लड़कियों को चोदते हुए जानवर. उस'में कयी छोकरे और छ्हॉकरियाँ डर और दर्द से रो भी रहे थे और कुच्छ बड़ी वासना से मस्ती में दिख रहे थे. कहीं कहीं तो एक किशोर या किशोरी पर तीन तीन चार चार जानवर चढये हुए थे. हर छेद में एक लंड था. एक चित्र में एक जवान खूबसूरत पुरुष की गान्ड में घोड़े का लंड घुसा हुआ था!

हम सोच रहे थे कि कुच्छ जानवर पाल लेना. प्रदीप दो माह बाद जा'कर खरीद लाएगा. इंसानों से रति कर'ने के लिए सीखे सिखाए मिलते हैं ऐसा मैने सुना है. सोच रहे हैं कि तीन चार बड़े कुत्ते और एक घोड़ा पहले ले आएँ. ह'में कबसे उत्सुक'ता है कि जानवरों के साथ रति करें. पर डर भी लग'ता है. अब तू आ गयी है तो पहले तुझे चुदवायेन्गे कुत्तों से और घोड़े से. तुझे उनका लंड चूस'ने पर मजबूर करेंगे. उत्तेजना से अब माजी अपनी बुर में उंगली कर रही थी. प्रदीप और प्रीतम भी ज़ोर ज़ोर से साँसें भरते हुए अप'ने लंड मुठिया रहे थे.

बड़ा मज़ा आएगा जब तीन कुत्ते तुझ पर चढ़ाएँगे. एक गान्ड मारेगा, एक लंड चूसेगा और एक मुँह चोदेगा. वैसे कुतिया भी ला सकते है कि तेरे लंड को उस'की चूत में दे दें या किसी कुत्ते की गान्ड में डाल दें. घ्होडे से तेरी गान्ड ज़रूर मरवाएँगे. और तू सही सलामत बच गयी तो फिर मैं भी चुदवा कर देखूँगी. प्रदीप से बड़ा लंड अब सिर्फ़ अरबी घोड़े का ही मिलेगा मुझे! हम लोग भी शुरू हो जाएँगे. तेरे साथ उन जानवरों की फिल्म निकाल'ने का भी प्लान है, बहुत पैसे मिलेगे. हमारी बहू हमारे लिए पैसे भी कमाएगी. मैं डर और वासना से बेहोश होने को था. रुलाई भी छूट रही थी और लंड तन कर उच्छल भी रहा था. मा बोलीं.

बहू को बात पसंद आ गयी, देखो कैसी खुश है!. चल बहुत हो गया. प्यारी जा, उसे तैयार कर. प्रीतम और प्रदीप के लंड अब फट जाएँगे बहू को नहीं चोदा तो. देखा बहू तू कित'ने प्यारे परिवार में आ गयी है! और सुन, आज चोद'ने के पहले सब मिल'कर ज़रा चप्पालों से उस'की पिटायी करो. कल पिटायी नहीं हुई थी उसकी, बुरा मान जाएगी, बोलेगी कैसी ससुराल है जहाँ मन भर के पिटायी भी नहीं होती बहू की. आज सटासट चप्पलें लगा लगा कर उसे पहले कुचल डालो, इतना पीटो की इसका कोमल शरीर गुलाबी हो जाए, फिर चढ जाना! वैसे वे रबड के कोडे भी पड़े हैं, कल इसे उलट लटक'कर इस'की सुनताई करना, मुँह में चप्पल भर देना कि चीख ना पाए.

प्यारी मुझे पकड़'कर ले गयी और मैं अपनी अगली जिंदगी के बारे में सोच'ता सिसक'ता हुआ खिंचाखींचा उस'के पीछे चल दिया.

तो दोस्तो कैसी लगी ये मस्त कहानी आप लोगो को बताना ज़रूर आपका दोस्त राज शर्मा

समाप्त
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Reply
07-26-2017, 10:58 AM,
#24
RE: Hindi Lesbian Stories समलिंगी कहानियाँ
मस्त कर गया पार्ट --01

दोस्तों ये कहानी काल्पनिक है भाइयों, आपको पढने के पहले ही वॉर्न कर दूँ कि मेरी इस कहानी में भी बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो शायद आप में से कुछ को अच्छी ना लगें! ये केवल एंटरटेनमैंट के लिये लिखी गयी हैं! इस में गाँड की भरपूर चटायी के बारे में, पिशाब से खेलने और उसको पीने के बारे में, इन्सेस्ट, गालियाँ, गेज़ और लडकियों के प्रति गन्दी गन्दी इन्सल्ट्स, फ़ोर्स्ड सैक्स, किन्की सैक्स वगैरह जैसी बातें हैं!इसकी रेटिंग कुछ पार्ट्स में एक्स।एक्स.एक्स. होनी चाहिये! इसमें चुदायी की ओवरडोज़ है! कभी कभी लगेगा, कि सिर्फ़ चुदायी ही जीवन है! जिस किसी को ये बातें अच्छी ना लगें वो कॄप्या आगे ना पढें!ये बात उन दिनों कि जब मैं सिर्फ़ 20 साल का हुआ करता था और होटल डिप्लोमा करके देहली में एक कम्प्यूटर कोर्स करने गया था! तब मोबाइल और ई-मेल्स नहीं थे, कम्प्यूटर भी नया नया आया था इसलिये गेज़ को ढूँढने के लिये सिर्फ़ इन्स्टिंक्ट, चाँस, लक और एक्सपीरिएंस ही इस्तेमाल होता था! अब तो मैं आराम से इंटरनेट के ग्रुप्स और चैट्स पर लडकों से मिलता हूँ मगर तब बात अलग थी! अभी मैं कुछ दिन से, इन्फ़ैक्ट डेढ साल से ज़ायैद नाम के एक लडके से चैट करता हूँ! उसने मुझे अपने फ़ेस के अलावा अपने जिस्म की बहुत पिक्स दिखाई हैं और खूब दिल खोल के चैट किया है! वो मुझे लम्बी लम्बी मेल्स लिखता है! लडका अभी शायद 18-19 का ही है, मुझे भी पता है कि वो मिलेगा नहीं! नेट पर अक्सर लोग मिलते हैं और बिछड जाते हैं... इंटरनेट कुम्भ के मेले की तरह है, जिसमें खो जाना आसान है!

इन्फ़ैक्ट, मैं जितने लोगों से नेट पर चैट करता हूँ उसमें से मिलते कम और बिछडते ज़्यादा हैं, मगर फ़िर भी आदत सी बन गयी है! जब तक ज़ायैद जैसे लडके, चाहे कुछ देर को ही सही, दिल बहलाते रहेंगे, मैं बहलता रहूँगा! मेरे ऑफ़िस में भी इसका चलन है! सभी साइड में एक विन्डो खोल कर चैट करते रहते हैं! वैसे आजकल मेरे ऑफ़िस में एक नया एग्ज़िक्यूटिव आया हुआ है! देखिये, उसके साथ कुछ हो पाता है या वो भी कुम्भ में खो जायेगा! इन्फ़ैक्ट अभी ये लिखते लिखते भी ज़ायैद से चैट कर रहा हूँ और वो चिकना सा सैक्सी एग्ज़िक्यूटिव भी मेरे आसपास ही अपना काम कर रहा है! अभी कुछ देर पहले, वो अपनी ड्रॉअर में कुछ ढूँढने के लिये बहुत देर तक झुका हुआ था! उसकी मज़बूत गाँड फ़ैल के मेरी नज़रों के सामने थी! उसकी थाईज़, पैंट के अंदर से टाइट होकर दिख रही थी!!! काश मैं उनको सहला पाता, उनको छू पाता या उनको किस कर पाता!

मेरी इस कहानी में भी बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो कुछ लोगों को बुरी लग सकती हैं! इसलिये मैं पहले ही बता दूँ कि ये कहानी भी मेरी और कहानियों की तरह केवल एंटरटेन्मैंट के लिये लिखी गयी है! इस में पता नहीं कितना सच है और कितना झूठ! बहुत सी ऐसी चीज़ों का विवरण है, जो मैने ना कभी की हैं और शायद ना कभी करूँगा... बस फ़ैंटेसीज़ हैं, या लोगों से सुना है, देखा है... इसलिये उनके बारे में लिखा है!
वैसे ऐसा कुछ भी नहीं है जो चुदायी शास्त्र में नहीं होता है! हम मे से बहुत लोग शायद मेरी कहानी के कैरेक्टर्स की तरह बहुत सी चीज़ें कर भी चुके होंगे! इसलिये भाइयों, इस कहानी को थोडा नमक मिर्च के साथ पढियेगा तो मज़ा आयेगा!

ये सब टाइप करने के कारण 'मेरा' वैसे भी कुछ खडा है और मैं चुपचाप अपनी ज़िप पर हाथ रख कर हल्के हल्के अपना लँड भी सहला लेता हूँ! कुछ देर पहले वो मेरी तरफ़ मुडा था और मुझे देख कर मुस्कुराया था! उसकी स्माइल बहुत ही सुंदर है! लगता है सारी की सारी गदरायी नमकीन जवानी जैसे पिघल कर होंठों पर आ गयी हो! उसकी उम्र 21 से ज़्यादा नहीं हुई होगी! वो हमारे यहाँ अपनी पहली जॉब ही कर रहा है और अभी दो महीने ही हुए हैं! पहले दिन ही उसकी जवानी मेरी नज़र में बस गई थी! मगर ये कहानी यहाँ शुरु नहीं होती है!

चलिये, आपको करीब 15 साल पहले ले चलता हूँ जब ये कहानी शुरु हो रही थी! मेरे कम्प्यूटर कोर्स के दिन थे! मैं जिस ढाबे पर खाना खाता था, वहाँ एक चिकना सा बिहारी लडका, असद, रोटियाँ बनाता था! उस ढाबे पर जाने का कारण ही था कि मैं उसकी जवानी आराम से निहार सकूँ! मैं ऐसी टेबल पर बैठता, जिससे मुझे वो तंदूर पर झुकता हुआ साफ़ दिखे और मैं उसकी निक्‍कर में लिपटी गदरायी गाँड और नँगी सुडौल माँसल जाँघों को देख सकूँ!

वो उम्र में मुझसे कुछ साल छोटा था मगर उसकी जवानी बडी उमँग से भरी थी! साले की पतली कमर चिकनी और गोरी थी, उसके बाज़ू कटावदार थे, रँग गोरा था, चूतड गोल और रसीले थे और आगे ज़िप के अंदर लौडा जैसे उफ़नता रहता था! वो चिकना और देसी था, मासूम सा मर्द, मुस्कुरा के रोटियाँ देता, मगर ढाबे की भीड में मैं बस उसको देख कर उसके नाम की मुठ ही मार सकता था! कभी रोटियाँ पैक करवाने के बहाने उसके पास कुछ देर खडा होकर उसको पास से देखता और वैसे ही मैने उससे काफ़ी दोस्ती कर ली!

उसका ढाबा मेरे रूम से एक घर आगे था, वो ग्राउँड पर था और मेरा रूम फ़र्स्ट फ़्लोर पर! अक्सर वो बालकॉनी से भी दिखता था! रात में वो वहीं ढाबे पर सोता! उसके साथ पाँच और लडके रहते थे! एक दिन ठँड में बारिश हो गयी तो एरीआ सूनसान हो गया! उस दिन 7 बजे ही आधी रात का सन्‍नाटा था! मैं जब उसके ढाबे पर गया तो वो और लडकों के साथ छुपा हुआ कम्बल ओढ कर टी.वी. देख रहा था! मैने भी दो पेग लगा रखे थे! वो हाथ मलता हुआ आया और तंदूर खोल कर रोटियाँ डालने लगा! दूसरे लडके ने मेरा खाना लगाया! उस दिन जब तीन रोटियाँ हो गयी तो मैने असद को अपने पास बिठा लिया! ठँड के मारे असद का सुंदर सा चेहरा गुलाबी हो गया था, उसके होंठ मुझसे बातें करने में थिरक रहे थे, वो एक पुरानी सी जैकेट पहने था!
'आज टी.वी. का प्रोग्राम है?' मैने पूछा!
'नहीं, ये साले आज कहीं से अध्‍धा ले आये थे...'
'तुम भी पीते हो क्या?'
'नहीं, मगर आज इन्होने पिला दी...'

मैं खुश हो गया! वो मुझे अचानक और ज़्यादा सैक्सी लगने लगा!
'तो क्या अब फ़िर प्रोग्राम चलेगा?'
'कहाँ... सब खत्म हो गयी... एक एक ही पेग बन पाया...'
'तो आज मेरे रूम पर आ जाओ, मेरे पास और भी है...'
'सच?'
'हाँ'
'मगर मैं कैसे आपके रूम पर आ सकता हूँ?'
'क्यों? इसमें क्या है, मैं चलता हूँ... तुम आ जाओ... इनको मत बताना, क्योंकि सबके लिये नहीं होगी...'

मैने उसको अकेले बुलाने का बहाना किया जो कामयाब रहा!
'नहीं नहीं... सबको थोडी पिलाऊँगा भैया...'
'तो आ जाओ'
'कुछ जुगाड करता हूँ...'
उसके साथ अकेले बैठ के दारू पीने की सोच के ही मेरा लौडा ठनक के खडा हो गया! उस दिन उसके चेहरे पर कसक, कामुकता और कसमसाहट थी! शायद मौसम ही इतना सैक्सी था, जिस वजह से उसकी जवानी हिचकोले खा रही थी! उसकी आँखों में एक पेग का नशा और एक कसक भरी प्यास थी जो शायद वैसे मौसम और माहौल में कोई भी गे या स्ट्रेट लडका महसूस कर सकता था और वैसे माहौल में चूत का बडा से बडा रसिया इतना कामातुर हो चुका होता कि वो गाँड मारने से भी परहेज़ नहीं करता!

मैं वहाँ पेमेंट करके उससे आँखों ही आँखों में इशारा करके बडी कामुकता से अपने रूम पहुँचा और वहाँ पहुँच के सिर्फ़ अपने बेक़ाबू लँड को ही सहलाता रहा! मेरे अंदर बेसब्री थी, पता नहीं साला कुछ करने देगा कि नहीं मगर फ़िर भी ये तो था कि मैं कम से कम उसकी जवानी को अकेले सामने बिठा के निहार तो सकता था! मैने जब चुपचाप खिडकी से नीचे झाँका तो वो नहीं दिखा मगर तभी मेरे दरवाज़े पर नॉक हुआ! मैने धडकते हुये दिल से दरवाज़ा खोला! वो अपनी उसी जैकेट और नीचे ट्रैक के ब्लूइश ग्रे लोअर में खडा था! ठँड के मारे उसकी हालत खराब थी!
'भैयाजी, बडी ठँड है... बहनचोद गाँड फ़ट गयी...'
'हाँ, ठँड तो बहुत है...'
मैने अपने लँड को छुपाने के लिये अपने लोअर के नीचे अँडरवीअर पहन ली थी!
'आओ, वोडका से गर्मी आ जायेगी...'
मैं बेड पर टेक लगा के आधा लेट के बैठ गया और वो बगल पर पडी कुर्सी पर बैठ गया, जहाँ मैने जानबूझ के कुछ अश्लील किताबें रख दी थी! मैने जल्दी जल्दी दो पेग बनाये और एक उसको दे दिया! साले ने गटागट अपना ग्लास खाली कर दिया!

'क्यों गर्मी आयी?' मैने पूछा!
'अभी कहाँ भैया, अभी तो ठँडी ही उतरी है...'
'एक और ले लूँ क्या?' मैने उसको एक और पेग दिया!
वो जब कुर्सी पर बैठा था तो उसकी सुडौल जाँघें फ़ैल गयी थीं और उसके लोअर से बाहर आयी जा रहीं थीं! उसके लँड के पास सलवटें पड गयी थीं और उसके टट्‍टे भी साफ़ पता चलने लगे थे! मेरी नज़र रह रह कर वहीं टिक रही थी! नशे में उसकी आँखें मस्त लगने लगीं थीं!. उसने मुझे अपना जिस्म निहारते हुए देखा! एक बार उसका हाथ नर्वसनेस में अपने आँडूओं पर गया और एक बार इंस्टिंक्टिली अपने लँड पर, मगर उसने कुछ देर में वहाँ से हाथ हटा लिया!

'आओ बेड पर बैठो ना आराम से...' मैने उसको इंवाइट किया!
'ठँड बहुत है भैया, कुछ ओढने का नहीं है...'
'आओ ना, रज़ाई ओढ कर साथ में बैठ जाओ...'
अब वो नशे में था! वो मेरे बगल में आ गया और मैने पैरों पर रज़ाई डाल ली! उसमें से पसीने की खुश्बू आ रही थी, तीखा मर्दाना देसी पसीना!
मैने बातों बातों में उसकी जाँघ पर हाथ रख कर हल्का सा सहलाया और फ़िर हाथ हटा लिया! उसकी जाँघ गर्म और मुलायम थी! कुछ देर में हमें एक दूसरे के बदन की गर्मी मिलने लगी तो रज़ाई कम्फ़र्टेबल हो गयी!
'ये किताबें कैसी हैं?'
'वहीं... लँड चूत वाली...' मैने डायरेक्टली कहा तो वो हल्का सा शरमाया! मगर लौंडा हरामी था!
'हाय... इस मौसम मे दारू के बाद गर्म गर्म चूत मिल जाती तो मज़ा आ जाता... खैर फ़ोटो ही दिखा दो भैया...' मैने एक पोर्न बुक उठा के उसका एक एक पेज उसको गोद में रख कर दिखाने लगा!
'अरे मेरी जान.. क्या आइटम है... साली की बुर देखो...' उसने एक नँगी लडकी की चूत देख के कहा! जब तक मैं दूसरी किताब पर पहुँचा वो कामातुर हो चुका था! मैं जब किताब उठाने के लिये उसके ऊपर से टेबल की तरफ़ झुका और उसकी जाँघ पर हाथ रख कर मज़ा लेने के लिये जैसे ही हाथ रखा तो वो हल्का सा ऊपर की तरफ़ हुआ और मेरा हाथ सीधा उसके लँड पर पडा जो उस समय तक पत्‍थर सा सख्त हो चुका था!

'अरे ये कहाँ थाम रहे हो?' उसने हरामीपने से कहा मगर मैने तब तक हाथ हटा लिया!
'अबे नशे में हाथ सरक गया...' मैने कहा!
'और साला सरक के सही निशाने पर पहुँच गया...'
'साला खडा है क्या?'
'और क्या, अब भी खडा नहीं होगा... तीर की तरह तना हुआ है... माल फ़ेंकने को तैयार...' उसकी बातें गर्म थी! मैने दूसरी किताब भी उसको दिखायी, इस वाली में चुदायी थी!
'बहनचोद, क्या चुदवा रही है साली...'
'इसका लौडा देखो, कितना मोटा है...'

फ़िर वो जब मूतने के लिये गया और वापस आया तो मेरी नज़र उसके खडे लँड पर पडी जो उसकी लोअर को तम्बू की तरह उठाये हुए था! मैं उसको देखता रहा, वो जब फ़िर मेरे बगल में बैठा तो मैं रज़ाई सही करने के बहाने एक बार फ़िर उसके लँड को सहला दिया और इस बार हल्का सा मसल दिया! मेरे ऐसा करने पर इस बार उसके चेहरे पर एक हरामी सी मुस्कुराहट आ गयी और आँखों में चमक!
'क्यों लँड खडा है क्या?'
'और क्या भैया, इतना भरपूर आइटम दिखाओगे तो साला ठनक ही जायेगा ना...'
वो मेरे बगल में था और जब हम एक दूसरे की तरफ़ मुह करके बातें करते तो उसकी गर्म साँसें मेरे चेहरे से टकराती!
'कोई लडकी वगैरह पटायी क्या?' मैने फ़िर पूछा!
'अरे ढाबे पर लडकी कहाँ मिलने वाली है... साले सब लडके होते हैं...'
'हाँ वो तो देखा है मैने...' मैने जवाब दिया!
'यहाँ तो लडकों के साथ ही रहना होता है... आप तो अकेले रहते हो, आप कोई लडकी नहीं लाये कभी?'
'मुझे तो मिलती ही नहीं यार...'

मैने अब रज़ाई के अंदर अपना हाथ आराम से उसकी चिकनी माँसल जाँघ पर रखा तो वो कुछ बोला नहीं!
'तो तुम अकेले सोते हो?'
'कहाँ भैया, आजकल तो एक रज़ाई में तीन लडके सोते हैं...'
मैने अब उसकी जाँघों को सहलाना शुरु किया!
'लडकों के साथ सोने में खतरा नहीं है?'
'कैसा खतरा... हमसे खतरनाक कौन हो सकता है?'
'अच्छा... कैसे?'
'बस लँड खडा हो जाता है कभी कभी... मगर किसी ने कुछ कोशिश की तो साले का छेद बंद कर दूँगा...'
'कैसे?'
'गाँड में लौडा डाल के... और कैसे...'
'मतलब लडको के साथ ही?'
'जब लडके ही मिलते हैं तो क्या करूँ?'
मैने अब अपना हाथ थोडा ऊपर खिसकाया!
'गाँड मार चुके हो क्या?'
'आप को क्या लगता है?'
'मुझे क्या लगेगा...'
'लौडे का साइज़ देख कर समझ नहीं आया?'
'लौडा कहाँ देखा?'
मेरा हाथ अब उसकी जाँघ को, लौडे के बहुत करीब और दोनो जाँघों के बीच के हिस्से की तरफ़ सहलाने लगा!
'ऊपर से दिखा तो होगा ना...'
'ऊपर से आइडिआ कहाँ लगता है?'
'तो क्या अंदर से आइडिआ लगाना चाहते हो?'
मैं अब गर्म हो रहा था और जल्द से जल्द उसकी बाहों में समा जाना चाहता था!
'अंदर से कैसे यार?'
'पजामे में हाथ डाल के और कैसे?'
'तुम बुरा मान जाओगे...'
'इसमें बुरा मानने की क्या बात है? आपको इतनी देर से सहलाने तो दे रहा हूँ...'
मैं थोडा झेंपा... लगता था लडका तैयार है!
'मगर लँड कहाँ सहलाया?'
'उसके पास तो पहुँच रहे हो...'
मैने अब और रास्ता नहीं देखा और अपनी हथेली उसके लँड पर रख दी तो उसका लँड उछला, साला गर्म और सख्त हो गया था! अच्छा मोटा और लम्बा लँड था!
'अआह भैया... सिउउहहआहह... ऐसे क्या मज़ा आयेगा... अंदर हाथ घुसाओ ना...'
'अबे तू तो बडा खिलाडी है...'
मेरे ये कहने पर वो हल्के से हँसा!
'हा हा हा... ये खेल तो अपने आप आ जाता है...'
मैने अब अपना हाथ उसकी लोअर की इलास्टिक पर फ़िराया!
'अंदर डाल के मसल दो ना...' जब उसने कहा तो मैने अपना हाथ उसकी लोअर के ऊपरी हिस्से से अंदर घुसा दिया! अंदर उसका लौडा उफ़ान पर था, मैने अपनी उँगलियों से उसकी नयी नयी झाँटें सहलायी, उनमें अपनी उँगलियों को नचाया तो उसने फ़िर सिसकारी भरी! फ़िर मैने उसके लँड को पकड लिया और उसके सुपाडे पर अपना अँगूठा फ़िराया तो पाया कि वो प्रीकम से भीगा हुआ था! मैने उसके प्रीकम को उसके लँड पर रगड दिया वो अब मेरे क़ाबू में आने लगा था! उसका लँड मेरे हाथ में नाच रहा था, तभी उसका हाथ मेरे लँड की तरफ़ आया!
'अपना भी दिखाइये ना...' कह कर उसने मेरे लँड पर अपना मुलायम और गर्म हाथ रखा तो मेरा लौडा भी मचल गया! मैने उसके कँधे पर सर रख के उसकी गर्दन को हल्के से अपने होंठों से छुआ! वो पसीने के कारण नमकीन सी थी और वहाँ उसके पसीने की खुश्बू भी बहुत तेज़ थी! मैने अब हाथ पूरा उसकी लोअर में घुसा दिया और वैसे ही उसकी पूरी जाँघें सहलाने लगा! बीच में मैं हाथ ऊपर तक लाकर उसके टट्‍टों को थाम के हल्के हल्के दबाता भी था और उसके लँड को पकड के दबा देता था!

वो भी अब मेरे ट्रैक के अंदर हाथ घुसा कर मेरे लँड को सहला रहा था, उसने जब मेरी अँडरवीअर के अंदर उँगलियाँ घुसायी तो मेरी सिसकारी निकल गयी! कुछ देर बाद हमने एक दूसरे को मुड के देखा और फ़िर एक दूसरे से लिपट के लेट गये और अपने लँड को आपस में भिडाने लगे! मैने उसकी एक जाँघ को अपनी जाँघों के बीच फ़ँसा के दबा लिया और उनसे ऐसे रगडने लगा कि मेरा घुटना उसके लँड तक जाने लगा! इस बीच मैने पहली बार उसकी कमर सहलाते हुये उसकी गाँड को सहलाना भी शुरु कर दिया तो वो भी मेरी गाँड सहलाने लगा!

'क्या करवायेगा?' मैने कामातुर होकर उससे पूछा!
'क्या करेंगें?' उसने पूछा!
'चूस लूँ क्या?'
'चूस लो...'

फ़िर हम धीरे धीरे नँगे हुए! उसने अपना लोअर उतार के मेरी ट्रैक और अँडरवीअर भी उतरवा दिये! मैं रज़ाई में नीचे सरका और फ़िर अपने होंठ उसकी झाँटों में लगा दिये तो मेरी नाक उसके पसीने की खुश्बू से मस्त हो गयी! उसने सिसकारी भरी 'सिउउहहह...' मैने अपना एक हाथ ऊपर करके उसका सीना सहलाया! उसके सीने पर कटावदार मसल्स थी, मैं एक एक करके अपने अँगूठे से उसकी चूचियाँ रगडी! वो और मस्त हो गया और दूसरे हाथ को उसकी जाँघों के बीच फ़ँसा के उसके टट्‍टे दबा के सहलाने लगा! और वैसे ही अपनी उँगलियों से उसकी गाँड के छेद के पास भी सहला देता! उसकी गाँड पर अभी बाल नहीं थे! गाँड चिकनी और गर्म थी! मैने उसके भीगे हुये सुपाडे पर अपने होंठ रखे तो उसकी साँस रुक गयी! मैने ज़बान निकाल के एक बार उसके सुपाडे पर फ़िरायी तो उसके प्रीकम का नमकीन टेस्ट महसूस हुआ! मैने अपने होंठों को हल्का सा खोल के उसके सुपाडे को उनसे भींचा, प्यार से पकड के दबाया तो उसकी सिसकारी से माहौल भर गया!
'हाय... इइइससस... उउउहहह... भैया...'
'क्यों, मज़ा आया?' मैने पूछा!
'बहु...त... मगर अभी तो आपने शुरु किया है...'
'हाँ बेटा, अब देखना... आगे आगे कितना मज़ा देता हूँ...'

उसने रज़ाई में हाथ घुसा के मेरा सर अपने दोनो हाथों से पकड लिया और मैने अपने मुह को खोल के उसके सुपाडे को चूसना शुरू कर दिया! मैने अब अपना एक हाथ उसकी गाँड पर आराम से रख के उसको दबा के रगडना शुरु कर दिया और उसके छेद तक अपनी उँगलियाँ प्यार से रगडने लगा! उसकी गाँड हल्के हल्के चुसवाने के मोशन में आने लगी! उसका लँड धीरे धीरे मेरे हलक तक घुसने और निकलने लगा और उसकी गाँड भिंच भिंच के आगे पीछे होने लगी!

अब रज़ाई के अंदर चुसायी की 'चप चप' गूँजने लगी और उसका लँड सधे हुये अँदाज़ में मेरा मुह चोदने लगा! कुछ देर में हमने रज़ाई हटा दी! अब वैसे ही गर्मी हो चुकी थी! उसका गोरा बदन नँगा होकर और ज़्यादा मस्त लग रहा था! मैं दूसरे हाथ से उसकी जाँघ और टट्‍टे सहला रहा था! उसने मेरा सर पकड रखा था! फ़िर उसके धक्‍के तेज़ होने लगे, वो मेरे दाँत हिला हिला के अपने लँड की मार से मेरे मुह को मस्त कर रहा था और साथ में सिसकारियाँ भरे जा रहा था!

फ़िर उसका लँड मेरे मुह में फ़ूलने लगा, और हिचक के दहाडने लगा! उसके धक्‍कों में अग्रेशन बढ गया! उसकी सिसकारी, मोनिंग में बदलने लगीं! वो सिसकरियाँ ले लेकर करहाने लगा!
'अआहहह... हा..ये... अआहहह...' तो मैं समझ गया कि अब किसी भी पल उसका माल झड जायेगा और फ़िर उसका सुपाडा उछला और उसने मेरे सर को अपने हाथ से भरपूर जकड के सिसकारी ली 'हाँ... अआहहह...' और फ़िर उसके लँड से बुलेट की तरह वीर्य की पहली धार सीधे मेरे हलक से टकरायी और उसके बाद सिसकारियों के साथ उसके लँड ने हिचकोले खाना शुरु किया और अपना गर्म गर्म वीर्य मेरे मुह में झाड दिया! जब वो थोडा शांत हुआ तो मैने वैसे ही लेटे लेटे उसका वीर्य हलक के अंदर निगल लिया और फ़िर जब उसके लँड पर ज़बान फ़ेरी तो उसके नमकीन और मर्दाने टेस्ट का अहसास हुआ! मैने उसके झडे हुये लँड को भी खूब चूसा!

उसके बाद वो उठा! अब वो थोडा डिस-इंट्रेस्टेड सा लगा और अपने कपडे पहनने लगा!
'यहीं सो जा ना...' मैने कहा तो वो कोल्डली बोला 'नहीं यार, लौंडे सोचेंगे कहाँ गया?'
'फ़िर आयेगा?'
'देखूँगा...'
'देखना क्या है... आ जाना ना... मज़ा नहीं आया क्या?'
'मज़ा तो ठीक है और भी सब देखना पढता है... चल दरवाज़ा बन्द कर ले, मैं चलता हूँ...'

वो चला तो गया मगर मुझे काफ़ी मस्त कर गया! उसके जाने के बाद मैने उसके नाम की मुठ मारी! अगले कुछ दिन वो मुझसे नज़रें बचा के कतराता रहा तो मैं समझ गया कि लौंडे को शायद शर्म और गिल्ट है इसलिये मैने भी ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया! इस टाइप के लौंडे मुझे पहले भी बहुत मिल चुके थे!
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Reply
07-26-2017, 10:59 AM,
#25
RE: Hindi Lesbian Stories समलिंगी कहानियाँ
2उसके करीब हफ़्ते भर बाद मेरे घर से लैटर आया जिसमें लिखा था कि वहाँ के मोहल्ले के एक भैया अपनी जॉब के इंटरव्यु के लिये आ रहे हैं और मेरे रूम पर 2-3 दिन रुकेंगे! राशिद भैया मुझे बहुत पसंद भी थे इसलिये मैं खुश हो गया! वो मुझसे 7 साल बडे थे और काफ़ी सुंदर और हैंडसम थे! रँग गोरा और कद लम्बा था, चेहरा सैक्सी, बदन गठीला और मस्क्युलर... टाइट कपडों में बडे लुभावने लगते थे! वो डिस्ट्रिक्ट लेवल के बॉलर थे और काफ़ी नॉर्मल से अग्रेसिव मर्द थे! मैने कभी उनके साथ कुछ ट्राई तो नहीं किया था मगर बस वो उनमें से थे जिनको मैं सिर्फ़ देख कर ही नज़रें गर्म कर लेता था! मैं लास्ट उनसे उनकी शादी के वक़्त चार साल पहले मिला था, उसके तुरन्त बाद पता चला कि उनको एक लडका भी हो गया और अब तो शायद उनको दो लडके थे और उनकी बीवी फ़िर प्रैगनेंट थी! वाह क्या मर्द था, साला शादी के बाद चूत का भरपूर इस्तेमाल कर रहा था! वैसे उसकी कसमसाती हुई मज़बूत जवानी से इससे कम की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिये थी!

वो लैटर पढते ही मैं खुश हो गया, उस दिन क्लास में भी बहुत दिल लगा और क्लास के लडके भी बहुत ज़्यादा अच्छे लगे... स्पेशिअली मर्दाना और अक्खड विनोद सिशोदिया, जो एक बडा हरामी जाट लडका था और कभी कभी ही क्लास में दिखता था! साले की भरपूर जवानी उससे संभाले नहीं संभलती थी! उस दिन वो बेइज़ कलर की टाइट सी पैंट में मेरे ही आगे बैठा अपने बगल वाले लडके से गन्दी गन्दी बातें कर रहा था! अचानक टीचर ने उसको खडा किया तो मेरी नज़र उसकी मज़बूत गाँड पर पडी! अचानक उठने के कारण उसकी गाँड पर पैंट की कुछ सलवटें थी, उसके गोल गोल चूतड गदराये और भरे हुये थे! उनके बीच उसकी पैंट की सिलाई सीधी उसके छेद के पास से घुसती हुई उसके आँडूओं के नीचे की तरफ़ जा रही थी! उसने एक हाथ से अपनी बैक पॉकेट सहलायी! उसका हाथ भी मस्क्युलर और बडा था! एक एक उँगली गदरायी हुई थी! जब वो सवाल का जवाब नहीं दे पाया तो टीचर ने उसको खडे रहने के लिये कहा! अब मेरा ध्यान क्लास में कहाँ लगता क्योंकि मुझसे कुछ ही दूर पर विनोद की जवानी खुल के मेरे सामने जो थी! मैने उस दिन उसकी गाँड और पिछली जाँघ की जवानी और कशिश को खूब जी भर के निहारा! फ़ाइनली लैक्चर के बाद सब बाहर आये तो विनोद टीचर को गन्दी गन्दी गालियाँ देता रहा! उस दिन वो मेरे साथ ही कैन्टीन में चाय पीने के लिये बैठ गया, साथ में कुछ और लडके भी आ गये मगर मैं सिर्फ़ विनोद की जवानी ही निहारता रहा क्योंकि वो कभी कभी ही मिलता था!

'यार, ये बहन का लौडा, सर मेरी गाँड मारता रहता है...' विनोद बोला तो कुणाल ने उसका साथ दिया!
'हाँ, लगता है... उसको 'तेरी' पसंद आ गयी है...' बाकी लडके हँसे!
'साला मूड घूम गया ना तो किसी दिन पलट के उसकी गाँड में लौडा दे दूँगा...' सब फ़िर हँसे!
'हाँ, साला जब देखो, गाँड मारता रहता है...' उसके मुह से वैसी बातें बडी सैक्सी लग रहीं थी, साथ में वो कभी कभी अपने आँडूए और लँड भी अड्जस्ट करता जा रहा था! बिल्कुल स्ट्रेट, मादक और अग्रेसिव जाट था! मैं बस मन मसोस कर उसको ही देखता रहा, और कभी कभी कुणाल को... जो था तो हरामी मगर उसमें मासूमियत और चिकनापन भी था! कुणाल विनोद के एरीये में ही कहीं रहता था इसलिये दोनो कुछ फ़्रैंक थे!
'साले ने ज़्यादा परेशान किया तो इसकी बेटी की चूत में लौडा दे दूँगा...'
'इसकी बेटी कहाँ मिलेगी?' मैने पूछा!
'अरे यहीं आगे स्कूल में पढती है... साली बडा कन्टाप माल है, स्कर्ट कमर मटका के जाती है...' मेरा मन और मचल गया! मैं ये सोचने लगा कि अगर विनोद जैसे गबरू मर्द ने अपने शेर जैसे लौडे से सर की नाज़ुक सी बेटी को चोदा तो उसका क्या हाल होगा! मुझे तो विनोद की गाँड उठती और गिरती हुई दिखने लगी!
कुणाल ने अपना एक हाथ विनोद की जाँघ पर रखा और बोला 'अबे, मैं चलता हूँ...'
'ठीक है मादरचोद, मगर ये जाँघ क्यों सहला रहा है साले... लौडा पकडेगा क्या?'
'अबे हट भोसडी के... अभी इतने बुरे दिन नहीं आये हैं...' सब फ़िर हँसने लगे!

मैं उनकी बातों से सिर्फ़ गर्म होता रहा, फ़िर जब लँड खडा हो गया तो सोचा, पिशाब कर लूँ तो शायद लँड थोडा बैठ जाये! मैं कैन्टीन के पीछे की तरफ़ ओपन एअर टॉयलेट के भी पीछे मूतने के लिये चल पडा! वहाँ मैं इसलिये जाता था कि वहाँ सूनसान में कोई होता नहीं था इसलिये मैं अपने लँड को आराम से खोल के उसकी ठनक कम कर सकता था! एक बार तो मैने वहाँ खडे खडे मुठ भी मारी थी मगर उसके बाद हिम्मत नहीं पडी थी! मैने वहाँ पहुँच कर अपनी पैंट से लौडा बाहर निकाला, जो उस समय पूरा मस्त ठनक के खडा था और मूतने के पहले विनोद की जवानी याद करके अपना लँड हल्के हल्के मसलने लगा! बिल्कुल ऐसा लगा कि विनोद मेरे सामने नँगा हो रहा है! मेरे लँड में उसके नाम की गुदगुदी हो रही थी! इतना मज़ा आया कि मेरी तो आँख एक दो बार बन्द सी होने लगी! अभी मज़ा मिलना ही शुरु हुआ ही था कि अचानक कुछ आहट हुई और एक और लडका उधर की तरफ़ आता दिखा!

मैं उसको जानता था, उसका नाम धर्मेन्द्र था और वो इलाहबाद का रहने वाला था जो मेरे साथ ही कोर्स करने वहाँ से आया था! धर्मेन्द्र मुझे देख के मुस्कुराया मगर कुछ पल में उसकी नज़र मेरे लँड पर पडी तो मैने देखा कि उसने कुछ ज़्यादा इंट्रेस्ट लेकर मेरे लँड को देखा! वैसे धर्मेन्द्र उस टाइप का लगता तो नहीं था, काफ़ी हट्‍टा कट्‍टा साँवला सा गदराया हुआ स्ट्रेट लौंडा लगता था जो नयी नयी जवानी में शायद किसी चूत की सील तोडने के सपने देखता होगा मगर शायद मेरे खडे लँड को देख के उसको कुछ अटपटा लगा! उसकी आँखों में एक झिलमिल सा नशा सा दिखा! उसके होंठ हल्की सी प्यास से थर्राये और फ़िर वो मुस्कुराते हुये मेरे कुछ ही दूर पर खडा होकर अपनी ज़िप खोल के जब मूतने लगा तो मुझ से भी ना रहा गया और मेरी नज़र भी उसके लँड पर पडी जो काफ़ी बडा और मोटा था!

उसने अपना लँड कुछ इस स्टाइल से पकडा हुआ था कि मुझे साफ़ दिख रहा था और जब उसने अपना लँड छुपाने की कोशिश नहीं की तो मैने भी उससे अपना लँड नहीं छुपाया! उसका लँड भी खडा सा होने लगा और कुछ देर में भरपूर खडा हो गया! हम एक दूसरे से कुछ बोले नहीं, बस चुपचाप प्यासी सी नज़रों से एक दूसरे का लँड देखते रहे! मस्ती इतनी छा गयी कि मूतने के बाद भी लँड अंदर करने का दिल नहीं कर रहा था! धर्मेन्द्र भी अपना लँड हाथ में लिये मुझे आराम से दिखा रहा था! तभी किसी और की आहट आयी तो हम दोनो ने ही अपने अपने लँड अपनी ज़िप में घुसा के बन्द किये और वहाँ से वापस हो लिये! जब मैं विनोद की तरफ़ जा रहा था तो धर्मेन्द्र मुझे गहरी नज़रों से देखता हुआ वहाँ से गुज़रा! उसकी आँखें मुझे कुछ इशारा कर रहीं थी! बस किसी तरह उसके साथ सैटिंग करनी थी, लगता था धर्मेन्द्र का काम तो हो गया था! एकदम अन-एक्स्पेक्टेड मगर सॉलिड लौंडा!

विनोद अब अकेला था, बाकी जा चुके थे!
'आजा बैठ ना... क्यों, तू जा नहीं रहा है क्या?'
'जाना तो है यार...'
'किस तरफ़ रहता है?' उसने पूछा तो मैने अपना एरीआ बताया!
'मुझे उसी तरफ़ जाना है, चल तुझे बाइक पर छोड दूँ...' उसने जब ऑफ़र दिया तो मैं तैयार हो गया! उसके पास बुलेट थी जो उसकी देसी जवानी को सूट कर रही थी, उसने किक मार के स्टार्ट की और जब टाँगें उठा के उस पर बैठा तो अचानक उसकी पैंट बहुत ज़्यादा टाइट हो गयी और टी-शर्ट भी पीछे से ऐसी उठी कि उसकी अँडरवीअर की इलास्टिक और कमर दिखने लगी! मैं जल्दी से उसके पीछे बैठ गया! मेरी जाँघ एक दो बार उसकी कमर से टच हुई और एक दो बार मैने बातों बातों में उसके कंधे और एक दो बार उसकी जाँघ पर भी हाथ रखा! ये पहला मौका था, जब मुझे वो सब करने को मिल रहा था!

उसने मेरी गली पर असद के ढाबे के सामने ही बाइक रोक दी तो मैने उसको चाय पीने के लिये रोक लिया! वो मेरे रूम पर आ गया!
'तू अकेला रहता है?'
'हाँ...'
'तब तो बढिया है... कभी अपने रूम की चाबी दे दियो यार...'
'क्यों क्या करेगा?' मैने मुस्कुरा के पूछा!
'रंडी लाऊँगा...'
'अच्छा यार, ले लेना चाबी...'
'अबे कभी दारू वारू का प्रोग्राम बना ना... यहाँ तो बढिया सैटिंग है...'
'हाँ यार, कभी भी बना ले...' वो भी एक्साइटेड हो गया!
'वाह यार, मज़ा आ जायेगा...' उस दिन हम थोडा फ़्रैंक हुये!
'चल तुझे किसी दिन अपना एरीआ दिखा दूँ... देख ले, जाटों का मोहल्ला कैसा होता है...'
'ठीक है यार, कभी भी बुला लेना... चल पडूँगा...'

अब तो मुझे विनोद और भी सैक्सी लगने लगा था! मेरे मन में तो कीडा घूमने लगा! अभी ढाबे से एक लडका चाय ले आया! वो नया सा था, मैने उसको पहले नहीं देखा था! कमसिन सा, गुलाबी, गोरा, नाज़ुक सा लौंडा था!

'क्यों, तू नया है क्या?'
'जी भैयाजी...'
'क्या नाम है?'
'विशम्भर...'
'कहाँ का रहने वाला है?'
'बीकानेर का...'
'ला बे, इधर रख दे चाय...' विनोद उससे बोला फ़िर जब वो चला गया तो वो अचानक बोला 'साला बडा चिकना सा था...'
'क्या मतलब यार... कौन चिकना था?' मेरे मन में तो उसकी बात से उमँग जग उठी!
'यही ढाबे वाला... साले के होंठ और कमर देखे थे लौंडिया की तरह थे...'
'अबे तू ये सब क्यों देख रहा था?'
'साले, जवान हूँ... देखने में क्या जाता है... हा हा हा हा...' फ़िर उसने बात पलट दी!

मुझे अँधेरे में उम्मीद की एक किरण दिखी! अब मुझे लगा उससे दोस्ती बढाने में फ़ायदा है! उससे जाते जाते मैने उसके घर जाने का प्रॉमिस किया और उससे भी अपने रूम में आते रहने के लिये कहा! उसके जाने के बाद विशम्भर ग्लास लेने आया तो मैने उसको तबियत से ऊपर से नीचे तक निहारा! वो एक टैरिकॉट की पुरानी सी व्हाइट पैंट पहने था और साथ में एक फ़ुल नैक का स्वेटर!
'क्यों, कब से आया है?'
'मैं यहाँ तो परसों से ही आया हूँ... पहले मालिक के घर पर काम करता था...'
'अच्छा, बढिया है... यहाँ आ जाया कर... बैठ के बातें करेंगे...'
'जी भैयाजी' वो सच में बिल्कुल मिश्री की डली की तरह मीठा और काजू की तरह मसालेदार लौंडा था! मैने उसकी नज़र के सामने ही उसको निहारा और अपने होंठों पर ज़बान फ़ेरी!
'रात में खाना ले आना...'
'कितने बजे?'
'कितने बजे सोता है तू?'
'जी आजकल तो 12 बजे...'
'ठीक है... उसके पहले जब टाइम हो, ले आना...'

जब मैने विशम्भर को भेज के दरवाज़ा बन्द कर रहा था तो सामने से एक बडा मादक लौंडा आता दिखा! वो कुछ नये से अन्दाज़ में इधर उधर देख रहा था और उसके कंधे पर एक बैग टंगा था! यही कोई 17-18 साल का चकाचक पीस था जो एक सुंदर सा मल्टी कलर्ड स्वेटर और ब्राउन कार्गो पहने था! मस्त सा देसी चिकना था जिसके चेहरे पर अभी बाल भी नहीं आये थे और आँखों मदमस्त भूरी थीं! उसने मुझसे गौरव के बारे में पूछा, जो मेरे रूम के ऊपर वाले रूम में सैकँड फ़्लोर पर रहता था! वो लडका चला गया मगर मैने उतनी सी देर में उसके जिस्म के हर कटाव को देख-पढ लिया!

अभी मैं दरवाज़ा बन्द करके लौटा ही था कि फ़िर नॉक हुआ! खोला तो पाया, वही लडका था!
'गौरव तो शायद है नहीं, क्या मैं कुछ देर यहाँ बैठ जाऊँ?' वो जब कमरे में आकर मेरी पलँग पर बैठा तो मैने पाया कि वो उससे कहीं ज़्यादा खूबसूरत था, जितना मुझे पहली नज़र में लगा था! मैने उसको जी भर के निहारा! काफ़ी देर होने पर भी गौरव नहीं आया!
'चिन्ता मत करो, यहीं सो जाना...' मैने उसको आश्‍वासन दिया!
'ये रह कहाँ गया?'
'पता नहीं, मुझे तो कभी कभी मिलता है...' उस नये लडके का नाम निशिकांत शुक्ला था और वो उन्‍नाव से इंजीनीरिंग डिप्लोमा के फ़ॉर्म्स लेने आया था मगर उसको ये नहीं मालूम था कि गौरव तो तीन दिन के लिये अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ शिमला गया हुआ था! उसकी मौजूदगी में विशम्भर का आना भी बेकार था सो मैं उसके साथ ढाबे पर चला गया! वहाँ असद मिला तो मैने उससे हाथ मिलाया!
'कहाँ हो यार, तुम तो दिखे ही नहीं...'
'बस ऐसे ही काम में लगा हूँ...' ना उसकी बातों से और ना मेरी बातों से हमारे बीच बने उस नये सम्बन्ध की झलक दिखी!

मैने और निशिकांत ने साथ में खाना खाया! वो खाते हुये भी सुंदर लग रहा था! हमारी टेबल पर विशम्भर खाना ला रहा था! मैने धीरे धीरे निशी से सैक्सी बातें शुरु कर दी थीं और वो भी खुलने लगा था जिससे मुझे उसकी हरामी गहरायी का पता चलने लगा था! लौंडा शातिर था, तभी सामने से एक लडकी जीन्स पहन के निकली तो वो बोला!
'देखो साली की गाँड देखो... साली के छेद में सुपाडा भिडा देंगे तो साँस रुक जायेगी!'
'हाँ यार, बढिया माल है...'
'हाँ साली गाँड उठा उठा के चूत देगी... रात भर में ही साली को लोड कर देंगे...'
वो खूब मस्ती से सैक्सी बातें कर रहा था! फ़िर जब हम रूम पर आये तो हमने सिगरेट पी!
'यार लगता है, आज तुमको यहीं सोना पडेगा...'
'अब क्या करें यार... तुम्हें दिक्‍कत तो नहीं होगी?'
'नहीं साथ में सो जायेंगे...' मेरे ये कहने पर वो चँचलता से मुस्कुराया!
'ध्यान से सोना पडेगा...'
'जाडे में सही रहता है...'
'हाँ, मगर गर्मी चढती है तो डेंजर हो जाता है...'
'तो क्या हुआ?'
'अभी तो कुछ नहीं हुआ, मगर वॉर्निंग दे रहा हूँ...'
'बेटा डरायेगा तो सोयेगा कहाँ? बाहर सडक पर?' मैने हँसते हुए कहा!
'हाँ यार... सोना भी है... मजबूरी है..'

तेज़ ठँड थी! उसने बाथरूम में जाकर कपडे चेंज किये और ठिठुरते हुये शॉर्ट्स और टी-शर्ट पहन के आया और रज़ाई में घुस गया!
'यार, गाँड फ़ाडू सर्दी है आज...' मैने बाथरूम में चेंज करने गया और देखा कि उसकी कार्गो दरवाज़े के पीछे खूंटी पर टंगी है! उसके अंदर उसकी चड्‍डी थी, ब्लैक फ़्रैंची... मुझसे रहा ना गया और मैने उसकी चड्‍डी हाथ में लेकर उसमें मुह घुसा के उसकी जवानी की खुश्बू सूंघी और मस्त हो गया! लौंडों की चड्‍डियाँ सूंघना मेरा पुराना शौक़ है! शायद उसका लँड खडा भी हुआ था क्योंकि उसकी चड्‍डी पर एक दो हल्के सफ़ेद धब्बे भी थे! मैने उनको ज़बान से चाटा और फ़िर अपनी शॉर्ट्स और टी-शर्ट पहन के बाहर आ गया और सर्दी का ड्रामा करते हुए जब रज़ाई में घुसा जो उसकी जवानी की गर्मी से पहले ही गर्म हो चुकी थी! कुछ देर में हम दोनो ही गर्म हो गये और हमने रूम की लाइट ऑफ़ कर दी मगर फ़िर भी बाहर से काफ़ी लाइट आ रही थी!

कुछ देर तो हम सीधे लेटे रहे, फ़िर जब एक दूसरे की तरफ़ करवट ली तो एक दूसरे की साँसें एक दूसरे के चेहरे को छूने लगीं! उसकी साँस में मस्त खुश्बू थी, देसी जवानी की! वो मुझे बेक़ाबू कर रहा था! हमारे पैर भी आपस में टच कर रहे थे! निशिकांत का जिस्म गदराया और गर्म था! अभी मैं सम्भल भी नहीं पाया था कि उसने एक करवट ली और अपनी एक जाँघ मेरी कमर पर चढा के अपना एक हाथ मेरे पेट के अक्रॉस रख दिया! मुझे उस शाम पहली बार उसकी ताक़त का आभास हुआ! वो मेरे ऊपर अपना वज़न दिये हुए था! मैने उसको छेडा नहीं और उसकी उस पकड का मज़ा लेता रहा! मैं चित्त लेता था और वो करवट से! उसकी जाँघ मेरे लँड से कुछ ही दूर थी, मेरा लँड खडा होने की कगार पर था! मैं भी चुपचाप लेटा सोने का नाटक करता रहा! उस करवट में उसका मुह भी मेरी गर्दन पर साइड से बहुत नज़दीक आ गया था जिस से उसकी गर्म साँस मेरी गरदन से टकरा रही थी!

कुछ देर बाद निशिकांत ने अपना पैर मेरे ऊपर कुछ और चढाया! अब उसकी जाँघ सीधे मेरे लँड पर आ गयी और अब मैं लँड के ठनकने को नहीं रोक पाया! मैने सोचा सोने का ड्रामा करता रहता हूँ, अगर वो उठ के मेरे लँड को खडा पायेगा तो खुद ही पैर हटा लेगा! मगर मुझे तो अब नींद आ ही नहीं रही थी! अभी मैं कुछ समझ ही पाता कि अचानक निशी का पैर हिला और मेरे लँड पर उसकी जाँघ हल्के हल्के रगडी! मैने अभी सोचा वो नींद में है! मेरा लँड अब हुल्लाड मार रहा था! इसी बीच उसका हाथ मेरे पेट से नीचे की तरफ़ सरका! उसकी जाँघ हल्के से मेरे लँड से अलग हुई और देखते देखते निशिकांत की हथेली मेरे खडे हुये लँड के ऊपर रगडने लगी! जब उसने अगले कुछ पल में मेरे लँड को अपनी मुठ्‍ठी में पकड के हल्का सा दबाया तो मेरी समझ में आया कि वो एक्चुअली जागा हुआ है! क्योंकि तब मुझे अपनी कमर पर उसके लँड की गर्मी और सख्ती का भी आभास हुआ! उसने अब अपने लँड को हल्के हल्के धक्‍कों से मेरी कमर पर रगडना शुरू कर दिया! मैने इस बार अपना हाथ नीचे किया और पहली बार उसके लँड की सख्ती को अपनी हथेली की उलटी तरफ़ महसूस किया और देखते देखते मैने उसके लँड को थाम लिया! उसका लँड जवानी के जोश में हुल्लाड मार रहा था! ज़्यादा मोटा नहीं था मगर सख्त और लम्बा था! मैने कुछ उँगलियों से उसको पकड के नापा और उसके सुपाडे को अपनी उँगली और अँगूठे से दबाया! कुछ देर एक दूसरे का लँड सहलाने के बाद बिना कुछ कहे हम एक दूसरे की तरफ़ पलटे और एक दूसरे से चिपक के भिड गये!

अब माहौल गर्म था! हमने कुछ बात नहीं की मगर मैने सीधा अपने गालों से उसके चिकने गालों को सहलाया, और फ़िर जब मैने अपने होंठ उसके होंठ पर रख कर उनको सहलाया तो उसने मुह खोल दिया और हम एक दूसरे के होंठों को चूम कर चूसने लगे और हमारी ज़बान एक दूसरे से गुँथने लगीं! वो लपक लपक के मेरे होंठ चुस रहा था और भूखे शेर की तरह अपने मुह को मेरे मुह पर दबा रहा था! जब उसने अपना हाथ मेरी गाँड पर रख कर मेरे छेद के पास अपनी उँगलियाँ दबायी तो मैने अपना एक पैर उसके ऊपर चढा के अपनी गाँड उसके लिये सही से खोल दी!

मैने उसके लँड को उसकी शॉर्ट्स के निचले हिस्से से बाहर करके उसको थाम के दबाना शुरु कर दिया! उसने मेरी शॉर्ट्स थोडा नीचे खिसका दी और मेरी गाँड को अपने हाथों से नोचने लगा और मेरे छेद को अपनी उँगलियों से कुरेदने लगा! मेरा छेद तो फ़ौरन खुलने लगा! अब मैं नीचे हुआ और अपना सर उसकी जाँघों के बीच रख दिया! उसने मेरे सर को एक बार कस के जकड लिया! वहाँ उसके पसीने और बदन की मादक खुश्बू थी! मैने उसकी जाँघ पर किस किया और फ़िर ऊपर होकर सीधा उसके सुपाडे को मुह में ले लिया! उसका सुपाडा अपने आप खुल गया और वो मेरे मुह को चोदने लगा! इस बीच मैने उसकी शॉर्ट्स सरका के उतार दी और फ़िर खुद भी नँगा हो गया! फ़िर वो मेरी छाती पर चढ गया और मुझसे अपना लँड चुसवाने लगा! मैने वैसा करने में उसकी गाँड की दोनो फ़ाँको को पकड के दबाना शुरु कर दिया! फ़िर वो पलट के बैठ गया, अब उसकी गाँड मेरे मुह की तरफ़ थी! उसने उसी पोज़िशन में अपना लँड अड्जस्ट करके मेरे मुह में डाला और मेरे ऊपर झुक गया! कुछ देर में मुझे अपने सुपाडे पर जब उसके होंठ महसूस हुए तो मेरी गाँड भी उठने लगी और मैं उसके गर्म मुह का मज़ा लेने लगा! उसने अपने हाथों को मेरे चूतड के नीचे फ़ँसा के मेरी गाँड दबाना शुरू कर दी! फ़िर उसने मुझे पलट दिया और जब पहली बार मेरी गाँड को किस किया तो मैं मचल गया और मेरी गाँड बेतहाशा कुलबुला गयी!

उसने मेरी गाँड को फ़ैला रखा था और फ़िर उसने आराम से मेरी गाँड की फ़ाँकों के बीच की दरार में अपना मुह घुसा दिया और साथ में एक उँगली को मेरे छेद पर दबाने लगा! अब वो कभी मेरे छेद को किस करता कभी उसमें उँगली करता! उसकी उँगली धीरे धीरे मेरे छेद में घुसने लगी!
'तेल है?' उसने पहली बार कुछ कहा!
'हाँ सामने टेबल से ले ले...' उसने बस एक पैर नीचे उतार के टेबल से चमेली के तेल की बॉटल उठा ली! फ़िर तो उसकी उँगली सटासट मेरे छेद में घुसने लगी!
'चढ जाऊँ ऊपर?' वो कुछ देर बाद फ़िर बोला!
'हाँ चढ जा ना...' मैने कहा! उसने अपने लँड पर तेल लगाया और जब मैने उसको देखा तो उसका चिकना और गोरा शरीर दमक रहा था! उसकी छाती के और बाज़ुओं के कटाव साफ़ दिख रहे थे! फ़िर उसका सुपाडा सीधा मेरे छेद पर आकर टिका तो मैने कसमसा कर सिसकारी भरते हुए अपने छेद और गाँड को भींच लिया! उसने अपने लँड को हाथ में लेकर मेरी दरार पर एक दो बार दबा दबा के पूरा रगडा! वो कमर से शुरु होकर सीधा मेरे आँडूओं की जड तक अपना लँड रगडता! मेरी गाँड अपने आप ही मस्त होकर उचक जाती और जाँघें फ़ैल जाती! उसने रुक कर मेरी जाँघ का पिछला हिस्सा, चूतड और कमर रगड के दबाये!
'अआहहहह... नि...शी... अआहहह... सी.. उउउहहह...' मैं सिर्फ़ सिसकारी भरता!

उसने फ़िर अपने उलटे हाथ से अपने लँड को पकड के मेरे छेद पर लगाया और दूसरे हाथ की एक उँगली और अँगूठे से मेरे छेद को फ़ैलाया और जब दबाव दिया तो पहले से ही मस्त हो चुकी मेरी गाँड कुलबुला गयी और उसका सुपाडा मेरे छेद में समा गया! इस बार उसने भी मस्ती से भर के सिसकारी भरी!
'अआहहह... सु...उहहह... सु..हहह...' और अपने लँड पर ज़ोर बढा कर उसको धीरे धीरे करके तब तक दबाता रहा जब तक वो पूरा का पूरा मेरी गाँड के अंदर नहीं घुस गया! फ़िर उसने अपने दोनो हाथों से मेरे कंधे पकड लिये और अपने गालों को पीछे से मेरे गालों के बगल में लाकर चिपकाता रहा और हल्के हल्के धक्‍के देकर मेरी गाँड चोदना शुरु कर दी! उसके हर धक्‍के में अच्छी देसी ताक़त थी! मेरी गाँड तुरन्त भरपूर ठरक में आ गयी! मैं भी उससे गाँड उठा उठा के चुदवाने लगा! उससे धक्‍कों में इतनी ताक़त थी कि कुछ देर में कमरे में चुदायी की चपाचप चप चपाचप गूँजने लगी और साथ में हम दोनो की सिसकारियाँ...

वो जब थक जाता तो वैसे ही गाँड में लँड डाले डाले ही मेरे ऊपर पस्त होकर लेट जाता! वैसे ही लेटने में उसने कहा!
'मज़ा आ रहा है ना?'
'हाँ यार बहुत...'
'देख, कैसे किस्मत से मिल गये...'
'हाँ वो तो है...'
'ओए यार, किसी से ये सब बताना नहीं... पता चले कि तू गौरव से कह दे... साला पूरे में फ़ैला देगा... ये सब मैं बस चुपचाप करता हूँ...'
'कहूँगा क्यों यार... मैं भी चुपचाप करता हूँ और वैसे भी गौरव से ज़्यादा दोस्ती नहीं है...'

सुस्ताने के बाद उसने फ़िर मेरी गाँड मारना शुरु कर दिया!
'साली सारी थकान मिट गयी... थकान मिटाने का बेस्ट तरीका है...'
'हाँ, पूरी एक्सरसाइज़ हो जाती है...'
'चल राजा, थोडी गाँड ऊपर उठा... कुतिया की तरह...' मैने उसके ये कहने पर अपने घुटने मोड के गाँड पूरी ऊपर उठा दी! उसने फ़िर अपने एक हाथ से चप चप एक दो बार मेरी गाँड पर अपनी हथेली मारी!
'वैसे तेरी चिकनी है...'
'थैंक्स यार...' उसके बाद वो मेरी गाँड के पीछे घुटनो के बल बैठा और फ़िर लँड मेरी गाँड के अंदर बाहर करने लगा! उस रात उसने काफ़ी देर चोद चोद के मेरी गाँड को मस्त कर दिया! फ़िर वैसे ही चिपक के मेरे साथ नँगा सो गया! जब सुबह मेरी आँख खुली तो तो वो बाथरूम में नहा रहा था! उस सुबह हमने पिछली रात की कोई बात नहीं की, बस एक दो बार हसरत भरी नज़रों से एक दूसरे को देखा!

उस दिन हम साथ ही निकले! मैने उसको बस पकडवा दी और लौटने का टाइम फ़िक्स कर लिया और खुद अपनी क्लासेज़ के लिये चला गया! उस दिन कॉलेज के गेट पर घुसते ही धर्मेन्द्र मिल गया! उस दिन उसने जब मुस्कुरा के मुझसे हाथ मिलाया तो उसकी पकड और उसकी नज़रों में जानी पहचानी ठरक थी! इन्फ़ैक्ट वो अब मुझे भी बहुत ज़्यादा सैक्सी लग रहा था! उस दिन से धर्मेन्द्र और मैं भी ठरक के कारण क्लोज़ आने लगे थे! उसको देखते ही मेरा मन तो कर रहा था कि उसको नँगा करके उसके सामने नँगा हो जाऊँ मगर कॉलेज में बना के रखनी पडती है! बातों बातों में पता चला कि धर्मेन्द्र को उस दिन 11 बजे स्पोर्ट्स प्रैक्टिस के लिये जाना था! वो कॉलेज की वॉलीबॉल टीम में खेलता था! मैने फ़िर उसके मज़बूत हाथ देखे जो वॉलीबॉल खेल कर मस्त गदरा गये थे! बीच बीच में मुझे निशिकांत के साथ गुज़ारी हुई रात भी याद आती रही!
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07-26-2017, 10:59 AM,
#26
RE: Hindi Lesbian Stories समलिंगी कहानियाँ
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उस दिन विनोद थोडा दूर बैठा था मगर फ़िर भी मैं उसको देखता रहा! इन्फ़ैक्ट मेरा बस चलता तो मैं क्लास के हर लडके से गाँड मरवा लेता मगर मजबूरी थी! उस दिन क्लास के बाद कैन्टीन में विनोद फ़िर मिला वो अब मुझसे काफ़ी फ़्रैंक हो चुका था, मुझे बार बार उसकी विशम्भर के बारे में कही हुई बात याद आती रही और मैं अन्दाज़ लगाता रहा कि क्या वो सीरिअस था या बस ऐसे लडकों वाला मज़ाक किया था! असल में स्कूल - कॉलेज में हरामी लडकों की बातों से उनकी सैक्शुएलिटी का अन्दाज़ लगाना बहुत मुश्किल हो जाता है!

कुछ देर में कुणाल भी आ गया और उसके साथ एक और क्लासमेट था! बातें करते करते विनोद बोला
"बहनचोद, अब चलता हूँ... बहुत थक गया यार..."
"ऐसा क्या किया साले, जो थक गया..."
"बहनचोद रात में तीन बार मुठ मारी यार... बहन का लौडा, मेरा लँड मुरझा ही नहीं रहा था..."
"अपने घर वालों से कह दे, तेरी शादी करवा दें..." उस दिन फ़िर विनोद ने गे बात कही!
"शादी क्यों कर लूँ साले... तू चिकना है ना, चल तेरी गाँड मार दूँ..."
"बेटा मेरी गाँड में घुसने की ताक़त नहीं होगी तेरे लँड में..." कुणाल ने कहा!
"बेटा ताक़त तो एक बार में दिखा दूँगा... साले, सुबह तक फ़ाड के रख दूँगा..."
"रहने दे गाँडू, जा कोई लौंडिया पटा ले..."
"लौंडिया ही तो नहीं मिलती है साले... तभी तो तुझे डार्लिंग बनने को कह रहा हूँ..."
"कहा ना, मेरी नहीं ले पायेगा..."
"बेटा दे तो एक बार..."
"साले, जा इसकी ले ले..."
"अबे रहने दे, मुझे क्यों इस में शामिल कर रहे हो..." कुणाल ने मेरी तरफ़ इशारा करते हुये कहा तो मैने नाटक में कहा!
"देखा, साला डर गया..."
"डर वर तो एक बार में निकल जायेगा..." विनोद बोला!
"रहने दे, तू इसकी ही ले ले..." मैने कुणाल की तरफ़ इशारा करते हुये कहा!
"हाय... चिकने... बात करने में ही फ़ट गयी तेरी?" कुणाल बोला!
"हाँ साला चिकना है... चिकने डर जाते हैं..." विनोद ने कहा!
"हा हा हा हा हा..."

कुछ भी हो, मुझे विनोद का आइडिआ लगने लगा था! मैं उस दिन धर्मेन्द्र को मिस कर रहा था! फ़िर कुणाल और विनोद ने पास के कम्युनिटी सेन्टर पर जाकर बीअर पीने का प्रोग्राम बनाया तो मैं सिर्फ़ इसलिये तैयार हो गया कि मैं उन दोनो को नशे में देखना चाहता था! फ़्रैंड्स कॉलोनी का कम्युनिटी सेन्टर काफ़ी भीड भाड वाला है, मगर वहाँ बहुत सी जगहें ऐसी हैं जहाँ चुपचाप अँधेरे में बैठा जा सकता है! हमारे कॉलेज के बहुत लडके वहीं जाते थे! वहाँ जामिया के बहुत लौंडे घूमते रहते थे, सब एक से एक करारे और जवान... टाइट पैंट्स और जीन्स पहने, वहाँ लडकियाँ देखते थे और अपने लँड मसलते थे!

हमने बीअर ली और एक कोने में चुपचाप बैठ गये! वो ऐसी जगह थी जहाँ से हम सब देख सकते थे, पर हमें कोई नहीं! एक बीअर के बाद विनोद बहकने लगा! मैने उतनी देर में कुछ ही घूँट पिये मगर कुणाल भी काफ़ी गटक गया! तभी पास से एक लडकी गुज़री तो विनोद ने मेरे सामने ही अपना लँड पकड के मसल डाला और बोला
"हाय... अब चढने के बाद किसी पर 'चढने' का दिल करता है यार... लौडा अपने आप फ़नफ़नाने लगता है..."
"क्यों, 'तेरा' खडा हो गया क्या?" मुझसे ना रहा गया और मैने पूछ ही लिया!
"'इसका' तो साला, किसी को भी देख के खडा हो जाता है... इसके सामने झुकना मत, वरना तेरी गाँड देख के भी खडा कर लेगा..." कुणाल बोला!
"मेरी देख के क्या करेगा यार..." मैने कहा!
"बेटा अगर करने पर आऊँ तो देख लियो... फ़िर हिलने नहीं दूँगा और टट्‍टे तक तेरी गाँड में डाल दूँगा..." इस पर विनोद बोला! कुणाल हँसा... मुझे कोई जवाब नहीं सूझा!

मगर मैं गर्म तो हो ही गया! अब मेरी गाँड विनोद के लँड के लिये कुलबुलाने लगी!
"अबे मैं होमो नहीं हूँ..." मैने कहा!
"होमो तो हम बना देते हैं बेटा... जब करने पर आते हैं..."
"तू इसकी ही मार..." मैने कुणाल की तरफ़ इशारा करके कहा! अब ना जाने क्यों मुझे लगने लगा था कि विनोद और कुणाल मिलकर मुझे फ़ँसाने की कोशिश कर रहे थे!
"किसी दिन अपने रूम में बुला तो दिखा दूँगा" विनोद बोला!
"तू अकेला रहता है क्या?" कुणाल ने पूछा!
"हाँ" मैने जवाब दिया!
"तो इससे बच के रहियो, साला बडा हरामी है..."
"रहने दे यार, इतना आसान नहीं है..." अभी मैने कहा ही था कि सामने से धर्मेन्द्र आता दिखा! उसने सिगरेट जला रखी थी! उसको देखते ही मैं मस्त हो गया!

"ओए, ये कहाँ से आ गया?" कुणाल बोला और उतनी देर में विनोद ने धर्मेन्द्र को आवाज़ लगा दी! धर्मेन्द्र का चेहरा भी मुझे देख के खिल गया, वो भी हमारे साथ बीअर पीने को तैयार हो गया! अब तो मैं मस्त हो चुका था! कुछ देर में धर्मेन्द्र को भी चढ गयी! फ़िर वहाँ से जाने की बारी आयी तो कुणाल बोला!
"अबे मैं तो चलता हूँ... तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?"
कुणाल के जाने के बाद विनोद मुझे और धर्मेन्द्र को अपनी बाइक पर छोडने के लिये तैयार हो गया, मगर ट्रिपल राइडिंग के कारण वो बोला कि गलियों से चलेगा! विनोद के गाडी स्टार्ट की और धर्मेन्द्र उसके पीछे बैठ गया और मैं उसके पीछे! पहली बार धर्मेन्द्र और मेरे बदन आपस में टच हुये तो बदन में एक सनसनी दौड गयी! मेरी जाँघें, धर्मेन्द्र की जाँघों से बिल्कुल चिपकी हुई थी! थोडा आगे बढे तो उसने अपने दोनो हाथ मेरी दोनो जाँघों पर रख दिये! उसकी हथेलियों की गर्मी से मेरा लँड तुरन्त खडा हो गया, जिसको मैं बहुत कोशिश करके उसकी कमर से दूर रखे हुये था! फ़िर धर्मेन्द्र ने कुछ पलट के मुझसे कुछ पूछा जो मैं बाइक की आवाज़ के कारण सुन नहीं पाया! इस बार उसने अपना मुह मेरे कान के पास लाकर जब मेरे कान के पास बोला तो मेरे चेहरे पर उसकी गर्म साँस टकरायी और तभी बाइक एक गढ्‍ढे से गुज़री तो उसकी जर्क से उसके होंठ ऑल्मोस्ट मेरे होंठों से छू गये! जर्क से बचने के लिये उसने मेरी जाँघ को भी दबा के पकड लिया!

मैं श्योर था, धर्मेन्द्र मेरे साथ कुछ करने में ज़रुर इंट्रेस्टेड है! बैठने बैठने में मैने इस बात का ध्यान नहीं दिया कि मेरा लँड अब उसकी कमर से चिपक गया था! मगर उसने इस बात पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया हुआ था! शायद उसको मज़ा आ रहा था! फ़िर मेरा एरीआ आ गया, मगर फ़िर भी वहाँ से लगभग 15 मिनिट की वॉक तो थी ही!
"यार, यहीं उतर जा... मेरा सर घूम रहा है... यहाँ से चले जाना... मैं जल्दी घर पहुँचना चाहता हूँ..." साला विनोद बोला!
"चल कोई बात नहीं..." मगर जब उतरा तो धर्मेन्द्र भी उतर गया!
"मैं भी उतर लेता हूँ, यहीं से चला जाऊँगा..." उसने कहा तो विनोद ने नशे के मारे ज़्यादा ध्यान नहीं दिया! उसके जाने के बाद मैं और धर्मेन्द्र साथ चल पडे! सडक पर अँधेरा था और ज़्यादा लोग नहीं थे! मैं उसके साथ एक अँधेरे कच्चे रास्ते से चला, जो शॉर्ट-कट भी था और मस्त भी! कुछ दूर पर ही धर्मेन्द्र ने मेरा हाथ पकड लिया!
"यार, अँधेरा बहुत है..."
"सही है यार... हाथ पकड के चलते हैं दोनो भाई..." मैने उसकी उँगलियों में उँगलियाँ फ़ँसा के उसकी हथेली से अपनी हथेली चिपका के उसका हाथ पकड लिया! कुछ देर के बाद वो मेरी हथेली पर अपनी उँगलियों से सहलाने लगा तो मैने भी अपनी उँगलियों से उसका हाथ और हथेली दबाना और सहलाना शुरु कर दिया!
"तू अकेला रहता है?"
"हाँ..."
"साथ चलूँ क्या? थोडी देर बातें करेंगे..."
"चल, मगर तुझे देर नहीं हो जायेगी?" मेरा दिल अब धडक रहा था! वो काफ़ी मस्त देसी आइटम था और लगातार मेरा हाथ दबाये और सहलाये जा रहा था! उसने बीअर के साथ साथ मुझे अपनी जवानी का नशा भी चढा दिया था!
"लेट तो हो गया है... थोडी देर में चला जाऊँगा..."
"चल, साथ बैठेंगे... मज़ा आयेगा..." मैने कहा!
"हाँ, थोडा नशे का मज़ा लेंगे..."

अब हम बिन्दास एक दूसरे का हाथ सहला रहे थे! थोडा आगे जाने पर उसने पहली बार मेरी कमर में हाथ डाल दिया और मुझे अपने करीब पकड के चलने लगा! उसने मेरी कमर को सिर्फ़ पकडा नहीं था बल्कि उसको हल्के हल्के सहलाना भी शुरु कर दिया था! शायद वो मेरा इरादा और रज़ामन्दी नाप रहा था! मैने भी बदले में उसके कंधे पर हाथ रख दिया! उसके कंधे अच्छे गदराये और मस्क्युलर थे! मैने उसकी बाज़ू और एक कंधा सहलाना और दबाना शुरु कर दिया!
"और कोई तो नहीं होता तेरे रूम पे?"
"नहीं यार..." उसका हाथ थोडा नीचे मेरी गाँड के पास सरका! वो बहुत फ़ूँक फ़ूँक के कदम रख रहा था!

उसने चुपचाप मेरे चूतडों की गोलायी को अपनी उँगलियों से तराशा! मुझे उसका हर टच मदहोश कर रहा था! थोडा बीअर का नशा भी था, थोडी मेरी ठरक और थोडी उसकी कशिश का! फ़िर उसने मेरी पीछे की पॉकेट पर हथेली लगायी!
"क्या कर रहा है?" मैने कहा!
"डर मत, पॉकेट नहीं मारूँगा..."
"वैसे भी पर्स में कुछ नहीं है..."
"तुझे सिर्फ़ पॉकेट मारे जाने का डर रहता है क्या?"
"हाँ..."
"उसके अलावा चाहे कुछ मार ली जाये?"
"उसके अलावा है ही क्या?"
"बहुत कुछ..." उसने मेरी एक फ़ाँक को हल्के से दबाया!
"उसकी चिन्ता नहीं है..."
"सही है... तब तो हमारी दोस्ती लम्बी चलेगी..."
"हाँ" कहकर मैने इस बार उसकी कमर में हाथ दे दिया! अब मेरी गली आने लगी थी! हम वहाँ तक पहुँचते पहुँचते काफ़ी ठरक चुके थे!
"ओह शिट यार... आज तो मेरे रूम पर एक गेस्ट आने वाला है..." और तब मुझे याद आया!
"क्या यार... क्या बात करता है... तूने तो कहा था कि..."
"यार बिल्कुल दिमाग से उतर गया यार... मेरे पडौसी..." मैने उसको निशिकांत के बारे में वो सब बताया जो मैं बता सकता था! धर्मेन्द्र का तो जैसे सारा मूड ही चौपट हो गया! फ़िर भी एक उम्मीद थी, शायद निशी अभी वापस ना आया हो!

मूड तो मेरा भी खराब हो गया कि एक नया लौंडा इतनी नज़दीक आने के बाद हाथ से निकल ना जाये! मैने उसकी गाँड और उसने मेरी गाँड अब लगभग दबाना शुरु कर दिया था! हम दोनो ही डेस्परेट हो चुके थे!
"यार के.एल.पी.डी. हो गयी यार..." धर्मेन्द्र ने जैसे अपना इरादा साफ़ कर दिया!
मैने कहा "एक जगह है..."
"कहाँ?"
"सीदियों पर..."
"नहीं यार, वहाँ कोई देख सकता है..." वैसे वो सही कह रहा था!
"फ़िर किसी दिन का रख लेते हैं..."
"अब तो रखना ही पडेगा... आज मुठ मार लूँगा..."
"आ साइड में आजा... मुठ तो मार ही दूँ तेरी..." ये वो अनकही बातें थी जो अब हम एक दूसरे से कह रहे थे!
"ले पकड के देख ले... मगर यहाँ सेफ़ है?" उसने कहा!
"किसको पता चलेगा यार?"
"लोग बडे हरामी होते हैं अँधेरे होने में दो लडकों को देख के समझ जायेंगे..." मैने अब अपना हाथ उसकी गाँड से हटा के आगे उसकी ज़िप पर रखा! अंदर उसका लँड ठनक के हुलाड मार रहा था! मैने उसको कुछ बार दबाया!
"वैसे भी साला इतनी देर से खडा है... चड्‍डी तो भीग ही चुकी है... चल आजा..."

मेरी गली से थोडी दूर एक छोटा सा मैदान था, जहाँ शादी वगैरह के टैंट लगते थे! एक दिन पहले ही किसी की शादी हुई थी जिसकी टेबल्स वगैरह पीछे पडी थी! उनके पीछे बॉउंड्री वॉल थी और उससे पूरी आड हो गयी थी! वहाँ लोग पिशाब भी करते थे मैने उसको वो जगह दिखायी जहाँ उस समय अँधेरा था!
"चल पिशाब करने के बहाने वहाँ चलते हैं... पहले मैं जाता हूँ, पीछे से तू आजा..." मैने धर्मेन्द्र से कहा!
"चल तू जा.."
मैं नर्वसनेस और ठरक से विभोर होकर वहाँ गया! उस जगह से ही पिशाब की बदबू आ रही थी मगर मुझे उस समय सब अच्छा लग रहा था! कुछ ही देर में धर्मेन्द्र आ गया तो मैं उससे लिपट गया मगर वो बोला "आज बस मुठ मार दे, फ़िर किसी दिन सही से लिपट के मज़ा करेंगे..." मैने उसके पैरों के बीच अपना हाथ फ़ँसा दिया और सहलाने लगा मगर उसने टाइम खराब ना करते हुये तुरन्त अपनी ज़िप खोल के अपना मोटा काला नाग खोल दिया तो मैने प्यार से उसको पकड लिया और अपनी मुठ्‍ठी से हल्के हल्के दबाने लगा, हम दोनो सिसकारियाँ भरने लगे!

मैं उसके बगल में उसकी कमर से अपना लँड भिडा के खडा था और एक तरह से उसकी कमर चोद रहा था और साथ में उसके लँड को मसल रहा था!
"उस दिन देखा था ना तूने?"
"हाँ..."
"पसन्द आया मेरा?"
"हाँ बहुत" उसने एक हाथ मेरी कमर में फ़ँसा के मेरी गाँड के छेद और फ़ाँकों को दबाना शुरु कर दिया! उसके हाथ में लँड की ताक़त थी, वो अपनी उँगली कसमसा कसमसा के मेरी दरार में फ़ँसा रहा था! मेरा छेद खुल चुका था, मेरे अंदर चुदने की चपास जग चुकी थी!
"राजा, तेरी गाँड मारूँगा..."
"हाँ राजा मार लेना" उसके बोलने का अन्दाज़ बिल्कुल देसी यू.पी. वाला था!
"तुझे डार्लिंग बना लूँगा..."
"हाँ बना ले ना मुझे डार्लिंग..."
"यही लौडा तेरी गाँड में घपाघप अंदर बाहर दूँगा राजा... पूरा चैन दे दूँगा तेरी गाँड को..." उसका लँड अब पूरे शबाब में आकर दहक रहा था! मेरी हथेली उसकी गर्मी से जलने लगी थी! उसका सुपाडा प्रीकम से भीगा हुआ था! मैं कभी उसको पकड के दबाता कभी उसके आँडूए पकड लेता और फ़िर उसकी मुठ मारता!
"चूसेगा?" उसने अचानक पूछा!
"ठीक है..." मैने कहा और उसके सामने घुटने के बल बैठ कर जब मैने अपने होंठ उसके लौडे पर लगाये और मुह खोल के उसके लौडे को चूसना शुरू किया तो वो घुटने मोड के मेरे मुह में अपना लँड धकेलने लगा और फ़िर कुछ देर बाद उससे ना रहा गया और उसके लँड का गर्म गर्म भयँकर नमकीन माल मेरे मुह में भरता चला गया! जिसको मैं प्रेम से पुचकार पुचकार के पी गया!

"अआह... राजा... अब थोडी ठँड पडी..."
"बस थोडी?"
"हाँ राजा, जिस दिन तेरी गाँड के अंदर माल डालूँगा ना... उस दिन पूरी चपास मिटेगी... स्वाद कैसा लगा?"
"उँहह... बढिया है..."
"चल अगली बार तक यही याद रहेगा... मगर यार, बात अपने तक रखना..."
"हाँ यार..."
"वरना साले इन लौंडों को तू जानता ही है..."
"हाँ यार जानता हूँ..."

हम जब वहाँ से ढाबे की तरफ़ आये तो निशिकांत वहाँ बैठा था!
"देख, वो बैठा है..." मैने उसको बैठा देख के दूर से धर्मेन्द्र को बताया!
"साला चिकना माल है... इसका भी चूस डाल..."
"नहीं यार, इज़्ज़त की बात होती है..."
"हाँ सही बात है, अब सबसे फ़्रैंक थोडी हो जाते हैं..." उसने मुझसे सहमती दिखायी!

वो फ़िर वहाँ से चला गया! मैने और निशी ने खाना खाया! इस बीच मैने फ़िर मौका निकाल के असद से बात कर ली!
"किसी दिन रूम पर आ ना यार..."
"हाँ, आऊँगा... देखते हो ना, दिन भर यहीं रहता हूँ..."
"हाँ मगर चाहे तो थोडा टाइम निकल ले यार..."
"ठीक है देखूँगा..."
"कब तक देखेगा यार?"
"क्या करूँ..." वो उस दिन के बाद फ़िर ऐसे बहाने कर रहा था जैसे हमारे बीच कुछ हुआ ही नहीं और मैं उस पर लाइन मार रहा था! उस दिन खाने के बाद मैने एक दस का नोट निकाल के विशम्भर को दे दिया तो वो खुश हो गया! ये तो चिडिया फ़ँसाने के लिये पहला दाना था! मुझे पता था विशम्भर की गाँड गुलाब जामुन की तरह मुलायम होगी! मैं बस दो दिन तक उसकी गाँड में नाक घुसा कर उसको सूंघना और उसको किस करके चूसना चाहता था!
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07-26-2017, 10:59 AM,
#27
RE: Hindi Lesbian Stories समलिंगी कहानियाँ
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क्या यार... अकेले ही पीकर आ गया?" मैने जब निशिकांत को बीअर के बारे में बताया तो वो बोला!
"अच्छा, तू पीता है क्या?"
"हाँ पिलायेगा तो पी लेंगे..."
"मेरे पास व्हिस्की है..."
"वो भी चलेगी..."
वैसे निशिकांत भी रात के बारे में ना कुछ बोल रहा था ना उसके हाव-भाव से कुछ पता चल रहा था! वो मुझे बहुत सुंदर लग रहा था! उसकी आँखों में चंचल सी चमक थी, चेहरा गोरा था! मैं उसको निहारता रहा और रात में एक्स्पीरिएंस किये उसके स्टेमिना को याद करता रहा! उसकी गाँड की गोल फ़ाँकों को अपने हाथों पर महसूस करता रहा! धर्मेन्द्र के साथ हुए काँड के बाद मेरी ठरक जगी हुई थी! मैं उस रात निशिकांत की गाँड मारना चाहता था! मगर मुझे पता नहीं था कि वो मुझे 'अपनी' मारने देगा या नहीं...

रूम पर वापस आकर उसने व्हिस्की पीना शुरु कर दी! मैने बस एक पैग में उसका साथ दिया मगर वो काफ़ी शातिर पियक्‍कड लगा क्योंकि साला काफ़ी पी गया था!
"बेटा देसी हूँ... पूरी बॉटल अकेले गटक जाऊँगा और सीधा खडा रहूँगा..."
"आज क्या पहन के सोयेगा?" मैने पहली बार सैक्स का टॉपिक शुरु किया!
"वही जो कल पहना था..."
"अब तो तुझे नींद आ जायेगी..."
"पहले थोडी थकान मिटाऊँगा... नींद किसे आ रही है... तुझे आ रही है क्या?"
"कैसे मिटायेगा?"
"जैसे कल मिटायी थी... क्यों आज तू डर गया क्या?"
"नहीं, मतलब तूने कुछ कहा नहीं... इसलिये मैने समझा..."
"बेटा हर काम कह के नहीं होता... और हम उनमें से हैं जो कहते नहीं, सिर्फ़ करते हैं... तू तो देख ही चुका है..."
"हाँ..."

उसने मुझे पकडा और सीधा अपने होंठ मेरे होंठ पर चिपका दिये और कसमसा के मेरा मुह चूसने लगा और मेरी छाती सहलाने लगा!
"चल तेरी शिकायत दूर कर देते हैं... लगता है तू इग्नोर्‍ड फ़ील कर रहा है..." वो बोला और हम गुँथ के पलँग पर लेट गये!
"आज सर्दी का पूरा जुगाड हो गया है... शराब के साथ साथ चुदायी की सम्पूर्ण व्यवस्था है और वो भी अकेले कमरे में..."
"हाँ अआहहह... नि..शी..."

हम देखते देखते फ़िर नंगे हो गये और रज़ाई में घुस गये! फ़िर हमने 69 पोजिशन बना ली और अगल बगल लेट कर एक दूसरे का लँड चूसने लगे! उस दिन मैं उसके आँडूओं को चूसने लगा और उसके साथ नीचे उसकी इनर थाईज़ में मुह घुसा कर उसकी गाँड के छेद तक अपनी ज़बान फ़िराने लगा! फ़िर उसने भी मेरी तरह अपनी जाँघें फ़ैला दीं! उसकी गाँड के बाल रेशमी और मुलायम थे, पर हल्के हल्के थे और जाँघें चिकनी! उस दिन हमने लाइट जला रखी थी इसलिये आराम से एक दूसरे का जिस्म देख रहे थे!

उस दिन उसने मुझे चित्त लिटा दिया और फ़िर मेरे घुटनो को मुडवा के मेरी छाती के पास करवा दिया और फ़िर मेरी खुली गाँड के फ़ैले हुये छेद को सहलाया और वहाँ बीच में बैठ कर उसने अपना लँड हाथ मे पकड के मेरे छेद पर दबाना शुरु कर दिया!
"अआहहह...सी...उहहह..." मैने सिसकारी भरी! उसने फ़िर तेल से अपने लँड को भिगा लिया और फ़िर देखते देखते मेरी गाँड के छेद को फ़ैलाते हुये सीधा अपना लँड मेरी गाँड में घुसाते हुये मेरे घुटनो को पकड लिया और फ़िर धक्‍के दे दे कर चोदने लगा!

"लौंडिया बना के चोद रहा हूँ जानेमन..."
"हाँ राजा... चोद दे, कैसे भी चोद दे..."
"हाय मेरी लैला... मेरी छमिया... तेरी गाँड में बहुत मज़ा है डार्लिंग..."
"हाँ... निशी..." वो कुछ देर में सटीक धक्‍के देने लगा और पूरा ठरक गया!
"शराब के बाद चोदने में ज़्यादा मज़ा आता है..."
"हाँ वो तो है..."
"बिल्कुल लग रहा है... स्वर्ग में हूँ... तू बढिया चिकना है..."
"हाँ... मैं भी... स्वर्ग में हूँ यार..."
"कल सैटिस्फ़ाई हुआ था ना?"
"हाँ पूरा..."
"आज भी... तुझे... पूरा सैटिस्फ़ाई कर दूँगा..."
"हाँ निशिकांत... कर दे..."

काफ़ी देर तक चोदने के बाद वो मूतने के लिये चला गया और मैने बिस्तर में लेट कर उसका वेट करने लगा! जब वो आया तो हम फ़िर एक दूसरे से लिपट के अपने लँड भिडा भिडा के एक दूसरे का जिस्म सहलाने लगे! इस बार जब वो अपना लँड चुसवाने के लिये मेरे सामने करवट लेकर लेटा तो मैने कहा!
"थोडा पलट के लेट ना..."
"क्यों?"
"गाँड चाटूँगा..."
"ले चाट ले..." वो जब करवट लेकर पलटा तो उसकी जाँघें सटी हुई थीं जिस से उसकी पतली कमर और गाँड का गोल उभार बहुत बढिया लग रहे थे! मैने हल्के से उसके चूतडों को फ़ैलाया और उसका गुलाबी छेद देखा! पहले सीधा अपनी नाक उस पर रख कर सूंघा! उसकी गाँड की बेहतरीन खुश्बू सूँघ कर मैं मस्त हो गया और मैने अपने होंठ उसकी गाँड पर रख दिये और फ़िर अपनी ज़बान से उसको चाटा और देखते देखते मैं उसकी गाँड के गहरे चुम्बन लेने लगा तो उसकी गाँड खुल गयी!
तब मेरी भी ठरक जग गयी और मैने बेड के नीचे पडी तेल की शीशी उठायी!
"अबे क्या कर रहा है?"
"थोडा सा... बस थोडा सा... ऊपर ऊपर से..."
"नहीं यार..."
"अबे प्लीज... यार प्लीज..."
"ठीक है... मगर... बस ऊपर से..."
"ठीक है..."
वो अब पलट के लेट गया और अपनी टाँगें थोडी सी फ़ैला लीं! उसकी गाँड की चिकनी दरार बडी खूबसूरत थी और उसके बीच उसका सुंदर सा चुन्‍नटदार छेद... मैने कुछ देर उसकी दरार में लँड रगडा तो वो रिलैक्स्ड हुआ! फ़िर मैने उसके छेद पर सुपाडा रगडा, वो शुरु में चिंहुका, मगर फ़िर धीरे धीरे एन्जॉय करने लगा! मुझे उसकी गाँड रिलैक्स्ड लगी! मैने हल्का सा लँड उसकी गाँड पर दबाया तो उसकी गाँड की चुन्‍नटें थोडा खुलीं! उसने हल्की सी सिसकारी भरी!
"तेरा बहुत मोटा है यार... कुछ करना मत..."
"पता नहीं चलेगा यार..."
"नहीं यार बडा मोटा है... हो नहीं पायेगा..."
"होने तो दे... सब हो जाता है..." मैने थोडा दबाव दिया तो उसका छेद फ़ैल गया!
"आई...अआह... नहीं बे... नहीं... नहीं..." मैने कुछ और दबाव दिया! उसकी गाँड शायद मेरे लँड के दबाव से मचल रही थी!
"अच्छा जितना जाता है... जाने दे..."
"नहीं जा पायेगा... बहुत.. मोटा.. है..."
"मोटे का.. भी.. तो.. मज़ा... ले ले..." इस बार मैने दबाया तो उसका छेद और फ़ैला!
"सी...उउ..उहहह..."
"देख.. मज़ा आया... ना..."
"अभी.. आह... कुछ गया... कहाँ.. आह.. है... इसलिये मज़ा...अआहहह... आ रहा... है... अआई..."
मैने और दबाव दिया तो मेरा सुपाडा उसकी गाँड में घुसा और उसने साँस रोक ली!
"उउहहह.."
"बस.. बस... बस..." मैने कहा और धक्‍का दिया तो लँड थोडा और अंदर गया! उसकी गाँड कुछ ऊपर उठी
"उउउहहह..."
"अच्छा.. मज़ा तो ले... जब दर्द होगा... तो बोल देना... मगर.. मज़ा तो.. ले..." मैने कहा और अगले धक्‍के में लँड को और अंदर घुसाया तो उसका छेद चरमराता हुआ महसूस हुआ! मैं एकदम आराम से लँड अंदर घुसा रहा था कि उसको तकलीफ़ ना हो!
"उउहहह... अम्बर प्लीज...."
"बस.. निशी बस..." बातों बातों में लँड पूरा उसकी गाँड में डाल दिया और उसके कंधे पकड के उसके ऊपर लेट गया!
"देखा... कहा था ना... चला जायेगा..."
"हाँ यार..." फ़िर मैने उसकी गाँड में धक्‍के देने शुरु कर दिये!
"क्यों? पहले ले चुका है ना..."
"हाँ..."
"कितने आसामी फ़ँसा रखे हैं?"
"अबे... एक कज़िन के साथ करता हूँ... बस..."
"अच्छा?"
"चल, अब मैं भी तेरा भाई हो गया..."
"हाँ..." उसने कहा!
"वैसे भी दो लडकों के बीच ये रिश्ता सबसे बढिया होता है..."
"हाँ..." मेरा लँड दोपहर से ही उफ़न रहा था इसलिये कुछ देर में ही मैने अपना माल उसकी गाँड की गहराईयों में भर दिया और फ़िर कुछ देर के ब्रेक के बाद अब वो मेरे ऊपर चढ गया!
"ले डार्लिंग... ले ले.. अब मेरा लौडा ले ले..."
"हाँ निशी दे दे... ला घुसा..."
"ले ना जानेमन... तेरी गाँड की माँ चोद दूँगा..."
"हाँ चोद दे... माँ बहन... सब चोद दे..."
"जानेमन मेरी जान... तेरी गाँड बडी रसीली है..." और फ़िर उसका लँड भी मेरी गाँड की गहराई में घुस कर झड गया! हम दोनो तृप्त हो गये थे और नशे के कारण उस रात जल्दी नींद आ गयी!
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07-26-2017, 10:59 AM,
#28
RE: Hindi Lesbian Stories समलिंगी कहानियाँ
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!अगली सुबह गौरव वापस आ गया! इस बार उससे आराम से बात-चीत हुई! वो भी यू.पी. का सैक्सी सा देसी लौंडा था जो बातों और हुलिये से काफ़ी स्मार्ट और हरामी लगा! मुझे शक़ सा होने लगा कि शायद उसके और निशिकांत के बीच भी कुछ है!

अगले दिन जब कॉलेज में धर्मेन्द्र मिला तो उसने और लडकों की तरह नाटक नहीं किया और हाथ मिलाते ही मेरा हाथ दबाया और बोला! "क्यों डार्लिंग रात में याद आयी?"
"हाँ बहुत" मैने कहा!
"बस अब कभी साथ में रात गुज़ार भी ले जानेमन... तो मज़ा आ जाये..."
"ठीक है" उस साले ने मुझे सुबह सुबह ही ठरका दिया!
"आज आजा... आज वो लडका नहीं है..."
"नहीं यार, आज मेरे मामा आये हुए है... उनके जाते ही..."

उस दिन विनोद नहीं आया था, बस कुणाल था! उस दिन हम जब कैन्टीन में बैठे तो लडकों की बातों से सैंट्रल पार्क के बारे में पता चला और मैने सोचा कि वहाँ भी जाकर देखूँगा! कुणाल भी काफ़ी चुदायी की बातें करता था! मगर मैं उससे और विनोद से सिर्फ़ बदनामी के डर से डरता था! वो मुह फ़ट टाइप के थे!
उस रात का खाना मैने निशिकांत और गौरव के साथ खाया! विशम्भर अब बहुत खुश होकर खाना लगाता था और मैं मस्ती से उसकी कमसिन चिकनाहट निहारता था! जब गौरव इधर उधर हुआ तो निशी बोला!
"यार आज तेरी याद आयेगी..."
"हाँ यार... मुझे भी..." मैने असद को देखा वो काम में लगा था! उस दिन भी मैने विशम्भर को दस रुपये दिये! वो अब मेरा फ़ैन हो गया था! मैने मौका निकाल के कहा "रूम पर आया करो ना... आराम से बैठेंगे..."
"जी, आऊँगा..." उसने कहा और जब मुडा तो उसकी पैंट के ऊपर से उसकी गाँड देखकर मैं मस्त हो गया... उसके गुलाबी रसीले होंठ, मादक मुस्कुराहट और नशीला चेहरा... खैर इसी बहाने मेरी गौरव से भी जान पहचान हो गयी और दोस्ती फ़्रैंकनेस की तरफ़ बढने लगी!

फ़िर राशिद भाई के आने का दिन आने लगा! उनके आने के दो दिन पहले फ़िर लैटर आया कि मैं टैक्सी लेकर जाऊँ क्योंकि शायद उनके पास ज़्यादा सामान है! अब मुझे इसका आइडिआ तो बिल्कुल नहीं था कि वहाँ टैक्सी कहाँ से मिलेगी! टैक्सी की तलाश में विनोद ने मुझे प्रदीप नाम के एक लडके से मिलवाया और उसको देखते ही मैं तो बस देखता ही रह गया! जब वो मिला था वो व्हाइट जीन्स और स्वेटर पहने हुये था और उसका स्लिम ट्रिम जिस्म बडा सैक्सी लग रहा था! वैसे उसका चेहरा भी बडा सुंदर और प्यासा सा था! उससे सैटिंग हो गयी! उसने कहा कि वो जाने वाले दिन शाम के 7 बजे मेरे रूम पर आ जायेगा क्योंकि भैया की ट्रेन रात में पहुँचने वाली थी! जब मैने विनोद से 'थैंक यू' कहा तो वो बोला!
"मेरी कटारी... तू 'थैंक यू' क्यों बोलता है... एक बार अपनी बुँड दे दे..."
"अबे रहने दे यार..." मैने हल्के से शरमाते हुये कहा तो देखा कि प्रदीप भी मुस्कुरा रहा था! प्रदीप ओरिजिनली विनोद के घर के आसपास कहीं रहता था! बडा हरामी सा कमीना लडका था, जो रह रह कर अपना लँड खुजा और सहला रहा था! जब मैने एक दो बार उसकी ज़िप पर नज़र डाली तो देखा वहाँ उसका उभार अच्छा खासा था मगर तब तक मैं उस टाइप के मुह फ़ट लडकों से दूर ही रहता था!

"बोल, रूम पर दारू पिलायेगा क्या? चलूँ?" जब वहाँ से चले तो विनोद बोला! मैं चाहता भी था और नहीं भी!
"साले तू पीकर हरामीपना करेगा..."
"अरे मेरी मक्खन... एक बार हमारे हरामीपने का भी मज़ा ले ले..."
"देख... इसीलिये मना कर रहा हूँ..."
"अच्छा चल, कुछ नहीं करूँगा चल..." मैं धडकते दिल से रास्ते से दारू लेकर उसके साथ अपने रूम पर पहुँच गया! वहाँ वो जब जूते उतार के पलँग पर बैठा तो उसके सॉक्स की बदबू आयी जिस से मैं मस्त सा होने लगा!
"साले, तेरे पैरों से कितनी बदबू आ रही है..."
"बदबू नहीं बेटा... मर्द की खुश्बू है... बहुत से गाँडू तो पैरों पर नाक रगड के इसको सूंघते हैं..." हम अब पी रहे थे!
"क्यों, तुझे कहाँ मिले ऐसे लोग?"
"सालों को फ़ँसाना पडता है... वो तो हमारे जैसे नये लौंडों को ढूँढते रहते हैं..."
"क्यों?"
"सालों को नया नया लँड चाहिये होता है..."
"क्या बात करता है यार? तू उस टाइप का है?"
"उस टाइप का नहीं हूँ... जवान हूँ... थोडा मज़ा कर लेता हूँ..."

उस दिन वो क्रीम कलर की टैरीकॉट की पैंट पहने था और हमेशा की तरह वो इतनी चुस्त थी कि उसकी जाँघें और लँड उसमें समा ही नहीं पा रहे थे! आदत से मजबूर, मैं अक्सर उसकी जाँघों और उसके बीच के पहाड को देख रहा था! उसके आँडूओं के आसपास से ही पैंट में सलवटें पड रहीं थीं और ठीक उसके आँडूओ के नीचे उसकी पैंट की सिलायी बडी खूबसूरत लग रही थी! उसने दूसरा पेग बनाते हुये मुझे बताया!
"बहनचोद, एक दो तो पैसे भी देते हैं... पहले दारू पिला कर गाँड मरवाते हैं फ़िर गाँड मारने के पैसे देते हैं..."
"वाह यार... मुझे नहीं मिला कोई..."
"चलियो मेरे साथ किसी दिन..."
"अबे नहीं..."
"बहनचोद... फ़ट गयी तेरी? वो साले कुणाल की भी फ़टी थी पहली बार..."
"मतलब वो बाद में गया तेरे साथ?"
"अब तो हम साथ जाते हैं... अपना अपना आसामी पकड के वहाँ से निकल लेते हैं..." बातों में उसका लँड खडा हो गया था और अब टाइट पैंट के कारण साफ़ उभरा हुआ दिख रहा था!
"तूने मारी है कभी किसी की गाँड?"
"नहीं यार" ऐसे मामलों में साफ़ मुकर जाता हूँ!
"एक बार मार ले... ऐसा चस्का लगेगा कि डेली ढूँढेगा..." उसको क्या पता था कि मुझे वो चस्का लग चुका था!

थोडी और शराब नीचे उतरी तो वो अपने दोनो पैर मोड कर दीवार से टेक लगाकर बैठ गया! अब मुझे उसकी जाँघ का निचला हिस्सा और गाँड साफ़ दिखने लगी जिस कारण मैं अब वहाँ से नज़र हटाने में मुश्किल महसूस कर रहा था! साला था ही बडा ज़बर्दस्त!
"मुझे आती ही नहीं है यार मारनी..."
"मैं सिखा दूँगा राजा..."
"नहीं यार..."
"मुठ तो मारता है ना?"
"हाँ"
"कितनी बार?"
"एक बार... कभी कभी दो बार..."
"मतलब लौडा खुराक तो ढूँढने लगा है तेरा..."
"हाँ खडा हो जाता है तो बैठता ही नहीं है..."
"मेरा तो अभी भी खडा हो गया..."
"अभी कैसे खडा हो गया?" मैने पूछा!
"बस..."
"मतलब कोई लडकी वडकी भी नहीं है... क्या तू लडकी के बारे में सोच रहा था?"
"लडकी नहीं है तो क्या हुआ... तू तो है..." विनोद बोला!
वैसे तब तक मुझे भी चढ चुकी थी!
"मुझे देख के ही खडा हो गया??? क्या बात करता है यार..."
"तू मुझे हमेशा से बडा चिकना लगता है... बस एक बार तेरी मारने का दिल है..."
"क्या बोलता है यार... मैं कोई लौंडिया थोडी हूँ?"
"अरे यार... लौंडिया में ऐसा क्या है जो तुझ में नहीं है... तू वैसा ही गोरा, नमकीन और चिकना तो है..." मुझे उसकी बातें अच्छी लग रही थीं!
"अबे रहने दे, क्यों बकवास कर रहा है... तूने मना किया था ना कि इस टाइप की बातें नहीं करेगा..." उसकी बातें अच्छी लगने के बावज़ूद भी मैने कहा!
"तू बुरा क्यों मान रहा है... मैं तो तुझे सच्चाई बता रहा हूँ... बस एक बार गाँड दे दे जानेमन... तो मज़ा आ जायेगा... अब चढ भी गयी है, गाँड मारने में बहुत मज़ा आयेगा..."
"पहले कितनों की मार चुका है?"
"काफ़ी एक्स्पीरिएन्स है... सैटिस्फ़ाई करके मारूँगा..."
"अबे गाँड मरवाने में क्या मज़ा आता होगा किसी को?"
"बेटा जब सरक के बुँड के छेद में घुसता है तो ऐसा मज़ा देता है कि पूछ मत..."
"तू क्या पूरा लँड घुसा देता है?"
"पूरा का पूरा... साले, जड तक... एक बार मरवा... दिखा दूँगा..."

कहते हुए उसने मज़बूती से मेरा हाथ पकड लिया तो मैं थोडा और मस्त हो गया!
"एक बार लँड सहला दे ना अपने चिकने हाथ से..."
"अबे...." मैं मना कर पाता, उसके पहले ही उसने मेरा हाथ पकड के अपने लँड पर घुमा दिया! उसका लँड वास्तव में फ़ुँकार मार रहा था!
"देख देख... कैसा लगा... देख..." वो मेरा हाथ अपने लँड पर दबा के कह रहा था!
"अबे कैसा क्या?"
"खोल के थमा दूँ क्या?"
"नहीं यार..."
"अच्छा चल एक चुम्मा दे दे... एक किस अपने गाल पे..." और फ़िर इसके पहले कि मैं फ़िर उसे मना कर पाता, उसने मेरा चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया और मेरे सर के पीछे के बालों में हाथ फ़ँसा के अपने होंठ मेरे गालों पर रख दिये!
"उँहु... विनोद... अबे ये क्या... अबे पागल है?" मगर उसने कसमसा के मेरे गालों को अपने हाथ से पकड के अपने होंठों से चूस डाला! उसकी मज़बूत पकड के कारण मैं हिल नहीं पाया और कुछ मैने भी हिलना नहीं चाहा! और फ़िर अभी वो हटता, उसने वैसे ही मुझे थोडा और घुमाया और देखते देखते अपने होंठ मेरे होंठों पर रख के दबा दिये तो उसके होंठों की मज़बूती के कारण मेरे होंठों मेरे दाँत पर दबे! इससे दर्द हुआ और मेरे होंठ हल्का सा खुल गया तो उसने मेरे मुह को अपने मुह से पूरा सील कर के चूसना शुरु कर दिया!
"उंहु... उहहह... उंहु..." उसने करीब दो मिनिट तक लगातार मुझे किस किया!
"अआहहह... मज़ा आया ना बेटा?" मैं अब काफ़ी कमज़ोर पड चुका था!
"आह... आज दिली इच्छा पूरी हो गयी यार... तेरे होंठों का रस बडा शराबी है..."
"अबे तू बडा कमीना है..."
"अच्छा चल अब चलता हूँ..." जब उसने कहा तो अंदर ही अंदर मेरा दिल टूट गया!
"ज़रा मूत लूँ... फ़िर निकलता हूँ..." उसने ऐसा कहते हुये मेरा रिएक्शन देखा क्योंकि अपने डिस-अपॉइंट्मेंट को मैं छुपा नहीं पाया था!

वो जब बाथरूम में मूतने के लिये गया तो उसने दरवाज़ा बन्द नहीं किया और अंदर से आती उसके मूतने की आवाज़ से मैं मस्त हो गया! फ़िर जब वो बाहर आया को मैने देखा कि उसने सिर्फ़ चड्‍डी पहन रखी थी और उसके निचले हिस्से से लँड बाहर खींच के हाथ में लेकर सहला रहा था! उसका लँड देख कर मेरी रही सही ना नुकुर गायब हो गयी! उसका लँड लम्बा और मोटा था और साँवला, उसने अपना सुपाडा खोल रखा था, काफ़ी सुंदर लौडा था!
"अरे यार... ये क्या?"
"तू भी खोल ले ना... तेरी किस ने खडा करवा दिया..."
"अरे यार किसी को पता चलेगा तो हँसेगा..."
"किसी बहन के लौडे को यहाँ अकेले मे हुई बात का कैसे पता चलेगा?" वो मेरे करीब आ गया था! मैं बैठा था, उसका लँड मेरे मुह के पास आ चुका था, मैं ठरक चुका था!
"चुप रह ना... अब देख, बहुत मज़ा आयेगा..." कहकर उसने मुझे पलँग पर धक्‍का दे दिया! मेरे पैर नीचे लटके थे और सर तकिये पर था! उसने मेरी पैंट खोल दी तो मैने बस हल्के से उसका हाथ पकडा!
"मत कर ना..."
"बेटा तुझे मज़ा दूँगा..."
उसने मेरी पैंट नीचे सरका के मेरे लँड पर हाथ रख के मसल दिया!
"तेरा तो काफ़ी बडा दिखता है..." कहते हुये उसने मेरी अँडरवीअर भी नीचे सरकाई तो मेरा लँड हवा में खडा हो गया!
"यार प्लीज..."
उसने मेरे सामने ही अपनी चड्‍डी भी उतार दी तो मैने देखा कि उसने झाँटें शेव की हुयीं थी! नँगा होकर उसका बदन और ज़्यादा मादक लग रहा था! उसकी जाँघें मस्क्युलर और हल्के हल्के बालों वाली थी! उसका रँग ऊपर से साँवला लगता था मगर अंदर से गोरा था! वो फ़िर मेरी तरफ़ आया और मेरे कंधों पर हाथ रख कर मेरे ऊपर झुक गया जिससे उसका लँड मेरे लँड से टकराया! इस बार मेरी साँस उस मस्ती से रुक ही गयी! उसने मेरी कमर के दोनो तरफ़ अपने घुटने मोड लिये और मेरे लँड पर अपनी गाँड रख के अपना वेट अपने हाथों पर डालते हुए बैठ गया और अपनी मज़बूत गाँड की दिलचस्प दरार को हल्के हल्के से मेरे लँड की लम्बाई पर रगडने लगा!
"अआह..." मेरी हल्की सी सिसकारी निकली! उसकी सुडौल जाँघें मेरी कमर को दोनो तरफ़ से अपनी गिरफ़्त में लिये हुई थीं!
"अआह..."
"देखा यार... मज़ा आया ना?" मैने पहली बार अपने दोनो हाथ से उसकी कमर पकड के उसकी रिदम के साथ उसको पकड लिया और फ़िर हाथ पीछे करके उसकी कमर और गाँड का उभार सहलाया!
"कैसी है?"
"क्या चीज़?"
"मेरी गाँड..."
"अच्छी है..."
मेरे समझ में नहीं आया कि वो जब, अभी तक मेरी गाँड मारने की बात कर रहा था तो अब मेरे लँड पर अपनी गाँड क्यों रगडने लगा था! शायद वो मुझे सेड्‍यूस करके कम्फ़र्टेबल करना चाहता था ताकि जब मैं भी मज़ा लेने लगूँ तो उसका काम आसान हो जाये! वो अब हल्के हल्के मेरे लँड पर बैठ कर अपनी फ़ाँकों को भींच कर मेरे लँड को उनके बीच दबाने लगा था! मैने इस बार उसके छेद के पास उँगलियाँ लगायी तो पाया कि वहाँ एक भी बाल नहीं था!
"वहाँ भी शेव कर दिया..."
"क्यों?"
"बस ऐसे ही..."
"कैसे करता है?"
"करवाता हूँ किसी से... तू भी करवायेगा क्या?"
"कर देना..."
"तेरी तो ऐसे ही चिकनी है..."
मेरा सुपाडा अब प्रीकम से भीग चुका था!
"मज़ा आ रहा है ना?"
"हाँ थोडा थोडा..."
"हाँ राजा मज़ा ले..." अब वो ऐसी पोजिशन बना रहा था कि मेरा, प्रीकम से भीगा हुआ, ल्युब्रिकेटेड सुपाडा अक्सर उसके छेद पर फ़ँसने लगा था! वैसे ही एक बार मैने हल्का सा चूतड ऊपर उठा के उसके छेद पर ज़ोर बनाया तो उसने सिसकारी भरी!
"अआहहह... घुसेगा बेटा अंदर भी घुसेगा..." उसने कहा! फ़िर उसने एक बार इधर उधर देखा!
"क्या देख रहा है?" मैने पूछा!
"तेल है तेरे पास?"
"सामने है..." उसने भी ठीक वैसे ही तेल की बॉटल उठायी जैसे निशिकांत ने उठायी थी और मेरे लँड को तेल से भिगा के फ़िर अपनी गाँड को उस पर रगडने लगा!
"गाँड मरवाना चाहता है क्या?"
"तुझे क्या लगता है?"
अब मुझे वो सेफ़ लगने लगा था, अगर वो मुझसे गाँड मरवायेगा तो किसी से ये सब बतायेगा नहीं!
अब जब मेरा सुपाडा उसके छेद पर फ़ँसा तो मैने एक हाथ से अपने लँड को पोजिशन में बना कर रखा! वो भी हल्का सा उठ गया और जब मैने अपनी गाँड ऊपर करके ज़ोर लगाया तो उसने भी अपनी गाँड को ढीला छोड कर मेरे लँड पर अड्जस्ट कर दिया और नीचे की तरफ़ दबाया जिससे मेरा लँड सडसडाता हुआ उसकी गाँड के अंदर घुस गया! उसकी गर्म मज़बूत गाँड ने मेरे लँड को कस के जकड लिया और मुझे मज़ा आ गया! मैने लँड को और अंदर घुसाया और कुछ ही देर में वो मेरा पूरा लँड अपनी गाँड में घुसवा के मज़ा ले ले कर मेरे ऊपर, ऊपर नीचे होने लगा! मैने अब उसकी कमर कस के पकड ली और उसको अपने ऊपर झुका कर फ़िर उसके होंठों पर अपने होंठ रख कर उसके साथ किसिंग शुरु कर दी! उसकी गाँड खुली हुई थी! मेरे एक्स्पीरिएन्स के हिसाब से उसने काफ़ी गाँड मरवायी हुई थी!

"क्यों, काफ़ी मरवा चुका है ना?" मैने पूछा!
"हाँ..." उसने कहा!
"कुणाल से भी मरवायी है क्या?"
"रहने दे यार... नाम क्यों लें किसी का..."
"ऐसे ही पूछ रहा हूँ यार... दोस्ती यारी में..."
"हाँ उससे भी..."
"उसकी मारी भी?"
"हाँ... तुझे मारनी है क्या उसकी?"
"देगा क्या?"
"दे देगा..."
"तो देखूँगा यार... अभी तो अपनी लेने दे..." कहकर मैं उसकी गाँड का मज़ा लेता रहा!
फ़िर मैने उसको सीधा करके लिटाया और उसके घुटने फ़ैला के आगे से उसकी गाँड बजाने लगा! अब मेरे धक्‍कों में ताक़त आ गयी थी!

कुछ देर बाद मैं रुक गया!
"क्या हुआ?"
"थक गया यार... तूने एकदम से शुरु करवा दिया ना..."
"हा हा हा..."
"लँड मुह में लेगा?"
"जा धोकर आ..."
"अपना नहीं चुसवायेगा?"
"आजा चुस ले..." 'अपना' धोने के पहले मैं उसके ऊपर झुका और उसका 'हथौडा' अपने मुह में भर लिया और उसको चूसने लगा!
"साले तू भी एक्स्पर्ट है..."
"अगर एक्स्पर्ट नहीं होता तो तुझे लँड की सवारी कैसे कराता?"
"तू मरवाता है?"
"हाँ..."
"वाह यार मैं समझता था कि तू इस लाइन का नहीं होगा इसीलिये तुझे पटाने में इतना टाइम लगाया..."
"होता है... होता है..." मैने कहा!

उसका लँड मर्दाना, भयन्कर और खुश्बूदार था! उसमें पसीने की खुश्बू और नमक था! उसकी बॉडी ओडर ज़बर्दस्त थी! फ़िर मैं उसकी छाती पर चढने लगा!
"अबे धो तो ले..."
"अबे क्या धोना... तेरी गाँड का ही गू तो है... चल मुह खोल..." मैने कहा और अपना लँड उसके मुह में घुसा के उसका मुह चोदने लगा!
"अब अपनी गाँड दे दे ना..." उसने कहा तो इस बार मैं पलट के लेट गया! उसका लँड मेरे छेद पर एक दो बार टिका और फ़िर सीधा अंदर घुसता चला गया! उसके साइज़ ने मेरा छेद फ़ैला दिया और मेरे मुह से आवाज़ निकल गयी!
"अआहह... ई... धीरे डाल यार..." उसका मज़बूत जिस्म मेरे चिकने बदन को ज़बर्दस्त थपेडे लगा रहा था! मैं उसके वज़न के नीचे दबा हुआ था!

"तेरी गाँड गुलाबी है यार... साली को चोद चोद के लाल कर दूँगा..." उसने कहा और तेज़ धक्‍के लगाता रहा!

अगले ब्रेक के बाद मैने फ़िर उसकी गाँड मारी! इस बार उसको पलट के लिटा दिया और मैं उसके ऊपर चढ गया! उसकी गाँड मस्क्युलर और गोल थी, उसके बीच लँड फ़ँसाने में बडा मज़ा आ रहा था! फ़िर मैं रुक नहीं पाया और मेरा माल झड गया! उसके बाद मेरे कहने पर उसने अपना माल मेरे मुह में झाड के मुझे पिलाया!
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07-26-2017, 10:59 AM,
#29
RE: Hindi Lesbian Stories समलिंगी कहानियाँ
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उसके बाद जब वो (विनोद) गया तो मैं गौरव के रूम में गया और उन दोनो (गौरव और निशिकांत) के साथ खाना खाने चला गया, जहाँ मैं उन दोनो के साथ साथ विशम्भर और असद को भी निहारता रहा! निशिकांत अब मुझे बडी प्यासी नज़रों से देखता था! हम इतने पास होकर भी चुदायी नहीं कर पा रहे थे! और इसी दूरी के कारण, वो साला भी मुझे और भी हसीन और चिकना लगने लगा था!
उस दिन जब मैने 500 का नोट निकाल के ढाबे वाले को दिया तो उसके पास चेंज नहीं था! मैने उससे कहा कि वो चेंज करवा के किसी लडके से भिजवा दे! वहाँ से लौटने में गौरव और निशिकांत मेरे रूम में ही बैठ गये!

"यार किसी दिन चलो, घूमने चलते हैं..." गौरव ने कहा!
"ठीक है यार, चलो, जब दिल हो चलो..." तो मैने भी कहा!
"हाँ, भाई को थोडा घुमा देते हैं... वरना वापस जाकर कहेगा कि सालों ने गाँड मार दी.. हा हा हा हा..."
गौरव के ये कहने पर मैने निशिकांत को देखा, वो हल्का सा शरमा सा गया था! वैसे गौरव हरामी था और निशी चिकना... मुझे फ़िर शक़ सा हुआ कि कहीं उन दोनो के बीच भी कुछ है तो नहीं!
"नहीं शिक़ायत नहीं करूँगा, मगर चलो कहीं चलेंगे..." निशिकांत बोला!

गौरव भी काफ़ी टाइट पैंट पहनता था और बडा रोचक सा लडका था! मैं तो उसके भी सपने देखने लगा था! उनके जाने के बाद मैं रज़ाई में घुस के लेट गया! फ़िर कुछ ही देर बाद अचानक दरवाज़े पर नॉक हुआ! मेरी समझ नहीं आया कि कौन हो सकता था! मुझे लगा कहीं निशिकांत ही तो नहीं है! दरवाज़ा खोला तो देखा, असद खडा था!
"क्या हुआ?" मैने खुश होते हुये पूछा!
"ये आपके पैसे..."
मैं तो भूल ही गया था कि ढाबे वाले से पैसे रूम पर भेजने को कहा था!
"आओ ना, अंदर तो आओ..." मैने असद का हाथ हल्के से सहलाते हुये उससे पैसे लिये और कहा!
"नहीं जाना है... अभी सफ़ाई करनी है!"
"अरे क्या हुआ? थोडी देर तो रुको... चले जाना..." कहकर मैने उसका हाथ पकड के उसको रूम में खींच लिया!
"तुम तो अब भाव ही नहीं देते हो, आओ तो..."
"अरे भैया, काम बहुत रहता है..." एक ही लडके को दूसरी बार सेड्‍यूस करने का अपना ही मज़ा था!
"थोडा बैठो, चले जाना..." वो पलँग पर बैठ गया तो मैने प्यार से उसक बदन देखा! उसका बदन इस बीच और निखर गया था! जाँघें और सुडौल हो गयी थी और चेहरे पर और लाली और चमक आ गयी थी!
"थोडा आराम करोगे क्या?"
"नहीं भैया जी.." मगर ये कहते हुये भी उसने एक बार अपनी ज़िप पर अपनी उँगलियाँ फ़ेरी! शायद उसका लँड कुलबुला रहा था! वो उनमें से था जो ठरक चढने पर चुदायी कर लेते थे और बाद मैं अवॉइड करते थे और फ़िर ठरक चढती तो फ़िर आ जाते थे! इन सब के बीच उन्हें शायद गे सैक्स का गिल्ट भी होता था!

मैं शॉर्ट्स में था! "ठँड है यार" कहते हुए मैने सामने पडी तेल की बॉटल देखी! फ़िर उसके काँपते हुये होंठ और एंग्क्शस सी चितवन! वो रह रह कर कभी अपने हाथों से अपने बाल सही कर रहा था और कभी अपने होंठ अपने दाँतों से काट रहा था और कभी अपने होंठों पर ज़बान फ़ेर रहा था! मैने उसकी जाँघ पर हाथ रखा!
"आज नहीं..." वो बोला!
"क्यों क्या हुआ?"
"आज मूड नहीं है..."
"अरे मूड तो बन जाता है..." कहते हुये मैने उसकी जाँघ पर हाथ फ़ेरा और ऊपर उसकी ज़िप की तरफ़ ले जाना लगा!
"टाइम भी नहीं है, जाना है..."
"चले जाना... थोडा जल्दी जल्दी कर लेना! तुम तो उस दिन के बाद से गायब ही हो गये..."
"ऐसा... नहीं है..."
मैने उसकी ज़िप पर हाथ रखा तो उसका लँड खडा हो चुका था! उसके लँड की कुलबुलाहट मुझे पसंद आयी! मैने उसके लँड को दबा के सहलाना शुरु कर दिया तो उसका मूड बनते टाइम नहीं लगा!
"भैया यार, आदत पड जायेगी..."
"तो क्या हुआ यार? मज़ा ले ना..." कहकर मैने उसकी ज़िप खोल कर उसका लँड बाहर किया और थाम के सहलाने लगा तो वो टाँगें फ़ैला के रिलैक्स्ड हो गया और जब मैने पसीने की खुश्बू से तर उसका लँड चूसना चालू किया तो वो बिल्कुल आराम से हो गया! थोडी देर चूसने के बाद मैं उसके बगल में लेट गया और उसके लँड को अपनी जाँघों पर रगडने लगा और फ़िर उसके सुपाडे को अपनी शॉर्ट्स के नीचे की तरफ़ से अंदर घुसा कर अपने फ़ाँकों पर उसकी गर्मी का मज़ा लेने लगा तो उसने मेरी कमर में हाथ डाल दिया और सहलाने लगा! वो शायद समझ गया था कि मैं गाँड मरवाने के मूड में हूँ! वो भी धक्‍के लगा लगा कर अपने लँड को मेरे शॉर्ट्स के अंदर सरका रहा था और इसमें जब उसका सुपाडा मेरी दरार में घुस के मेरे छेद के आसपास टकराता तो मज़ा आ जाता था!

मैने कुछ देर में अपनी शॉर्ट्स उतार दी तो वो बिना कुछ कहे मेरे ऊपर चढ गया और अपने लँड को मेरे चूतडों के बीच दबा के रगडने लगा! इससे अब उसका सुपाडा सीधा मेरे छेद से दब के टकरा रहा था और बहुत मज़ा दे रहा था! इस कारण मैं अपनी गाँड कभी ऊपर उठाता कभी बीच मे उसके लँड को फ़ाँकों के बीच दबा लेता और कभी अपनी जाँघें फ़ैला लेता! मुझे अपने छेद पर उसका प्रीकम भी महसूस होने लगा था! उसने मेरी गाँड गीली कर दी थी जिस वजह से उसका लँड आराम से फ़िसलने लगा था! प्रीकम के सहारे ही उसने अपना लँड मेरी गाँड में घुसाने की कोशिश की! उसका सुपाडा एक दो बार हल्का सा मेरे छेद में फ़ँसा, एक बार थोडा घुसा भी! फ़िर उसने कस के मेरे कंधे पकड के सिसकारी भरी और उसको और अंदर घुसाने की कोशिश की! लँड में जान तो थी मगर लौंडे को शायद एक्स्पीरिएंस नहीं था!
"रुक, तेल लगा ले..."
"लाओ, तेल कहाँ है?" मैने तेल उठा के बडे प्यार से उसके लँड की मालिश की तो उसने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा!
"अब सही से घुस जायेगा..."
"हाँ बेटा, अब सटासट जायेगा... आजा..." कहकर मैं पलट के लेटा तो वो फ़िर मेरे ऊपर आकर सीधा अपने लँड को मेरे छेद पर दबाने लगा! मैने एक दो धक्‍के के बाद छेद को रिलैक्स्ड कर के ढीला किया और जब उसने साँस रोक के निशाना साध कर ज़ोर लगाया तो मेरी गाँड का सुराख फ़ैलता गया और उसका लँड सीधा अंदर की गहरायी में घुसता चला गया! उस पर वो मस्त हो गया!

"हाँ... अब घुसा अंदर... सीधा अंदर है... पूरा घुस गया..." उसने कहा और मस्ती से अपने गाँड को उठा उठा के मेरी गाँड में अपने लँड के धक्‍के देने लगा! कुछ देर में उसका लँड पूरा का पूरा मेरी गाँड में घुस गया और मैने भींच भींच के उसकी मस्ती बढाना शुरु कर दी! मैं गाँड उठा उठा के उसका लँड अपने अंदर लेने लगा! उसका लँड मेरे छेद पर जो फ़्रिक्शन पैदा कर रहा था उससे मुझे बहुत मज़ा आ रहा था! उसके धक्‍कों में नयी जवानी के जोश की जान थी! उसका हर धक्‍का, उसके लँड को काफ़ी ताक़त से मेरी गाँड की गहराईयों में धकेल रहा था! मुझे अपने छेद की रिम पर उसके लँड की सरसराहट का अहसास अच्छा लग रहा था! शाम में विनोद के लँड ने मेरी गाँड खोली थी और अब ये जोशिला नौजवान मेरे ऊपर चढा हुआ था! मेरी गाँड के मस्ती की दिन थे! बडा मज़ा आ रहा था!

फ़िर जब उसकी पकड मज़बूत, धक्‍के तेज़ और साँसें उखडने लगीं तो मैं समझ गया कि लौंडे का माल झडने वाला है! इसलिये मैने उसका मज़ा बढाने के लिये अपनी गाँड खूब उठा उठा के भींचनी शुरु कर दी! उसका लँड अब सटासट अंदर बाहर हो रहा था! फ़िर उसने दो तीन गहरे धक्‍के दिये और दूसरे धक्‍के के बीच में ही उसका लँड मेरी गाँड में फ़ूला और साथ में उसकी सिसकारी निकली!
"हाश... उउउहहह... साला... आहहह..." माल झडते समय वो बडी तेज़ धक्‍के दे रहा था! उसका लँड कई बार मेरी गाँड में फ़ूला और हुल्लाड मारने लगा!
"बहन... चोद... झड गया... साला..आह.. मज़ा.. आ.. आ.. गया यार...." उसने कहा और जब उसका लँड उछलना बंद हो गया तो वो मेरे ऊपर पस्त होकर गिर गया! उसका लँड अभी भी मेरी गाँड में ही था और कभी कभी वो भिंचता तो लँड हिचकोले खा जाता! मैने भी छेद भींच कर उसके लँड को अपनी गाँड से थाम रखा था! कुछ देर बाद वो हिला! पहले उसका आगे का बदन ऊपर उठा और फ़िर उसने धीरे धीरे अपना लँड बाहर खींचा! फ़िर उसका सुपाडा 'छपाक' की आवाज़ के साथ बाहर आ गया!
"कोई कपडा दो..." उसने कहा तो मैने पास पडी मेरी बनियान उठा के दे दी! उसने उससे अपना लँड पोछा और फ़िर मैने उसी से अपनी गाँड पोछ ली! उसका माल हल्का हल्का मेरी गाँड से रिस रहा था! मैने सही से गाँड में उँगली करके उसका माल गाँड से साफ़ किया!
"इसमें ज़्यादा मज़ा आया!" इस बीच वो बोला!
"अच्छा चुसवाने से ज़्यादा चोदने में आया मज़ा तुझे?"
"हाँ"
"तो आ जाया कर ना... मैं तो बुलाता ही रहता हूँ..."
"हाँ आ जाऊँगा..." फ़िर जब वो चला गया तो मैं फ़ाइनली उस दिन बडा खुश खुश सो गया!
जब मैं टैक्सी लेकर राशिद भैया को लेने जा रहा था तो मुझे काफ़ी देर तक आराम से प्रदीप को देखने का टाइम मिल गया! उसने भी मुझे कई बार अपना जिस्म और चेहरा निहारते हुए देख लिया! साला जब एक पैर ब्रेक पर और एक अक्सेलरेटर पे रख के गाडी चला रहा था तो मैं सिर्फ़ उसकी ज़िप और थाईज़ का मूवमेंट देख कर चकरा रहा था! टाइट पैंट में उसका वो एरीआ बडा सुंदर लग रहा था! उसके हाथ स्टीअरिंग पर ऐसे घूम रहे थे जैसे किसी चिकने से कमसिन लौंडे के जिस्म पर!
उस दिन शाम से ही कोहरा हो गया था!
"बहनचोद कोहरे में मा चुद जाती है..." प्रदीप बोला!
"हाँ मुश्किल तो हो जाती है..."
"साला इतना कोहरा है कि ऊपर चढूँ तो चूत का छेद ना दिखायी दे..." मुझे उसकी अब्यूसिव बातें मदहोश करने लगीं थी! उसने एक हाथ में कडा पहन रखा था और एक हाथ में पूजा के धागे थे! गले में लॉकेट था और ऊपर एक मरून जैकेट! लडका गोरा था और स्लिम भी! शायद लम्बाई के कारण उसके मसल्स छुप गये थे क्योंकि उसकी कलायी चौडी थी और कंधे भी काफ़ी चौडे थे!

फ़ाइनली हम स्टेशन पहुँचे तो वहाँ सर्दी के मारे सन्‍नाटा था! कुछ लोग इधर उधर आग जलाये बैठे थे! उसने पार्किंग में गाडी खडी कर दी! 9 बजे थे!
"ट्रेन का टाइम देख कर बताता हूँ कहीं साली लेट ना हो..." मैने कहा!
मगर जब पता किया तो पता चला कि सारी ट्रेन्स कोहरे के कारण लेट हैं और भैया की ट्रेन तो 11 बजे आयेगी!
"लो गाँड मर गयी ना... अब बोलो वापस चलें या यहीं बैठोगे?" जब मैने वापस आकर प्रदीप को बताया तो वो बोला! मुझे वहाँ बैठने में फ़ायदा लगा!

पहले तो कुछ देर मैं पीछे और प्रदीप आगे बैठा! उसने गाने लगा दिये थे! मगर उसके बाद वो भी पीछे आ गया!
"पीछे आराम से बैठता हूँ..." पीछे बैठने में उसने अपने घुटने मोड के सामने के सीट पर टिका लिये! इससे उसकी गाँड थोडा आगे हो गयी और जाँघें टाइट हो गयी और मैं उनको देखता रहा! उसने अपना एक हाथ बगल में रखा जिसपे कई बार मेरा हाथ पडा!
"मौसम बढिया है... क्यों है ना?" फ़िर वो बोला!
"हाँ बढिया है यार..."
"मज़ा लेने वाला मौसम है..."
"कैसा मज़ा?"
"यारों दोस्तों के साथ..."
"हाँ वो तो है..."
"साला क्वॉर्टर लिया था, वो भी स्टैण्ड पर रखा है... सोचा था फ़ौरन लौट जाऊँगा..."
"ये तो बुरा हुआ... अब तो मिलेगा भी नहीं..."
"साली इतनी सर्दी है, रज़ाई भी एक घंटे में गर्म होती है... ऐसे में शादीशुदा बन्दों की मस्ती है..."
"हाँ यार, रज़ाई में चूत का हीटर रहता है ना..." मैने कहा!
"हाँ बस चूत खोलो और गर्मी ले लो..." उसकी बातें बढिया थीं!
"यहाँ हम छडे साले मुठ मारते रह जाते हैं..."
"हा हा... हाँ, मुठ मार कर ही काम चलता है..."
इस बार जब मेरा हाथ उसके हाथ से टच हुआ तो मैने अपनी उँगलियाँ वहीं रहने दीं! इन्फ़ैक्ट अब मैने भी वैसे ही आगे घुटने मोड कर पैर रख लिये थे और हमारी जाँघें भी आपस में कई बार टकरा जा रहीं थी! उसका जिस्म गर्म था और काफ़ी गदराया हुआ लग रहा था! उसकी आँखों में कशिश थी उसने मेरे हाथ के पास से अपने हाथ को हटाने की कोई कोशिश नहीं की! इन्फ़ैक्ट अब वो मेरा हाथ पकड पकड के बातें करने लगा!
"साला जब रात में घूँट्‍टा गर्म होता है ना, तो दिल करता है किसी चूत को ऊपर बिठा के उछाल उछाल के, साली की चोदूँ..." उसने कहा और मेरी जाँघ पर हाथ रख कर कस के दबाया!
"क्यों यार, क्या बोलता है?" उसने पूछा!
"हाँ दिल तो करता है, मगर मिलती कहाँ है?"
"यही तो अफ़सोस है... साली चूत नहीं मिलती... तेरा गुज़ारा कैसे चलता है?" अब हम आराम से चुदायी की बातें कर रहे थे! उसने, जो हाथ मेरी जाँघ पर रखा था, अब तक नहीं हटाया था! मुझे उसकी हथेली की गर्मी मिल रही थी! शायद साला ठरक रहा था मगर अभी तक मेरी कुछ करने की हिम्मत नहीं पडी थी!
11 बजे फ़िर पता चला कि गाडी और एक घंटे बाद आयेगी!

"यार एक नींद मार लेता हूँ..." प्रदीप ने उसी पोजिशन में बैठे बैठे अपनी आँखें बन्द कर लीं! "जब जाना हो तो उठा देना..." उसने मुझसे कहा!
वो कुछ देर वैसे ही बैठा रहा! उसका हाथ मेरे घुटने पर था और कुछ देर में उसने मेरे कंधे पर सर रख लिया तो मेरा लँड तुरन्त खडा हो गया और मज़ा भी आने लगा! मैने एक हाथ पीछे फ़ैला दिया और कार की सीट पर रख दिया और वो वैसे ही बैठ कर सोता रहा! कुछ देर में नींद में उसका हाथ मेरे घुटने से सरक के मेरी जाँघ पर आ गया और वो मेरे ऊपर थोडा और झुक के लेट गया! उसका एक हाथ अपनी टाँगों के बीच था! सर्दी और अँधेरा बहुत था! मुझे बस उसके बदन और उसके साँसों की गर्मी अच्छी लग रही थी! मैने अपना फ़ैला हुआ हाथ उअके कंधे पर रख दिया! वो थोडा और नीचे हो गया और ऑल्मोस्ट मेरी छाती के पास अपना मुह रख कर लेटा रहा! मैं उसका इरादा भाँप नहीं पा रहा था!
एक घंटे के बाद फ़िर पता चला कि गाडी डेढ घंटा और लेट हो गयी!

इस बार उसने कहा कि वो पैर फ़ैला के लेटना चाहता है! मगर जब मैने अपने आगे बैठने का आइडिआ दिया तो उसने मना कर दिया!
"ऐसे ही बैठ जा ना, तेरे ऊपर सर रख के लेट जाता हूँ!" अब वो मेरी गोद में सर रख कर लेट गया और अपने पैर मोड के सीट पर रख लिये! मैने इस बार हिम्मत कर के एक हाथ उसकी कमर पर रख दिया वो कुछ नहीं बोला! उसकी साँसें मेरी जाँघ से टकरा रहीं थी! मेरा लँड अब हुल्लाड भर रहा था और जब वो अड्जस्ट हुआ तो उसका गाल सीधा मेरे लँड पर आ गया! मुझे लगा कि वो लँड को खडा पाकर शायद अपना मुह हटा ले! मगर जब वो मेरे लँड को तकिया बना के लेटा रहा तो मैने अपने हाथ से उसकी कमर सहलाना शुरु कर दी! मुझे तो मज़ा आना शुरु हो चुका था! फ़िर उसने करवट ली और अपना मुह मेरी टाँगों के बीच घुसा के लेट गया! अब उसका मुह मेरे लँड पर था! अब मेरा लँड बिन्दास उछलने लगा था! उसकी साँसों ने 'उसको' गर्म कर दिया था! मैने एक दो बार कमर से होते हुये उसकी गाँड की गदरायी गोल और मुलायम फ़ाँक को भी सहलाया! माहौल पूरा रोमेंटिक था, मगर फ़िर भी मुझे ये पता नहीं था कि वो सच में सोया था या नाटक कर रहा था! मगर जितना हो सकता था, मैं मज़ा लेता रहा!

फ़िर गाडी आने का टाइम हुआ तो मैने उसको उठाया और जब एन्क्वाइअरी पर गया तो पता चला कि एक घंटा और लगेगा! डेढ तो बज ही चुके थे! इस बार प्रदीप ने कहा कि मैं थोडा आराम कर लूँ!
"लेट जा यार, तू भी लेट जा... आजा सर रख ले..." उसकी आवाज़ कामतुर हो चुकी थी! वो मुझे सैक्सी सी नज़रों से देख रहा था! इस बार वो बैठ गया और जब मैने उसकी जाँघों पर सर रखा तो उसकी देसी जवानी की गर्मी और मुलायम मसल्स के स्पर्श से मैं मस्त हो गया! मैं कुछ देर बाद सोने का नाटक करता हुआ उसकी ज़िप की तरफ़ करवट लेकर लेट गया और ऐसा करते ही मुझे भी गालों पर उसके खडे लँड का स्पर्श मिला! उसका लँड बिल्कुल हुल्लाड मार कर शायद बाहर निकलने को तैयार था! साला पत्थर सा सख्त था! मैने उसका खूब मज़ा लिया! प्रदीप टाँगों के बीच दहक रहा था! किसी तंदूर की तरह गर्म था वहाँ! मैने अपने होंठों पर उसके लँड को मचलते हुये महसूस किया तो मैं ठरक गया! उसने अपना एक हाथ मेरे सर पर रख दिया!

अब वो हरकत में आने लगा था! उसका लँड ठनक के मस्त हो चुका था! मेरे कुछ देर लेटने के बाद उसने अपनी एक टाँग आगे सीट पर टिका ली मगर मैं फ़िर भी उसकी फ़ैली जाँघों के बीच मुह उसके लँड पर घुसा कर लेटा रहा! उसने एक बार वैसे ही अपने आँडूए अड्जस्ट किये फ़िर मेरी बाज़ू सहलायी और एक हाथ की उँगलियों से मेरे गालों को सहलाया! उसका लँड अब उफ़न रहा था!
"रुक, थोडा पैंट सरका दूँ..." फ़ाइनली वो अचानक बोला! मतलब उसको मालूम था कि मैं जगा हुआ हूँ! मैं हल्का सा ऊपर उठा तो उसने अपनी पैंट के बटन और ज़िप को खोल के अपनी चड्‍डी समेत उसको अपनी जाँघ पर सरका दिया! मुझे उसके मर्दाने लँड की खुश्बू सूंघने को मिली और मैं मदहोश हो गया!
"अब ठीक रहेगा, अब लेट जा..."
मैने अपने गालों को उसके लँड के बगल रखा और उनसे ही उसके लँड को सहलाते हुये मज़ा लेने लगा! उसका लँड लाल लोहे की तरह खडा और गर्म था! उसका सुपाडा तो भीग चुका था, उसका कुछ वीर्य मेरे गाल पर लग गया! मैने उसकी झाँटों में मुह घुसा के तेज़ तेज़ साँसें लेना शुरु कर दिया! उसने मेरा सर पकड लिया और अपनी जाँघें फ़ैला दीं! मैने एक हाथ की हथेली उसकी जाँघों के बीच उसके आँडूओं के नीचे घुसा के उसके आँडूये पकड के सहलाना शुरु कर दिये और उसकी गाँड और वहाँ के बालों को भी सहलाने लगा! उसकी खुश्बू बढिया थी! फ़िर मैने उसके सुपाडे को अपने होंठों से सहलाया तो उसने सिसकारी भरी!
"आह... शाबाश... आह..." मैने उसके लँड के छेद को ज़बान से सहलाया! उसका सुपाडा फ़ूला हुआ था! मैने उसके सुपाडे के निचले हिस्से को चाटा! वो उसके प्रीकम से नमकीन हो चुका था!

"पूरा मुह खोल ले ना..." उसने कहा तो मैने अपना मुह खोला और फ़िर उसका लँड पूरा अपने मुह में भर लिया! उसका सुपाडा मेरे मुह में टकरा टकरा के घुसने लगा! उसके लँड की गर्मी से मेरा मुह भी गर्म हो गया और होंठ उसके फ़्रिक्शन से फ़टने लगे! मैं उसका लँड चूसने लगा तो वो गाँड उचका उचका के मुझे अपना लँड चुसवाने लगा! साले में बडी जान थी! देसी गदरायी और कसावदार जान!

फ़ाइनली गाडी के आने के दो मिनिट पहले उसने अपने वीर्य की पहली धार मेरे मुह में मार दी!
"वाह... इन्तज़ार का फल मिल गया... क्यों मज़ा आया ना तुझे भी?"
"हाँ बहुत..."
"सर्दी में यही सब हो जाये तो बढिया रहता है... क्यों?"
"हाँ..." मुझे अभी भी उसके वीर्य का टेस्ट मिल रहा था! इस बार फ़ाइनली पता चला कि दस मिनिट बाद गाडी आ जायेगी!
मैं अपने होंठों से प्रदीप के गर्म नमकीन वीर्य का स्वाद चखता हुआ प्लेटफ़ॉर्म की तरफ़ बढ गया!
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07-26-2017, 11:00 AM,
#30
RE: Hindi Lesbian Stories समलिंगी कहानियाँ
मस्त कर गया पार्ट --07

राशिद भैया का ख्याल आने पर मैं अपनी कमसिन जवानी के दिनों की एक बात नहीं भूल पाता था! वैसे अब वो बात पुरानी हो चुकी थी मगर मुझे अभी भी उनकी बीसवीं बर्थ-डे भली भांति याद थी! मानों बस अभी कल ही की बात हो! मैं तब स्कूल की कच्ची कमसिन कली की तरह चिकना और मासूम हुआ करता था! राशिद की बर्थ-डे हमेशा धूम-धाम से मनायी जाती थी! उस बार भी वही हुआ था! उनके घर के सामने टैंट हाउस की कुर्सियाँ वगैरह पडीं थीं और छत पर शामियाना लगा था जिसमें मैं और लडकों के साथ खेल रहा था! हालाँकि तब तक मेरी सील नहीं टूटी थी मगर मैं दो-तीन लँड चूस चुका था और तीन चार लडकों से ऊपर ऊपर अपनी गाँड की दरार में लँड रगडवा चुका था! उनमें से एक लडका तो राशिद भैया का कजिन सनी भी था!

उस दिन राशिद भैया के फ़ादर ने मुझे सिगरेट लाने के लिये पैसे दिये! मैं अक्सर उनके लिये सिगरेट लाया करता था! उस दिन भी मैं एक लडके के साथ बाज़ार से सिगरेट लाने चला गया मगर जब लौटा तो राशिद भैया के फ़ादर यानी हुमेर चाचा नहीं दिखे! मैने उनको इधर उधर ढूँढा और फ़िर सिगरेट पॉकेट में रखकर खेलने लगा! कुछ देर बाद राशिद भैया वहाँ आये!
"क्यों, तुम पापा की सिगरेट लाने गये थे क्या?" उन्होने पूछा!
"जी भैया" तो मैने कहा!
"जाओ वो ऊपर कमरे में हैं, उनको दे दो, वो तुम्हारा वेट कर रहे हैं..."
ऊपर वाले कमरे का मतलब उनकी तीसरी मन्ज़िल पर बना एक छोटा सा कमरा था, जहाँ हुमेर चाचा अक्सर बैठा करते थे और सामने की छत पर पडे गमलों में पानी डाला करते थे! उस दिन राशिद भैया नयी नयी टाइट सी पैंट पहने थे जिसमें उनका जिस्म बडा खूबसूरत लग रहा था!

मैं और लडकों के साथ खेल रहा था इसलिये बडा मन मार के ऊपर की तरफ़ गया! दोपहर का समय था, ऊपर कमरे में कूलर चल रहा था, लाइट ऑफ़ थी! मैं सिर्फ़ एक छोटी सी निक्‍कर और टी-शर्ट पहने था, जो तब शायद मेरे कमसिन बदन और चिकनी गोल गाँड पर टाइट हुआ करती थी! जब मैने दरवाज़ा खोला तो कुछ नहीं दिखा! कुछ देर में जब आँखें अँधेरे में अड्जस्ट हुयीं तो देखा कि हुमेर चाचा सिर्फ़ एक लुँगी पहने चारपायी पर लेटे थे! उनके पैर मेरी तरफ़ थे और सर दूसरी तरफ़! उनकी जाँघें फ़ैली हुई थी! उनका जिस्म भी राशिद की तरह मज़बूत और गोरा था, उस समय उनकी उम्र कोई 42-45 के करीब रही होगी क्योंकि उनके घर में शादियाँ जल्दी हो जाती थी!

मैने अँधेरे में और आँखें गडा के देखा! हुमेर चाचा की लुँगी उनकी जाँघों तक उठी हुई थी, एक तरफ़ उनकी जाँघ के बीच तक और दूसरी टाँग पर उनकी जाँघ के ऊपरी हिस्से तक! मेरी साँसें और दिल की धडकनें तेज़ चलने लगीं! एक मन हुआ की उल्टे पैर वहाँ से वापस आ जाऊँ, मगर फ़िर भी अँधेरे में देखता रहा और जब मेरी आँखें अँधेरे की पूरी "यूज़्ड-टू" हुयीं तो फ़टी की फ़टी रह गयी क्योंकि मैने देखा कि हुमेर चाचा का एक हाथ तो उनकी आँखों के ऊपर मुडा हुआ था, मगर दूसरी अपनी नँगी जाँघ पर ऊपर की तरफ़ था और वो ना सिर्फ़ अपने आँडूए को हल्के हल्के सहला रहे थे बल्कि उनका लँड भी पूरा खडा हुआ हवा में लहरा रहा था! उन्होने लुँगी के नीचे कुछ नहीं पहन रखा था और उतनी सी रोशनी में भी मैं उनके मज़बूत भयावान लँड के साइज़ को साफ़ देख सकता था! मैने तब तक किसी मर्द का उतना बडा मज़बूत और पूरा खडा हुआ लँड नहीं देखा था! मैं उनके हथौडे जैसे भयन्कर लँड को देख के एकदम से पैनिक हो गया और जैसे ही वहाँ से मुडना चाहा हुमेर चाचा ने मुस्कुराते हुये अपनी आँखों से हाथ हटाया और कहा!
"अरे, अम्बर सिगरेट ले आये क्या? लाओ... मैं कब से इन्तज़ार कर रहा था... लाओ सिगरेट दे दो..."

मैने उनका वो रूप पहली बार देखा था इसलिये शरमा के हकला गया!
"जी हुमेर... चाचा... जी ले आया... लीजिये..." कहकर मैं जब उनके पास पैकेट लेकर गया तो भी ना जाने क्यों उनके मज़बूत लँड पर से, जिसको छुपाने की उन्होने कोई कोशिश नहीं की थी, नज़र नहीं हटा पा रहा था! जैसे जैसे मैं उनके पास जाता गया उनके लँड का असली भयन्कर साइज़ मेरे सामने आता गया! उस दौर में भी और ना जाने कितनी चुदायी के बाद भी उनके लँड में भरपूर फ़्रेशनेस और सख्ती थी! मैने काँपते हुये हाथों से सिगरेट का पैकेट उनकी तरफ़ बढाया तो उन्होने पैकेट के बजाये मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया और उनकी मर्दानी उँगलियाँ मेरे चिकने और मुलायम और काँपते हुये हाथ को सहलाने लगीं!
मेरा हलक सूखा जा रहा था और मैं बार बार अपना थूक निगल रहा था!

"डर गये क्या?" उन्होने पूछा तो मैने फ़िर थूक निगला!
"...नहीं... जी.. जी.. हाँ..."
"अरे डरो नहीं, इसमें डरने की क्या बात है?" कहकर उन्होने लेटे लेटे ही मुझे अपने करीब खींचा और अपने हाथ को मेरी कमर में डाल दिया!
"लो ज़रा पकड के तो देखो..." अब तो मैं बिल्कुल डर के हकला गया और मेरा गला कांटे की तरह सूख गया "जी... चाचा.. जी.. मतलब नहीं... मुझे खेलना है.. जी नहीं... जाना है..."
"अरे खेल लेना... ये भी तो खेल है... देखो बिल्कुल बैट की तरह है... लो, मैं किसी से पकडवाता नहीं हूँ, तुम बहुत अच्छे हो इसलिये तुमको पकडवा रहा हूँ... लो पकड के तो देखो... आओ, डरो नहीं..."
वैसे इतनी सब बात हो जाने के बाद मेरे बदन में भी आग सी लगने लगी थी! मेरे अंदर गे सैक्स का कीडा कुलबुलाने लगा था! तब तक मैने बस मोहल्ले के लडकों, नौकर और कजिन्स के साथ ही किया था मगर यहाँ इतने बडे मर्द के सामने मैं घबरा गया था!

उन्होने खुद ही मेरा काँपता हुआ हाथ पकडा और बडे प्यार से उसको अपने लँड पर रखा तो मैं उनके लँड की सख्ती और गर्मी से दँग रह गया...
"अआह शाबाश..." उन्होने सिसकारी भरते हुये कहा!
"हाँ ज़रा उँगलियों से पकड लो... डरो मत, पकड लो ना... डरते नहीं है..." कहकर उन्होने ना सिर्फ़ मुझे अपना लँड पकडा दिया बल्कि मेरी कमर को रगड के सहलाने लगे और बीच बीच में अब उनका हाथ सीधा मेरी गोल गाँड की चिकनी गाँड की फ़ाँकों पर जाने लगा!

"बढिया है... शाबाश, ऐसे ही पकड के ज़रा सहलाओ ना..." हुमेर चाचा का लँड अब मेरी हथेली की गिरफ़्त में मेरी मुलायम उँगलियों के स्पर्श से उछल उछल के हुल्लाड मार रहा था! मुझे उनका लँड किसी बन्दूक की गर्म नाल की तरह लग रहा था! मैने पहली बार थोडा सहम के और थोडा शरमा के उनके लँड को पकड के हल्के से सहलाते हुये रगडा तो उनकी सिसकारी निकल गयी!
"सी... अआहहह... बेटा अआह... वाह... शाबाश... वाह..." कहते हुये उन्होने अपनी लुँगी पूरी ऊपर उठा के अपनी जाँघें काफ़ी फ़ैला दीं!

उनका नँगा बदन, उसकी उभरती बल खाती मसल्स और जिस्म के कटाव अब मुझे साफ़ दिख रहे थे! उनकी जाँघें भी गदरायी हुई माँसल थी और उनके बीच उनके बडे बडे काले आँडूए थे! उन्होने एक झटके से मेरी निक्‍कर को कमर से सरका के मेरे घुटनों के नीचे कर दिया! मैं इम्पल्ज़ पर उसको पकडने के लिये झुका मगर तब तक देर हो चुकी थी! उनका हाथ मेरी झुकी हुई नँगी गाँड की मदमस्त फ़ाँकों पर आ चुका था और वो मेरी गाँड मसलने लगे थे! मैने अपने एक हाथ से उनके हाथ को पकड के हटाना चाहा मगर उन्होने जवाब में मुझे ही अपने ऊपर गिरा लिया और बिस्तर में खींच के मुझे अपने आप से लिपटा लिया! इस लिपटा लिपटी में मेरी जाँघें उनकी जाँघों के बीच घुस गयी और उन्होने मुझे वहाँ दबा के दबोच लिया और फ़िर अपने एक हाथ से मेरी गाँड को दबा के रगडना जारी रखा!

उनकी उँगलियाँ मेरे छेद के पास और मेरी चिकनी दरार के दर्मियाँ बडे ही एक्स्पर्ट तरीके से घूम रही थीं जिससे मेरा गाँडू सुराख और मेरा गे जिस्म कुछ ही देर की रगड में उनकी रगड से रेस्पॉंड करने लगा! उनके ऊपर खींचने के दर्मियाँ मेरी निक्‍कर मेरे बदन से पूरी तरह अलग हो चुकी थी! अब मेरी शरम थोडी कम हुई मगर बिल्कुल खत्म नहीं हुई थी जिस कारण मैं डायरेक्टली उनकी आँखों में नहीं देख पा रहा था! उन्होने अचानक मुझे अपने तरफ़ खींचा, जिससे मेरा मुह सीधा उनके मुह से चिपक गया और उन्होने तुरन्त मेरे होंठ चूसना शुरु कर दिये! ये मेरी पहली किस थी! उसके पहले मैने गालों में दाँत कटवाये थे!

उन्होने मेरी पीठ पर हाथ रख कर मुझे अपने करीब जकड लिया था! और फ़िर दूसरे हाथ से मेरे पैर फ़ैला के अपने बदन के दोनो तरफ़ करवा दिये! अब मैं अपनी गाँड पूरी फ़ैलाये उनके जिस्म की सवारी कर रहा था! मुझे तब तक ये तो पता था कि गाँड मरवाने में बहुत दर्द होता है क्योंकि एक दो बार जब लडको ने अपना लँड मेरी गाँड के सुराख में घुसाना चाहा था तो मैं दर्द से चिहुँक गया था और उन्होने वैसा नहीं किया था! मगर यहाँ तो मैं किसी खरगोश की तरह एक चीते की गिरफ़्त में था, जो शायद मेरे साथ हर वो काम करने वाला था जो वो करना चाहता था!

ये हुमेर चाचा का वो रूप था जो मैने पहले कभी नहीं देखा था! पर सच्चाई तो ये थी कि लौंडेय्बाज़ हुमेर चाचा बहुत दिन से मेरी ताक में थे और सही मौका ढूँढ रहे थे! उसके पहले भी बिना समझे हुये मैं उनके चँगुल से कई बार बच चुका था मगर उस दिन मैं उनके बिछाये जाल में फ़ँस ही गया! उनके हाथ अब मेरी पहले से फ़ैली हुई गाँड को और ज़्यादा फ़ैला के मेरे छेद पर आ रहे थे! उनके मज़बूत गदराये जिस्म के दोनो तरफ़ फ़ैलने के कारण मेरी जाँघें तो दुखने भी लगी थी!

"अब जाना है चाचा... अब जाने दीजिये" मैने कहा!
"अरे चले जाना... ऐसी भी क्या जल्दी है... कह देना, चाचा ने सोने के लिये कह दिया था..." उन्होने मुझे थोडा हिला डुला के ऐसा अड्जस्ट किया कि अब मेरी गाँड सीधा उनके लँड से रगडने लगी और वो अपना बदन हल्का हल्का ऊपर उठाने लगे और मेरी गाँड का भीना भीना आनन्द लेने लगे!

"वाह बेटा वाह... बिल्कुल जैसा सोचा था वैसा पाया..."
"क्या चाचा?" मैने मासूमियत से पूछा!
"तेरा चिकना बदन बेटा... और क्या?" उन्होने कहा और इस बार अपने एक हाथ से अपने लँड को पकड के अपने सुपाडे को मेरे गुलाबी छेद पर रगडा!
"अआई... नहीं... चाचा नहीं..." अब मैं थोडा घबराया!
"डरो मत..." कह कर उन्होने अपने सुपाडे को प्रीकम के साथ मेरे छेद पर हक्ला सा दबाया मगर उसकी टक्‍कर मेरी सीलबन्द गाँड के टाइट चुन्‍नटदार सुराख से हुई!
"साली कसी हुई सील बन्द है... क्यों कभी किसी से करवाया नहीं?"
"क्या चीज़?" मैने समझते हुये भी उनसे नासमझ सा सवाल पूछा!
"यही बेटा... गाँड में लँड और क्या?"
"जी नहीं..." और कहते कहते जब मैने उनका इरादा समझा तो मैं पैनिक हो कर बोला "नहीं चाचा... और कुछ मत करियेगा प्लीज... बस ऐसे ही..."
"हाँ हाँ, ऐसे ही ऊपर ऊपर करूँगा... डरो नहीं... वरना तुम्हारी फ़ट जायेगी.... बस थोडा तेल लगा लूँ तो रगडने में आराम रहेगा...." कहकर उन्होने पास रखा नारियल के तेल का डिब्बा उठाया और काफ़ी सारा तेल अपने लँड पर चुपड लिया और वही हाथ आराम से मेरी गाँड पर रगड के साफ़ करते हुये इस बार जब अपनी तेल लगी उँगली मेरे छेद पर रखी तो मेरी गाँड उतनी टाइटनेस से उसका मुकाबला नहीं कर पायी और उन्होने उँगली से मेरी कुछ चुन्‍नटें फ़ैला दीं!
"आई... चाचा नहीं... नहीं..." मैं घबराया!
"डरो मत बेटा, डरो मत..." इस बार उनका तेल में डूबा हुआ सुपाडा आराम से मेरे सुराख पर और मेरी दरार में फ़िसलने लगा! उनके लँड की मज़बूती से मेरी गाँड कुछ तो नेचुरली ढीली पड के कुलबुलाने लगी मगर मैं बार बार अपनी गाँड बचाने के लिये भींच लेता था!

"चलो डरो मत... ऐसा करो, तुम अपने आप ही अपनी गाँड को मेरे लौडे पर रगडो..." मैने पहली बार उनके मुह से इतने नँगे शब्द सुने थे! उनसे मैं थोडा उत्तेजित भी हुआ! मैने अपने आप अपने घुटने मोड के अपनी गाँड थोडा आराम से उठा ली और हल्का सा बैठ के अपनी गाँड को उनके लँड पर रख कर रगडने लगा! अब मुझे मज़ा भी आने लगा था क्योंकि मैं ऊपर था इसलिये मैं जानता था कि जब तक मैं नहीं चाहूँगा वो मेरी गाँड में लँड नहीं घुसा पायेंगे! मैं मज़ा ले ले कर अपनी गाँड पर उनके लँड का मज़ा लेने लगा! फ़िर कुछ देर बाद उन्होने मेरे हाथ अपनी छाती पर रखवा लिये! मैं उनके ऊपर उखडू बैठ के मज़ा लेता रहा! उन्होने इस बीच जब अपना लँड ऊपर को खडा किया तो उसको अंदर घुसने से बचाने के लिये मैं भी थोडा और उचक गया!

उनका सुपाडा अब मेरी इनर थाईज़ के बीच फ़ँस गया था और मेरे सुराख पर दस्तक दे रहा था! मैं अपने पैर उनके दोनो तरफ़ मोडे हुये था! तभी उन्होने बडी ज़ोर से मेरे घुटनों पर हाथ मारा! उनके वैसा करने से मैं डिस-बैलेंस्ड हुआ, मेरे घुटने हिले और मैं उनके ऊपर ऑल्मोस्ट बैठ सा गया जिससे मेरी गाँड पर रखा उनका सुपाडा बडे ज़ालिम तरीके से, निसंकोच, एक झटके से मेरे गुलाबी सुराख को फ़ाडता हुआ, मेरी चुन्‍नटों को फ़ैलाता हुआ, सीधा मेरी गाँड की गहरायी में घुस गया! दर्द के मारे मेरी चीख निकल गयी और मैं फ़ौरन उठना चाहता था! मगर मुझे अपना बैलेंस नहीं मिला और उन्होने भी ना सिर्फ़ एक हाथ से मेरा मुह बन्द करके मेरी चीख का गला घोंट दिया, बल्कि दूसरे से मुझे जकड के अपने लँड पर बिठाये रखा और अपनी गाँड झटके से ऊपर ऐसी उठायी कि उनका बचा खुचा लँड भी मेरी गाँड में समाता चला गया और मेरी जाँघें उनके जिस्म से चिपक गयी! मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने एक तलवार मेरी गाँड में घुसा दी हो! मेरी गाँड दर्द से गर्म हो गयी! तुरन्त बाद उन्होने मुझे लपेट के बेड पर लिटाया के पलट दिया और वैसे ही गाँड में लँड दिये दिये मेरे ऊपर चढ गये और मेरी गाँड मारने लगे! अब मेरा मुह उनकी तकिया में घुस गया! मेरी आँख से दर्द के मारे आँसू आने लगे! मैं रोने लगा! लग रहा था कि मेरी गाँड, मेरे जिस्म से फ़ट के अलग हो जायेगी! कुछ देर में उनके धक्‍के तेज़ हो गये!
"अआह बेटा... किसके... लिये बचा... के रख रहा... था... आज... तेरा जीवन सफ़ल... कर दिया... मर्द के हाथ... तेरी सील... टूटी है... अब जीवन भर... लँड की चाहत... लगी रहेगी..." उन्होने चोदते चोदते कहा और कुछ देर में उन्होने मेरी गाँड में अपना वीर्य भर दिया!

जब उन्होने अपना लँड मेरी गाँड से बाहर खींचा तो "फ़च्चाक" से आवाज़ आयी और एक बार फ़िर उनके लँड के फ़्रिक्शन से मेरी गाँड दुख गयी! एक बार को तो मुझे लगा, जैसे टट्‍टी निकल जायेगी!

"जा, वहाँ कोने में गाँड धो ले..." उन्होने मुझ से कहा और मुझे एक ग्लास पानी दे दिया! जब मैने गाँड धोयी तो वो बुरी तरह से चरमरा गयी!
"अआह..." मैं करहाया! चुदायी के बाद अब मेरी गाँड ज़्यादा दुख रही थी! मुझसे चला भी नहीं जा रहा था! वहाँ से जाते जाते उन्होने मुझे 20 रुपये दिये!
"ये ले लो और ये सब किसी से कहना मत..." वो सब किसी से कहने का तो मेरा इरादा भी नहीं था! मैने चुप-चाप 20 रुपये ले लिये मगर जब सीढियों से उतरने में मेरे पैर हिले तो गाँड फ़ट के दुखने लगी! उस दिन मैं पैर फ़ैला के किसी तरह चला और ना उस दिन, ना उसके अगले दिन किसी के साथ खेला! तब कहीं जाकर मेरी गाँड थोडा ठीक हुई!अभी ट्रेन रुकी भी नहीं थी कि मुझे कम्पार्ट्मेंट के दरवाज़े पर ही राशिद भैया खडे दिख गये और मैने हाथ हिलाने के बाद जब उनको देखा तो पाया कि पिछले कुछ सालों में उनकी जवानी पर नमक की ज़बर्दस्त परत चढ चुकी थी! उनका जिस्म और जवानी पूरी तरह निखर चुके थे! वो मुस्कुराये तो मेरा मन मचल गया! उन्होने जब ट्रेन से उतर के मुझे गले लगाया तो उनकी जवानी के स्पर्श से मैं मस्त हो गया! मैने गले मिलने के बहाने उनका जिस्म और उनकी पीठ सहलायी और उनके मसल्स का मज़ा लिया!
"चलो, यार एक कुली कर लेते हैं, बहुत सामान है..." जब वो एक कुली से बात करने लगे तो मैं सिर्फ़ उनको देखता रहा और सोचता रहा कि काश उनके अंदर भी अपने बाप की आदत आ गयी हो तो मज़ा आ जाये! शादी के बाद तो शायद चूत लेकर सारा खुमार राशिद भैया की जवानी पर आ गया था!

मगर एक और सर्प्राइज़ अभी बाकी था! मैं जब कुली के साथ अंदर गया तो वहाँ एक ऐसा लडका बैठा दिखा कि मानो चाशनी में डूबा हुई रसमलाई हो! एक-दम कमसिन, नर्म, मुलायम, गोरा, चिकना, नमकीन और रसीला सा काशिफ़! काशिफ़, राशिद भैया के साले का बेटा था जो उसको अलीगढ से लेने आने वाले थे! इसलिये वो राशिद भैया के साथ वहाँ आया था! उस समय वो लाइट ब्लू कलर की डेनिम की कैपरी पहने था जो उसके घुटने के कुछ नीचे तक थी! ऊपर एक पिंक कलर की शर्ट, एक ब्लैक स्वेटर, एक कैप और एक सुंदर सी ब्लू जैकेट पहनी हुई थी! उसके होंठ गुलाब की पँखुडी की तरह थर्रा रहे थे! डार्क ब्राउन बाल, बिना किसी पार्टिंग के उड रहे थे! उससे हाथ मिलाने में ऐसा झटका लगा कि मुझे लगा कहीं मेरा लौडा चड्‍डी के अंदर ही ना झड जाये!

जब हम वहाँ से चले तो मैं आगे आगे कुली के साथ था और राशिद भैया एक सूटकेस लिये, हमसे पीछे चल रहे थे! मैने काशिफ़ के साथ मिलकर एक बैग पकडा हुआ था और लगातार उसको ही देखे जा रहा था! काशिफ़ को ठँड लग रही थी!
"क्यों पूरी पैंट नहीं है तुम्हारे पास?"
"जी है..."
"तो पहन के आते ना... यहाँ इतनी ठँड है..."
"जी पता नहीं था..." वो सर्दी से कंपकपा रहा था!
मैने सामान रखते समय प्रदीप को भी तरसी हुई नज़रों से काशिफ़ को काफ़ी देर तक घूरते हुये देखा! सामान रख कर राशिद भैया आगे बैठे! हमने कुछ सामान पीछे सीट पर भी रख लिया था जिस कारण मेरे और काशिफ़ के बैठने के लिये बहुत कम जगह बची! वो जब मुझसे चिपक के बैठा तो मज़ा आ गया! मैं उसे पहली ही नज़र में दिल दे बैठा! जैसे ही गाडी रोड पर आयी मैने हल्के से अपना हाथ काशिफ़ की जाँघ पर रख दिया! साला बडा नर्म और गर्म था! वैसे भी उसकी जाँघ काफ़ी देर से मेरी जाँघ से चिपक के मेरे अंदर ठरक पैदा कर चुकी थी! रास्ते में राशिद भैया इधर उधर की बातें करने लगे और प्रदीप और मैं उनकी बातों का जवाब देते रहे! मेरा दिल तो कर रहा था कि वहीं काशिफ़ के साथ चालू हो जाऊँ! मैने अपना एक हाथ उसके कंधे पर रख दिया था! उसको शायद सर्दी में मेरे बदन की गर्मी अच्छी लग रही थी!

मैने रूम पर राशिद भैया के लिये गौरव से लेकर एक फ़ोल्डिंग कोट का इन्तज़ाम कर दिया था! मगर मुझे उनके साथ काशिफ़ के आने का बिल्कुल आइडिआ नहीं था! प्रदीप हमें छोड के चला गया! उसने रूम तक सामान पहुँचाने में भी मदद की और जब राशिद भैया उसको पैसे देने लगे तो वो बोला!
"जी पैसे बाद में ले लूँगा... अम्बर मेरा पुराना फ़्रैंड है, इतनी जल्दी भी क्या है?"
रूम में राशिद भैया ने चेंज किया! उन्होने जल्दी से एक लुँगी पहन ली... अआह... लुँगी देख कर मुझे उनके बाप के साथ गुरज़े हुये दिन याद आ गये! वो जल्दी से एक रज़ाई में घुस गये!

"भैया, मैं और काशिफ़ साथ में सो जायेंगे..." हम लोगों के सामने उस समय और कोई चारा भी नहीं था! लुँगी और स्वेटर में राशिद भैया तो कामदेव लग रहे थे! मेरी नज़र बार बार लुँगी में झूलते हुये उनके लँड पर जा रही थी! फ़िर काशिफ़ जब बाथरूम से लाल रँग का पजामा पहन के निकला तो मैं तो मस्त हो गया! फ़िर जब मैं बाथरूम में घुसा तो समझ नहीं आया कि क्या करूँ! मेरा लँड पूरा खडा था! मैने पहले राशिद भैया की पैंट टँगी देखी और उसके अंदर उनकी फ़्रैंची की ब्लू चड्‍डी... तो उसको लेकर मैने उसमें मुह घुसा के उनकी मर्दानगी की खुश्बू सूंघी! फ़िर मैने काशिफ़ की कैपरी को सूंघा और फ़िर उसकी लाइनिंग को चाटा, जहाँ शायद उसकी गाँड आती होगी!
अब मेरी ठरक पूरी बेक़ाबू हो चुकी थी! किसी तरह मैं एक लोअर और टी-शर्ट पहन के बाहर निकला! तब तक राशिद भैया ने काशिफ़ के लिये एक कम्बल निकाल दिया था! मैं अपनी पलँग पर रज़ाई में लेटा और वो कम्बल ओढ के! सोते सोते साढे तीन बज गये! कुछ देर बाद काशिफ़ ने मेरी तरफ़ मुह कर लिया तो उसकी साँसें सीधा मेरे चेहरे से टकराने लगीं! उसकी गर्म साँसों में गुलाब सी खुश्बू थी! कुछ देर में हम सब सो गये!

उसके करीब घंटे भर बाद मुझे काशिफ़ करवट बदलता महसूस हुआ! उसका कम्बल, दिल्ली की सर्दी के सामने कुछ नहीं था! राशिद भैया तब तक सो चुके थे!
"क्या हुआ?" मैने पूछा!
"जी, सर्दी लग रही है..."
"अच्छा आओ, कम्बल और रज़ाई मिला के ओढ लेते हैं..." कहकर मैने उसको अपनी रज़ाई में सुला लिया! जब वो मेरे बगल में आया तो उसका गर्म जिस्म महसूस करके मुझसे ना रहा गया और मैने अपनी एक जाँघ सोने के बहाने उसकी जाँघ पर चढा दी! मैं तो साले की उसी समय गाँड मार देना चाहता था, मगर बगल में भैया सो रहे थे! इसलिये वैसे ही मज़ा लेता रहा और कुछ देर अपना लँड उसकी कमर से रगड के सो गया! अगले दिन से साला मुझे बडा सुंदर लगने लगा! अब मेरा दिल उस पर पूरी तरह से आ गया! उस दिन जब राशिद भैया अपने काम से गये तो वो काशिफ़ को भी अपने साथ ले गये! वैसे दोनो की जोडी बडी सैक्सी थी! एक मज़बूत लोहे का खम्बा... दूसरा मक्खन सा, गुलाबी नाज़ुक सी फ़ुलझडी...

कॉलेज में मेरी दोस्ती एक और ग्रुप से भी होने लगी क्योंकि उसमें एक लडका था आकाश गौड जिसको देखते ही मैं उसका आशिक़ हो गया था! उस दिन आकाश एक व्हाइट पैंट पहने था और ऊपर एक ग्रे स्वेटर! वो लम्बा और गोरा था और बडा सुंदर और चँचल सा मर्दाना चिकना लौंडा! उसके चक्‍कर में उसके बाकी ग्रुप से भी जान पहचान हो गयी!

उसमें अभिषेक त्यागी था, मॄत्युंजय, सूर्यकांत, इमरान और नफ़ीस! मेरा अगला निशाना आकाश था... मगर उसको फ़ँसाना मुश्किल था क्योंकि वो पूरा ग्रुप ही साला स्ट्रेट था! वो सब हमेशा लडकियों की बातें करते, बीअर पीते और गाली गलौच करते, मगर मैने भी अपना जाल डालना शुरु कर दिया! आकाश क्लासेज के बाद ग्राउँड पर क्रिकेट प्रैक्टिस करता था! आकाश के चेहरे पर लडकपन वाली चँचल सी कशिश थी और साथ में हल्का हल्का गुलाबी मर्दानापन, उसके बदन हाथ कटावदार और सुडौल थे! वो जब बॉलिंग करने के लिये रन-अप लेता तो मैं बस उसकी गाँड की फ़ाँकों को ही निहारता रहता! उसकी गाँड बडी मस्त होकर कभी टाइट होती कभी ललचाते हुये हिलती थी और साथ में उसकी मस्त जाँघें मुझ पर जादू करतीं!

मैं उस दिन आकाश को निहार ही रहा था कि पीछे से आवाज़ आयी "इसको मत देख, ये तेरे काम नहीं आयेगा.. हा हा हा हा..."
मैने जब पलट के देखा तो देखा, वहाँ धर्मेन्द्र था... उसके कमेंट से मैं झेंप गया!
"मैं तो बस..."
"हाँ हाँ बेटा, तेरे जैसों को खूब जानता हूँ... साले, चिकने को देख कर सपने देख रहा होगा हा हा हा हा... चल आज मेरी ठरक चढी हुई है, चल रूम पर ले चल... तेरी गाँड में लँड डाल दूँ जानेमन..." धर्मेन्द्र के सीधे प्रपोज़ल से मैं मस्त तो हो गया!
"अरे यार, आज भी कोई आया हुआ है..."
"बहन के लौडे, तू कमरे पर क्या गाँड मरवाने के लिये लौंडों को बुलाता रहता है?" धर्मेन्द्र हल्का सा इरिटेट हुआ!
"नहीं यार, घर से कोई ना कोई आ जाता है..."
"बेटा, गाँड कब देगा? साला लँड अब तेरे नाम से फ़नफ़नाता है... एक बार तो तेरी मारने का दिल है अब... साले, वैसे चूसता तो तू बढिया है... अब ज़रा तेरी गाँड की गहरायी में घुसने का मन है..."
"क्या बताऊँ यार..." अभी हमारी बात हो ही रही थी कि विनोद उधर आ गया और हमने टॉपिक चेंज कर दिया और उसके कुछ देर बाद इमरान और आकाश भी आ गये! इमरान भी पटना का खूबसूरत सा चिकना लडका था जिसमें काफ़ी नमक और सैक्स था!
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